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सर्वकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 792, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 792

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सेइक्षणे धाञा प्रभु गङ्गाते पड़िल।
नित्यानन्द-हरिदास धरि' उठाइल ॥ 245 ॥
विजय आचार्येर घरे से रात्रे रहिला।
प्रातःकाले भक्त सबे घरे लञा गेला ॥ 246 ॥
अनुवाद-एक दिन महाप्रभुके नृत्यके अन्तमें एक
ब्राह्मणीने आकर उनके चरणोंको पकड़ लिये। वह
ब्राह्मणी बार-बार उनके चरणोंकी धूलिको लेने लगी,
उसको ऐसा करते देखकर महाप्रभुको बहुत दुःख हुआ।
उसी समय महाप्रभु दौड़कर गङ्गामें जाकर कूद पड़े।
श्रीनित्यानन्द प्रभु तथा श्रीहरिदास ठाकुरने जाकर उन्हें
बाहर निकाला। उस रात्रि महाप्रभु विजय आचार्यके घर
पर ही रहे। प्रातःकाल सभी भक्त उन्हें घर ले
गये॥ 243-246 ॥
अनुभाष्य-इस घटनाका चैतन्यभागवतमें वर्णन नहीं
है॥ 243-246 ॥
उच्चस्वरमें 'गोपी' 'गोपी' पुकारते हुए महाप्रभु :-
एकदिन गोपीभावे गृहेते बसिया।
'गोपी' 'गोपी' नाम लय विषण्ण हञा ॥ 247 ॥
अनुवाद-एक दिन अपने घरमें बैठे हुए महाप्रभु
गोपीभावमें आविष्ट होकर दुःखित हृदयसे 'गोपी' 'गोपी'
पुकार रहे थे॥ 247 ॥
मर्म-अनभिज्ञ पाषण्डी छात्रका महाप्रभुको मना करना :-
एक पड़ुया आइल प्रभुके देखिते।
'गोपी' 'गोपी' नाम शुनि' लागिल बलिते ॥ 248 ॥
“कृष्णनाम ना लओ केने, कृष्णनाम-धन्य।
'गोपी' 'गोपी' बलिले वा किवा हय पुण्य ॥"249 ॥
अनुवाद-उस समय एक छात्र महाप्रभुसे मिलने
आया और महाप्रभुके मुखसे 'गोपी' 'गोपी' नाम सुनकर
वह कहने लगा,- “आप कृष्णनाम क्यों नहीं लेते?
कृष्णनाम तो परम धन्य है। 'गोपी' 'गोपी' कहनेसे क्या
कोई पुण्य होता है? ॥" 249 ॥
प्रहार करनेके लिये महाप्रभुका उसके
पीछे दौड़ना; छात्रका भागना :-
शुनि' प्रभु क्रोधे कैल कृष्णे दोषोद्गार।
ठेङ्गा लञा उठिला प्रभु पड़ुया मारिबार ॥ 250 ॥
अनुवाद-उसकी बात सुनकर महाप्रभु क्रोधित
होकर श्रीकृष्णके दोषोंका वर्णन करने लगे और लाठी
लेकर छात्रको मारनेके लिये उठ खड़े हुए॥ 250 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य-'दोषोद्गार' - परिहासपूर्वक
दोषारोपण ॥ 250 ॥
भये पलाय पड़ुया, प्रभु पाछे पाछे धाय।
आस्ते व्यस्ते भक्तगण प्रभुरे रहाय ॥ 251 ॥
अनुवाद-वह छात्र डरकर भागा और महाप्रभु
उसके पीछे दौड़े। जैसे-तैसे करके भक्तोंने महाप्रभुको
रोका ॥ 251 ॥
महाप्रभुको सान्त्वना :-
प्रभुरे शान्त करि' आनिल निज घरे।
पड़ुया पलाया गेल पड़ुया-सभारे ॥ 252 ॥
छात्रसमाजमें महाप्रभुके प्रति कटु बातें और क्रोध :-
पड़ुया सहस्र याहाँ पड़े एकठाञि।
प्रभुर वृत्तान्त द्विज कहे ताहाँ याइ ॥ 253 ॥
अनुवाद-भक्त महाप्रभुको शान्त करके उनके घरपर
ले आये। वह छात्र भागकर छात्रोंकी सभांमें जा पहुँचा
जहाँ एक साथ सैकड़ों छात्र पढ़ रहे थे। उस ब्राह्मण
छात्रने उस सभामें महाप्रभुका वृत्तान्त सुनाया ॥ 252-253 ॥
शुनि' क्रोध कैल सब पड़ुयार गण।
सबे मेलि' करे तब प्रभु निन्दन ॥ 254 ॥
“सब देश भ्रष्ट कैल एकला निमाञि।
ब्राह्मण मारिते चाहे, धर्मभय नाञि ॥ 255 ॥
256 | श्रीचैतन्यचरितामृत