श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ 17/196-203
होकर सदा हिन्दुओंके देवताका नाम ले रहे हो, इसका
क्या कारण है?'॥ 196-197॥
म्लेच्छ कहे,–'हिन्दुरे आमि करि परिहास।
केह केह–कृष्णदास, केह–रामदास॥ 198॥
केह–हरिदास, सदा बले 'हरि' 'हरि'।
जानि कार घरे धन करिबेक चुरि॥ 199॥
सेइ हैते जिह्वा मोर बले 'हरि' 'हरि'।
इच्छा नाहि, तबु बले,–कि उपाय करि॥' 200॥
अनुवाद–म्लेच्छने कहा,–'मैंने हिन्दुओंसे परिहासमें
कहा कि तुम लोग कोई कृष्णदास हो, कोई रामदास
हो और कोई हरिदास हो। तुम सदा 'हरि' 'हरि' बोलते
हो। लगता है कि किसीके घरमें चोरी करोगे? तबसे
मेरी जिह्वा भी 'हरि' 'हरि' बोलने लगी। मेरी इच्छा नहीं
है, तो भी यह बोलना नहीं छोड़ती है, मैं क्या उपाय
करूँ?'॥ 198-200॥
आर म्लेच्छ कहे, शुन–'आमि त' एइमते।
हिन्दुके परिहास कैनु से दिन हइते॥ 201॥
जिह्वा कृष्णनाम करे, ना माने वर्ज्जन।
ना जानि, कि मन्त्रौषधि जाने हिन्दुगण॥' 202॥
अनुवाद–और एक म्लेच्छ कहने लगा,–'सुनो!
मैंने भी जिस दिनसे इसी प्रकार हिन्दुओंसे परिहास
किया था, उसी दिनसे मेरी जिह्वा भी कृष्णनाम करने
लगी है और अब यह मेरे बहुत रोकनेपर भी रुकती
नहीं है। न जाने ये हिन्दू कौनसी मन्त्रौषधि जानते
हैं?'॥ '201-202॥
अमृतप्रवाह भाष्य–काजीने कहा,–"हे गौरहरि! मैंने
जिस भी म्लेच्छ पियादेसे पूछा, उसने यही उत्तर
दिया,–मैंने हिन्दुओंको कहा, 'तुम लोग कोई कोई
'कृष्णदास', 'रामदास', 'हरिदास'–इस नामके परिचयसे
'हरि' 'हरि' बोलते हो, किन्तु 'हरि' 'हरि' शब्दका अर्थ
तो 'चोरी करता हूँ' 'चोरी करता हूँ' होता है। ऐसा
लगता है कि दूसरोंके घरोंसे धन चोरी करनेके
अभिप्रायसे 'हरि' 'हरि' ('हरण करूँ' 'हरण करूँ') ऐसा
कहते हो।' मैंने जिस दिनसे उनके साथ यह परिहास
किया, उस दिनसे मेरी जिह्वा इच्छा न होनेपर भी 'हरि'
'हरि' बोल रही है, मैं इसे रोकनेका कोई उपाय नहीं
कर पा रहा हूँ॥" 196-202॥
अनुभाष्य–'परिहास'–चार प्रकारके नामाभासोंमें एक।
जैसे, (भाः 6/2/14)–
“साङ्केत्यं पारिहास्यं वा स्तोभं हेलनमेव वा।
वैकुण्ठनामग्रहणमशेषाघहरं विदुः॥”
“सङ्केत (दूसरी वस्तुको लक्ष्य करके भगवन्नाम
उच्चारण), परिहास (उपहासपूर्वक नामोच्चारण), स्तोभ
(तिरस्कारपूर्वक नामोच्चारण) और हेला (अनादरपूर्वक
नामोच्चारण), ये चार छाया नामाभास हैं, विद्वान लोग
ऐसे नामाभासको समस्त पापोंका नाशक मानते हैं।”
क्योंकि इनका उच्चारण जड़ीय अक्षर-उच्चारणमात्र नहीं
है। नामाभास नित्य-वास्तव वस्तुको लक्ष्य करके
विष्णुकी स्मृति जाग्रत कराता है, यह जीवोंकी
विषय-वासनाओंका विनाश करता है और इसके
फलस्वरूप सेवोनमुख मुक्तजीवोंके द्वारा उच्चारित शुद्ध
नाममें बद्धजीवका अधिकार उदित होता है॥ 198-202॥
काजीसे स्मार्त्त पाखण्डियोंका अभियोग :–
एत शुनि' ता सभारे घरे पाठाइल।
हेनकाले पाषण्डी हिन्दु पाँच-सात आइल॥ 203॥
अनुवाद–यह सुनकर मैंने उन सबको अपने
घरोंमें भेज दिया। तब पाँच-सात पाषण्डी हिन्दू मेरे पास
आये॥ 203॥
अनुभाष्य–'पाषण्डी'–सांसारिक कर्मोंमें श्रद्धा रखनेवाले,
अनेक ईश्वरोंको माननेवाले और विष्णु-वैष्णव-द्वेषी
मूर्त्तिपूजक (श्रीविग्रहमें काष्ठ-पत्थरकी बुद्धि
रखनेवाले)॥ 203॥
250 | श्रीचैतन्यचरितामृत