श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 788, कुल 2549 में से
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उसके हठात् ही जिह्वा और कानोंपर अवतीर्ण होनेपर
वह स्वयं निष्फल हो जाता है—इन लोगोंका ऐसा
मानना है। अहो! प्रत्यक्ष ज्ञानको ही सर्वोच्च ज्ञान
माननेवाले ये लोग श्रौतपन्थाके इतने अधिक विरोधी
हैं!!॥ 211-212॥
ग्रामेर ठाकुर तुमि, सब तोमार जन।
निमाइ बोलाइया तारे करह वर्ज्जन॥'213॥
अनुवाद—आप तो इस ग्रामके स्वामी हैं और हम
सभी आपकी प्रजा हैं। इसलिये आप कृपाकर निमाइको
बुलाकर उसे निष्कासित कर दीजिये॥'213॥
अनुभाष्य—इसके बाद उन्होंने काजीसे कहा, —'आप
इस स्थानके सर्वस्व कर्त्ता-धर्त्ता हैं, ग्रामके सभी लोग
आपके अधीन हैं, इसलिये आप निमाइ पण्डितको
अपने पास बुलाकर उसे निष्कासित कर दो॥'213॥
काजीके द्वारा उनको सान्त्वना-प्रदान :—
तबे आमि प्रीतिवाक्य कहिल सबारे।
'सबे घरे याह, आमि निषेधिव तारे॥'214॥
अनुवाद—उनकी प्रार्थना सुनकर मैंने उन सबसे
प्रीतिपूर्वक कहा, —'आप सभी अपने-अपने घर जाँय, मैं
निमाइको सङ्कीर्त्तनके लिये मना कर दूँगा॥'214॥
महाप्रभुके प्रति काजीकी उक्ति :—
हिन्दुर ईश्वर बड़ येइ नारायण।
सेइ तुमि हओ,—हेन लय मोर मन॥'215॥
अनुवाद—हिन्दुओंके सबसे बड़े ईश्वर जो नारायण
हैं, मेरा मन कहता है कि तुम वही हो॥'215॥
महाप्रभुकी कृपापूर्ण उक्ति :—
एत शुनि' महाप्रभु हासिया हासिया।
कहिते लागिला प्रभु काजीरे छुँइया॥ 216॥
नामाभाससे पापक्षय :—
“तोमार मुखे कृष्णनाम,—ए बड़ विचित्र।
पापक्षय गेल, हैला परम पवित्र॥ 217॥
'हरि' 'कृष्ण' 'नारायण'—लैले तिन नाम।
बड़ भाग्यवान् तुमि, बड़ पुण्यवान्॥'218॥
अनुवाद—ऐसा सुनकर महाप्रभु हँसते-हँसते काजीको
स्पर्श करके कहने लगे, —“यह बड़ी ही विचित्र बात है
कि तुम्हारे मुखसे कृष्णनाम निकल रहा है। इस
कृष्णनामसे तुम्हारे समस्त पाप नष्ट हो गये हैं तथा
तुम परम पवित्र हो गये हो। तुमने 'हरि', 'कृष्ण' और
'नारायण'—इन तीन नामोंका उच्चारण किया है। तुम
बहुत ही भाग्यवान् और पुण्यवान् हो॥"216-218॥
अनुभाष्य—काजीके मुखमें नामाभास उदित हुआ
था॥217-218॥
काजीकी दैन्योक्ति :—
एत शुनि' काजीर दुइ चक्षे पड़े पानि।
प्रभुर चरण छुँइ बले प्रियवाणी॥ 219॥
“तोमार प्रसादे मोर घुचिल कुमति।
एइ कृपा कर,—येन तोमाते रहु भक्ति॥"220॥
अनुवाद—ऐसा सुनकर काजीके दोनों नेत्रोंसे अश्रु
प्रवाहित होने लगे और वह महाप्रभुके चरणकमलोंको
स्पर्श करके प्रियवाणी कहने लगा, —“आपकी कृपासे
मेरी कुमति दूर हो गयी है। अब आप मुझपर ऐसी
कृपा करें जिससे मेरे हृदयमें आपके प्रति भक्ति
रहे॥"220॥
महाप्रभुकी उक्ति :—
प्रभु कहे, —“एक दान मागिये तोमाय।
सङ्कीर्त्तन बाद यैछे नहे नदीयाय॥"221॥
अनुवाद—महाप्रभुने कहा, —“मैं आपसे एक दान
माँगता हूँ कि नदियामें सङ्कीर्त्तनमें कभी भी बाधा न
हो॥'221॥
अनुभाष्य—जिससे नवद्वीपमें श्रीकृष्णनाम-कीर्त्तनमें
कोई बाधा न हो॥ 221॥
252 | श्रीचैतन्यचरितामृत