श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
करनेसे लोक-लज्जा और उनके धर्म एवं कीर्त्तिकी
हानि होती है॥ 49-53॥
अमृतानुकणिका-मनुसंहिता 4/91-
“न राज्ञः प्रतिगृह्णन्ति प्रेत्य श्रेयोऽभिकाङ्क्षिणः।”
“जो परलोककी मङ्गल कामना करते हैं, उन्हें
राजधन स्वीकार नहीं करना चाहिये।” हरिभक्तिविलास
(11/746) में भी ऐसी उक्ति देखी जाती है-
“न राज्ञः प्रतिगृह्णीयान्न शूद्रात् पतितादपि।
नान्यस्माद् याचकत्वञ्च निन्दिताद्वर्जयेद्बुधः॥”
“राजा, शूद्र या पतित व्यक्तिसे कोई वस्तु स्वीकार
नहीं करनी चाहिये एवं अन्य निन्दित व्यक्तिसे भी किसी
वस्तुकी याचना नहीं करना चाहिये॥” 49-53॥
महाप्रभु और श्रीअद्वैतप्रभु-एक दूसरेके मर्मज्ञ :-
आचार्येर अभिप्राय प्रभु मात्र बुझे।
प्रभुर गम्भीर वाक्य आचार्य समुझे॥ 54॥
एइ त' प्रस्तावे आछे बहुल विचार।
ग्रन्थ-बाहुल्येर भये नारि लिखिवार॥ 55॥
अनुवाद-श्रीअद्वैताचार्यके अभिप्रायको केवल महाप्रभु
बूझ पाते हैं और महाप्रभुके वाक्यके गम्भीर अर्थको
श्रीअद्वैताचार्य ही समझ सकते हैं। इस सम्बन्धमें अनेक
विचार हैं, परन्तु ग्रन्थके विशाल होनेके भयसे मैं उन्हें
यहाँ नहीं लिख रहा हूँ॥ 54-55॥
(5) यदुनन्दनाचार्य-शाखा :-
श्रीयदुनन्दनाचार्य—अद्वैतेर शाखा।
ताँर शाखा-उपशाखा-गणेर नाहि लेखा॥ 56॥
वासुदेव दत्तेर तेंहो कृपार भाजन।
सर्वभावे आश्रियाछे चैतन्य-चरण॥ 57॥
अनुवाद-श्रीयदुनन्दनाचार्य श्रीअद्वैताचार्यकी शाखा
हैं और उनकी शाखाओं और उपशाखाओंकी गणना
इतनी है कि उन्हें लिखना सम्भव नहीं है। उन्होंने
वासुदेव दत्तकी कृपा प्राप्त की और सब प्रकारसे
श्रीचैतन्य महाप्रभुके चरणकमलोंका आश्रय ग्रहण
किया॥ 56-57॥
अनुभाष्य-'श्रीयदुनन्दनाचार्य'-ये श्रीरघुनाथदास
गोस्वामीके पाञ्चरात्रिकी-दीक्षागुरु हैं। चैःचः अन्त्यलीला,
6/160-169 संख्या द्रष्टव्य है।
'वासुदेव दत्त'-गौरगणोद्देशदीपिका श्लोक 140-
“व्रजे स्थितौ गायकौ यौ मधुकण्ठ-मधुव्रतौ।
मुकुन्द-वासुदेवौ तौ दत्तौ गौराङ्ग-गायकौ ॥ 140 ॥”
“व्रजके मधुकण्ठ और मधुव्रत नामक गायक अब
श्रीमुकुन्द दत्त और श्रीवासुदेव दत्त नामक श्रीगौराङ्गदेवके
गायक हैं।” चैःचः आदिलीला, 10/41 द्रष्टव्य है॥ 57॥
(6) भागवताचार्य, (7) विष्णुदास,
(8) चक्रपाणि, (9) अनन्त आचार्य :-
भागवताचार्य, आर विष्णुदासाचार्य।
चक्रपाणि आचार्य, आर अनन्त आचार्य॥ 58॥
अनुवाद-भागवाताचार्य, विष्णुदासाचार्य, चक्रपाणि
आचार्य और अनन्त आचार्य, ये श्रीअद्वैताचार्यकी
शाखाएँ हैं॥ 58॥
अनुभाष्य-'भागवताचार्य'-ये पहले श्रीअद्वैतप्रभुके
गणोंमें और बादमें श्रीगदाधरके गणोंमें प्रविष्ट हुए।
यदुनन्दनदासके द्वारा लिखित 'शाखा-निर्णयामृत' ग्रन्थके
छठे श्लोकमें-
“वन्दे भागवताचार्यं गौराङ्ग-प्रियपात्रकम्।
येनाकारि महाग्रन्थो नाम्ना 'प्रेमतराङ्गिणी'॥”
“मैं श्रीगौराङ्ग महाप्रभुके प्रियपात्र श्रीभागवताचार्यको
प्रणाम करता हूँ, जिन्होंने 'प्रेमतराङ्गिणी' नामक महाग्रन्थकी
रचना की है।” श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 195 और 203वाँ
श्लोक-
“कर्पूरमञ्जरी श्याममञ्जरी 'श्वेतमञ्जरी'।
विलासमञ्जरी कामलेखा च मौनमञ्जरी ॥ 195 ॥
निर्मिता पुस्तिका येन कृष्णप्रेमतराङ्गिणी।
'श्रीमद्भागवताचार्यो' गौराङ्गात्यन्तवल्लभः ॥ 203 ॥”
बारहवाँ अध्याय | 135
[ 12/58-64
“श्वेतमञ्जरी श्रीगौराङ्गके अत्यन्त प्रिय वही
श्रीमद्भागवताचार्य हैं, जिन्होंने ‘कृष्णप्रेमातरङ्गिणी’ नामक
ग्रन्थकी रचना की है।” चैःचः आदिलीला, 10/113
संख्या द्रष्टव्य है।
‘विष्णुदासाचार्य’—ये खेतरि-महोत्सवके समय अच्युतानन्द
प्रभुके साथ गये थे (भक्तिरत्नाकर की दशम तरङ्ग
द्रष्टव्य है)।
‘अनन्त आचार्य’—श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 165वाँ
श्लोक—
“अनन्ताचार्यगोस्वामी या सुदेवी पुरा व्रजे॥ 165 ॥”
“व्रजकी सुदेवी अब श्रीअनन्ताचार्य गोस्वामी हैं।”
ये श्रीअद्वैतप्रभुके गणोंमें रहनेपर भी, बादमें श्रीगदाधर-शाखामें
प्रविष्ट हुए। चैःचः आदिलीला 8वाँ अध्याय संख्या
59-60 द्रष्टव्य है। शाखा-निर्णयामृत 11 श्लोक—
“वन्देनन्ताद्भुतरसमनन्ताचार्यसंज्ञकम्।
लीलानन्ताद्भुतमयं गौरप्रेम्णो हि भाजनम्॥”
इनके शिष्य हरिदास पण्डित गोस्वामी वृन्दावनमें
श्रीगोविन्ददेवजीकी सेवाके अध्यक्ष थे। उनके शिष्य
श्रीराधाकृष्ण गोस्वामी ‘साधन-दीपिका’ ग्रन्थके रचयिता
हैं (भक्तिरत्नाकर द्वितीय तरङ्ग) ॥ 58 ॥
(10) नन्दिनी, (11) कामदेव, (12) चैतन्यदास,
(13) दुर्लभविश्वास, (14) वनमालिदास :-
नन्दिनी, आर कामदेव, चैतन्यदास।
दुर्लभविश्वास, आर वनमालिदास ॥ 59 ॥
अनुवाद—नन्दिनी, कामदेव, चैतन्यदास, दुर्लभ विश्वास
और वनमाली दास श्रीअद्वैताचार्यकी अन्य शाखाएँ
हैं ॥ 59 ॥
अनुभाष्य—‘नन्दिनी’—श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 89वाँ
श्लोक—
“नन्दिनी जङ्गली ज्ञेया जया च विजया क्रमात्॥ 89 ॥”
“श्रीसीतादेवीकी परिचारिका और शिष्या जया अब
नन्दिनी हुई हैं।” ये सम्भवतः श्रीसीतादेवीकी गर्भजात
श्रीअद्वैताचार्यकी कन्या हैं (?) ॥ 59 ॥
(15) जगन्नाथ, (16) भवनाथ कर,
(17) हृदयानन्द, (18) भोलानाथ :-
जगन्नाथ कर, आर कर भवनाथ।
हृदयानन्द सेन, आर दास भोलानाथ ॥ 60 ॥
(19) यादव, (20) विजय, (21) जनार्द्दन,
(22) अनन्तदास, (23) कानुपण्डित, (24) नारायण :-
यादवदास, विजयदास, जनार्द्दन।
अनन्तदास, कानुपण्डित, दास नारायण ॥ 61 ॥
(25) श्रीवत्स, (26) हरिदास ब्रह्मचारी, (27) पुरुषोत्तम
और (28) कृष्णदास ब्रह्मचारी :-
श्रीवत्स पण्डित, ब्रह्मचारी हरिदास।
पुरुषोत्तम ब्रह्मचारी, आर कृष्णदास ॥ 62 ॥
(29) पुरुषोत्तम पण्डित, (30) रघुनाथ,
(31) वनमाली, (32) वैद्यनाथ :-
पुरुषोत्तम पण्डित, आर रघुनाथ।
वनमाली कविचन्द्र, आर वैद्यनाथ ॥ 63 ॥
(33) लोकनाथ, (34) मुरारि पण्डित,
(35) हरिचरण, (36) माधव पण्डित :-
लोकनाथ पण्डित, आर मुरारि पण्डित।
श्रीहरिचरण, आर माधव पण्डित ॥ 64 ॥
अनुवाद—जगन्नाथ कर, भवनाथ कर, हृदयानन्द
सेन और भोलानाथ दास, यादवदास, विजयदास, जनार्द्दन,
अनन्तदास, कानुपण्डित, नारायण दास, श्रीवत्स पण्डित,
हरिदास ब्रह्मचारी, पुरुषोत्तम ब्रह्मचारी, कृष्णदास, पुरुषोत्तम
पण्डित, रघुनाथ, वनमाली कविचन्द्र, वैद्यनाथ, लोकनाथ
पण्डित, मुरारि पण्डित, श्रीहरिचरण और माधव पण्डित
श्रीअद्वैताचार्यकी अन्य शाखाएँ हैं ॥ 60-64 ॥
अनुभाष्य—‘हरिदास ब्रह्मचारी’ की गणना श्रीअद्वैताचार्य
और श्रीगदाधर पण्डित, दोनोंके गणोंमें होती है।
शाखानिर्णयामृतके नौवें श्लोकमें—
“श्रीयुतं हरिदासाख्यं ब्रह्मचारिमहाशयम्।
परमानन्द-सन्दोहं वन्दे भक्त्या मुदाकरम्॥”
“श्रीहरिदास ब्रह्मचारी नामक महाशय परमानन्दके
136 | श्रीचैतन्यचरितामृत
12/62–72 ]
भण्डार, जो भक्तोंको आनन्द प्रदान करनेवाले हैं, मैं
उनकी वन्दना करता हूँ॥” 62 ॥
क्रु
जलाभावे कृश शाखा शुकाइया मरे ॥ 69 ॥
(37) विजय, (38) श्रीराम पण्डित :-
विजय पण्डित, आर पण्डित श्रीराम।
असंख्य अद्वैत-शाखा कत लइब नाम ॥ 65 ॥
अनुवाद—विजय पण्डित और श्रीराम पण्डित भी
श्रीअद्वैताचार्यकी शाखा हैं। श्रीअद्वैताचार्यकी असंख्य
शाखाएँ हैं, मैं कितनोंका नाम उल्लेख करूँ ? ॥ 65 ॥
अनुभाष्य—‘श्रीराम पण्डित’—ये श्रीवास पण्डितके
छोटे भाई हैं। श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 90वाँ श्लोक—
“पर्वताख्यो मुनिवरो य आसीन्नारदप्रियः।
स रामपण्डितः श्रीमांस्तत् कनिष्ठसहोदरः ॥ 90 ॥”
“श्रीनारदके अत्यन्त प्रिय श्रीपर्वत नामक श्रेष्ठ
मुनि ही अब श्रीवास पण्डितके कनिष्ठ भ्राता श्रीमान्
राम पण्डित हैं।” चैःचः मध्यलीला, 13/39 संख्या
द्रष्टव्य है॥ 65 ॥
श्रीगौरकृपाके बलपर सारग्राही-अद्वैतदासोंकी वृद्धि :-
मालि-दत्त जल अद्वैत-स्कन्ध योगाय।
सेइ जले जीये शाखा, —फुल, फल हय ॥ 66 ॥
अनुवाद—मूल माली श्रीचैतन्य महाप्रभुके द्वारा
दिया गया जल श्रीअद्वैत स्कन्धके माध्यमसे उसकी
शाखाओं तक पहुँचा, जिसके कारण वे फूल और
फलोंसे लद गयीं ॥ 66 ॥
दुर्भाग्यसे असार अद्वैतदासाभिमानियोंके द्वारा
ही श्रीगौर-विरोध और श्रीगौरकृपाके
अभावसे उनका ध्वंस :-
इहार मध्ये मालि-पाछे कोन शाखागण।
ना माने चैतन्य-माली दुर्देव कारण ॥ 67 ॥
सृजाइल, जीयाइल, ताँरे ना मानिला।
कृतघ्न हइला, ताँरे स्कन्ध क्रु
अनुवाद—पहले श्रीअद्वैताचार्यके सभी शिष्य महाप्रभुको
मानते थे, परन्तु महाप्रभुके अप्रकट होनेके बाद
श्रीअद्वैताचार्यके कोई-कोई शिष्य अपने दुर्भाग्यके कारण
उनके मार्गसे भटक गये। महाप्रभुरूपी जिस स्कन्धने
उनको जन्म दिया और उनका पालन-पोषण किया,
श्रीअद्वैताचार्यकी कुछ शाखाएँ (शिष्य) उसको न
मानकर कृतघ्न हो गयीं, इस कारण स्कन्ध (श्रीअद्वैताचार्य)
उनपर क्रोधित हो गये। क्रोधित होकर स्कन्धने उनमें
जलका सञ्चार बन्द कर दिया। जलके अभावसे क्षीण
वे शाखाएँ सूखकर मर गयीं ॥ 67–69 ॥
श्रीगौरकृष्णभक्त-यमके गुरु,
श्रीगौरकृष्णविमुख-यमके द्वारा दण्डयोग्य :-
चैतन्य-रहित देह—शुष्ककाष्ठ-सम।
जीवितेइ मृत सेइ, मैले दण्डे यम ॥ 70 ॥
केवल ए गण-प्रति नहे एइ दण्ड।
चैतन्य-विमुख येइ सेइ त’ पाषण्ड ॥ 71 ॥
कि पण्डित, कि तपस्वी, किवा गृही, यति।
चैतन्य-विमुख येइ, तार एइ गति ॥ 72 ॥
अनुवाद—चेतनारहित देह जैसे सूखी लकड़ीके
समान है, वैसे ही श्रीकृष्णभक्तिरहित मनुष्य जीवित होते
हुए भी मृतके समान है और मरनेके बाद उसे
यमराजका दण्ड भोगना पड़ता है। ऐसा दण्ड केवल
भटके हुए श्रीअद्वैताचार्यके गणोंके लिये ही नहीं है,
अपितु यह श्रीचैतन्य महाप्रभुसे विमुख सभी जीवोंके
लिये है, क्योंकि वे सभी पाखण्डी हैं। क्या पण्डित,
क्या तपस्वी, क्या गृहस्थ और क्या संन्यासी, जो भी
श्रीचैतन्य महाप्रभुसे विमुख हैं, उनकी यही गति है ॥ 70-72 ॥
अनुभाष्य—(भाः 6/3/29) में जैसा यमराजजीने
अपने दूतोंसे कहा—
बारहवाँ अध्याय | 137
[ 12/70-78
“जिह्वा न वक्ति भगवद्गुणनामधेयं,
चेतश्च न स्मरति तच्चरणारविन्दम्।
कृष्णाय न नमति यच्छिर एकदापि,
तानानयध्वमसतोऽकृतविष्णुकृत्यान्॥”
“हे दूतों! जिनकी जिह्वा एकबार भी श्रीकृष्णनाम-
गुणादिका कीर्तन नहीं करती, जिनका चित्त एकबार भी
श्रीकृष्णके पादपद्मका स्मरण नहीं करता, जिनका
मस्तक एक बार भी श्रीकृष्णको नमन नहीं करता, ऐसे
असत् लोगोंको ही मेरे पास लाना, क्योंकि वे कुछ भी
विष्णुभक्तिका कार्य नहीं करते हैं॥”70॥
केवल अच्युतके अनुगतजन ही सारग्राही
श्रीगौरभक्त और श्रीअद्वैत-कृपाप्राप्त :-
ये ये लैल श्रीअच्युतानन्देर मत।
सेइ आचार्येर गण—महाभागवत॥73॥
सेइ सेइ आचार्येर कृपार भाजन।
अनायासे पाइल सेइ चैतन्य-चरण॥74॥
अनुवाद—जिन्होंने श्रीअच्युतानन्दके मतको ग्रहण
किया, वे ही श्रीअद्वैताचार्यके गण महाभागवत हैं। वे ही
श्रीअद्वैताचार्यकी कृपाके पात्र हैं और उन्होंने अनायास
ही श्रीचैतन्य महाप्रभुके चरणकमलोंको प्राप्त किया
है॥73-74॥
अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीअद्वैतप्रभु भक्ति-कल्पवृक्षके
एक स्कन्ध हैं। श्रीचैतन्य महाप्रभुने मालीके रूपमें जल
सिञ्चन करके उस स्कन्ध और उसकी शाखाओंको
पुष्ट किया, तथापि दुर्भाग्यवश किसी-किसी शाखाने
मालीके अप्रकट होनेके बाद मालीको न मानकर
केवल स्कन्धको ही कल्पवृक्षका कारण कहकर निर्देश
किया। इसलिये स्कन्धरूप श्रीअद्वैतप्रभुने वृक्षके सृष्टिकर्त्ता
और पालक श्रीचैतन्य महाप्रभुको कृतघ्नताके कारण ना
माननेपर उन सब पापी-शाखाओंको जल देना बन्द कर
दिया। इस कारण जलके अभावसे क्षीण हुई शाखाएँ
सूखकर मरने लगीं। केवलमात्र इन्हीं शाखाओंके लिये
ही यह दण्ड है, ऐसा नहीं है। सामान्यतः क्या पण्डित,
क्या तपस्वी, क्या गृहस्थ और क्या संन्यासी, (प्रत्येक
ही) श्रीचैतन्य महाप्रभुसे विमुख होनेसे ही पाखण्डी हो
जाते हैं। जिन सब महात्माओंने श्रीअच्युतानन्दके मतको
ग्रहण किया था, वे ही श्रीअद्वैताचार्यप्रभुके गणोंमें
'महाभागवत' हैं॥67-73॥
इति अमृतप्रवाह भाष्ये द्वादश परिच्छेद।
बारहवें अध्यायका अमृतप्रवाह भाष्य सम्पूर्ण हुआ।
उन सब शुद्धभक्तोंकी वन्दना :-
सेइ आचार्यगणे मोर कोटि नमस्कार।
अच्युतानन्द-प्राय, चैतन्य-जीवन याँहार॥75॥
अनुवाद—श्रीअच्युतानन्दके समान जिनके श्रीचैतन्य
महाप्रभु जीवन-स्वरूप हैं, उन आचार्योंको मेरा कोटि-कोटि
प्रणाम है॥75॥
एइ त' कहिलाङ आचार्य-गोसाञिर गण।
तिन स्कन्धेर कैल शाखार संक्षेप गणन॥76॥
शाखार उपशाखा, तार नाहिक गणन।
किछुमात्र करि' कहिं दिग्दर्शन॥77॥
अनुवाद—यह मैंने श्रीअद्वैताचार्य गोस्वामीके गणोंका
वर्णन किया है। अभी तक मैंने संक्षेपमें तीन स्कन्धोंकी
शाखाओंका वर्णन किया। इन शाखाओंकी उपशाखाओंकी
तो गिनती ही नहीं है, मैंने केवल कुछ वर्णन करके
उनका दिग्दर्शनमात्र करवाया है॥76-77॥
श्रीगदाधरके शिष्य अथवा उपशाखासमूह :-
श्रीगदाधर पण्डित-उपशाखा महोत्तम।
ताँर शाखागण किछु करि ये गणन॥78॥
अनुवाद—श्रीचैतन्य महाप्रभुकी शाखाओंमें श्रीगदाधर
पण्डित सर्वोत्तम हैं। उनकी कुछ शाखाओंका मैं वर्णन
करूँगा॥78॥
138 | श्रीचैतन्यचरितामृत
12/79–80 ]
(1) ध्रुवानन्द, (2) श्रीधर, (3) हरिदास ब्रह्मचारी
और (4) रघुनाथ भागवताचार्य :-
शाखा-श्रेष्ठ ध्रुवानन्द, श्रीधर ब्रह्मचारी।
भागवताचार्य, हरिदास ब्रह्मचारी॥ 79॥
अनुवाद-ध्रुवानन्द, श्रीधर ब्रह्मचारी, भागवताचार्य
और हरिदास ब्रह्मचारी, ये श्रीगदाधर पण्डितकी चार
श्रेष्ठ शाखाएँ हैं॥ 79॥
अनुभाष्य—'ध्रुवानन्द ब्रह्मचारी'—श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका
152वाँ श्लोक—
“ध्रुवानन्दब्रह्मचारी ललितेत्यपरे जगुः।
स्वप्रकाशविभेदेन समीचीनं मतन्तु तत्॥ 152॥”
“कोई-कोई कहते हैं कि ध्रुवानन्द ब्रह्मचारी ललिता
हैं। यह विचार भी स्वप्रकाश अर्थात् श्रीललितादेवीके
प्रकाशके विशेष भेदके कारण सुसङ्गत है।” शाखानिर्णयामृत
4—
“ध्रुवानन्दमहं वन्दे सदोज्ज्वलविलासिनम्।
स्व-स्वभावं ददौ यस्मै कृपया श्रीगदाधरः॥”
'श्रीधर ब्रह्मचारी'—(श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 194 एवं
199वाँ श्लोक)—
“मालती 'चन्द्रलतिका' मञ्जुमेधा वराङ्गदा।
रत्नावली च कमला गुणचूडा सुकेशिनी॥ 194॥
शुभानन्दो द्विजो 'ब्रह्मचारी श्रीधरनामकः'।
परमानन्दगुप्तो यत्कृता कृष्णस्तवावली॥ 199॥”
“पूर्वमें व्रजकी चन्द्रलतिका अब श्रीधर ब्रह्मचारी
हैं।” शाखानिर्णयामृत 5—
“श्रीश्रीधरं सुदामाख्यं ब्रह्मचारिणमद्भुतम्।
प्रेमामृतमयं सर्वं गौरलीलाविलासकम्॥”॥ 79॥
(5) अनन्ताचार्य, (6) कविदत्त, (7) नयनमिश्र,
(8) गङ्गामन्त्री, (9) मामुठाकुर, (10) कण्ठाभरण :-
अनन्त आचार्य, कविदत्त, मिश्र नयन।
गङ्गामन्त्री, मामु ठाकुर, कण्ठाभरण॥ 80॥
अनुवाद—अनन्त आचार्य, कविदत्त, नयन मिश्र,
गङ्गामन्त्री, मामु ठाकुर और कण्ठाभरण, श्रीगदाधर
पण्डितकी अन्य शाखाएँ हैं॥ 80॥
अनुभाष्य—'कविदत्त'—शाखानिर्णयामृत 14—
“महाभाव-चमत्काररूप-नित्यं स्वभावजम्।
राधाकृष्णौ यस्य हृदि वन्दे तं कविदत्तकम्॥”
(श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 197वाँ और 207वाँ श्लोक)—
“कलकण्ठी कुरङ्गाक्षी चन्द्रिका चन्द्रशेखरा।
या याः स्वयोग्यसेवायां नियुक्ताः सन्ति राधया॥ 197॥
हर्याचार्यो गौरसङ्गी मिश्रः श्रीनयनस्तथा।
कविदत्तो रामदासश्चिरञ्जीव-सुलोचनौ॥ 207॥”
“ये व्रजकी कलकण्ठी हैं।”
'नयनमिश्र'—श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 196वाँ और 207वाँ
श्लोक—
“गन्धोन्मादा रसोन्मादा चन्द्रिका कलभाषिणी।
गोपाली हरिणी काली कालाक्षी नित्यमञ्जरी॥ 196॥
“ये व्रजकी नित्यमञ्जरी हैं।” शाखानिर्णयामृत 1ला
श्लोक—
“वन्दे श्रीनयनानन्दं मिश्रं प्रेम-सुधार्णवम्।
गदाधरस्य गौरस्य प्रेमरत्नेकभाजनम्॥”
“श्रीनयनानन्द मिश्रकी मैं वन्दना करता हूँ जो
प्रेमामृतके समुद्र हैं। वे श्रीगदाधर और गौरचन्द्रके
प्रेमरत्नके ऐकान्तिक पात्र हैं।”
'गङ्गामन्त्री'—(श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 196वाँ और 205
श्लोक)—
“ईशानाचार्य-कमलौ लक्ष्मीनाथाख्य-पण्डितः।
गङ्गामन्त्री जगन्नाथो मामुपाधिर्द्विजोत्तमः॥ 205॥”
“ये व्रजकी चन्द्रिका हैं।” शाखानिर्णयामृत 16
श्लोक—
“गङ्गामन्त्रिणमीडेऽहं सेवासौख्यविलासिनम्।
नामप्रेमप्रकाशार्थं स्वर्धुन्या यः सुमन्त्रितः॥”
'मामु ठाकुर'—श्रीमहाप्रभु इन्हें 'मामा' कहकर पुकारते
थे। इसलिये लोग इन्हें 'मामुठाकुर' कहते थे। पूर्वी
बङ्गाल और उत्कल-देशमें मामाको 'मामु' कहते हैं।
बारहवाँ अध्याय | 139
[ 12/80-83
इनका वास्तविक नाम जगन्नाथ चक्रवर्ती है, ये नीलाम्बर
चक्रवर्तीके भतीजे हैं। इनका निवास फरिदपुर जिलाके
मगडोबा गाँवमें है। श्रीगदाधरके अप्रकट होनेके पश्चात्
मामुठाकुर पुरीके ‘श्रीतोटा-गोपीनाथ’ के सेवाधिकारी बने
थे। श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 196वाँ और 205वाँ श्लोकके
अनुसार ये व्रजकी ‘कलभाषिणी’ हैं। शाखानिर्णयामृत
17श्लोक—
“यः प्रेम्णा गौरचन्द्रेण परिवारगणैः सह।
उत्कले भाषितो मामुस्तं वन्दे मामुठाकुरम्॥”
तोटा-गोपीनाथके सेवकगणोंकी गुरु-प्रणाली
(1) श्रीगदाधर पण्डित गोस्वामी (श्रीमती राधिका, अन्य
मतमें सौभाग्य-मञ्जरी), (2) उनके अनुगत श्रीजगन्नाथ
चक्रवर्ती ‘मामु’ गोस्वामी (श्रीरूप-मञ्जरी?), (3) उनके
अनुगत रघुनाथ गोस्वामी, (4) रामचन्द्र, (5) राधावल्लभ,
(6) कृष्णजीवन, (7) श्यामसुन्दर, (8) शान्तामणि,
(9) हरिनाथ, (10) नवीनचन्द्र, (11) मतिलाल,
(12) दयामयी, (13) कुञ्जबिहारी।
‘कण्ठाभरण’—इनका नाम श्रीअनन्त चट्टराज है।
श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 196वाँ और 206ठा श्लोक—
“श्रीकण्ठाभरणोपाधिरनन्तश्चट्टवंशजः।
हस्तिगोपालनामा च रङ्गवासी च वल्लभः॥206॥”
“व्रजकी गोपाली अब चट्टवंशमें जन्म लेनेवाले
कण्ठाभरण उपाधिसे विभूषित श्रीअनन्त हैं।” शाखानिर्णयामृत
18 श्लोक—
“लीलाकलापसंयुक्तं राधाकृष्णरसात्मकम्।
श्रीकण्ठाभरणं वन्दे तयोः कण्ठावतारकम्॥”॥80॥
(11) भूगर्भ गोस्वामी, (12) भागवतदास :—
भूगर्भ गोसाञि, आर भागवत दास।
येइ दुइ आसि' कैल वृन्दावने वास ॥ 81 ॥
अनुवाद—अन्य प्रमुख शाखाएँ भूगर्भ गोस्वामी और
भागवत दास हैं, जिन्होंने आकर वृन्दावनमें वास
किया॥81॥
अनुभाष्य—'भूगर्भ गोस्वामी’—श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका
187वाँ श्लोक—
“भूगर्भठक्कुरस्यासीत् पूर्वाख्या प्रेममञ्जरी॥187(क)॥”
“ये व्रजकी प्रेममञ्जरी' हैं।” ये श्रीलोकनाथ गोस्वामीके
अभिन्न हृदय सुहृद हैं। शाखानिर्णयामृत 24 श्लोक—
“गोस्वामिनञ्च भूगर्भं भूगर्भोत्थं सुविश्रुतम्।
सदा महाशयं वन्दे कृष्णप्रेमप्रदं प्रभुम्॥
श्रील-गोविन्द-देवस्य सेवा सुखविलासिनम्।
दयालुं प्रेमदं स्वच्छं नित्यमानन्दविग्रहम्॥”
'भागवत दास'—शाखानिर्णयामृत 31 श्लोक—
“भूगर्भसङ्गिनं वन्दे श्रीभागवतदासकम्।
सदा राधाकृष्ण-लीला-गानमण्डितमानसम्।”
“भूगर्भ गोस्वामीके सङ्गी श्रीभागवतदासकी मैं वन्दना
करता हूँ, जिनका हृदय सदा श्रीराधाकृष्णकी लीलाओंके
गानसे मण्डित रहता है।”॥81॥
(13) वाणीनाथ ब्रह्मचारी, (14) वल्लभचैतन्य :—
वाणीनाथ ब्रह्मचारी—बड़ महाशय।
वल्लभचैतन्यदास—कृष्णप्रेममय ॥ 82 ॥
अनुवाद—वाणीनाथ ब्रह्मचारी बड़े महात्मा हैं और
वल्लभचैतन्यदास सदा कृष्णप्रेममें डूबे रहते हैं॥82॥
अनुभाष्य—‘वाणीनाथ ब्रह्मचारी'—शाखानिर्णयामृत 32
श्लोक—
“भक्त-सङ्घदृग्भक्ताख्यं भक्तवृन्देन राजितम्।
ब्रह्मचारिणमीड़े तं वाणीनाथ-महाशयम्॥”
चैःचः आदिलीला 10/114 संख्या द्रष्टव्य है।
'वल्लभचैतन्य'—शाखानिर्णयामृत 33 श्लोक—
“कृष्णप्रेममयं स्वच्छं परमानन्ददायिनम्।
वन्दे वल्लभचैतन्यं लीलागानयुतान्तरम्॥”॥82॥
(15) श्रीनाथ, (16) उद्धव,
(17) जितामित्र, (18) जगन्नाथ :—
श्रीनाथ चक्रवर्ती, आर श्रीउद्धवदास।
जितामित्र, काष्ठकाटा-जगन्नाथदास ॥ 83 ॥
140 | श्रीचैतन्यचरितामृत
12/83-85 ]
(19) हरि आचार्य, (20) पुरिया गोपाल,
(21) कृष्णदास ब्रह्मचारी, (22) पुष्पगोपाल :-
श्रीहरि आचार्य, दास-पुरियागोपाल।
कृष्णदास ब्रह्मचारी, पुष्पगोपाल ॥ 84 ॥
(23) श्रीहर्ष, (24) रघुमिश्र, (25) लक्ष्मीनाथ,
(26) चैतन्यदास, (27) रघुनाथ :-
श्रीहर्ष, रघुमिश्र, पण्डित लक्ष्मीनाथ।
बङ्गवाटी-चैतन्यदास, श्रीरघुनाथ ॥ 85 ॥
अनुवाद-श्रीनाथ चक्रवर्ती, श्रीउद्धव दास, जितामित्र, काष्ठकाटाके जगन्नाथदास, श्रीहरि आचार्य, सादीपुरवासी गोपाल दास, कृष्णदास ब्रह्मचारी, पुष्पगोपाल, श्रीहर्ष, रघुमिश्र, लक्ष्मीनाथ पण्डित, बङ्गवाटी-चैतन्यदास और श्रीरघुनाथ, श्रीगदाधर पण्डितकी अन्य शाखाएँ हैं॥ 83-85 ॥
अनुभाष्य-‘श्रीनाथ चक्रवर्ती’- शाखानिर्णयामृत 13 श्लोक-
“वन्दे श्रीनाथनामानं पण्डितं सद्गुणाश्रयम्।
कृष्णसेवापरिपाटी यत्नैर्येन सुसेविता ॥”
‘उद्धवदास’- शाखानिर्णयामृत 35 श्लोक-
“अतिदीनजने पूर्ण-प्रेमवित्तप्रदायकम्।
श्रीमदुद्धवदासाख्यं वन्देऽहं गुणशालिनम् ॥”
‘जितामित्र’- श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 202रा श्लोक-
“रिपवः षट् काममुख्या जिता येन वशीकृताः।
यथार्थनामा गौरेण जितामित्रः स निर्मितः ॥ 202 ॥”
“श्याममञ्जरी वही जितामित्र हैं, जिन्होंने काम आदि प्रमुख छह शत्रुओंको जीतकर वशीभूत कर लिया था और जिन्हें श्रीमन्महाप्रभुने उनके गुणोंके अनुरूप यथार्थ नाम प्रदान किया था।” शाखानिर्णयामृत 36 श्लोक-
“यस्य श्रीपुस्तकं कृष्ण-माधुर्य-प्रेमपोषकम्।
जितामित्रमहं वन्दे सर्वाभीष्टप्रदायकम् ॥”
‘जगन्नाथदास’- इनका निवास ढाका-विक्रमपुरके अन्तर्गत काष्ठकाटा (काठादिया) नामक ग्राममें है। इनके वंशधर अब आड़ियल-ग्राममें, कामारपाड़ा और पाइकपाड़ा-ग्राममें वास करते हैं। इनके द्वारा प्रतिष्ठित ‘यशोमाधव’ विग्रहकी सेवा आड़ियलके ‘गोस्वामी’ गण करते हैं। ये श्रीरूप गोस्वामी पादके द्वारा रचित ‘कृष्णगणोद्देश’ में वर्णित समसमाजमें स्थित चौंसठ सखियोंमेंसे छब्बीसवीं सखी, चित्रादेवीकी उपसखी ‘तिलकिनी’ हैं। 142वाँ श्लोक-
“रसालिका तिलकनी सौरसेनी सुगन्धिका ॥”
इनकी वंशधारा इस प्रकार है-(2) रामनृसिंह, (3) रामगोपाल, (4) रामचन्द्र, (5) सनातन, (6) मुक्ताराम, (7) गोपीनाथ, (8) गोलोक, (9) हरिमोहन शिरोमणि, (10) राखालराज।
उपरोक्त (7) गोपीनाथके कनिष्ठ पुत्र-(8) माधव, (9) लक्ष्मीकान्त।
सूर्यदास सरखेलके द्वारा रचित ‘भोगनिर्णय-पद्धति’ में-
“ततः सुचित्रायूथाश्च ये महान्तो भवन्ति तान्।
जगन्नाथाह्वयदासश्च ठक्कुरो जगदीशकः ॥”
शाखानिर्णयामृत 48 श्लोक-
“वन्दे जगन्नाथदासं काष्ठकाटेति विश्रुतम्।
दत्तं येन त्रैपुरे च श्रीहरिनाममङ्गलम् ॥”
‘श्रीहरि आचार्य’- श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 196 एवं 207वाँ श्लोकके अनुसार पहले व्रजकी ‘कालाक्षी’ अब श्रीहरि आचार्य हैं। शाखानिर्णयामृत 37 श्लोक-
“हरिदासाचार्यं बङ्गदेशनिवासिनम्।
वन्दे तं परया भक्त्या सोज्ज्वलेनोज्ज्वलीकृतम् ॥”
‘पुरिया गोपालदास’- शाखानिर्णयामृत 38 श्लोक-
“वन्दे गोपालदासाख्यं सादिपुर-निवासिनम्।
राधाकृष्णप्रेमरसैः प्लावितं विक्रमं पुरम् ॥”
“मैं सादीपुर निवासी गोपालदासकी वन्दना करता हूँ, जिन्होंने विक्रमपुरको श्रीराधाकृष्णके प्रेमरससे आप्लावित कर दिया।” अर्थात् ये विक्रमपुरमें हरिनाम प्रचारक थे।
‘कृष्णदास ब्रह्मचारी’- श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 164वाँ श्लोक-
बारहवाँ अध्याय | 141
[ 12/83-86
“इन्दुलेखा व्रजे यासीच्छ
कृष्णदासब्रह्मचारी कृतवृन्दावनस्थितिः ॥ 164 ॥ ”
“पहले व्रजमें जो श्रीराधाकी सखी इन्दुलेखा थीं, वे
अब श्रीकृष्णदास ब्रह्मचारी हैं। इन्होंने श्रीवृन्दावनको
अपना वासस्थान बनाया है।” शाखानिर्णयामृत 41
श्लोक—
“कृष्णदास-ब्रह्मचारी-कृष्णप्रेम-प्रकाशकम्।
वन्दे तमुज्ज्वलधियं वृन्दावननिवासिनम् ॥ ”
‘पुष्पगोपाल'–शाखानिर्णयामृत 39 श्लोक—
“पुष्पगोपालनामानं वन्दे प्रेमविलासिनम्।
स्वरसैः पुष्पितः स्वर्णग्रामको नामधेयतः ॥ ”
‘श्रीहर्ष' –(श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 194 एवं 201वाँ
श्लोक)—
“मालती चन्द्रलतिका मधुमेधा वराङ्गदा।
रत्नावली च कमला गुणचूडा सुकेशिनी ॥ 194 ॥
सुबुद्धिमिश्रः श्रीहर्षो रघुमिश्रो द्विजोत्तमः ॥ 201 ॥ ”
“पहले व्रजमें जो 'सुकेशिनी' थीं, वे ही अब श्रीहर्ष
हैं।” शाखानिर्णयामृत 40 श्लोक—
“वन्दे श्रीहर्षमिश्राख्यं कृष्णप्रेमविनोदिनम्।
गौरप्रेम्णा मत्तचित्तं महानन्दरसाङ्कुरम् ॥ ”
'रघुमिश्र'–श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 195वें एवं 201वें
श्लोकके अनुसार पहले व्रजमें जो 'कर्पूरमञ्जरी' थीं, वे
ही अब श्रीरघुमिश्र हैं।
'लक्ष्मीनाथ पण्डित'–श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 196वें
एवं 205वें श्लोकके अनुसार पहले व्रजमें जो 'रसोन्मादा'
थीं, वे ही अब श्रीलक्ष्मीनाथ पण्डित हैं। शाखानिर्णयामृत
42 श्लोक—
“ब्रजलक्ष्मीनाथदासं करुणालयविग्रहम्।
महाभावान्वितं वन्दे व्रजसौभाग्यदायकम् ॥ ”
‘बङ्गवाटी-चैतन्यदास'–श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 196वें
एवं 206वें श्लोकके अनुसार पहले व्रजमें जो 'काली'
थीं, वे ही अब रङ्गवासी वल्लभ (श्रीबङ्गवाटी-चैतन्यदास)
हैं। शाखानिर्णयामृत 43 श्लोक—
“बङ्गवाट्याः श्रीचैतन्यदासं वन्दे महाशयम्।
सदा प्रेमाश्रुरोमाञ्च-पुलकाञ्चितविग्रहम् ॥ ”
इनकी शाखा-परम्परा—(2) मधुराप्रसाद,
(3) रुक्मिणी-कान्त, (4) जीवनकृष्ण, (5) युगलकिशोर,
(6) रतनकृष्ण, (7) राधामाधव, (8) ऊषामणि,
(9) वैकुण्ठनाथ, (10) लालमोहन साहा शंखनिधि
(ढाकावासी)।
'श्रीरघुनाथ'–शाखानिर्णयामृत 44 श्लोक—
“वन्दे श्रीरघुनाथाख्यं प्रेमकन्दमहाशयम्।
यन्नामश्रवणेनैव वृन्दावनरसं लभेत् ॥ ”
श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 194वाँ एवं 200वाँ श्लोक—
“रघुनाथो द्विजः कश्चिद्गौराङ्गानन्यसेवकः।
कंसारिसेनेः सेनः श्रीजगन्नाथो महाशयः ॥ 200 ॥ ”
“पहले व्रजमें जो 'वराङ्गदा' थीं, वे ही अब
श्रीरघुनाथ हैं॥” 83-85 ॥
(28) अमोघ, (29) हस्तिगोपाल, (30) चैतन्यवल्लभ,
(31) यदु, (32) मङ्गलवैष्णव :–
अमोघ पण्डित, हस्तिगोपाल, चैतन्यवल्लभ।
यदु गाङ्गुलि आर मङ्गल वैष्णव ॥ 86 ॥
अनुवाद—अमोघ पण्डित, हस्तिगोपाल, चैतन्यवल्लभ,
यदु गाङ्गुलि और मङ्गल वैष्णव भी श्रीगदाधर पण्डितकी
अन्य शाखाएँ हैं॥86॥
अनुभाष्य—'अमोघ पण्डित'–शाखानिर्णयामृत 59
श्लोक—
“अमोघपण्डितं वन्दे श्रीगौरेणात्मसात्कृतम्।
प्रेमगद्गदसान्द्राङ्गं पुलकाकुलविग्रहम् ॥ ”
'हस्तिगोपाल'–श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 196वें एवं 206वें
श्लोकके अनुसार ये व्रजकी हरिणी हैं। शाखानिर्णयामृत
61 श्लोक—
“हस्तिगोपालदासाख्यं प्रेममत्तकलेवरम्।
नमामि परया भक्त्या गौरप्रेममयं परम् ॥ ”
‘चैतन्यवल्लभ'–शाखानिर्णयामृत 60 श्लोक—
142 | श्रीचैतन्यचरितामृत
12/86-87 ]
“चैतन्यवल्लभं नाम वन्दे प्रेमरसालयम्।
गदाधरस्य गौरस्य गुणगानाभिलाषिणम्॥”
'यदु गाङ्गुलि'—शाखानिर्णयामृत 34 श्लोक—
“यदुनाथ-चक्रवर्त्ती-लीलाभागवताभिधम्।
प्रेमकन्दं महाभिज्ञं वन्दे भक्त्या महाशयम्॥”
वर्धमान जिलामें शालिग्राम-चानक निवासी श्रीनलिनाक्ष
ठाकुर इस शाखाके वंशधर हैं।
'मङ्गल वैष्णव'—शाखानिर्णयामृत 47 श्लोक—
“मङ्गलं वैष्णवं वन्दे शुद्धचित्तकलेवरम्।
वृन्दावनश्योर्लीलामृतस्निग्धकलेवरम्॥”
इनका निवास मुर्शिदाबादके अन्तर्गत टिकरणा-ग्राममें
था। इनके पितृकुल मुर्शिदाबादकी देवी किरीटेश्वरीके
सेवायेत थे। कहा जाता है कि इन्होंने पहले वृहद्व्रत
स्वीकार करके घरको त्याग दिया और बादमें मयनाडालमें
अपने शिष्य प्राणनाथ अधिकारीकी कन्यासे विवाह
किया। इनके वंशधर काँदड़ाके ठाकुरके रूपमें प्रसिद्ध
हैं। काँदड़ा वर्द्धमान जिलाके काटोयाके पास गाँवका
नाम है।
मङ्गल ठाकुर महाशयके प्रसिद्ध शिष्योंमें मयनाडालके
प्राणनाथ अधिकारी, काँकड़ा-निवासी पुरुषोत्तम चक्रवर्ती
और मयनाडालके नृसिंहप्रसाद मित्र ठाकुरका नाम
उल्लेख-योग्य है। मयनाडालके अधिकारी-वंशका लोप
हो चुका है, परन्तु इनकी कन्याका वंश विद्यमान है।
पुरुषोत्तम चक्रवर्तीके वंशज अब वीरभूमके अन्तर्गत
साकुलेश्वरके अधीन आङ्गड़ा-ग्राममें वास करते हैं। ये
श्रीचैतन्यमङ्गलका गान करते हैं। नृसिंहप्रसाद मित्रठाकुरके
वंशज मृदङ्गविद्याके आचार्य हैं।
मङ्गलठाकुर महाशयने गौड़देशके राजाके लिये
गौड़देशसे क्षेत्र (नीलाचल) तक मार्ग-प्रस्तुतिकरण और
बृहत् सरोवरके खननकार्यके समय 'श्रीराधावल्लभ'
युगलविग्रहको प्राप्त किया था। तब वे काँदड़ाके
पश्चिममें राणीपुर-नामक गाँवमें वास करते थे। मङ्गल
ठाकुर महाशयके द्वारा पूजित श्रीनृसिंहशिला आज भी
काँदड़ामें विराजमान है। विग्रहकी सेवाके लिये गौड़-राजाके
द्वारा प्रदत्त सम्पदाके नष्ट हो जानेसे मङ्गलठाकुर भिक्षा
करके सेवा करते थे।
मङ्गलठाकुरके तीन पुत्र थे—(1) राधिकाप्रसाद,
(2) गोपीरमण और (3) श्यामकिशोर। इन तीनों
भाइयोंका वंश विद्यमान है। बादमें काँदड़ामें
श्रीवृन्दावनचन्द्रकी सेवा स्थापित हुई॥ 86॥
(33) शिवानन्द चक्रवर्ती :—
चक्रवर्ती शिवानन्द सदा व्रजवासी।
महाशाखा-मध्ये तेंहो सुदृढ़ विश्वासी॥ 87॥
एइ त' संक्षेपे कहिलाङ पण्डितेर गण।
ऐछे आर शाखा-उपशाखार गणन॥ 88॥
अनुवाद—शिवानन्द चक्रवर्ती श्रीगदाधरकी शाखाओंमें
एक प्रमुख शाखा हैं, जिन्होंने सुदृढ़ विश्वाससे श्रीवृन्दावनको
अपना निवास स्थान बनाया था। यहाँ तक मैंने
श्रीगदाधर पण्डितके गणोंका संक्षेपमें वर्णन किया। इस
प्रकार उनकी और भी अनेक शाखाएँ-उपशाखाएँ हैं,
जिनका मैंने यहाँ वर्णन नहीं किया है॥ 87-88॥
अनुभाष्य—'शिवानन्द चक्रवर्ती'—श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका
183वाँ श्लोक—
“श्रीमल्लवङ्गमञ्जर्य्याः प्रकाशत्वेन विश्रुतः।
शिवानन्दश्चक्रवर्ती कृतवृन्दावनस्थितिः॥ 183॥”
“वे श्रीशिवानन्द चक्रवर्ती, जिन्होंने श्रीवृन्दावनको
अपना निवास स्थान बनाया है, लवङ्गमञ्जरीके प्रकाश
रूपमें प्रसिद्ध हैं।” शाखानिर्णयामृत 10—
“शिवानन्दमहं वन्दे कुमुदानन्द-नामकम्।
रसोज्ज्वलयुतं स्वच्छं वृन्दाकाननवासिनम्॥”
चैःचः आदिलीला 8/70 संख्या द्रष्टव्य है।
इसके अतिरिक्त श्रीयदुनन्दनदासने 'शाखा-निर्णयामृत'
में कुछ और भी श्रीगदाधर-शाखाके सम्बन्धमें उल्लेख
किया है। जैसे, (1) माधवाचार्य, (2) गोपालदास,
(3) हृदयानन्द, (4) वल्लभभट्ट, (इनके नामानुसारसे
बारहवाँ अध्याय | 143
[ 12/87–95
'वल्लभ' या 'पुष्टिमार्गीय' सम्प्रदाय प्रसिद्ध है),
(5) मधुपण्डित (खड़दहसे दो मील पूर्वकी ओर
'साँइवोना' ग्राममें इनका श्रीपाट है। ये ही वृन्दावनके
प्रसिद्ध श्रीगोपीनाथदेवके प्रतिष्ठाता और सेवक हैं।)
(6) अच्युतानन्द, (7) चन्द्रशेखर, (8) वक्रेश्वर पण्डित
(?) (9) दामोदर, (10) भगवान् आचार्य (अन्य),
(11) अनन्ताचार्यवर्य (अन्य), (12) कृष्णदास,
(13) परमानन्द भट्टाचार्य, (14) भवानन्द गोस्वामी,
(15) चैतन्यदास, (16) लोकनाथ भट्ट (श्रीनरोत्तम
ठाकुरके गुरु, यशोहर जिलाके तालखड़ि-निवासी, वृन्दावनके
'श्रीराधाविनोद' के प्रतिष्ठाता एवं भूगर्भ ठाकुरके प्रगाढ़
बन्धु) (?) (17) गोविन्दाचार्य, (18) अक्रूर ठाकुर,
(19) सङ्केताचार्य, (20) प्रतापादित्य, (21) कमलाकान्त
आचार्य (22) यादवाचार्य, (23) नारायण पड़िहारी
(क्षेत्रवासी) ॥ 87 ॥
इति अनुभाष्य द्वादश परिच्छेद।
बारहवें अध्यायका अनुभाष्य पूर्ण हुआ।
गदाधर-गणोंकी ऐकान्तिकी गौरभक्ति :-
पण्डितेर गण सब,—भागवत धन्य।
प्राणवल्लभ—सबार श्रीकृष्णचैतन्य ॥ 89 ॥
अनुवाद—श्रीगदाधर पण्डितके गण सब परम भागवत
हैं और श्रीकृष्णचैतन्य इन सभीके प्राणवल्लभ हैं॥ 89 ॥
श्रीनिताइ-अद्वैत-गदाधरके गणोंका स्मरण-माहात्म्य :-
एइ तिन स्कन्धेर कैलुँ शाखार गणन।
याँ-सबा-स्मरणे भवबन्ध-विमोचन ॥ 90 ॥
याँ-सबा-स्मरणे पाइ चैतन्य-चरण।
याँ-सबा-स्मरणे हय वाञ्छित पूरण ॥ 91 ॥
अतएव ताँ-सबार वन्दिये चरण।
चैतन्यमालीर कहि लीला-अनुक्रम ॥ 92 ॥
अनुवाद—इन तीन (श्रीनित्यानन्द, श्रीअद्वैताचार्य और
श्रीगदाधर पण्डित) स्कन्धोंकी शाखाओंकी मैंने गणना
की। इन समस्त भक्तोंका स्मरण करनेसे भवबन्धन-विमोचन
अर्थात् श्रीचैतन्य महाप्रभुके चरणकमलोंकी प्राप्ति होती
है और सभी अभीष्ट पूर्ण होते हैं। इसलिये उन सबके
चरणोंमें वन्दन करके अब मैं श्रीचैतन्य महाप्रभु
मालीकी लीला क्रमानुसार कहूँगा॥ 90-92 ॥
ग्रन्थकारकी दैन्योक्ति :-
गौरलीलामृत-सिन्धु-अपार अगाध।
के करिते पारे ताँहा अवगाह-साध ॥ 93 ॥
ताहार माधुरी-गन्धे लुब्ध हय मन।
अतएव तटे रहि' चाकि एक कण ॥ 94 ॥
अनुवाद—श्रीगौरसुन्दरके लीलामृतका समुद्र
अगाध-अपार है। इस असाध्य समुद्रके पार जानेके
लिये कौन साहस कर सकता है? उसकी माधुरीकी
सुगन्धसे मेरा मनमें लोभ उत्पन्न हुआ है, इसलिये मैं
उसके तटपर रहकर उसके एक कणके आस्वादनमें
प्रवृत्त हुआ हूँ॥ 93-94 ॥
श्रीरूप-रघुनाथ पदे याँर आश।
चैतन्यचरितामृत कहे कृष्णदास ॥ 95 ॥
इति श्रीचैतन्यचरितामृते आदिखण्डे अद्वैतस्कन्ध-शाखावर्णनं
नाम द्वादश-परिच्छेदः।
अनुवाद—श्रीरूप-रघुनाथ गोस्वामीके चरणकमलोंकी
कृपाभिलाषा करते हुए कृष्णदास इस श्रीचैतन्यचरितामृतका
वर्णन कर रहा है॥ 95 ॥
श्रीश्रीचैतन्यचरितामृतके आदिखण्डका श्रीअद्वैत-स्कन्धकी
शाखाओंका वर्णन नामक बारहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ।
तेरहवाँ अध्याय
चित्र 6
तेरहवाँ अध्याय
तेरहवें अध्यायका कथासार—इस तेरहवें अध्यायमें
महाप्रभुकी जन्मलीलाका वर्णन हुआ है। उनकी
गृहस्थलीलाको आदिलीला और उनकी संन्यासलीलाको
अन्त्यलीला कहा गया है। उनकी (अन्त्यलीला) के
प्रथम छह वर्षकी लीलाका नाम 'मध्यलीला' है, जिसमें
महाप्रभुने दक्षिणदेश, वृन्दावनदि तीर्थोंमें गमनागमन और
नामका प्रचार किया। श्रीहट्टनिवासी उपेन्द्रमिश्रके पुत्र
जगन्नाथ मिश्र हैं। वे नवद्वीपमें वास करने लगे और
उन्होंने नीलाम्बर चक्रवर्त्तीकी पुत्री शचीदेवीसे विवाह
किया। उनकी पहले आठ कन्याएँ हुईं। वे कन्याएँ
जन्म लेनेके बाद ही परलोक सिधार गयीं और नवें
गर्भसे विश्वरूपका जन्म हुआ। 1407 शकमें
फाल्गुनी-पूर्णिमामें सन्ध्याकालमें सिंह-लग्न, सिंह-राशिमें
चन्द्र-ग्रहणके समय श्रीकृष्णनाम-कीर्तनके साथ श्रीगौरचन्द्र
अवतीर्ण हुए। शिशुका जन्म सुनकर सम्भ्रान्त महिलायें
अनेक उपहारोंके साथ शिशुके दर्शनके लिये आयीं।
नीलाम्बर चक्रवर्त्तीने उनकी जन्मपत्री और हस्तरेखायें
देखकर उनमें महापुरुषोंके चिह्न देखे। (अमृतप्रवाह
भाष्य)
श्रीगौरकृपासे अधम व्यक्तिकी भी उनकी
लीलावर्णनमें योग्यता :-
स प्रसीदतु चैतन्यदेवो यस्य प्रसादतः।
तल्लीलावर्णने योग्यः सद्यः स्यादधमोऽप्ययम् ॥ १॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥१॥
अमृतप्रवाह भाष्य—जिनके प्रसन्न होनेपर मेरे जैसा
अधम व्यक्ति भी उनकी लीला-वर्णनमें तुरन्त योग्यता
लाभ करता है, वे श्रीचैतन्यदेव मेरे प्रति प्रसन्न हों॥१॥
अनुभाष्य—यस्य (श्रीकृष्णचैतन्यदेवस्य) प्रसादतः (अनुकम्पया)
अयं (मादृशः) अधमः अपि तल्लीलावर्णने सद्यः योग्यः स्यात्, स
चैतन्यदेवः प्रसीदतु।
श्लोक भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥१॥
जय जय श्रीकृष्णचैतन्य गौरचन्द्र।
जयाद्वैतचन्द्र जय जय नित्यानन्द ॥२॥
जय जय गदाधर जय श्रीनिवास।
जय मुकुन्द वासुदेव जय हरिदास ॥३॥
जय दामोदर-स्वरूप जय मुरारि गुप्त।
एइ सब चन्द्रोदये तमः कैल लुप्त ॥४॥
भक्त-चन्द्रकी हरिभजन-किरणोंसे
जीवोंका अज्ञान-तमो-विनाश :-
जय श्रीचैतन्येर भक्त पूर्णचन्द्रगण।
सबार प्रेम-ज्योत्स्नाय उज्ज्वल त्रिभुवन ॥५॥
अनुवाद—श्रीकृष्णचैतन्य महाप्रभुकी जय हो, जय
हो। श्रीअद्वैतचन्द्र और श्रीनित्यानन्द प्रभुकी जय हो।
श्रीगदाधर पण्डितकी जय हो, जय हो, श्रीनिवास
पण्डितकी जय हो। श्रीमुकुन्द और श्रीवासुदेवकी जय
हो, श्रीहरिदास ठाकुरकी जय हो। श्रीस्वरूप दामोदरकी
जय हो, श्रीमुरारि गुप्तकी जय हो। श्रीचैतन्य महाप्रभुके
पूर्णचन्द्ररूपी भक्तोंकी जय हो। इन सब चन्द्रमाओंने
उदित होकर (अज्ञानरूप) अन्धकारको दूर किया है।
इन सबके प्रेमकी ज्योत्स्नासे तीनों लोक प्रकाशित हो
गये हैं॥२-५॥
श्रीगौरलीलाका वर्णन आरम्भ :-
एइ त' कहिल ग्रन्थानारम्भे मुखबन्ध।
एबे कहि चैतन्य-लीलाक्रम-अनुबन्ध ॥६॥
पहले सूत्ररूपमें और बादमें सविस्तार वर्णन-प्रतिज्ञा :-
प्रथमे त' सूत्ररूपे करिये गणन।
पाछे विस्तार करिब तार विवरण ॥७॥
अनुवाद—अभी तक मैंने ग्रन्थकी भूमिका कही है।
[ 13/6-17
अब मैं चैतन्यलीलाको क्रमानुसार कहूँगा। मैं पहले इन
लीलाओंको सूत्ररूपमें कहूँगा और बादमें उनका विस्तृत
विवरण दूँगा॥ 6-7॥
महाप्रभुकी अड़तालीस वर्षकी प्रकटलीला :-
श्रीकृष्णचैतन्य नवद्वीपे अवतरि।
आटचल्लिश वत्सर प्रकट विहरि ॥ 8 ॥
चौद्दशत सात शके जन्मेरे प्रमाण।
चौद्दशत पञ्चान्ने हइल अन्तर्धान ॥ 9 ॥
अनुवाद-श्रीकृष्णचैतन्य नवद्वीपमें अवतरित हुए
और उन्होंने अड़तालीस वर्ष तक इस जगत्में प्रकट
विहार किया। चौदह सौ सात शकाब्दमें उनके जन्म
लेनेका प्रमाण है और चौदह सौ पचपन शकाब्दमें वे
अन्तर्धान हुए॥ 8-9॥
प्रथम चौबीस वर्ष नवद्वीपमें गृहस्थ लीला, शेष चौबीस
वर्ष नीलाचलमें संन्यास-लीला-अभिनय :-
चब्बिश वत्सर प्रभु कैल गृहवास।
निरन्तर कैल ताहे कीर्त्तन-विलास ॥ 10 ॥
चब्बिश वत्सर शेषे करिया संन्यास।
आर चब्बिश वत्सर कैल नीलाचले वास ॥ 11 ॥
अनुवाद-चौबीस वर्ष महाप्रभुने गृहवास करते हुए
निरन्तर श्रीकृष्ण-कीर्तनका प्रचार किया। चौबीस वर्ष
पूर्ण होनेपर उन्होंने संन्यास लिया और शेष चौबीस वर्ष
वे नीलाचलमें रहे॥ 10-11॥
शेष चौबीस वर्षोंमें छह वर्ष उत्तर और दक्षिण भारतमें
श्रीकृष्णका अन्वेषण और प्रचार :-
तार मध्ये छय वत्सर-गमनागमन।
कभु दक्षिण, कभु गौड़, कभु वृन्दावन ॥ 12 ॥
अष्टादश वत्सर रहिला नीलाचले।
कृष्णप्रेम-लीलामृते भासां'ल सकले ॥ 13 ॥
अनुवाद-शेष चौबीस वर्षोंमें प्रथम छह वर्ष वे
कभी दक्षिण भारत, कभी गौड़देश और कभी वृन्दावन
आते-जाते रहे। शेष अठारह वर्ष सभीको श्रीकृष्णप्रेममें
निमग्न करते हुए नीलाचलमें ही रहे॥ 11-13॥
गृहस्थ-लीला ही आदिलीला और संन्यास-लीला
ही मध्य एवं अन्त्यलीला :-
गार्हस्थ्ये प्रभुर लीला- 'आदि'-लीलाख्यान।
'मध्य'-'अन्त्य'-नामे-शेषलीलार दुइ नाम ॥ 14 ॥
अनुवाद-गृहवास करते हुए महाप्रभुने जो लीलाएँ
कीं, उन्हें 'आदिलीला' कहा जाता है और शेषलीलाके
दो नाम हैं-(प्रथम छह वर्षकी लीलाओंका नाम)
'मध्यलीला' और (शेष अठारह वर्षकी लीलाओंका
नाम) 'अन्त्यलीला' है॥ 14॥
'चैतन्यचरित्रमें' मुरारिगुप्तके द्वारा आदिलीलाका तथा
'कड़चामें' स्वरूप दामोदरके द्वारा शेष-लीलाका ग्रन्थन :-
आदिलीला-मध्ये प्रभुर यतेक चरित।
सूत्ररूपे मुरारिगुप्त करिल ग्रथित ॥ 15 ॥
प्रभुर मध्य-शेष-लीला स्वरूप-दामोदर।
सूत्र करि' ग्रन्थिलेन ग्रन्थेर भितर ॥ 16 ॥
अनुवाद-आदिलीलामें महाप्रभुके जो भी चरित हैं,
उनका मुरारि गुप्तने सूत्ररूपमें गुन्थन किया है। महाप्रभुकी
मध्यलीला और शेषलीलाको स्वरूप दामोदरने सूत्ररूपमें
अपने ग्रन्थ (कड़चा) में सङ्कलित किया है॥ 15-16॥
इन दोनोंके सूत्र ही महाप्रभुकी लीला-वर्णनके मूल :-
एइ दुइजनेर सूत्र देखिया शुनिया।
वर्णना करेन वैष्णव क्रम ये करिया ॥ 17 ॥
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥ 17॥
अमृतप्रवाह भाष्य-श्रीमुरारिगुप्तके आदिलीलाके सूत्र
अभी तक विद्यमान हैं, उसे देखकर और श्रीस्वरूप
गोस्वामीके कड़चा-सूत्र श्रीरघुनाथदास गोस्वामीके मुखसे
सुनकर सभी वैष्णव वर्णन करते हैं॥ 17॥
148 | श्रीचैतन्यचरितामृत
13/18-25 ]
आदिलाके चार भाग :-
बाल्य, पौगण्ड, कैशोर, यौवन,–चारिभेद।
अतएव आदिखण्डे लीला चारि भेद॥18॥
अनुवाद—अवस्थाके अनुसार बाल्य, पौगण्ड, कैशोर
और यौवन-ये चार भेद हैं। इसलिये आदिखण्डमें
लीलाके चार भेद हैं॥18॥
शुभ फाल्गुनी-पूर्णिमाकी वन्दना :-
सर्वसद्गुणपूर्णां तां वन्दे फाल्गुनपूर्णिमम्।
यस्यां श्रीकृष्णचैतन्योऽवतीर्णः कृष्णनामभिः॥19॥
अनुवाद-अनुभाष्य द्रष्टव्य है॥19॥
अमृतप्रवाह भाष्य-
“वैवस्वतमनोरष्टाविंशतियुगसम्भवे।
चतुर्दश-शताब्दे वै सप्तवर्षसमन्विते॥
भागीरथीपटे रम्ये शचीगर्भमहार्णवे।
राहुग्रस्ते पूर्णिमायां गौराङ्गः प्रकटोऽभवत्॥”
“अर्थात् वैवस्वत मन्वन्तरके अठाइसवें चतुर्युगमें
कलियुगमें चौदह सौ सात (शक) वर्षमें भागीरथीके
तटपर शचीमाताके गर्भरूप महासिन्धुसे राहुग्रस्त पूर्णिमा
(चन्द्रग्रहणके समय) में श्रीगौराङ्गदेव प्रकट हुए।”
उस सर्वसद्गुणोंसे पूर्ण फाल्गुन-पूर्णिमाकी मैं वन्दना
करता हूँ, जिस पूर्णिमामें श्रीकृष्णनामके साथ श्रीकृष्णचैतन्य
अवतीर्ण हुए थे॥19॥
अनुभाष्य-यस्यां (फाल्गुन-पौर्णमास्यां) कृष्णनामभिः [सह]
श्रीकृष्णचैतन्यः (राधाकृष्णाभिन्नविग्रहः मूलावतारो गोलोकनाथः)
[निजलोकतः गौरप्रकोष्ठात् प्रपञ्चे भौमनवद्वीपे] अवतीर्णः, तां
सर्वसद्गुणपूर्णां फाल्गुन-पूर्णिमां (प्रापञ्चिक-कालावतीर्णाम् अप्राकृतां
सेवापरां तिथिरूपां देवीम्) (अहं) वन्दे।
श्लोक भावानुवाद-जिस फाल्गुनकी पूर्णिमामें
श्रीकृष्णनामके साथ श्रीराधाकृष्णाभिन्न-विग्रह मूलावतारो
गोलोकनाथ श्रीकृष्णचैतन्य अपने लोकके गौरप्रकोष्ठसे
इस प्रपञ्चमें भौम नवद्वीपमें अवतरित हुए, उस
सर्व-सद्गुणशाली (इस प्रपञ्चमें कालके रूपमें अवतीर्ण,
अप्राकृत जगत्में सेवा-परायण तिथिरूपा देवी)
फाल्गुन-पूर्णिमाकी मैं वन्दना करता हूँ॥19॥
चन्द्रग्रहण-छलसे जीवोंको हरिनामें प्रेरित करना :-
फाल्गुनपूर्णिमा-सन्ध्याय प्रभुर जन्मॊदय।
सेइ काले दैवयोगे चन्द्रेर ग्रहण हय॥20॥
'हरि' 'हरि' बले लोक हरषित हञा।
जन्मिला चैतन्यप्रभु 'नाम' जन्माइया॥21॥
अनुवाद—फाल्गुन पूर्णिमाकी सन्ध्यामें महाप्रभुका
जन्म हुआ और दैववश उस समय चन्द्रग्रहण लगा
हुआ था। सभी लोग हर्षसे 'हरि' 'हरि' बोल रहे थे।
इस प्रकार हरिनामको जन्म देते हुए श्रीचैतन्य महाप्रभुने
जन्म लिया॥20-21॥
आदिलीलामें सर्वत्र हरिनाम-प्रवर्तन :-
जन्म-बाल्य-पौगण्ड-कैशोर-युवाकाले।
हरिनाम लओयाइला प्रभु नाना छले॥22॥
अनुवाद-उन्होंने जन्मके समय, बाल्य, पौगण्ड,
कैशोर और युवाकालमें अनेक प्रकार युक्तियोंसे लोगोंसे
हरिनाम करवाया॥21-22॥
नाम उच्चारण करानेके छलसे क्रन्दन
और नाम लेनेपर ही शान्त होना :-
बाल्यभाव-छले प्रभु करेन क्रन्दन।
'कृष्ण' 'हरि' नाम शुनि' रहये रोदन॥23॥
दर्शनके लिये आने वाले सभी
व्यक्तियोंके द्वारा नाम-उच्चारण :-
अतएव 'हरि' 'हरि' बले नारीगण।
देखिते आइसे येवा सर्व बन्धुजन॥24॥
'गौरहरि' नामकी आदि सूचना :-
'गौरहरि' बलि' तारे हासे सर्वनाी।
अतएव हैल ताँर नाम 'गौरहरि'॥25॥
अनुवाद-महाप्रभु बाल्यभावके छलसे रोते थे और
जब तक 'कृष्ण' या 'हरि' नाम नहीं सुनते थे, तब तक
तेरहवाँ अध्याय | 149
यहाँ पृष्ठ का पंक्ति-दर-पंक्ति लिप्यंतरण प्रस्तुत है:
[ 13/23-30
रोते रहते। इसलिये जब महाप्रभु रोने लगते, तब
उनको देखने आनेवाली महिलाएँ और सभी बन्धु-बान्धव
'हरि' 'हरि' बोलते। महिलाएँ आनन्दसे 'गौरहरि' बोलकर
उन्हें हँसाती, इसलिये महाप्रभुका एक नाम 'गौरहरि' हो
गया॥ 23-25 ॥
आयु वृद्धिके साथ सब समय
जीवोंको नाममें प्रवर्तन :-
बाल्य वयस—यावत् हाते खड़ि दिल।
पौगण्ड वयस—यावत् विवाह ना कैल॥ 26 ॥
विवाह करिले हैल नवीन यौवन।
सर्वत्र लओयाइल प्रभु नाम-सङ्कीर्त्तन॥ 27 ॥
अनुवाद—जन्मसे विद्या आरम्भ करने तक उनकी
बाल्यावस्था है, इसके बाद उनके विवाह तक पौगण्ड
अवस्था है। विवाह करनेके समयसे उनका नवयौवन
आरम्भ होता है। इस अवस्थामें महाप्रभुने सर्वत्र
नाम-सङ्कीर्त्तनका प्रचार किया॥ 26-27 ॥
पौगण्डमें अध्ययन-अध्यापना करते समय प्रत्येक विषयमें
श्रीकृष्णनाम-व्याख्या और प्रेरणा :-
पौगण्ड-वयसे पड़ेन, पड़ान शिष्यगणे।
सर्वत्र करेन कृष्णनामेर व्याख्याने॥ 28 ॥
सूत्र-वृत्ति-टीकाय कृष्णनामेर तात्पर्य।
शिष्येर प्रतीत हय, —सबार आश्चर्य॥ 29 ॥
अनुवाद—पौगण्ड अवस्थामें उन्होंने स्वयं विद्याध्ययन
किया और बादमें शिष्योंको पढ़ानेका कार्य आरम्भ
किया तथा वे सर्वत्र ही श्रीकृष्णनामकी व्याख्या करते।
वे सूत्रों, वृत्तियों और टीकाओंकी ऐसी व्याख्या करते
कि सबका तात्पर्य श्रीकृष्णनाम ही है तथा उसे
श्रवणकर उनके शिष्योंको उसकी अनुभूति भी होती—ऐसा
देखकर सभीको आश्चर्य होता॥ 28-29 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—व्याकरण-सूत्र, उसकी वृत्ति और
टीका शिष्योंको पढ़ाते समय महाप्रभु श्रीकृष्णनाम
तात्पर्यके द्वारा शिष्योंको शिक्षा देते। उस शिक्षाका
अवलम्बन करके श्रीजीव गोस्वामीने बादमें 'लघु' और
'बृहत्', इन दो 'हरिनामामृत-व्याकरण' की रचना की।
इन दोनों व्याकरणोंका पाठ करनेसे जीवोंमें शब्द-ज्ञान
और श्रीकृष्णभक्तिका उदय होता है॥ 29 ॥
अनुभाष्य—(चैःभाः मध्यखण्ड, पहला अध्याय)—
“आविष्ट हइया प्रभु करये व्याख्यान।
सूत्रवृत्ति-टीकाय सकले हरिनाम्॥ 147 ॥
प्रभु बले,—सर्वकाल सत्य कृष्णनाम।
सर्वशास्त्रे कृष्ण बइ ना बलये आन॥ 148 ॥
कृष्णेर चरण छोड़ि’ ये आर बाखाने।
व्यर्थ जन्म याय तार अकथ्य कथने॥ 150 ॥
कृष्णेर भजन छोड़ि’ ये शास्त्र बाखाने।
से अधम कभु शास्त्रमर्म नाहि जाने॥ 157 ॥
शास्त्रेर ना जाने मर्म, अध्यापना करे।
गर्दभेर प्राय मात्र शास्त्र बहि’ मरे॥ 158 ॥”
“महाप्रभु आविष्ट होकर सूत्र, वृत्ति और टीका
सभीकी हरिनाामसे व्याख्या करते थे। महाप्रभुने
कहा,—'श्रीकृष्णनाम सब कालमें सत्य है। सभी शास्त्र
श्रीकृष्णके विषयमें ही कहते हैं और उन्हें छोड़कर
अन्य कुछ नहीं कहते। श्रीकृष्णके चरणोंको छोड़कर
जो शास्त्रोंकी व्याख्या करता है, वह अकथ्य है अर्थात्
जो कहने योग्य नहीं है, ऐसा व्याख्यान करनेसे उसका
जीवन व्यर्थ हो जाता है। जो श्रीकृष्णके भजनके
अतिरिक्त अन्य-अन्य रूपोंमें शास्त्रका व्याख्यान करता
है, वह अधम व्यक्ति शास्त्रके वास्तविक अर्थको नहीं
जानता। जो शास्त्रके मर्मको नहीं जानता और उसका
अध्यापन करता है, उसका बोलना गधेके रेंकनेके
समान ही व्यर्थ है और वह शास्त्रको जाने बिना ही
मर जाता है।'” 28-29 ॥
सभीको श्रीकृष्णनाम-कीर्त्तनमें प्रवर्तन :-
यारे देखे, तारे कहे, —कह कृष्णनाम।
कृष्णनामे भासाइल नवद्वीप-ग्राम॥ 30 ॥
150 | श्रीचैतन्यचरितामृत
13/30-39 ]
कैशोरमें स्वयं कीर्तन करके सभीको नाममें प्रवर्तन :-
किशोर-वयसे आरम्भिला सङ्कीर्त्तन।
रात्र-दिने प्रेमे नृत्य, सङ्गे भक्तगण॥ 31 ॥
नगरे नगरे भ्रमे कीर्त्तन करिया।
भासाइल त्रिभुवन प्रेमभक्ति दिया॥ 32 ॥
अनुवाद-महाप्रभु जिसे भी देखते, उसे ही श्रीकृष्णनाम
उच्चारण करनेके लिये कहते। इस प्रकार महाप्रभुने
नवद्वीपको श्रीकृष्णनाममें निमग्न करवाया। कैशोर अवस्थामें
महाप्रभुने सङ्कीर्तन आरम्भ किया और वे रात-दिन
भक्तोंके साथ प्रेममें विभोर होकर नृत्य करते। वे
नगर-नगरमें भ्रमणकर कीर्तन करते। इस प्रकार उन्होंने
तीनों लोकोंको प्रेमभक्ति प्रदानकर उसमें निमग्न कर
दिया॥ 30-32 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य-‘श्रीनवद्वीपधाम’-जाह्नवी (गङ्गा)
नदीसे वेष्टित (घिरे हुए) सोलह कोसकी परिधिके
भीतर श्रीनवद्वीपधाम है। उसमें नवधा भक्तिके पीठस्वरूप
‘अन्तः’, ‘सीमन्त’, ‘गोद्रुम’, ‘मध्य’, ‘कोल’, ‘ऋतु’, ‘जह्नु’,
‘मोद्रुम’ और ‘रुद्र’-ये नौ द्वीप विराजमान हैं। उनमेंसे
अन्तर्द्दीपके मध्यभागमें श्रीमायापुर-ग्राममें श्रीजगन्नाथ मिश्रका
निवास-स्थान है। इन सब नगर-नगरमें कीर्तन करके
महाप्रभुने प्रेमभक्तिके द्वारा तीनों लोकोंको आप्लावित
किया॥ 32 ॥
नवद्वीपमें पूर्ण चौबीस वर्ष ही जीवोंको नाममें प्रवर्तनः-
चब्बिश वत्सर ऐछे नवद्वीप-ग्रामे।
लओयाइल सर्वलोके कृष्णप्रेम-नामे॥ 33 ॥
अनुवाद-चौबीस वर्षकी अवस्था तक महाप्रभुने
नवद्वीप-ग्राममें सबसे श्रीकृष्णनाम बुलवाकर श्रीकृष्णप्रेम
प्रदान किया॥ 33 ॥
नीलाचलमें शेष चौबीस वर्षोंमेंसे छह वर्ष समुद्रसे
हिमाचलतक नाम प्रेम-प्रचार :-
चब्बिश वत्सर छिला करिया संन्यास।
भक्तगण लञा कैला नीलाचले वास॥ 34 ॥
तार मध्ये नीलाचले छय वत्सर।
नृत्य, गीत, प्रेमभक्ति-दान निरन्तर॥ 35 ॥
सेतुबन्ध, आर गौड़-व्यापि वृन्दावन।
प्रेम-नाम प्रचारिया करिल भ्रमण॥ 36 ॥
ये छह वर्ष ही-मध्यलीला और
केवल नामप्रचारमय :-
एइ ‘मध्यलीला’-नाम लीला-मुख्यधाम।
शेष अष्टादश वर्ष-‘अन्त्यलीला’ नाम॥ 37 ॥
अनुवाद-चौबीस वर्षकी आयुमें उन्होंने संन्यास
ग्रहण किया और भक्तोंके साथ नीलाचलमें वास करने
लगे। प्रथम छह वर्षोंमें नीलाचलमें नृत्य और गान
करते हुए उन्होंने निरन्तर प्रेमभक्तिका दान किया। इसी
समय कन्याकुमारीसे लेकर सम्पूर्ण गौड़देश और
वृन्दावन तक सम्पूर्ण भारतका भ्रमण करके उन्होंने
नाम-कीर्तन करते हुए सर्वत्र प्रेमका दान किया। यही
छह वर्षोंकी ‘मध्यलीला’ की मुख्य लीलाएँ हैं। शेष
अठारह वर्षोंकी लीलाका नाम ‘अन्त्यलीला’ है॥ 34-37 ॥
अवशिष्ट अठारह वर्षोंमें छह वर्ष केवल
कीर्तन-नृत्य द्वारा प्रेम-प्रचार :-
तार मध्ये छय वत्सर भक्तगण-सङ्गे।
प्रेमभक्ति लओयाइल नृत्य-गीत-रङ्गे॥ 38 ॥
शेष बारह वर्ष केवल स्वयं श्रीकृष्णविरहमें अनुक्षण
श्रीकृष्णप्रेमका आस्वादन और प्रेमावस्था-प्रदर्शन :-
द्वादश वत्सर शेष रहिला नीलाचले।
प्रेमावस्था शिखाइला आस्वादन-छले॥ 39 ॥
अनुवाद-उन अठारह वर्षोंमेंसे प्रथम छह वर्ष
भक्तोंके सङ्गमें आनन्दके साथ नृत्य-गीत करते हुए
सबको प्रेमभक्ति प्रदान की। शेष बारह वर्ष वे
नीलाचलमें ही रहे। स्वयं प्रेमास्वादन करते हुए उन्होंने
प्रेमकी विभिन्न अवस्थाओंको जगत्को भी
सिखलाया॥ 38-39 ॥
अनुभाष्य-जातप्रेम-व्यक्ति सम्भोगके पुष्टिकारक
तेरहवाँ अध्याय | 151
[ 13/39-42
अप्राकृत विप्रलम्भरसमें अवस्थित होते हैं। श्रीगौरसुन्दरने
उसी प्रेमावस्थाको स्वयं आस्वादन करनेकी इच्छाके
द्वारा जगत्के जीवोंको सिखलाया कि विप्रलम्भके बिना
सम्भोगकी पुष्टि नहीं होती॥39॥
रात्रि-दिवसे कृष्णविरह-स्फुरण।
उन्मादेर चेष्टा करे प्रलाप-वचन॥40॥
उद्धवके द्वारा दृष्ट श्रीराधाके समान
महाप्रभुका महाभाव :-
श्रीराधार प्रलाप यैछे उद्धव-दर्शने।
सेइमत उन्माद-प्रलाप करे रात्रिदिने॥41॥
अनुवाद—रात-दिन उन्हें श्रीकृष्णके विरहकी अनुभूति
होती थी, इसके फलस्वरूप वे उन्माद-ग्रस्त जैसा
आचरण करते और प्रलाप करने लगते। श्रीमती
राधिकाके जैसे प्रलापका उद्धवजीने दर्शन किया था,
वैसे ही महाप्रभु रात-दिन उन्माद अवस्थामें प्रलाप
करते थे॥41॥
अनुभाष्य—उद्धवजीने वृषभानुनन्दिनी श्रीमती राधिकाका
जिस 'चित्रजल्प' भावमय अवस्थाका दर्शन किया था,
वैसे ही भावमय श्रीगौरसुन्दर सुदीर्घ विप्रलम्भरसके
मूर्तिमान आदर्श हैं। असूया, ईर्ष्या और मदयुक्त
अवज्ञामुद्राके द्वारा श्रीमती राधिकाने भ्रमरको उपलक्ष्य
करके श्रीकृष्णकी अपटुता प्रकाश करते हुए जो प्रजल्प
किया था, उन सब भावोंमें श्रीगौरसुन्दर निमग्न रहते
थे। चैःचः आदिलीला, 4/107-108 संख्या द्रष्टव्य
है॥41॥
स्वरूप और रायके साथ चण्डीदास, विद्यापति
और गीतगोविन्दकी आलोचना :-
विद्यापति, जयदेव, चण्डीदासेर गीत।
आस्वादेन रामानन्द-स्वरूप-सहित॥42॥
अनुवाद—महाप्रभु श्रीराय रामानन्द और श्रीस्वरूप
दामोदरके साथ विद्यापति, जयदेव और चण्डीदासके
गीतोंका आस्वादन करते थे॥42॥
अनुभाष्य—'विद्यापति'—ये ब्राह्मण कुलमें उत्पन्न
मिथिलामें रहनेवाले एक वैष्णव कवि थे। राजा
शिवसिंह और रानी लछिमादेवीके राज्यकालमें श्रीमन्महाप्रभुके
प्रकटकालसे प्रायः एक सौ वर्ष पूर्व इनका जन्म हुआ
था। चौदह सौ शक शताब्दीके प्रथम भागमें इन्होंने
गीतोंकी रचना की। इनके द्वारा रचित श्रीकृष्ण गीतोंमें
प्रचुर अप्राकृत विप्रलम्भ-रसका आदर्श प्राप्त होता है।
इनके ऐसे भाव श्रीमन्महाप्रभुके आस्वादनीय थे।
'जयदेव'—बङ्गालके राजा 'लक्ष्मणसेन' के राज्यकालमें
ये भोजदेवके द्वारा वामादेवीके गर्भसे उत्पन्न हुए थे।
किसी-किसीके मतसे इनका जन्मकाल ग्यारहवीं अथवा
बारहवीं शक शताब्दी है। बङ्गालकी राजधानी नवद्वीप-नगरमें
इन्होंने बहुत समय तक वास किया। किसीके मतके
अनुसार वीरभूम जिलाके 'केन्दुबिल्व' ग्राममें अथवा
अन्य किसीके मतानुसार उत्कलदेशमें अथवा अन्य
किसीके मतमें दक्षिणदेशमें इनका जन्म हुआ। इन्होंने
नवद्वीपमें बहुत समय रहनेके बाद जीवनका शेष समय
श्रीजगन्नाथक्षेत्रमें व्यतीत किया। इनके कविता-ग्रन्थका
नाम 'गीत-गोविन्द' अथवा 'अष्टपदी' है। इस ग्रन्थमें
प्रचुर अप्राकृत विप्रलम्भ-रसका समावेश देखा जाता है।
श्रीभागवतमें वर्णित रासस्थलीसे व्रजराजकुमारके गोपियोंको
छोड़कर जानेसे सम्भोगरसके पुष्टिकारक विप्रलम्भ-रसकी
अवतारणा इस ग्रन्थमें वर्णित है। अष्टपदीकी टीका
और टीकाकारोंके नाम 'वैष्णव-मञ्जूषा' (प्रथम संख्या)
में द्रष्टव्य हैं।
'चण्डीदास'—इन्होंने वीरभूम जिलाके अन्तर्गत 'नान्नुर'
ग्राममें ब्राह्मण कुलमें चौदह सौ शक शताब्दीके प्रथम
भागके अन्त होनेके बाद जन्म ग्रहण किया। सम्भवतः
विद्यापति ठाकुरके साथ इनका बन्धुत्व था। इनकी
लेखनीमें अप्राकृत विप्रलम्भरसकी प्रचुरता है।
चण्डीदासादि भक्तोंकी प्रस्फुटित भावावली श्रीमन्महाप्रभुकी
परमप्रिय आस्वादनीय वस्तु थी। श्रीराधाभावमें ही विभावित
होकर, श्रीदामोदरस्वरूप और श्रीरामानन्दराय—इन दो
152 | श्रीचैतन्यचरितामृत
अन्तरङ्ग भक्तोंके साथ विप्रलम्भ-रसास्वादनके द्वारा
श्रीकृष्णचन्द्रने श्रीगौरसुन्दररूपमें अपनी वाञ्छा पूर्ण की
थी।
परमहंसकुल-शिरोमणि श्रीदामोदरस्वरूप और श्रीराय
रामानन्द जैसे अद्वितीय चिन्मय श्रीकृष्णरस-तत्त्ववेत्ताओंके
साथ स्वयं भगवान् श्रीगौरसुन्दरने इन तीन भक्तों
(विद्यापति, चण्डीदास और जयदेव) के द्वारा रचित
जिन अप्राकृत गीतोंका आस्वादन किया, वही अद्वितीय
भोक्ता सच्चिदानन्दविग्रह श्रीनन्दनन्दनके प्रति 'कृष्णमयी'
श्रीराधिकाके महाभाव-वैचित्र्यसमूहका विकास है। यह
इस नश्वर स्थूल-सूक्ष्म जगत्के भोग और त्याग-इन
दोनोंसे उदासीन, परममुक्त और निष्किञ्चन, राधादास्यके
नित्य अभिलाषी, महासौभाग्यवान् व्यक्तियोंके ही नित्य
अनुसरणका विषय है। प्राकृत काव्यरसके आमोदी,
निरीश्वर साहित्य-प्रिय, इन्द्रिय विषय-भोगी व्यक्तियोंके
द्वारा इन अप्राकृत गीतोंकी गवेषणाके कारण तथा
प्राकृत सहजिया सम्प्रदायके लोगोंने अपनी जड़ेन्द्रियोंके
भोगके लिये स्वयंमें 'रागानुगा' होनेका अभिमान करके
चण्डीदास, विद्यापति और जयदेवके गीतोंकी जो आलोचना
करनेकी धृष्टता दिखलायी है, उसके फलस्वरूप वह
जगत्में नास्तिकता और व्यभिचारकी वृद्धि कराकर
उनको नरकगामी बना रही है। उनकी इस आलोचना
और व्याख्याको स्वीकारकर देहात्मबुद्धिवाले असत्-तृष्णामय,
अनर्थयुक्त अनधिकारी लोग परममुक्त भक्तोंके आराध्य
श्रीराधाकृष्णकी अलौकिक लीलाविलासको प्राकृत
नायक-नायिकाके वैरस्यमय घृणित काम-क्रीड़ा-विलास
अथवा उसके समान मानकर स्वयंकी इन्द्रियोंकी तृप्तिमें
लग जाते हैं। वे श्रीराधाकृष्णकी अप्राकृत लीलाके
वर्णनके अधिकारी नहीं हैं॥42॥
श्रीराधाकी कृष्णविरह-चेष्टासे उत्पन्न कृष्णप्रेमास्वादनके
द्वारा अपनी तीन वाञ्छाओंकी पूर्ति :-
कृष्णेर वियोगे यत प्रेम-चेष्टित।
आस्वादिया पूर्ण कैल आपन वाञ्छित॥43॥
अनन्त चैतनलीला क्षुद्र जीव हञा।
के वर्णिते पारे, ताहा विस्तार करिया॥44॥
स्वयं अनन्तदेव भी गौरलीलाका
अन्त पानेमें असमर्थ :-
सूत्र करि' गणे यदि आपने अनन्त।
सहस्र-वदने तेँहो नाहि पाय अन्त॥45॥
अनुवाद-श्रीकृष्णके वियोगमें श्रीमती राधिकाकी
जो प्रेम-चेष्टाएँ थीं, उस प्रेम-वैचित्रीका आस्वादनकर
महाप्रभुने अपनी इच्छाओंकी पूर्ति की। श्रीचैतन्य महाप्रभुकी
अनन्त लीलाएँ हैं, मैं एक क्षुद्र जीव होकर उनका
विस्तारसे कैसे वर्णन कर सकता हूँ? यदि स्वयं
अनन्त शेष भी सूत्र रूपसे उनका वर्णन करना चाहें,
तो भी वे अपने हजारों मुखोंसे उनका वर्णन नहीं कर
सकते॥43-45॥
मुरारिगुप्त और श्रीस्वरूप दामोदरके द्वारा रचित सूत्रमें
आदि और शेषलीलाका लेखन :-
दामोदर-स्वरूप, आर गुप्त मुरारि।
मुख्यमुख्यलीला सूत्रे लिखियाछे विचारि'॥46॥
उन्हीं सूत्रोंके अनुसार वृन्दावनदासके
द्वारा गौरलीला-वर्णन :-
सेइ अनुसारे लिखि लीला-सूत्रगण।
विस्तारि' वर्णियाछेन ताहा दास-वृन्दावन॥47॥
श्रीवृन्दावनदासकी रचना-माधुर्य-वर्णन :-
चैतन्य-लीलार व्यास,-दास वृन्दावन।
मधुर करिया लीला करिला रचन॥48॥
ग्रन्थकारके द्वारा उनके द्वारा छोड़े गये
अंशोंके वर्णनकी प्रतिज्ञा :-
ग्रन्थ-विस्तार-भये छाड़िला ये ये स्थाने।
सेइ सेइ स्थाने किछु करिब व्याख्याने॥49॥
श्रीवृन्दावनदास ठाकुरको ग्रन्थकारके
द्वारा मर्यादा-प्रदान :-
प्रभुर लीलामृत तेँहो करिल स्वादन।
ताँर भुक्त-शेष किछु करिये चर्वण॥50॥
तेरहवाँ अध्याय | 153
[ 13/46-58
अनुवाद—श्रीस्वरूप दामोदर और श्रीमुरारिगुप्तने भी
केवल मुख्य-मुख्य लीलाएँ ही सूत्ररूपमें विचारपूर्वक
लिखी हैं। उन्हींके अनुसार मैं उन लीलाओंको सूत्ररूपमें
लिख रहा हूँ, जिनका श्रीवृन्दावनदासने विस्तारसे वर्णन
किया है। श्रीचैतन्यलीलाके व्यास श्रीवृन्दावनदास हैं।
उन्होंने लीलाओंका इस प्रकारसे वर्णन किया है कि वे
और भी सरस और मधुर हो गयी हैं। ग्रन्थके
विस्तारके भयसे उन्होंने जिस-जिस स्थानपर कुछ
लीलाओंको छोड़ा है, मैं उन-उन स्थानोंपर उन
लीलाओंका कुछ विस्तारसे वर्णन करनेका प्रयास
करूँगा। महाप्रभुके लीलामृतका उन्होंने आस्वादन किया
है, मैं तो केवल उनके उच्छिष्टका कुछ चर्वण
करूँगा ॥ 46-50 ॥
आदिलीला-सूत्रारम्भ :-
आदिलीला-सूत्र लिखि, शुन, भक्तगण।
संक्षेपे लिखिये सम्यक् ना याय लिखन ॥ 51 ॥
अनुवाद—हे भक्तगण! सुनिये, मैं आदिलीलाको
सूत्ररूपमें लिख रहा हूँ। मैं लीलाओंको संक्षेपमें लिख
रहा हूँ, क्योंकि समस्त लीलाओंको लिखना सम्भव नहीं
है ॥ 51 ॥
तीन इच्छाओंकी पूर्तिके लिये
श्रीकृष्णका गौररूपमें अवतार :-
कोन वाञ्छा पूरण लागि' व्रजेन्द्रकुमार।
अवतीर्ण हैते मने करिला विचार ॥ 52 ॥
अनुवाद—किसी इच्छाकी पूर्तिके लिये मनमें विचार
करके व्रजेन्द्रकुमार श्रीकृष्णने अवतीर्ण होनेका निश्चय
किया ॥ 52 ॥
श्रीकृष्णके गुरुजनोंका अवतार :-
आगे अवतारिल ये गुरु-परिवार।
संक्षेपे कहिये, कहा ना याय विस्तार ॥ 53 ॥
अनुवाद—पहले उन्होंने अपने जिन गुरुवर्ग और परिवारको अवतीर्ण करवाया, उनका मैं संक्षेपमें वर्णन
करूँगा, क्योंकि विस्तारसे वर्णन करना सम्भव नहीं
है ॥ 53 ॥
गुरुवर्गके नाम :-
श्रीशची-जगन्नाथ, श्रीमाधवपुरी।
केशव भारती, आर श्रीईश्वरपुरी ॥ 54 ॥
अद्वैत आचार्य, आर पण्डित श्रीवास।
आचार्यरत्न, विद्यानिधि, ठाकुर हरिदास ॥ 55 ॥
अनुवाद—श्रीकृष्णने श्रीशचीदेवी, श्रीजगन्नाथ मिश्र,
श्रीमाधवेन्द्रपुरी, श्रीकेशव भारती, श्रीईश्वरपुरी, श्रीअद्वैताचार्य,
श्रीवास पण्डित, आचार्यरत्न, विद्यानिधि और श्रीहरिदास
ठाकुरको पहले अवतीर्ण करवाया ॥ 54-55 ॥
श्रीहट्ट-निवासी श्रीउपेन्द्रमिश्र-नाम।
वैष्णव, पण्डित, धनी, सद्गुण-प्रधान ॥ 56 ॥
अनुवाद—श्रीहट्टके निवासी श्रीउपेन्द्रमिश्र भी पहले
अवतरित हुए। वे परम वैष्णव, विद्वान, धनी और
सद्गुण सम्पन्न थे ॥ 56 ॥
अनुभाष्य— 'श्रीउपेन्द्रमिश्र'-(श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका
35वाँ श्लोक)—
“पर्जन्यो नाम गोपाल आसीत् कृष्णपितामहः।
उपेन्द्रमिश्रः सञ्जातः श्रीहट्टे सप्त पुत्रवान्॥ 35॥”
“व्रजमें जो पर्जन्य नामक गोप श्रीकृष्णके पितामह
(दादा) थे, उन्होंने ही श्रीहट्टमें श्रीउपेन्द्र मिश्रके रूपमें
जन्म ग्रहण किया है।” श्रीहट्ट जिलाके अन्तर्गत
'ढाका-दक्षिण' ग्राम इनका वासस्थान था ॥ 56 ॥
उपेन्द्र मिश्रके सात पुत्र :-
सप्त मिश्र ताँर पुत्र-सप्त ऋषीश्वर।
कंसारि, परमानन्द, पद्मनाभ, सर्वेश्वर ॥ 57 ॥
जगन्नाथ, जनार्द्दन, त्रैलोक्यनाथ।
नदीयाते गङ्गावास कैल जगन्नाथ ॥ 58 ॥
154 | श्रीचैतन्यचरितामृत