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सर्वकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 684, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 684

[ 13/6-17
अब मैं चैतन्यलीलाको क्रमानुसार कहूँगा। मैं पहले इन
लीलाओंको सूत्ररूपमें कहूँगा और बादमें उनका विस्तृत
विवरण दूँगा॥ 6-7॥
महाप्रभुकी अड़तालीस वर्षकी प्रकटलीला :-
श्रीकृष्णचैतन्य नवद्वीपे अवतरि।
आटचल्लिश वत्सर प्रकट विहरि ॥ 8 ॥
चौद्दशत सात शके जन्मेरे प्रमाण।
चौद्दशत पञ्चान्ने हइल अन्तर्धान ॥ 9 ॥
अनुवाद-श्रीकृष्णचैतन्य नवद्वीपमें अवतरित हुए
और उन्होंने अड़तालीस वर्ष तक इस जगत्में प्रकट
विहार किया। चौदह सौ सात शकाब्दमें उनके जन्म
लेनेका प्रमाण है और चौदह सौ पचपन शकाब्दमें वे
अन्तर्धान हुए॥ 8-9॥
प्रथम चौबीस वर्ष नवद्वीपमें गृहस्थ लीला, शेष चौबीस
वर्ष नीलाचलमें संन्यास-लीला-अभिनय :-
चब्बिश वत्सर प्रभु कैल गृहवास।
निरन्तर कैल ताहे कीर्त्तन-विलास ॥ 10 ॥
चब्बिश वत्सर शेषे करिया संन्यास।
आर चब्बिश वत्सर कैल नीलाचले वास ॥ 11 ॥
अनुवाद-चौबीस वर्ष महाप्रभुने गृहवास करते हुए
निरन्तर श्रीकृष्ण-कीर्तनका प्रचार किया। चौबीस वर्ष
पूर्ण होनेपर उन्होंने संन्यास लिया और शेष चौबीस वर्ष
वे नीलाचलमें रहे॥ 10-11॥
शेष चौबीस वर्षोंमें छह वर्ष उत्तर और दक्षिण भारतमें
श्रीकृष्णका अन्वेषण और प्रचार :-
तार मध्ये छय वत्सर-गमनागमन।
कभु दक्षिण, कभु गौड़, कभु वृन्दावन ॥ 12 ॥
अष्टादश वत्सर रहिला नीलाचले।
कृष्णप्रेम-लीलामृते भासां'ल सकले ॥ 13 ॥
अनुवाद-शेष चौबीस वर्षोंमें प्रथम छह वर्ष वे
कभी दक्षिण भारत, कभी गौड़देश और कभी वृन्दावन
आते-जाते रहे। शेष अठारह वर्ष सभीको श्रीकृष्णप्रेममें
निमग्न करते हुए नीलाचलमें ही रहे॥ 11-13॥
गृहस्थ-लीला ही आदिलीला और संन्यास-लीला
ही मध्य एवं अन्त्यलीला :-
गार्हस्थ्ये प्रभुर लीला- 'आदि'-लीलाख्यान।
'मध्य'-'अन्त्य'-नामे-शेषलीलार दुइ नाम ॥ 14 ॥
अनुवाद-गृहवास करते हुए महाप्रभुने जो लीलाएँ
कीं, उन्हें 'आदिलीला' कहा जाता है और शेषलीलाके
दो नाम हैं-(प्रथम छह वर्षकी लीलाओंका नाम)
'मध्यलीला' और (शेष अठारह वर्षकी लीलाओंका
नाम) 'अन्त्यलीला' है॥ 14॥
'चैतन्यचरित्रमें' मुरारिगुप्तके द्वारा आदिलीलाका तथा
'कड़चामें' स्वरूप दामोदरके द्वारा शेष-लीलाका ग्रन्थन :-
आदिलीला-मध्ये प्रभुर यतेक चरित।
सूत्ररूपे मुरारिगुप्त करिल ग्रथित ॥ 15 ॥
प्रभुर मध्य-शेष-लीला स्वरूप-दामोदर।
सूत्र करि' ग्रन्थिलेन ग्रन्थेर भितर ॥ 16 ॥
अनुवाद-आदिलीलामें महाप्रभुके जो भी चरित हैं,
उनका मुरारि गुप्तने सूत्ररूपमें गुन्थन किया है। महाप्रभुकी
मध्यलीला और शेषलीलाको स्वरूप दामोदरने सूत्ररूपमें
अपने ग्रन्थ (कड़चा) में सङ्कलित किया है॥ 15-16॥
इन दोनोंके सूत्र ही महाप्रभुकी लीला-वर्णनके मूल :-
एइ दुइजनेर सूत्र देखिया शुनिया।
वर्णना करेन वैष्णव क्रम ये करिया ॥ 17 ॥
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥ 17॥
अमृतप्रवाह भाष्य-श्रीमुरारिगुप्तके आदिलीलाके सूत्र
अभी तक विद्यमान हैं, उसे देखकर और श्रीस्वरूप
गोस्वामीके कड़चा-सूत्र श्रीरघुनाथदास गोस्वामीके मुखसे
सुनकर सभी वैष्णव वर्णन करते हैं॥ 17॥
148 | श्रीचैतन्यचरितामृत