श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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इनका वास्तविक नाम जगन्नाथ चक्रवर्ती है, ये नीलाम्बर
चक्रवर्तीके भतीजे हैं। इनका निवास फरिदपुर जिलाके
मगडोबा गाँवमें है। श्रीगदाधरके अप्रकट होनेके पश्चात्
मामुठाकुर पुरीके ‘श्रीतोटा-गोपीनाथ’ के सेवाधिकारी बने
थे। श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 196वाँ और 205वाँ श्लोकके
अनुसार ये व्रजकी ‘कलभाषिणी’ हैं। शाखानिर्णयामृत
17श्लोक—
“यः प्रेम्णा गौरचन्द्रेण परिवारगणैः सह।
उत्कले भाषितो मामुस्तं वन्दे मामुठाकुरम्॥”
तोटा-गोपीनाथके सेवकगणोंकी गुरु-प्रणाली
(1) श्रीगदाधर पण्डित गोस्वामी (श्रीमती राधिका, अन्य
मतमें सौभाग्य-मञ्जरी), (2) उनके अनुगत श्रीजगन्नाथ
चक्रवर्ती ‘मामु’ गोस्वामी (श्रीरूप-मञ्जरी?), (3) उनके
अनुगत रघुनाथ गोस्वामी, (4) रामचन्द्र, (5) राधावल्लभ,
(6) कृष्णजीवन, (7) श्यामसुन्दर, (8) शान्तामणि,
(9) हरिनाथ, (10) नवीनचन्द्र, (11) मतिलाल,
(12) दयामयी, (13) कुञ्जबिहारी।
‘कण्ठाभरण’—इनका नाम श्रीअनन्त चट्टराज है।
श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 196वाँ और 206ठा श्लोक—
“श्रीकण्ठाभरणोपाधिरनन्तश्चट्टवंशजः।
हस्तिगोपालनामा च रङ्गवासी च वल्लभः॥206॥”
“व्रजकी गोपाली अब चट्टवंशमें जन्म लेनेवाले
कण्ठाभरण उपाधिसे विभूषित श्रीअनन्त हैं।” शाखानिर्णयामृत
18 श्लोक—
“लीलाकलापसंयुक्तं राधाकृष्णरसात्मकम्।
श्रीकण्ठाभरणं वन्दे तयोः कण्ठावतारकम्॥”॥80॥
(11) भूगर्भ गोस्वामी, (12) भागवतदास :—
भूगर्भ गोसाञि, आर भागवत दास।
येइ दुइ आसि' कैल वृन्दावने वास ॥ 81 ॥
अनुवाद—अन्य प्रमुख शाखाएँ भूगर्भ गोस्वामी और
भागवत दास हैं, जिन्होंने आकर वृन्दावनमें वास
किया॥81॥
अनुभाष्य—'भूगर्भ गोस्वामी’—श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका
187वाँ श्लोक—
“भूगर्भठक्कुरस्यासीत् पूर्वाख्या प्रेममञ्जरी॥187(क)॥”
“ये व्रजकी प्रेममञ्जरी' हैं।” ये श्रीलोकनाथ गोस्वामीके
अभिन्न हृदय सुहृद हैं। शाखानिर्णयामृत 24 श्लोक—
“गोस्वामिनञ्च भूगर्भं भूगर्भोत्थं सुविश्रुतम्।
सदा महाशयं वन्दे कृष्णप्रेमप्रदं प्रभुम्॥
श्रील-गोविन्द-देवस्य सेवा सुखविलासिनम्।
दयालुं प्रेमदं स्वच्छं नित्यमानन्दविग्रहम्॥”
'भागवत दास'—शाखानिर्णयामृत 31 श्लोक—
“भूगर्भसङ्गिनं वन्दे श्रीभागवतदासकम्।
सदा राधाकृष्ण-लीला-गानमण्डितमानसम्।”
“भूगर्भ गोस्वामीके सङ्गी श्रीभागवतदासकी मैं वन्दना
करता हूँ, जिनका हृदय सदा श्रीराधाकृष्णकी लीलाओंके
गानसे मण्डित रहता है।”॥81॥
(13) वाणीनाथ ब्रह्मचारी, (14) वल्लभचैतन्य :—
वाणीनाथ ब्रह्मचारी—बड़ महाशय।
वल्लभचैतन्यदास—कृष्णप्रेममय ॥ 82 ॥
अनुवाद—वाणीनाथ ब्रह्मचारी बड़े महात्मा हैं और
वल्लभचैतन्यदास सदा कृष्णप्रेममें डूबे रहते हैं॥82॥
अनुभाष्य—‘वाणीनाथ ब्रह्मचारी'—शाखानिर्णयामृत 32
श्लोक—
“भक्त-सङ्घदृग्भक्ताख्यं भक्तवृन्देन राजितम्।
ब्रह्मचारिणमीड़े तं वाणीनाथ-महाशयम्॥”
चैःचः आदिलीला 10/114 संख्या द्रष्टव्य है।
'वल्लभचैतन्य'—शाखानिर्णयामृत 33 श्लोक—
“कृष्णप्रेममयं स्वच्छं परमानन्ददायिनम्।
वन्दे वल्लभचैतन्यं लीलागानयुतान्तरम्॥”॥82॥
(15) श्रीनाथ, (16) उद्धव,
(17) जितामित्र, (18) जगन्नाथ :—
श्रीनाथ चक्रवर्ती, आर श्रीउद्धवदास।
जितामित्र, काष्ठकाटा-जगन्नाथदास ॥ 83 ॥
140 | श्रीचैतन्यचरितामृत