श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 678, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 12/83-86
“इन्दुलेखा व्रजे यासीच्छ
कृष्णदासब्रह्मचारी कृतवृन्दावनस्थितिः ॥ 164 ॥ ”
“पहले व्रजमें जो श्रीराधाकी सखी इन्दुलेखा थीं, वे
अब श्रीकृष्णदास ब्रह्मचारी हैं। इन्होंने श्रीवृन्दावनको
अपना वासस्थान बनाया है।” शाखानिर्णयामृत 41
श्लोक—
“कृष्णदास-ब्रह्मचारी-कृष्णप्रेम-प्रकाशकम्।
वन्दे तमुज्ज्वलधियं वृन्दावननिवासिनम् ॥ ”
‘पुष्पगोपाल'–शाखानिर्णयामृत 39 श्लोक—
“पुष्पगोपालनामानं वन्दे प्रेमविलासिनम्।
स्वरसैः पुष्पितः स्वर्णग्रामको नामधेयतः ॥ ”
‘श्रीहर्ष' –(श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 194 एवं 201वाँ
श्लोक)—
“मालती चन्द्रलतिका मधुमेधा वराङ्गदा।
रत्नावली च कमला गुणचूडा सुकेशिनी ॥ 194 ॥
सुबुद्धिमिश्रः श्रीहर्षो रघुमिश्रो द्विजोत्तमः ॥ 201 ॥ ”
“पहले व्रजमें जो 'सुकेशिनी' थीं, वे ही अब श्रीहर्ष
हैं।” शाखानिर्णयामृत 40 श्लोक—
“वन्दे श्रीहर्षमिश्राख्यं कृष्णप्रेमविनोदिनम्।
गौरप्रेम्णा मत्तचित्तं महानन्दरसाङ्कुरम् ॥ ”
'रघुमिश्र'–श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 195वें एवं 201वें
श्लोकके अनुसार पहले व्रजमें जो 'कर्पूरमञ्जरी' थीं, वे
ही अब श्रीरघुमिश्र हैं।
'लक्ष्मीनाथ पण्डित'–श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 196वें
एवं 205वें श्लोकके अनुसार पहले व्रजमें जो 'रसोन्मादा'
थीं, वे ही अब श्रीलक्ष्मीनाथ पण्डित हैं। शाखानिर्णयामृत
42 श्लोक—
“ब्रजलक्ष्मीनाथदासं करुणालयविग्रहम्।
महाभावान्वितं वन्दे व्रजसौभाग्यदायकम् ॥ ”
‘बङ्गवाटी-चैतन्यदास'–श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 196वें
एवं 206वें श्लोकके अनुसार पहले व्रजमें जो 'काली'
थीं, वे ही अब रङ्गवासी वल्लभ (श्रीबङ्गवाटी-चैतन्यदास)
हैं। शाखानिर्णयामृत 43 श्लोक—
“बङ्गवाट्याः श्रीचैतन्यदासं वन्दे महाशयम्।
सदा प्रेमाश्रुरोमाञ्च-पुलकाञ्चितविग्रहम् ॥ ”
इनकी शाखा-परम्परा—(2) मधुराप्रसाद,
(3) रुक्मिणी-कान्त, (4) जीवनकृष्ण, (5) युगलकिशोर,
(6) रतनकृष्ण, (7) राधामाधव, (8) ऊषामणि,
(9) वैकुण्ठनाथ, (10) लालमोहन साहा शंखनिधि
(ढाकावासी)।
'श्रीरघुनाथ'–शाखानिर्णयामृत 44 श्लोक—
“वन्दे श्रीरघुनाथाख्यं प्रेमकन्दमहाशयम्।
यन्नामश्रवणेनैव वृन्दावनरसं लभेत् ॥ ”
श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 194वाँ एवं 200वाँ श्लोक—
“रघुनाथो द्विजः कश्चिद्गौराङ्गानन्यसेवकः।
कंसारिसेनेः सेनः श्रीजगन्नाथो महाशयः ॥ 200 ॥ ”
“पहले व्रजमें जो 'वराङ्गदा' थीं, वे ही अब
श्रीरघुनाथ हैं॥” 83-85 ॥
(28) अमोघ, (29) हस्तिगोपाल, (30) चैतन्यवल्लभ,
(31) यदु, (32) मङ्गलवैष्णव :–
अमोघ पण्डित, हस्तिगोपाल, चैतन्यवल्लभ।
यदु गाङ्गुलि आर मङ्गल वैष्णव ॥ 86 ॥
अनुवाद—अमोघ पण्डित, हस्तिगोपाल, चैतन्यवल्लभ,
यदु गाङ्गुलि और मङ्गल वैष्णव भी श्रीगदाधर पण्डितकी
अन्य शाखाएँ हैं॥86॥
अनुभाष्य—'अमोघ पण्डित'–शाखानिर्णयामृत 59
श्लोक—
“अमोघपण्डितं वन्दे श्रीगौरेणात्मसात्कृतम्।
प्रेमगद्गदसान्द्राङ्गं पुलकाकुलविग्रहम् ॥ ”
'हस्तिगोपाल'–श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 196वें एवं 206वें
श्लोकके अनुसार ये व्रजकी हरिणी हैं। शाखानिर्णयामृत
61 श्लोक—
“हस्तिगोपालदासाख्यं प्रेममत्तकलेवरम्।
नमामि परया भक्त्या गौरप्रेममयं परम् ॥ ”
‘चैतन्यवल्लभ'–शाखानिर्णयामृत 60 श्लोक—
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