श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें12/83-85 ]
(19) हरि आचार्य, (20) पुरिया गोपाल,
(21) कृष्णदास ब्रह्मचारी, (22) पुष्पगोपाल :-
श्रीहरि आचार्य, दास-पुरियागोपाल।
कृष्णदास ब्रह्मचारी, पुष्पगोपाल ॥ 84 ॥
(23) श्रीहर्ष, (24) रघुमिश्र, (25) लक्ष्मीनाथ,
(26) चैतन्यदास, (27) रघुनाथ :-
श्रीहर्ष, रघुमिश्र, पण्डित लक्ष्मीनाथ।
बङ्गवाटी-चैतन्यदास, श्रीरघुनाथ ॥ 85 ॥
अनुवाद-श्रीनाथ चक्रवर्ती, श्रीउद्धव दास, जितामित्र, काष्ठकाटाके जगन्नाथदास, श्रीहरि आचार्य, सादीपुरवासी गोपाल दास, कृष्णदास ब्रह्मचारी, पुष्पगोपाल, श्रीहर्ष, रघुमिश्र, लक्ष्मीनाथ पण्डित, बङ्गवाटी-चैतन्यदास और श्रीरघुनाथ, श्रीगदाधर पण्डितकी अन्य शाखाएँ हैं॥ 83-85 ॥
अनुभाष्य-‘श्रीनाथ चक्रवर्ती’- शाखानिर्णयामृत 13 श्लोक-
“वन्दे श्रीनाथनामानं पण्डितं सद्गुणाश्रयम्।
कृष्णसेवापरिपाटी यत्नैर्येन सुसेविता ॥”
‘उद्धवदास’- शाखानिर्णयामृत 35 श्लोक-
“अतिदीनजने पूर्ण-प्रेमवित्तप्रदायकम्।
श्रीमदुद्धवदासाख्यं वन्देऽहं गुणशालिनम् ॥”
‘जितामित्र’- श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 202रा श्लोक-
“रिपवः षट् काममुख्या जिता येन वशीकृताः।
यथार्थनामा गौरेण जितामित्रः स निर्मितः ॥ 202 ॥”
“श्याममञ्जरी वही जितामित्र हैं, जिन्होंने काम आदि प्रमुख छह शत्रुओंको जीतकर वशीभूत कर लिया था और जिन्हें श्रीमन्महाप्रभुने उनके गुणोंके अनुरूप यथार्थ नाम प्रदान किया था।” शाखानिर्णयामृत 36 श्लोक-
“यस्य श्रीपुस्तकं कृष्ण-माधुर्य-प्रेमपोषकम्।
जितामित्रमहं वन्दे सर्वाभीष्टप्रदायकम् ॥”
‘जगन्नाथदास’- इनका निवास ढाका-विक्रमपुरके अन्तर्गत काष्ठकाटा (काठादिया) नामक ग्राममें है। इनके वंशधर अब आड़ियल-ग्राममें, कामारपाड़ा और पाइकपाड़ा-ग्राममें वास करते हैं। इनके द्वारा प्रतिष्ठित ‘यशोमाधव’ विग्रहकी सेवा आड़ियलके ‘गोस्वामी’ गण करते हैं। ये श्रीरूप गोस्वामी पादके द्वारा रचित ‘कृष्णगणोद्देश’ में वर्णित समसमाजमें स्थित चौंसठ सखियोंमेंसे छब्बीसवीं सखी, चित्रादेवीकी उपसखी ‘तिलकिनी’ हैं। 142वाँ श्लोक-
“रसालिका तिलकनी सौरसेनी सुगन्धिका ॥”
इनकी वंशधारा इस प्रकार है-(2) रामनृसिंह, (3) रामगोपाल, (4) रामचन्द्र, (5) सनातन, (6) मुक्ताराम, (7) गोपीनाथ, (8) गोलोक, (9) हरिमोहन शिरोमणि, (10) राखालराज।
उपरोक्त (7) गोपीनाथके कनिष्ठ पुत्र-(8) माधव, (9) लक्ष्मीकान्त।
सूर्यदास सरखेलके द्वारा रचित ‘भोगनिर्णय-पद्धति’ में-
“ततः सुचित्रायूथाश्च ये महान्तो भवन्ति तान्।
जगन्नाथाह्वयदासश्च ठक्कुरो जगदीशकः ॥”
शाखानिर्णयामृत 48 श्लोक-
“वन्दे जगन्नाथदासं काष्ठकाटेति विश्रुतम्।
दत्तं येन त्रैपुरे च श्रीहरिनाममङ्गलम् ॥”
‘श्रीहरि आचार्य’- श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 196 एवं 207वाँ श्लोकके अनुसार पहले व्रजकी ‘कालाक्षी’ अब श्रीहरि आचार्य हैं। शाखानिर्णयामृत 37 श्लोक-
“हरिदासाचार्यं बङ्गदेशनिवासिनम्।
वन्दे तं परया भक्त्या सोज्ज्वलेनोज्ज्वलीकृतम् ॥”
‘पुरिया गोपालदास’- शाखानिर्णयामृत 38 श्लोक-
“वन्दे गोपालदासाख्यं सादिपुर-निवासिनम्।
राधाकृष्णप्रेमरसैः प्लावितं विक्रमं पुरम् ॥”
“मैं सादीपुर निवासी गोपालदासकी वन्दना करता हूँ, जिन्होंने विक्रमपुरको श्रीराधाकृष्णके प्रेमरससे आप्लावित कर दिया।” अर्थात् ये विक्रमपुरमें हरिनाम प्रचारक थे।
‘कृष्णदास ब्रह्मचारी’- श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 164वाँ श्लोक-
बारहवाँ अध्याय | 141