श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 671, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंकरनेसे लोक-लज्जा और उनके धर्म एवं कीर्त्तिकी
हानि होती है॥ 49-53॥
अमृतानुकणिका-मनुसंहिता 4/91-
“न राज्ञः प्रतिगृह्णन्ति प्रेत्य श्रेयोऽभिकाङ्क्षिणः।”
“जो परलोककी मङ्गल कामना करते हैं, उन्हें
राजधन स्वीकार नहीं करना चाहिये।” हरिभक्तिविलास
(11/746) में भी ऐसी उक्ति देखी जाती है-
“न राज्ञः प्रतिगृह्णीयान्न शूद्रात् पतितादपि।
नान्यस्माद् याचकत्वञ्च निन्दिताद्वर्जयेद्बुधः॥”
“राजा, शूद्र या पतित व्यक्तिसे कोई वस्तु स्वीकार
नहीं करनी चाहिये एवं अन्य निन्दित व्यक्तिसे भी किसी
वस्तुकी याचना नहीं करना चाहिये॥” 49-53॥
महाप्रभु और श्रीअद्वैतप्रभु-एक दूसरेके मर्मज्ञ :-
आचार्येर अभिप्राय प्रभु मात्र बुझे।
प्रभुर गम्भीर वाक्य आचार्य समुझे॥ 54॥
एइ त' प्रस्तावे आछे बहुल विचार।
ग्रन्थ-बाहुल्येर भये नारि लिखिवार॥ 55॥
अनुवाद-श्रीअद्वैताचार्यके अभिप्रायको केवल महाप्रभु
बूझ पाते हैं और महाप्रभुके वाक्यके गम्भीर अर्थको
श्रीअद्वैताचार्य ही समझ सकते हैं। इस सम्बन्धमें अनेक
विचार हैं, परन्तु ग्रन्थके विशाल होनेके भयसे मैं उन्हें
यहाँ नहीं लिख रहा हूँ॥ 54-55॥
(5) यदुनन्दनाचार्य-शाखा :-
श्रीयदुनन्दनाचार्य—अद्वैतेर शाखा।
ताँर शाखा-उपशाखा-गणेर नाहि लेखा॥ 56॥
वासुदेव दत्तेर तेंहो कृपार भाजन।
सर्वभावे आश्रियाछे चैतन्य-चरण॥ 57॥
अनुवाद-श्रीयदुनन्दनाचार्य श्रीअद्वैताचार्यकी शाखा
हैं और उनकी शाखाओं और उपशाखाओंकी गणना
इतनी है कि उन्हें लिखना सम्भव नहीं है। उन्होंने
वासुदेव दत्तकी कृपा प्राप्त की और सब प्रकारसे
श्रीचैतन्य महाप्रभुके चरणकमलोंका आश्रय ग्रहण
किया॥ 56-57॥
अनुभाष्य-'श्रीयदुनन्दनाचार्य'-ये श्रीरघुनाथदास
गोस्वामीके पाञ्चरात्रिकी-दीक्षागुरु हैं। चैःचः अन्त्यलीला,
6/160-169 संख्या द्रष्टव्य है।
'वासुदेव दत्त'-गौरगणोद्देशदीपिका श्लोक 140-
“व्रजे स्थितौ गायकौ यौ मधुकण्ठ-मधुव्रतौ।
मुकुन्द-वासुदेवौ तौ दत्तौ गौराङ्ग-गायकौ ॥ 140 ॥”
“व्रजके मधुकण्ठ और मधुव्रत नामक गायक अब
श्रीमुकुन्द दत्त और श्रीवासुदेव दत्त नामक श्रीगौराङ्गदेवके
गायक हैं।” चैःचः आदिलीला, 10/41 द्रष्टव्य है॥ 57॥
(6) भागवताचार्य, (7) विष्णुदास,
(8) चक्रपाणि, (9) अनन्त आचार्य :-
भागवताचार्य, आर विष्णुदासाचार्य।
चक्रपाणि आचार्य, आर अनन्त आचार्य॥ 58॥
अनुवाद-भागवाताचार्य, विष्णुदासाचार्य, चक्रपाणि
आचार्य और अनन्त आचार्य, ये श्रीअद्वैताचार्यकी
शाखाएँ हैं॥ 58॥
अनुभाष्य-'भागवताचार्य'-ये पहले श्रीअद्वैतप्रभुके
गणोंमें और बादमें श्रीगदाधरके गणोंमें प्रविष्ट हुए।
यदुनन्दनदासके द्वारा लिखित 'शाखा-निर्णयामृत' ग्रन्थके
छठे श्लोकमें-
“वन्दे भागवताचार्यं गौराङ्ग-प्रियपात्रकम्।
येनाकारि महाग्रन्थो नाम्ना 'प्रेमतराङ्गिणी'॥”
“मैं श्रीगौराङ्ग महाप्रभुके प्रियपात्र श्रीभागवताचार्यको
प्रणाम करता हूँ, जिन्होंने 'प्रेमतराङ्गिणी' नामक महाग्रन्थकी
रचना की है।” श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 195 और 203वाँ
श्लोक-
“कर्पूरमञ्जरी श्याममञ्जरी 'श्वेतमञ्जरी'।
विलासमञ्जरी कामलेखा च मौनमञ्जरी ॥ 195 ॥
निर्मिता पुस्तिका येन कृष्णप्रेमतराङ्गिणी।
'श्रीमद्भागवताचार्यो' गौराङ्गात्यन्तवल्लभः ॥ 203 ॥”
बारहवाँ अध्याय | 135