श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
288 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 10/143-153 ]
अनुवाद—श्रीशिवानन्द सेन अपने पुत्र श्रीचैतन्यदासको
महाप्रभुसे मिलवानेके लिये अपने साथ लेकर आये।
महाप्रभुने उन दोनोंसे मिलनेपर श्रीशिवानन्दसे उनके
पुत्रका नाम पूछा। उनके पुत्रका 'चैतन्यदास' नाम
सुनकर श्रीगौररायने कहा,—“आपने अपने पुत्रका कैसा
नाम रखा है? इसे समझना बड़ा कठिन है॥”143-144 ॥
श्रीशिवानन्दका उत्तर और महाप्रभुको निमन्त्रण :—
सेन कहे,—“ये जानिलुँ, सेइ नाम धरिल।”
एत बलि' महाप्रभुरे निमन्त्रण कैल ॥ 145 ॥
जगन्नाथेर बहुमूल्य प्रसाद आनाइला।
भक्तगणे लञा प्रभु भोजने बसिला ॥ 146 ॥
बहुत अधिक भोजनके कारण महाप्रभुकी अप्रसन्नता :—
शिवानन्देर गौरवे प्रभु करिला भोजन।
अतिगुरु-भोजने प्रसन्न नहे मन ॥ 147 ॥
अनुवाद—श्रीशिवानन्द सेनने उत्तर दिया,—“मुझे
जो समझमें आया, मैंने उसके अनुसार नाम रखा है।”
यह कहकर श्रीशिवानन्द सेनने महाप्रभुको निमन्त्रण
दिया। श्रीशिवानन्द सेनने श्रीजगन्नाथदेवका बहुमूल्य
प्रसाद मँगवाया था और उसे महाप्रभुको निवेदन किया।
महाप्रभु भक्तोंको अपने साथ लेकर भोजनके लिये बैठे।
महाप्रभुने श्रीशिवानन्द सेनके सम्मान हेतु वह सब
भोजन तो खाया, किन्तु मात्रामें बहुत अधिक और
गरिष्ठ (कठिनतासे पचनेवाला भारी) होनेके कारण
उनका मन प्रसन्न नहीं हुआ॥ 145-147 ॥
महाप्रभुके अभिप्रायको समझकर श्रीशिवानन्दके
पुत्र श्रीचैतन्यदासके द्वारा जठराग्नि-मन्दनाशक
द्रव्यके द्वारा 'स्वारसिकी' सेवा :—
आर दिन चैतन्यदास कैला निमन्त्रण।
प्रभुर 'अभीष्ट' बुझि' आनिला व्यञ्जन ॥ 148 ॥
दधि, लेम्बु, आदा, आर फुलबड़ा-लवण।
सामग्री देखि' प्रभुर प्रसन्न हैल मन ॥ 149 ॥
अनुवाद—अगले दिन श्रीचैतन्यदासने महाप्रभुको
निमन्त्रण किया और उन्होंने महाप्रभुके अभीष्टको
समझकर व्यञ्जन मँगवाये और दही, नींबू, अदरक,
फूल-बड़ी तथा नमक आदिको महाप्रभुको निवेदन
किया। यह सब सामग्री देखकर महाप्रभु अत्यन्त प्रसन्न
हुए॥ 148-149 ॥
अन्तर्यामी महाप्रभुको श्रीचैतन्यदासकी यथार्थ
शुद्धसेवा-प्रवृत्ति देखकर आनन्द :—
प्रभु कहे,—“ए बालक आमार मत जाने।
सन्तुष्ट हइलाङ् आमि इहार निमन्त्रणे॥” 150 ॥
अपने दासको महाप्रभुके द्वारा अपना उच्छिष्ट प्रदान :—
एत बलि' दधि-भात करिला भोजन।
चैतन्यदासरे दिला उच्छिष्ट-भाजन ॥ 151 ॥
अनुवाद—महाप्रभुने कहा,—“यह बालक मेरे मनको
जानता है, मैं इसके निमन्त्रणसे अत्यन्त सन्तुष्ट हुआ
हूँ।” यह कहकर महाप्रभुने दही-भातका भोजन किया
और श्रीचैतन्यदासको अपना उच्छिष्ट दे दिया॥ 150-151 ॥
अनुभाष्य—'भाजन',—सहभाजन (साँझा करना),
पात्र ॥ 151 ॥
चार मास तक भक्तोंके द्वारा महाप्रभुको निमन्त्रण :—
चारिमास एइमत निमन्त्रणे याय।
कोन कोन वैष्णव 'दिवस' नाहि पाय ॥ 152 ॥
अनुवाद—चार मास इसी प्रकार महाप्रभुके द्वारा
प्रतिदिन निमन्त्रण स्वीकार करते हुए व्यतीत हो गये।
किसी-किसी वैष्णवको तो निमन्त्रण करनेके लिये
खाली दिन ही नहीं मिला ॥ 152 ॥
श्रीगदाधर और श्रीसार्वभौमका महाप्रभुको
निमन्त्रण करनेका निर्दिष्ट नियम :—
गदाधर-पण्डित, आचार्य-सार्वभौम।
इँहा सबार आछे भिक्षार दिवस-नियम ॥ 153 ॥
अनुवाद—श्रीगदाधर पण्डित और श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यके
[ 10/153–162 दसवाँ अध्याय 289
मासमें दिन निर्धारित थे जब महाप्रभु उनके निमन्त्रणको
स्वीकार करते थे॥ 153 ॥
बीच-बीचमें निमन्त्रण करनेवाले भक्त :—
गोपीनाथाचार्य, जगदानन्द, काशीश्वर।
भगवान्, रामभद्राचार्य, शङ्कर, वक्रेश्वर ॥ 154 ॥
मध्ये मध्ये घर–भाते करे निमन्त्रण।
अन्येर निमन्त्रणे प्रसादे कौड़ि दुइपण ॥ 155 ॥
अनुवाद—श्रीगोपीनाथ आचार्य, श्रीजगदानन्द पण्डित,
श्रीकाशीश्वर पण्डित, श्रीभगवान् आचार्य, श्रीरामभद्राचार्य,
श्रीशङ्कर पण्डित और श्रीवक्रेश्वर पण्डित बीच-बीचमें
अपने घरपर अन्न-व्यञ्जन आदि बनाकर महाप्रभुको
निमन्त्रण करते थे। अन्य भक्त महाप्रभुको निमन्त्रण
करके दो पण कौड़ीका (दो आनेका) प्रसाद मँगवाते
थे॥ 154-155 ॥
अनुभाष्य—महाप्रभु जो जन्मसे ब्राह्मण थे उनके
घरमें बना भोजन स्वीकार करते थे। अथवा जो जन्मसे
ब्राह्मण थे, किन्तु उनके घरका बना भोजन नहीं खाया
जा सकता था अथवा अन्यान्य व्यक्तियोंके निमन्त्रणमें
महाप्रभु दो पण अथवा चार पण कौड़ीके मूल्यका
महाप्रसाद स्वीकार करते थे॥ 154-155 ॥
रामचन्द्रपुरीके भयसे आधा-भोजन :—
प्रथमे आछिल ‘निर्वन्ध’ कौड़ि चारिपण।
रामचन्द्रपुरी-भये घटाइला निमन्त्रण ॥ 156 ॥
अनुवाद—पहले महाप्रभुके प्रसादके लिये चार पण
कौड़ी खर्च करने तकका नियम था, किन्तु रामचन्द्रपुरीके
भयसे उसे कम करके आधा कर दिया गया था॥ 156 ॥
अनुभाष्य—'घटाइला',—कम कर दिया॥ 156 ॥
दसवें अध्यायका अनुभाष्य समाप्त।
गौड़ीयभक्तोंका गौड़में जाना, पुरीवासियोंका पुरीमें रहना :—
चारिमास रहि' गौड़ेर भक्ते विदाय दिला।
नीलाचलेर सङ्गी भक्त सङ्गेइ रहिला ॥ 157 ॥
अनुवाद—महाप्रभुने गौड़देशसे आये भक्तोंको चार
मास तक रहनेके बाद विदायी दी। उसके बाद
श्रीजगन्नाथपुरीके सङ्गी भक्त ही महाप्रभुके साथ रहे॥ 157 ॥
महाप्रभुकी भिक्षाकी रीति, भक्तोंके द्वारा प्रदान किये
गये द्रव्य और परिमुण्डा-नृत्यादि वर्णित :—
एइ त' कहिलुँ प्रभुर भिक्षा-निमन्त्रण।
भक्त-दत्त वस्तु यैछे कैला आस्वादन ॥ 158 ॥
तार मध्ये राघवेर झालि-विवरण।
तार मध्ये परिमुण्डा-नृत्य-कथन ॥ 159 ॥
अनुवाद—इस प्रकार मैंने यह बतलाया कि महाप्रभुने
कैसे भोजनके निमन्त्रणको स्वीकार किया और कैसे
उन्होंने भक्तोंके द्वारा प्रदत्त वस्तुओंका आस्वादन किया।
मैंने इसी प्रसङ्गके बीचमें ही श्रीराघव पण्डितकी
झोलीका विवरण और महाप्रभुके परिमुण्डा (मण्डलीबद्ध)
नृत्यका वर्णन किया है॥ 158-159 ॥
श्रीकृष्णचैतन्य-कथाके श्रवणसे श्रीगौर-कृष्णके
चरणोंमें प्रेमका उदय :—
श्रद्धा करि' शुने येइ चैतन्येर कथा।
चैतन्यचरणे प्रेम पाइबे सर्वथा ॥ 160 ॥
श्रीगौरकथा—जीवोंके हृदय और कानोंके लिये रसायन :—
शुनिते अमृत-सम जुड़ाय कर्ण-मन।
सेइ भाग्यवान्, येइ करे आस्वादन ॥ 161 ॥
अनुवाद—जो व्यक्ति श्रद्धापूर्वक श्रीचैतन्य महाप्रभुकी
कथाका श्रवण करता है, उसे अवश्य ही श्रीचैतन्य
महाप्रभुके चरणकमलोंमें प्रेमकी प्राप्ति होगी। महाप्रभुकी
कथा सुननेमें अमृतके समान है और वह कानों तथा
मनको परम तृप्त कर देती है। जो व्यक्ति इसका
आस्वादन करता है, वह अत्यन्त सौभाग्यशाली
है॥ 160-161 ॥
श्रीरूप-रघुनाथ-पदे यार आश।
चैतन्यचरितामृत कहे कृष्णदास ॥ 162 ॥
290 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 10/162 ]
इति श्रीचैतन्यचरितामृते अन्त्यखण्डे भक्तदत्तास्वादनं वर्णन कर रहा है॥162॥
नाम दशमः परिच्छेदः। श्रीचैतन्यचरितामृतके अन्त्यखण्डमें 'भक्तोंके द्वारा प्रदत्त
अनुवाद—श्रीरूप-रघुनाथ गोस्वामीके चरणकमलोंकी भेंटका आस्वादन' नामक दसवें अध्यायका अनुवाद
कृपाभिलाषा करते हुए कृष्णदास इस श्रीचैतन्यचरितामृतका समाप्त।
ग्यारहवाँ अध्याय
कथासार—इस अध्यायमें ब्रह्म-श्रीहरिदासठाकुरके
द्वारा महाप्रभुकी आज्ञा प्राप्त करके देहत्याग करनेपर
महाप्रभुने उन्हें विशेष भक्ति और समारोहके साथ ले
जाकर समुद्रके तटपर समाधि प्रदान की। अपने हाथोंसे
बालू देकर चबूतरा बना दिया, बादमें समुद्र स्नान
करके स्वयं भिक्षा करके श्रीहरिदासका विजय महोत्सव
किया।
—(अमृतप्रवाह भाष्य)
गोदमें श्रीहरिदासकी देहको उठाकर नृत्य
करनेवाले श्रीगौरको प्रणाम :-
नमामि हरिदासं तं चैतन्यं तञ्च तत्प्रभुम्।
संस्थितामपि यन्मूर्त्तिं स्वाङ्के कृत्वा ननर्त्त यः ॥ १ ॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ १ ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—मैं श्रीहरिदासको नमस्कार करता
हूँ और उनके प्रभु उन चैतन्यदेवको नमस्कार करता
हूँ,—जिन्होंने श्रीहरिदासके द्वारा परित्यक्त देहको गोदमें
उठाकर नृत्य किया था ॥ १ ॥
अनुभाष्य—
यः (चैतन्यदेवः) यन्मूर्त्तिं (यस्य हरिदासस्य मूर्त्तिं)
संस्थितां (समाधिप्राप्ताम्) अपि स्वाङ्के (स्वस्य क्रोड़े)
कृत्वा ननर्त्त, तं हरिदासं तत्प्रभुं तं चैतन्यं च नमामि।
श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ १ ॥
जय जय श्रीचैतन्य जय दयामय।
जयाद्वैतप्रिय नित्यानन्दप्रिय जय ॥ २ ॥
अनुवाद—श्रीअद्वैताचार्य प्रभु और श्रीनित्यानन्द प्रभुके
अति प्रिय दयामय श्रीचैतन्य महाप्रभुकी जय हो, जय
हो ॥ २ ॥
जय श्रीनिवासेश्वर हरिदासनाथ।
जय गदाधरप्रिय स्वरूप-प्राणनाथ ॥ ३ ॥
अनुवाद—श्रीनिवास पण्डितके ईश्वर, श्रीहरिदास
ठाकुरके नाथ, श्रीगदाधर पण्डितके प्रिय और श्रीस्वरूप
दामोदरके प्राणनाथ श्रीचैतन्य महाप्रभुकी जय हो ॥ ३ ॥
काशीश्वर-प्रिय जगदानन्द-प्राणेश्वर।
जय रूप-सनातन-रघुनाथेश्वर ॥ ४ ॥
अनुवाद—श्रीकाशीश्वर पण्डितके प्रिय, श्रीजगदानन्द
पण्डितके प्राणेश्वर और श्रीरूप-श्रीसनातन-श्रीरघुनाथदास
गोस्वामीके ईश्वर श्रीचैतन्य महाप्रभुकी जय हो ॥ ४ ॥
जय गौरदेह कृष्ण स्वयं भगवान्।
कृपा करि' देह' प्रभु, निज-पद-दान ॥ ५ ॥
अनुवाद—श्रीगौरदेहधारी स्वयं भगवान् श्रीकृष्णकी
जय हो, हे प्रभो ! कृपा करके अपने श्रीचरणकमलोंका
आश्रय प्रदान कीजिये ॥ ५ ॥
अनुभाष्य—'गौरदेह',-गौरवर्णकान्ति-देहधारी ॥ ५ ॥
नित्यानन्दचन्द्र जय चैतन्येर प्राण।
तोमार चरणारविन्दे भक्ति देह' दान ॥ ६ ॥
अनुवाद—श्रीचैतन्य महाप्रभुके प्राण-स्वरूप
श्रीनित्यानन्दचन्द्रकी जय हो, आप कृपा मुझे अपने
श्रीचरणकमलोंमें भक्ति प्रदान कीजिये ॥ ६ ॥
जय जयाद्वैतचन्द्र चैतन्येर आर्य।
स्वचरणे भक्ति देह' जयाद्वैताचार्य ॥ ७ ॥
अनुवाद—श्रीचैतन्य महाप्रभुके सम्माननीय
श्रीअद्वैतचन्द्रकी जय हो, जय हो। हे श्रीअद्वैताचार्य
292 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 11/7-16 ]
प्रभो ! आप मुझे अपने श्रीचरणकमलोंकी भक्ति प्रदान
कीजिये ॥ 7 ॥
अनुभाष्य- 'चैतन्येर आर्य', - महाप्रभुके द्वारा
सम्माननीय ॥ 7 ॥
जय गौरभक्तगण-गौर याँर प्राण।
सब भक्त मिलि' मोरे भक्ति देह' दान ॥ 8 ॥
अनुवाद-श्रीगौरसुन्दर ही जिनके प्राणस्वरूप हैं,
उन समस्त गौरभक्तोंकी जय हो। आप सभी भक्त कृपा
करके मुझे भक्तिका दान दीजिये ॥ 8 ॥
जय रूप, सनातन, जीव, रघुनाथ।
रघुनाथ, गोपाल, -छय मोर प्राणनाथ ॥ 9 ॥
अनुवाद-मेरे प्राणनाथ श्रीरूप गोस्वामी, श्रीसनातन
गोस्वामी, श्रीजीव गोस्वामी, श्रीरघुनाथदास गोस्वामी, श्रीरघुनाथ
भट्ट गोस्वामी, श्रीगोपाल भट्ट गोस्वामी-इन छह गोस्वामियोंकी
जय हो ॥ 9 ॥
ग्रन्थकारकी दीनतापूर्वक उक्ति, स्वयंको शोधन
करनेके लिये श्रीचैतन्यगुणलीलाका वर्णन :-
ए-सब प्रसादे लिखि चैतन्य-लीला-गुण।
यैछे तैछे लिखि, करि आपन पावन ॥ 10 ॥
अनुवाद-मैं श्रीचैतन्य महाप्रभु और उनके समस्त
भक्तोंकी कृपासे ही श्रीचैतन्य महाप्रभुकी लीलाओं और
उनके गुणोंको लिख रहा हूँ। मैं ठीकसे लिखना भी
नहीं जानता हूँ, केवल स्वयंको पवित्र करनेके लिये
लिख रहा हूँ ॥ 10 ॥
भक्तोंके साथ महाप्रभुका नीलाचलमें कीर्तनविलास :-
एमत महाप्रभुर नीलाचले वास।
सङ्गे भक्तगण लञा कीर्त्तन-विलास ॥ 11 ॥
अनुवाद-इस प्रकार महाप्रभु अपने भक्तोंको साथमें
लेकर कीर्तन-विलास करते हुए श्रीजगन्नाथपुरीमें वास
कर रहे थे ॥ 11 ॥
दिनमें नामसङ्कीर्तन और श्रीजगन्नाथ-दर्शन,
रात्रिमें श्रीस्वरूप-रामानन्दके साथ
श्रीराधाके कृष्णप्रेमका रसास्वादन :-
दिने नृत्य-कीर्त्तन, ईश्वर-दरशन।
रात्र्ये राय-स्वरूप-सने रस-आस्वादन ॥ 12 ॥
अनुवाद-महाप्रभु दिनके समय नृत्य-कीर्तन और
श्रीजगन्नाथदेवके दर्शन करते थे। रात्रिके समय श्रीरामानन्द
और श्रीस्वरूप दामोदरके साथ रसका आस्वादन करते
थे ॥ 12 ॥
श्रीकृष्णविरहमें महाप्रभुकी देहमें सात्त्विकभावोंका उदय :-
एमत महाप्रभुर सुखे काल याय।
कृष्णेर विरह-विकार अङ्गे नाना हय ॥ 13 ॥
अनुवाद-इस प्रकार महाप्रभुका समय सुखपूर्वक
व्यतीत होता था। कृष्णविरहके कारण उनके अङ्गोंमें
अनेक विकार उत्पन्न होते थे ॥ 13 ॥
दिने दिने बाड़े विकार, रात्र्ये अतिशय।
चिन्ता, उद्वेग, प्रलापादि यत शास्त्रे कय ॥ 14 ॥
अनुवाद-दिन-प्रतिदिन महाप्रभुमें कृष्णविरहसे उत्पन्न
शास्त्रोंमें वर्णित चिन्ता, उद्वेग, प्रलापादि विकार वर्धित हो
रहे थे जो रात्रिमें बहुत अधिक बढ़ जाते थे ॥ 14 ॥
अप्राकृत विप्रलम्भ-लीलामें महाप्रभुके दो नित्य सङ्गी :-
स्वरूप गोसाञि, आर रामानन्द राय।
रात्रि-दिने करे दोँहे प्रभुर सहाय ॥ 15 ॥
अनुवाद-श्रीस्वरूप दामोदर और श्रीरामार्नन्द राय-ये
दोनों रात-दिन महाप्रभुके साथ रहकर उनको सान्त्वना
देते ॥ 15 ॥
श्रीहरिदासके वृत्तान्तका वर्णन; श्रीगोविन्दके द्वारा
श्रीहरिदासको प्रसाद देनेके लिये जाना :-
एकदिन गोविन्द महाप्रसाद लञा।
हरिदासे दिते गेला आनन्दित हञा ॥ 16 ॥
[ 11/16-25 ग्यारहवाँ अध्याय 293
श्रीहरिदास ठाकुरके अप्रकट कालकी अवस्था :-
देखे,—हरिदास-ठाकुर करियाछेन शयन।
मन्द मन्द करितेछेन संख्या-सङ्कीर्त्तन ॥ 17 ॥
अनुवाद—एकदिन जब महाप्रभुके सेवक श्रीगोविन्द आनन्दित होकर श्रीहरिदास ठाकुरको महाप्रसाद देनेके लिये गये, तब उन्होंने देखा कि श्रीहरिदास ठाकुर लेटे हुए मन्द-मन्द ध्वनिसे संख्यापूर्वक नामसङ्कीर्तन कर रहे हैं॥ 16-17 ॥
श्रीगोविन्दके द्वारा प्रसाद ग्रहण करनेके लिये
अनुरोध, श्रीहरिदासकी नहीं लेनेकी इच्छा :-
गोविन्द कहे,—“उठ आसि’ करह भोजन।”
हरिदास कहे,—“आजि करिमु लङ्घन ॥ 18 ॥
श्रीहरिदासके द्वारा नामाश्रित साधकके प्रसादके
सम्मानके विषयमें आदर्श-व्यवहारका प्रदर्शन :-
संख्या-कीर्त्तन पूरे नाहि, केमते खाइमु?
महाप्रसाद आनियाछ, केमते उपेक्षिमु??” 19 ॥
अनुवाद—श्रीगोविन्दने कहा,—“कृपया उठिये और आकर भोजन कीजिये।” श्रीहरिदास ठाकुरने कहा,—“आज मैं उपवास ही करूँगा। अभी तक मेरे नामकीर्तनकी संख्या पूर्ण नहीं हुई है, इसलिये मैं कैसे खा सकता हूँ? किन्तु आप महाप्रसाद लाये हैं, तो मैं उसकी उपेक्षा भी कैसे कर सकता हूँ?”18-19 ॥
एत बलि’ महाप्रसाद करिला वन्दन।
एक रञ्च लञा तार करिला भक्षण ॥ 20 ॥
अनुवाद—यह कहकर श्रीहरिदास ठाकुरने महाप्रसादकी वन्दना की और उसमें-से एक कण लेकर उसे खा लिया॥ 20 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—‘रञ्च’,—कण॥ 20 ॥
एकदिन महाप्रभुका श्रीहरिदासके पास आना
और उनका कुशल पूछना :-
आर दिन महाप्रभु ताँर ठाञि आइला।
“सुस्थ हओ, हरिदास”—बलि’ ताँरे पुछिला ॥ 21 ॥
अनुवाद—अगले दिन महाप्रभु श्रीहरिदास ठाकुरके वासस्थानपर आये और उनसे पूछा,—“हे हरिदास! आप स्वस्थ तो हैं ना!”21 ॥
श्रीहरिदासकी दैन्य-उक्ति :-
नमस्कार करि’ तँहो कैला निवेदन।
“शरीर सुस्थ हय मोर, असुस्थ बुद्धि-मन ॥”22 ॥
अनुवाद—श्रीहरिदास ठाकुरने उनको प्रणाम करके निवेदन किया,—“मेरा शरीर तो स्वस्थ है, किन्तु मन और बुद्धि अस्वस्थ हैं॥”22 ॥
महाप्रभुके प्रश्नोत्तरमें संख्यानाम-कीर्तन-अभावसे
उत्पन्न अपने दुःखके विषयमें बतलाना :-
प्रभु कहे,—“कोन व्याधि, कह त’ निर्णय?”
तँहो कहे,—“संख्या-कीर्त्तन ना पूरय ॥” 23 ॥
अनुवाद—महाप्रभुने पूछा,—“क्या आप बता सकते हो आपको क्या रोग है?” श्रीहरिदास ठाकुरने उत्तर दिया,—“मेरा संख्यापूर्वक नामकीर्तन पूर्ण नहीं हो पाता॥” 23 ॥
अनुभाष्य—यहाँपर भी जाना जा रहा है कि संख्या-ग्रहणपूर्वक नियमितरूपसे ठाकुर श्रीहरिदासके आनुगत्यमें (सोलह नाम बत्तीस अक्षर) “हरे कृष्ण”-महामन्त्रकी उच्चस्वरमें कीर्तनकी विधि ही प्रत्येक नामाश्रित साधकके लिये एकमात्र पालनीय है।
अन्त्यलीला 3/99, 113-115, 120, 123-124, 129, 175, 223, 227, 238-242 आदि संख्या देखें॥ 23 ॥
महाप्रभुके द्वारा अप्राकृत सिद्धदेह श्रीहरिदासको
साधनके अभिनयको कम करनेका आदेश :-
प्रभु कहे,—“वृद्ध हइला ‘संख्या’ अल्प कर।
सिद्ध-देह तुमि, साधने आग्रह केने कर? ? 24 ॥
स्वयं महाप्रभुके वचन—“नामके आचार्य और
प्रचारकके रूपमें श्रीहरिदास अवतीर्ण” :-
लोक निस्तारिते एइ तोमार ‘अवतार’।
नामेर महिमा लोके करिला प्रचार ॥ 25 ॥
294 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 11/24-33 ]
एबे अल्प संख्या करि' कर सङ्कीर्त्तन।”
हरिदास कहे, —“शुन मोर निवेदन ॥ 26 ॥
अनुवाद-महाप्रभुने कहा, —“अब आप वृद्ध हो
गये हैं, आप नाम-संख्याको कम कर दीजिये। आप
सिद्ध-देहको प्राप्त कर चुके हैं, तो आपका साधनमें
इतना आग्रह क्यों हैं? आपका यह अवतार लोगोंका
उद्धार करनेके लिये ही हुआ है। आपने कृष्णनामकी
महिमाका इस जगत्में बहुत प्रचार किया है। अब आप
संख्याको कुछ कम करके नाम-सङ्कीर्तन कीजिये।”
श्रीहरिदास ठाकुरने कहा, —“आप मेरा निवेदन
सुनिये— ॥ 24-26 ॥
अनुभाष्य- 'तोमार अवतार',—भगवद्भक्त और पार्षदगण
भगवान्की इच्छासे उनकी सेवाके उद्देश्यसे पृथ्वीपर
अवतीर्ण होते हैं ॥ 25 ॥
श्रीहरिदासके पत्थरको भी पिघला देनेवाले दीनतापूर्ण
वचन और महाप्रभुकी महिमाका गान :-
हीन-जाति जन्म मोर निन्द्य-कलेवर।
हीनकर्मे रत मुञि अधम पामर ॥ 27 ॥
अदृश्य, अस्पृश्य मोरे अङ्गीकार कैला।
रौरव हइते मोरे वैकुण्ठे चढ़ाइला ॥ 28 ॥
स्वतन्त्र ईश्वर तुमि हओ इच्छामय।
जगत्नाचाओ, यारे यैछे इच्छा हय ॥ 29 ॥
अनेक नाचाइला मोरे प्रसाद करिया।
विप्रेर श्राद्धपात्र खाइनु 'म्लेच्छ' हञा ॥ 30 ॥
अनुवाद-मेरा जन्म हीन जातिमें हुआ है और
मेरी यह देह अति निन्दनीय है। मैं हीन कर्मोंमें ही
रत रहता हूँ, इसलिये मैं अधम और पापी हूँ। यद्यपि
मैं देखने और स्पर्श करने योग्य भी नहीं हूँ, तथापि
आपने मुझे अङ्गीकार करके रौरव-नरकसे उठाकर
वैकुण्ठमें पहुँचा दिया है। आप स्वतन्त्र ईश्वर होनेके
कारण जो चाहे कर सकते हैं। आपकी जैसी इच्छा
होती है, आप जगत्को वैसे ही नचाते हैं। आपने कृपा
करके मुझे भी बहुत नचाया है, मैंने म्लेच्छ होनेपर
भी ब्राह्मणके श्राद्ध-पात्रको खाया है ॥ 27-30 ॥
अनुभाष्य- 'श्राद्धपात्र', —विष्णुस्मृतिमें—
“ब्राह्मणापसदा ह्येते कथिताः पङ्क्तिदूषकाः।
एतान् विवर्जयेद्यत्नात् श्राद्धकर्मणि पण्डितः ॥”
अर्थात् “ब्राह्मणकुलमें जन्म होनेपर भी स्मृतिमें
बतलाये गये पंक्तिदूषक [जिसके साथ बैठकर भोजन
करनेमें दूषण लगे, ऐसे समाजको दूषित करनेवाले]
'अपसदाख्य' [नीच कहे जानेवाले] ब्राह्मणको श्राद्ध-पात्र
मत देना।” यहाँपर शुद्ध ब्राह्मणको प्राप्त होनेवाला
श्राद्धपात्र [अप्राकृत] दीक्षित-ब्राह्मण श्रीहरिदासको दिया
गया। म्लेच्छ-कुलमें उत्पन्न होनेपर भी 'हरिजन' होनेके
कारण उनका उसमें अधिकार है ॥ 30 ॥
महाप्रभुसे अपना अभिप्राय बतलाना :-
एक वाञ्छा हय मोर बहु दिन हैते।
लीला सम्वरिबे तुमि, —लय मोर चित्ते ॥ 31 ॥
महाप्रभुके अप्रकट होनेसे पहले ही अपनी
लीलाको सम्वरण करनेकी इच्छा :-
सेइ लीला प्रभु मोरे कभु ना देखाइबा।
आपनार आगे मोर शरीर पड़िबा ॥ 32 ॥
अनुवाद-बहुत दिनोंसे मेरी एक इच्छा है। मुझे
ऐसा प्रतीत हो रहा है कि आप शीघ्र ही अपनी लीला
सम्वरण करेंगे, इसलिये हे महाप्रभो ! आप मुझे अपनी
वह अन्तर्धान-लीला कभी मत दिखाना। उसके पूर्व ही
आपके सामने ही मेरा यह शरीर छूट जाय ॥ 31-32 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य- 'सेइ लीला'-आपकी अन्तर्धान-
लीला ॥ 32 ॥
काय-मन-वाक्यसे श्रीगौर-कृष्णसेवासुखपरायण अपनी
अभिलाषाके साथ अप्रकट होनेकी इच्छाका ज्ञापन :-
हृदये धरिमु तोमार कमल-चरण।
नयने देखिमु तोमार चाँद-वदन ॥ 33 ॥
[ 11/33-44 ग्यारहवाँ अध्याय 295
जिह्वाय उच्चारिमु तोमार 'कृष्णचैतन्य'-नाम।
एइमत मोर इच्छा,-छाड़िमु पराण ॥ 34 ॥
मोर एइ इच्छा यदि तोमार प्रसादे हय।
एइ निवेदन मोर कर, दयामय ॥ 35 ॥
एइ नीच देह मोर पड़ुक तव आगे।
एइ वाञ्छा-सिद्धि मोर तोमाते लागे ॥”36 ॥
अनुवाद—मैं अपने हृदयमें आपके चरणकमलोंको
धारण करूँ, अपने नेत्रोंसे आपके चन्द्र जैसे मुखका
दर्शन करूँ और मैं अपनी जिह्वासे आपके
'कृष्णचैतन्य'-नामका उच्चारण करूँ—मैं ऐसे करते हुए
देहत्याग करूँ, मेरी ऐसी इच्छा है। आपकी कृपासे मेरी
यह वाञ्छा पूर्ण हो सकती है। हे दयामय! आप मेरे
इस निवेदनको स्वीकार कीजिये। मेरी यह नीच देह
आपके सामने ही छूट जाय, मेरी यह वाञ्छासिद्धि
आपके द्वारा ही हो सकती है॥”33-36 ॥
महाप्रभुके द्वारा श्रीहरिदासकी इच्छा पूर्ण करना :-
प्रभु कहे,—“हरिदास, ये तुमि मागिबे।
कृष्ण कृपामय ताहा अवश्य करिबे ॥ 37 ॥
लीला-परिकरके विच्छेदके स्मरणसे महाप्रभुके अति
मर्मस्पर्शी और करुण वचन :-
किन्तु आमार ये किछु सुख, सब तोमा लञा।
तोमार योग्य নহে,-याबे आमारे छाड़िया ॥”38 ॥
अनुवाद—महाप्रभुने कहा,—“हे हरिदास! आप जो
कुछ भी माँगोगे, कृपामय कृष्ण आपकी इच्छाको
अवश्य ही पूर्ण करेंगे। किन्तु मेरा जो कुछ सुख है,
वह सब आपके सङ्गके कारण ही है। आपके लिये
मुझे इस प्रकारसे छोड़कर जाना उचित नहीं है॥”37-38 ॥
श्रीहरिदासके द्वारा महाप्रभुकी निष्कपट कृपाकी याचना :-
चरणे धरि' कहे हरिदास,—“ना करिह 'माया'।
अवश्य मो-अधमे, प्रभु, कर एइ 'दया' ॥ 39 ॥
पुनः दैन्यपूर्ण उक्ति :-
मोर शिरोमणि कत कत महाशय।
तोमार लीलार सहाय कोटिभक्त हय ॥ 40 ॥
आमा-हेन यदि एक कीट मरि' गेल।
पिपीलिका मैले पृथिवीर काँहा हानि हैल??41 ॥
भक्तवत्सल-महाप्रभुके निकट श्रीहरिदासके द्वारा स्वयंका
उनके दासाभासके रूपमें वर्णन और अपने अभीष्टकी
सिद्धिके विषयमें आशाबन्ध :-
'भकतवत्सल' तुमि, मुइ 'भक्ताभास'।
अवश्य पूरिबे, प्रभु, मोर एइ आश ॥”42 ॥
अनुवाद—श्रीहरिदास ठाकुरने महाप्रभुके चरणोंको
पकड़कर उनसे कहा,—“आप अपनी मायाका विस्तार
मत कीजिये। हे प्रभो! इस अधमपर आप यह दया
अवश्य ही कीजिये। ऐसे करोड़ों महाशय हैं जो मेरे
शिरोमणि हैं और वे आपकी लीलामें सहायता कर रहे
हैं। मेरे जैसे एक कीटके मर जानेपर आपकी क्या
हानि होगी? जैसे एक चींटीके मर जानेपर पृथ्वीकी
कोई भी हानि नहीं होती। हे महाप्रभो! यद्यपि आप तो
भक्तवत्सल हैं और मैं भक्तका आभासमात्र ही हूँ,
तथापि मुझे यह पूर्ण आशा है कि आप मेरी इच्छाको
अवश्य पूर्ण करेंगे॥”39-42 ॥
महाप्रभुका प्रस्थान और अगले दिन महाप्रभुके
द्वारा आनेके विषयमें आश्वासन :-
मध्याह करिते प्रभु चलिला आपने।
ईश्वर देखिया कालि दिबेन दरशने ॥ 43 ॥
तबे महाप्रभु ताँरे करि' आलिङ्गन।
मध्याह करिते समुद्रे करिला गमन ॥ 44 ॥
अनुवाद—मध्याह्न कृत्य करनेका समय हो जानेके
कारण महाप्रभुने श्रीहरिदास ठाकुरसे कहा कि मैं कल
भगवान् जगन्नाथके दर्शन करके आपके पास आऊँगा।
तब उन्होंने श्रीहरिदास ठाकुरका आलिङ्गन किया और
296 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 11/43-55 ]
मध्याह्न कृत्य और स्नान करनेके लिये समुद्रकी ओर
गमन किया ॥ 43-44 ॥
अगले दिन प्रातः भक्तोंके साथ श्रीजगन्नाथ-दर्शनके बाद
श्रीहरिदासको दर्शन देनेके लिये महाप्रभुका आगमन :-
प्रातःकाले ईश्वर देखि' सब भक्त लञा।
हरिदासे देखिते आइला शीघ्र करिया ॥ 45 ॥
श्रीहरिदासके निर्याणका वर्णन, श्रीहरिदासके द्वारा
भक्त और भगवान्के चरणोंकी वन्दना :-
हरिदासेर आगे आसि' दिला दरशन।
हरिदास वन्जिला प्रभुर आर वैष्णव-चरण ॥ 46 ॥
अनुवाद-अगले दिन प्रातःकालमें महाप्रभुने सब
भक्तोंको अपने साथ लेकर भगवान् श्रीजगन्नाथका दर्शन
किया और फिर वे शीघ्रतासे श्रीहरिदास ठाकुरसे
मिलनेके लिये आ गये और उन्हें अपने दर्शन प्रदान
किये। श्रीहरिदास ठाकुरने महाप्रभु और समस्त वैष्णवोंके
चरणोंकी वन्दना की ॥ 45-46 ॥
महाप्रभुके द्वारा श्रीहरिदासके कुशलकी जिज्ञासा;
श्रीहरिदासके द्वारा गोलोक गमन करनेका प्रयास :-
प्रभु कहे, - "हरिदास, कह समाचार।"
हरिदास कहे, - "प्रभु, ये-आज्ञा तोमार ॥" 47 ॥
अनुवाद-महाप्रभुने कहा, - 'हे हरिदास ! सुनाओ,
क्या समाचार है?" श्रीहरिदास ठाकुरने कहा, - "हे
महाप्रभो ! जैसी आपकी आज्ञा हो ॥" 47 ॥
श्रीहरिदासकी कुटियाके सामने भक्तोंसहित
महाप्रभुके द्वारा महाकीर्तन-आरम्भ :-
अङ्गने आरम्भिला प्रभु महासङ्कीर्त्तन ।
वक्रेश्वर-पण्डित ताँहा करेन नर्त्तन ॥ 48 ॥
स्वरूप-गोसाञि आदि यत प्रभुर गण।
हरिदासे बेड़ि' करे नाम-सङ्कीर्त्तन ॥ 49 ॥
अनुवाद-यह सुनकर महाप्रभुने वहीं आङ्गनमें
महा-सङ्कीर्तन आरम्भ किया। श्रीवक्रेश्वर पण्डितने नृत्य
आरम्भ किया। श्रीस्वरूप दामोदर आदि महाप्रभुके
समस्त परिकर श्रीहरिदास ठाकुरको चारों ओरसे घेरकर
नाम-सङ्कीर्तन करने लगे ॥ 48-49 ॥
सभीके सामने महाप्रभुके द्वारा महा-आनन्दसे
भक्त श्रीहरिदासके गुणोंका वर्णन :-
रामानन्द, सार्वभौम, सबार अग्रेते।
हरिदासेर गुण प्रभु लागिला कहिते ॥ 50 ॥
हरिदासेर गुण कहिते हइला पञ्चमुख।
कहिते कहिते प्रभुर बाड़े महासुख ॥ 51 ॥
सभी भक्तोंका विस्मय और श्रीहरिदासके
चरणोंकी वन्दना :-
हरिदासेर गुणे सबार विस्मित हय मन।
सर्वभक्त वन्दे हरिदासेर चरण ॥ 52 ॥
अनुवाद-महाप्रभु श्रीरामानन्द राय तथा श्रीसार्वभौम
भट्टाचार्य आदि समस्त भक्तोंके सामने श्रीहरिदास ठाकुरके
गुणोंका वर्णन करने लगे। श्रीहरिदास ठाकुरके गुणोंका
वर्णन करते समय महाप्रभु मानो पाँच मुखवाले हो गये
अर्थात् जैसे पाँच मुखोंसे वर्णन कर रहे हों। जैसे वे
गुणोंका गान करते जा रहे थे, वैसे उनकी प्रसन्नता
बढ़ती जा रही थी। श्रीहरिदास ठाकुरके गुणोंको सुनकर
सभी भक्त आश्चर्यचकित हो गये और वे सब
श्रीहरिदास ठाकुरके चरणकमलोंकी वन्दना करने
लगे ॥ 50-52 ॥
अपने सामने महाप्रभुका दर्शन और महाप्रभुके नामका
कीर्तन करते-करते श्रीठाकुरका निर्याण या देहत्याग :-
हरिदास निजाग्रेते प्रभुरे बसाइला।
निज-नेत्र-दुइ भृङ्ग-मुखपद्मे दिला ॥ 53 ॥
स्व-हृदये आनि' धरि' प्रभुर चरण।
सर्वभक्त-पदरेणु मस्तक-भूषण ॥ 54 ॥
'श्रीकृष्णचैतन्य प्रभु' बलेन बार बार।
प्रभुमुख-माधुरी पिये, नेत्रे जलधार ॥ 55 ॥
यहाँ प्रस्तुत पृष्ठ का पूर्ण पाठ (प्रतिलेखन) दिया गया है:
[ 11/53-64 ग्यारहवाँ अध्याय 297
[बायाँ स्तम्भ]
'श्रीकृष्णचैतन्य'-शब्द करिते उच्चारण।
नामेर सहित प्राण करिला उत्क्रमण॥ ५६॥
अनुवाद—श्रीहरिदास ठाकुरने महाप्रभुको प्रार्थना
करके उन्हें अपने समक्ष बैठाया और उन्होंने अपने
भ्रमररूपी दोनों नेत्रोंको महाप्रभुके मुखकमलपर स्थिर
कर दिया। उन्होंने अपने हृदयमें महाप्रभुके चरणकमलोंको
धारण किया और समस्त भक्तोंकी चरण-रजको लेकर
अपने मस्तकके भूषणरूपमें धारण किया। वे पुनः पुनः
'श्रीकृष्णचैतन्य प्रभु' नामका उच्चारण करने लगे। जैसे
ही वे महाप्रभुके मुखकी माधुरीका पान करने लगे
उनके नेत्रोंसे अश्रुऑकी धारा प्रवाहित होने लगी।
उन्होंने 'श्रीकृष्णचैतन्य'-नाम उच्चारण करते हुए नामके
साथ अपने प्राणोंको छोड़ दिया॥ ५३-५६॥
अमृतप्रवाह भाष्य—'उत्क्रमण',—बाहर, निर्गमन
(निकलना)॥ ५६॥
सभीके द्वारा द्वापरयुगके भीष्मकी इच्छा-मृत्युका स्मरण :—
महायोगेश्वर-प्राय स्वच्छन्दे मरण।
'भीष्मेर निर्याण' सबार हइल स्मरण॥ ५७॥
अनुवाद—श्रीहरिदास ठाकुरके महा-योगेश्वरकी भाँति
स्वेच्छामय देहत्यागको देखकर समस्त भक्तोंको श्रीभीष्म
पितामहके निर्याणका स्मरण हो आया॥ ५७॥
अनुभाष्य—'भीष्मेर निर्याण',—भाः 1/9/29-43 संख्या
देखें॥ ५७॥
महाकीर्तन-कोलाहल, महाप्रभुकी प्रेम-विह्वलता :—
'हरि' 'कृष्ण'-शब्दे सबे करे कोलाहल।
प्रेमानन्दे महाप्रभु हइला विह्वल॥ ५८॥
गोदमें श्रीहरिदासकी अप्राकृत देहको लेकर
महाप्रभुके द्वारा नृत्य :—
हरिदासेर तनु प्रभु कोले उठाइा।
अङ्गने नाचेन प्रभु प्रेमाविष्ट हञा॥ ५९॥
[दायाँ स्तम्भ]
सभीके द्वारा प्रेमावेशमें कीर्तन और नृत्य :—
प्रभुर आवेशे अवश सर्वभक्तगण।
प्रेमावेशे सबे नाचे, करेन कीर्त्तन॥ ६०॥
अनुवाद—सभी भक्त लोग 'हरि', 'कृष्ण' बोलकर
उच्च स्वरसे कीर्तन करने लगे। महाप्रभु प्रेमानन्दमें
विह्वल हो उठे। उन्होंने श्रीहरिदास ठाकुरकी देहको
अपनी गोदमें उठा लिया और प्रेमाविष्ट होकर आङ्गनमें
नृत्य करने लगे। महाप्रभुके आवेशके कारण सभी भक्त
भी अपनेको वशमें नहीं रख सके और वे भी कीर्तन
तथा प्रेमावेशमें नृत्य करने लगे॥ ५८-६०॥
एइमते नृत्य प्रभु कैला कतक्षण।
स्वरूप-गोसाञि प्रभुरे कैला निवेदन॥ ६१॥
भक्तोंके साथ महाप्रभुके द्वारा कीर्तन करते हुए
ठाकुर श्रीहरिदासको समुद्रतटपर लाना :—
हरिदास-ठाकुरे तबे विमाने चड़ाइा।
समुद्रे लञा गेला कीर्त्तन करिया॥ ६२॥
अनुवाद—इसी प्रकार महाप्रभुने कुछ देर तक नृत्य
किया और तब श्रीस्वरूप दामोदर गोस्वामीने महाप्रभुको
कुछ निवेदन किया। उनकी बात सुनकर तब महाप्रभु
श्रीहरिदास ठाकुरको रथपर चढ़ाकर कीर्तन करते हुए
समुद्रके तटपर ले गये॥ ६१-६२॥
आगे महाप्रभु चलेन नृत्य करिते करिते।
पाछे नृत्य करे वक्रेश्वर भक्तगण-साथे॥ ६३॥
अनुवाद—श्रीहरिदास ठाकुरकी अन्तिम-यात्राके समय
महाप्रभु नृत्य करते-करते उनसे आगे चल रहे थे और
श्रीहरिदास ठाकुरके पीछे श्रीवक्रेश्वर पण्डित भक्तोंके
साथ नृत्य करते हुए चल रहे थे॥ ६३॥
श्रीहरिदासको समुद्रमें स्नान कराना, उस समय
उनके स्पर्शसे समुद्रका 'महातीर्थ' बनना :—
हरिदासे समुद्र-जले स्नान कराइला।
प्रभु कहे,—"समुद्र एइ 'महातीर्थ' हइला॥" ६४॥
298 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 11/64-73 ]
अनुवाद—महाप्रभुने श्रीहरिदास ठाकुरको समुद्रके
जलमें स्नान कराया और कहा,—“आजसे यह समुद्र
'महातीर्थ' बन गया है॥”64॥
भक्तोंके द्वारा श्रीहरिदासके अप्राकृत
शरीरके चरणोंके जलका पान :—
हरिदासेर पादोदक पिये भक्तगण।
हरिदासेर अङ्गे दिला प्रसाद-चन्दन॥65॥
अनुवाद—सभी भक्तोंने श्रीहरिदास ठाकुरका चरणामृत
पान किया और श्रीहरिदास ठाकुरके अङ्गोंपर भगवान्
श्रीजगन्नाथदेवका प्रसादी चन्दन लगाया॥65॥
कीर्तन करते हुए समाधि-प्रदान करनेकी रीति :—
डोर, कड़ार, प्रसाद, वस्त्र अङ्गे दिला।
बालुकार गर्त्त करि' ताहे शोयाइला॥66॥
अनुवाद—बालूमें गड़ढा बनाकर उसमें श्रीहरिदास
ठाकुरको बैठा दिया। भगवान् श्रीजगन्नाथदेवकी प्रसादी
रेशमी-डोर, प्रसादी चन्दन, प्रसाद और वस्त्र आदि
उनके शरीरके ऊपर रखे गये॥66॥
अनुभाष्य—'डोर',—श्रीजगन्नाथकी प्रसादी रेशमी-डोरी;
'कड़ार',—प्रसादी चन्दन॥66॥
भक्तोंके द्वारा कीर्तन और नृत्य :—
चारिदिके भक्तगण करेन कीर्त्तन।
वक्रेश्वर-पण्डित करेन आनन्दे नर्त्तन॥67॥
अनुवाद—श्रीहरिदास ठाकुरकी देहके चारों ओर
भक्त कीर्तन करने लगे और श्रीवक्रेश्वर पण्डित
आनन्दपूर्वक नृत्य करने लगे॥67॥
महाप्रभुके द्वारा अपने श्रीकरकमलोंसे
श्रीठाकुरको समाधि देना :—
'हरिबोल' 'हरिबोल' बलेन गौरराय।
आपनि श्रीहस्ते बालु दिला ताँर गाय॥68॥
अनुवाद—श्रीगौररायने हरिबोल, हरिबोल बोलते हुए
स्वयं अपने श्रीकरकमलोंसे श्रीहरिदास ठाकुरके दिव्य
कलेवरपर बालू दी॥68॥
समाधि-पीठका निर्माण :—
ताँरे बालु दिया उपरे पिण्डा बाँधाइला।
चौदिके पिण्डेर महा-आवरण कैला॥69॥
अनुवाद—महाप्रभुने अन्य-अन्य भक्तोंके द्वारा भी
श्रीहरिदास ठाकुरकी देहपर बालू दिलवाकर उसे ढककर
उसके ऊपर बेदी अथवा चबूतरा बनवा दिया। फिर
उस चबूतरेके चारों ओर बाढ़ लगवा दी॥69॥
भक्तोंके साथ कीर्त्तन-नृत्यके बाद समुद्र-स्नान करनेके
बाद समाधि-पीठकी परिक्रमा करके मन्दिरमें आना :—
तबे महाप्रभु कैला कीर्त्तन, नर्त्तन।
हरिध्वनि-कोलाहले भरिल भुवन॥70॥
अनुवाद—तब महाप्रभुने कीर्तन और नृत्य करना
प्रारम्भ किया। सभीके द्वारा की जानेवाली उच्च
हरिध्वनिसे सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड गुञ्जायमान हो उठा॥70॥
तबे महाप्रभु सब भक्तगण-सङ्गे।
समुद्रे करिला स्नान जलकेलि रङ्गे॥71॥
अनुवाद—तब महाप्रभुने सभी भक्तोंके साथ समुद्रमें
आनन्दपूर्वक जलकेलि करते हुए स्नान किया॥71॥
हरिदासे प्रदक्षिण करि' आइल सिंहद्वारे।
हरिकीर्त्तन-कोलाहल सकल नगरे॥72॥
अनुवाद—महाप्रभु श्रीहरिदास ठाकुरकी समाधिकी
परिक्रमा करके सिंहद्वारपर आ गये। सम्पूर्ण श्रीजगन्नाथ
पुरीमें उच्च स्वरसे हरिकीर्तन होने लगा॥72॥
श्रीहरिदासके विरह-महोत्सवके उद्देश्यसे सिंहद्वारपर
दुकानदारोंसे स्वयं महाप्रभुके द्वारा प्रसादकी भिक्षा :—
सिंहद्वारे आसि' प्रभु पसारिर ठाँइ।
आँचल पातिया प्रसाद मागिला तथाइ॥73॥
[ 11/73-82 ग्यारहवाँ अध्याय 299
“हरिदास-ठाकुरेर महोत्सवेर तरे।
प्रसाद मागिये भिक्षा देह त' आमारे॥” 74 ॥
अनुवाद—महाप्रभुने सिंहद्वारपर आकर पंसारियोंसे आँचल फैलाकर प्रसादकी भिक्षा माँगनी प्रारम्भ कर दी,—“मैं हरिदास ठाकुरके महोत्सवके आयोजन हेतु आप लोगोंसे प्रसादकी भिक्षा माँग रहा हूँ, आप लोग कृपा करके मुझे भिक्षा प्रदान कीजिये॥” 73-74 ॥
दुकानदारोंके द्वारा सम्पूर्ण प्रसाद देनेकी इच्छा :—
शुनिया पसारि सब चाङ्गड़ा उठाञा।
प्रसाद दिते आसे तारा आनन्दित हञा॥ 75 ॥
अनुवाद—यह सुनकर सब पंसारी लोग प्रसादकी बड़ी-बड़ी टोकरियोंको उठाकर आनन्दपूर्वक देनेके लिये आये॥ 75 ॥
अनुभाष्य—'चाङ्गड़ा',—बड़ी टोकरी॥ 75 ॥
श्रीस्वरूपके द्वारा उन्हें मना करना :—
स्वरूप-गोसाञि पसारिके निषेधिल।
चाङ्गड़ा लञा पसारि पसारे बसिल॥ 76 ॥
अनुवाद—किन्तु श्रीस्वरूप दामोदरने पंसारियोंको इसके लिये निषेध किया। पंसारी उन टोकरियोंको लेकर पुनः अपनी दुकानोंपर बैठ गये॥ 76 ॥
महाप्रभुको घर भेजकर स्वयं श्रीस्वरूपके द्वारा महोत्सवके कार्यभारको अपने हाथोंमें लेना :—
स्वरूप-गोसाञि प्रभुरे घर पाठाइला।
चारि-वैष्णव, चारि पिछाड़ा सङ्गे राखिला॥ 77 ॥
अनुवाद—श्रीस्वरूप दामोदर गोस्वामीने महाप्रभुको उनके वासस्थानमें भेज दिया और उन्होंने अपने साथ चार वैष्णवों तथा बोझा उठानेवाले चार व्यक्तियोंको रख लिया॥ 77 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—'पिछाड़ा',—पीछे चलनेवाले लोग (मतान्तरमें 'झुड़ि' अथवा 'झोला',—79 संख्या देखें)॥ 77 ॥
स्वरूप-गोसाञि कहिलेन सब पसारिरे।”
“एक एक द्रव्येर एक एक पुआ देह' मोरे॥” 78 ॥
अनुवाद—श्रीस्वरूप दामोदर गोस्वामीने समस्त पंसारियोंको कहा,—“आप सभी मुझे प्रत्येक वस्तुमें-से उसका चौथाई भाग प्रसाद दे दीजिये॥” 78 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—'पुआ',—चार-चार करके एक भाग॥ 78 ॥
प्रचुर प्रसादका संग्रह :—
एइमते नानाप्रसाद बोझा बान्धाञा।
लञा आइला चारि-जनेर मस्तके चड़ाञा॥ 79 ॥
अनुवाद—इस प्रकार श्रीस्वरूप दामोदरने अनेक प्रकारके प्रसाद द्रव्योंको एकत्रित करके बँधवा लिया और उसे चार व्यक्तियोंके सिरपर रखवाकर ले आये॥ 79 ॥
श्रीवाणीनाथ और श्रीकाशीमिश्रके द्वारा प्रसादका संग्रह :—
वाणीनाथ-पट्टनायक प्रसाद आनिला।
काशीमिश्र अनेक प्रसाद पाठाइला॥ 80 ॥
अनुवाद—श्रीवाणीनाथ पट्टनायक भी प्रसाद लेकर आये और श्रीकाशीमिश्रने भी बहुत-सा प्रसाद भेजा॥ 80 ॥
विरह-महोत्सवमें वैष्णवोंको महाप्रभुके द्वारा अपने श्रीहस्तसे प्रचुर प्रसाद बाँटना :—
सब वैष्णवे प्रभु बसाइला सारि सारि।
आपने परिवेशे प्रभु लञा जना चारि॥ 81 ॥
अनुवाद—महाप्रभुने समस्त वैष्णवोंको पंक्तिमें बैठाया और वे स्वयं चार लोगोंको अपने साथ लेकर प्रसाद वितरण करने लगे॥ 81 ॥
महाप्रभुर श्रीहस्ते अल्प ना आइसे।
एक एक पाते पञ्चजनार भक्ष्य परिवेशे॥ 82 ॥
अनुवाद—महाप्रभुके हाथमें प्रसाद अल्प मात्रामें
300 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 11/82-92 ]
नहीं आ रहा था, वे तो एक-एक व्यक्तिके पत्तलमें
पाँच व्यक्तियोंके खाने योग्य प्रसाद दे रहे थे॥82॥
महाप्रभुको मना करके श्रीस्वरूपका तीन भक्तोंके
साथ प्रसाद वितरण करना :-
स्वरूप कहे,—“प्रभु, बसि' करह दर्शन।
आमि इँहा-सबा लञा करि परिवेश्न॥"83॥
अनुवाद- श्रीस्वरूप दामोदरने कहा, — "हे महाप्रभो!
आप कृपा बैठकर देखिये। मैं इन सभीको लेकर प्रसाद
परोसता हूँ॥" 83॥
स्वरूप, जगदानन्द, काशीश्वर, शङ्कर।
चारिजन परिवेश्न करे निरन्तर ॥ 84 ॥
अनुवाद- श्रीस्वरूप दामोदर, श्रीजगदानन्द पण्डित,
श्रीकाशीश्वर पण्डित और श्रीशङ्कर पण्डित-ये चारों
जन निरन्तर प्रसाद परोसने लगे ॥ 84 ॥
भक्तोंके द्वारा महाप्रभुके भोजनकी अपेक्षा, महाप्रभुको
काशीमिश्रके द्वारा प्रसाद-भिक्षा-प्रदान :-
प्रभु ना खाइले केह ना करे भोजन।
प्रभुरे से दिने काशीमिश्रेर निमन्त्रण ॥ 85 ॥
अनुवाद-महाप्रभुके नहीं खानेके कारण किसीने
भी खाना आरम्भ नहीं किया। महाप्रभुने इसलिये नहीं
खाया, क्योंकि उस दिन उनका श्रीकाशीमिश्रके घरमें
निमन्त्रण था॥ 85॥
आपने काशीमिश्र आइला प्रसाद लञा।
प्रभुरे भिक्षा कराइला आग्रह करिया ॥ 86 ॥
अनुवाद—इसलिये श्रीकाशीमिश्र स्वयं महाप्रभुके
लिये प्रसाद लेकर आये और आग्रहपूर्वक महाप्रभुको
भोजन कराया ॥ 86 ॥
संन्यासियोंके साथ महाप्रभुके द्वारा प्रसादका सम्मान :-
पुरी-भारतीर सङ्गे प्रभु भिक्षा कैला।
सकल वैष्णव तबे भोजन करिला ॥ 87 ॥
अनुवाद-महाप्रभुने श्रीपरमानन्द पुरी और श्रीब्रह्मानन्द
भारतीके साथ बैठकर प्रसाद ग्रहण करना आरम्भ
किया, तब समस्त वैष्णवोंने भी भोजन करना प्रारम्भ
किया ॥ 87 ॥
सभी भक्तोंको गले तक भरकर भोजन कराना :-
आकण्ठ पूराञा सबाय कराइला भोजन।
'देह' देह' बलि' प्रभु बलेन वचन ॥ 88 ॥
अनुवाद—महाप्रभुने सभीको गले तक भरकर
भोजन कराया, क्योंकि वे प्रसाद-वितरण करनेवाले
भक्तोंको कहते रहे कि भक्तोंको और प्रसाद दो, और
प्रसाद दो ॥ 88 ॥
सभीको आचमन करनेके बाद महाप्रभुके द्वारा
माला और चन्दन पहनाना :-
भोजन करिया सबे कैला आचमन।
सबारे पराइला प्रभु माल्य-चन्दन ॥ 89 ॥
अनुवाद-जब सभी भक्तोंने भोजन करनेके बाद
आचमन कर लिया, तब महाप्रभुने सभीको माला
पहनाकर चन्दन लगाया ॥ 89 ॥
प्रेमके आवेशमें महाप्रभुके द्वारा भक्तोंको वरदान देना :-
प्रेमाविष्ट हञा प्रभु करेन वर-दान।
शुनि' भक्तगणेर जुड़ाय मनस्काम ॥ 90 ॥
अनुवाद—प्रेमाविष्ट होकर महाप्रभुने भक्तोंको वरदान
दिया जिसे सुनकर भक्त अपनी मनोवाञ्छा पूर्ण होनेसे
सन्तुष्ट हो गये॥ 90 ॥
श्रीहरिदासके विरहोत्सवमें जिस-किसी भी प्रकारसे योगदान
करनेवालेको श्रीकृष्णप्राप्तिका वर-लाभ :-
"हरिदासेर विजयोत्सव ये कैल दर्शन।
ये इँहा नृत्य कैल, ये कैल कीर्त्तन ॥ 91 ॥
ये ताँरे बालुका दिते करिल गमन।
तार मध्ये महोत्सवे ये कैल भोजन ॥ 92 ॥
[ 11/91-101 ग्यारहवाँ अध्याय 301
अचिरे सबाकार हवे 'कृष्णप्राप्ति'।
हरिदास-दरशने हय ऐछे 'शक्ति' ॥ 93 ॥
अनुवाद—महाप्रभुने कहा, — “जिसने भी हरिदास
ठाकुरके विजयोत्सवका दर्शन किया है, जिसने उसमें
नृत्य और कीर्तन किया है, जिसने हरिदास ठाकुरकी
समाधिपर बालू दिया है और जिसने इस महोत्सवमें
प्रसाद ग्रहण किया है, उन सभीको अतिशीघ्र श्रीकृष्णकी
प्राप्ति होगी। हरिदास ठाकुरके दर्शनमें ऐसी शक्ति
है॥ 91-93 ॥
अनुभाष्य— 'विजयोत्सव', — विरह-महोत्सव ॥ 91 ॥
प्रियभक्तके विरहमें भगवान्की विलाप-उक्ति :-
कृपा करि' कृष्ण मोरे दियाछिला सङ्ग।
स्वतन्त्र कृष्णेर इच्छा, —कैला सङ्ग-भङ्ग ॥ 94 ॥
अनुवाद—कृष्णने कृपा करके मुझे हरिदास ठाकुरका
सङ्ग प्रदान किया था। किन्तु कृष्णकी इच्छा स्वतन्त्र
होनेके कारण उन्होंने अब मेरा वह सङ्ग भङ्ग कर
दिया है॥ 94 ॥
हरिदासेर इच्छा यबे हइल चलिते।
आमार शकति ताँरे नारिल राखिते ॥ 95 ॥
इच्छामात्रे कैला निजप्राण निष्क्रामण।
पूर्वे येन शुनियाछि भीष्मेर मरण ॥ 96 ॥
अनुवाद—जब हरिदास ठाकुरकी इस जगत्से
जानेकी इच्छा हुई, तब उन्हें रोकना मेरे बसमें नहीं
था। उन्होंने अपने प्राणोंको अपनी इच्छामात्रसे ऐसे
छोड़ दिया, जैसे हमने पूर्वकालमें भीष्म पितामहके
शरीर त्यागनेके विषयमें सुना है ॥ 95-96 ॥
ठाकुर-श्रीहरिदासके गुणोंका वर्णन :-
हरिदास आछिल पृथिवीर 'शिरोमणि'।
ताहा बिना रत्न-शून्या हइल मेदिनी ॥ 97 ॥
अनुवाद—हरिदास ठाकुर पृथिवीके शीशपर विराजित
सर्वोत्तम मणि स्वरूप थे, उनके बिना यह पृथवी अपने
उस रत्नसे शून्य हो गयी है॥ 97 ॥
श्रीहरिदासकी जयध्वनि और महाप्रभुके द्वारा नृत्य :-
'जय जय हरिदास' बलि' कर हरिध्वनि।”
एत बलि' महाप्रभु नाचेन आपनि ॥ 98 ॥
अनुवाद—आप सभी हरिदासकी जयध्वनि कीजिये
और हरिनामका कीर्तन कीजिये।” यह कहकर महाप्रभु
स्वयं नृत्य करने लगे ॥ 98 ॥
सबे गाय, — “जय जय जय हरिदास।
नामेर महिमा यँह करिला प्रकाश ॥”99 ॥
अनुवाद—सभी भक्त गान करने लगे, — “श्रीहरिदास
ठाकुरकी जय हो, जय हो, जय हो, जिन्होंने कृष्णनामकी
महिमाको जगत्में प्रकाशित किया है ॥”99 ॥
भक्तोंको विदायी देना और भक्त (श्रीहरिदास)के विरह
और विजय (देहत्याग) -ऐश्वर्यको देखकर हर्ष और
विषादके साथ महाप्रभुका विश्राम :-
तबे महाप्रभु सब भक्ते विदाय दिला।
हर्ष-विषादे प्रभु विश्राम करिला ॥ 100 ॥
अनुवाद—तब महाप्रभुने सभी भक्तोंको विदायी दी
और स्वयं उन्होंने हर्ष एवं विषादके मिश्रित भावोंके
साथ विश्राम किया ॥ 100 ॥
भक्तश्रेष्ठ नामाचार्य श्रीहरिदासके तिरोभावके वृत्तान्तको
सुननेसे श्रीकृष्णभक्तिकी प्राप्ति :-
एइ त' कहिलुँ हरिदासेर विजय।
याहार श्रवणे कृष्णे दृढ़भक्ति हय ॥ 101 ॥
अनुवाद—इस प्रकार मैंने श्रीहरिदास ठाकुरके
विजयोत्सवका वर्णन किया है। जो भी इसे सुनता है
उसे भगवान् श्रीकृष्णमें दृढ़भक्ति होती है ॥ 101 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—'हरिदासेर विजय', —श्रीपुरुषोत्तम-
302 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 11/101-104 ]
क्षेत्रमें तोटा-गोपीनाथसे समुद्रके तटपर जानेपर समुद्रके
ऊपर ही ठाकुर श्रीहरिदासकी समाधि अभी भी विद्यमान
है। प्रत्येक वर्ष 'अनन्तचतुर्दशी'के दिन ठाकुर श्रीहरिदासका
विजयोत्सव होता है ॥ 101 ॥
ग्यारहवें अध्यायका अमृतप्रवाह भाष्य समाप्त।
भक्त-वाञ्छाको पूर्ण करनेवाले
भक्तवत्सल श्रीगौर-भगवान् :-
चैतन्येर भक्तवात्सल्य इहातेइ जानि।
भक्तवाञ्छा पूर्ण कैला न्यासी-शिरोमणि ॥ 102 ॥
अनुवाद—श्रीहरिदासके निर्याण और महाप्रभुके द्वारा
उन्हें समाधि एवं उनके विजयोत्सवको मनानेकी घटनासे
ही श्रीचैतन्य महाप्रभुका भक्त-वात्सल्य जाना जा सकता
है। महाप्रभुने संन्यासी-शिरोमणि होनेपर भी अपने भक्त
श्रीहरिदास ठाकुरकी इच्छाको पूर्ण किया ॥ 102 ॥
गोलोक-गमनकालमें श्रीहरिदासको साक्षात् कृपा दान :-
शेषकाले दिला ताँरे दर्शन-स्पर्शन।
ताँरे कोले करि' कैला आपने नर्त्तन ॥ 103 ॥
अनुवाद—महाप्रभुने श्रीहरिदास ठाकुरके अन्तिम
समयमें उन्हें अपना दर्शन और स्पर्श प्रदान किया एवं
उनके दिव्य कलेवरको अपनी गोदमें लेकर नृत्य
किया ॥ 103 ॥
आपने श्रीहस्ते कृपाय ताँरे बालु दिला।
आपने प्रसाद मागि' महोत्सव कैला ॥ 104 ॥
अनुवाद—महाप्रभुने कृपा करके अपने हाथोंसे
श्रीहरिदास ठाकुरके दिव्य कलेवरको बालूसे ढक दिया
और उन्होंने स्वयं ही प्रसाद भिक्षा माँगकर श्रीहरिदास
ठाकुरका विरह-महोत्सव आयोजित किया ॥ 104 ॥
अनुभाष्य—श्रीहरिदास ठाकुरके समाधि-क्षेत्रमें लगभग
एक सौ वर्ष पूर्व श्रीगौर, नित्यानन्द और अद्वैताचार्य-इन
तीनों विग्रहोंकी सेवा स्थापित हुई है। केन्द्रापाड़ाके
'भ्रमरधर' नामक एक उत्कलवासी भक्तकी वित्त सहायतासे
पुरीके स्वर्गद्वारमें स्थायी श्रीमन्दिर बना। यहाँकी
सेवा-तोटा-गोपीनाथके सेवायत गोस्वामियोंकी देखरेखमें
थी। किन्तु अब यह सम्पत्ति बिककर अन्योंके हाथोंमें
चली गयी है और वे ही सेवा चला रहे हैं। श्रीहरिदास
ठाकुरकी समाधि स्थलीके निकट ही श्रीमद्भक्तिविनोद
ठाकुरने अपनी भजन-स्थली 'भक्तिकुटी'का निर्माण
किया। बङ्गाब्द 1329 सालमें इस भक्तिकुटीमें श्रीपुरुषोत्तम
मठ संस्थापित हुआ है। भक्तिरत्नाकरकी तृतीय तरङ्गमें
वर्णन आता है—
“श्रीनिवास शीघ्र समुद्रेर कूले गेला।
हरिदास-ठाकुरेर समाधि देखिला ॥
भूमिते पडिया कैला प्रणति विस्तर।
भागवतगण श्रीसमाधि-सन्निधाने।
श्रीनिवासे स्थिर कैला सस्नेह-वचने ॥
पुनः श्रीनिवास श्रीसमाधि प्रणमिया।
ये विलाप कैला, ता शुनिते द्रवे हिया॥”
[अर्थात् “श्रीनिवासाचार्य जगन्नाथ पुरीमें आकर
शीघ्रतासे समुद्रके तटपर गये। वहाँ उन्होंने
श्रीहरिदास-ठाकुरकी समाधिके दर्शन किये और भूमिपर
गिरकर बहुत देर तक प्रणाम किया। श्रीसमाधिके
निकट जितने भक्तगण थे, उन्होंने अत्यन्त स्नेहपूर्ण
वचनोंके द्वारा श्रीनिवासाचार्यको शान्त किया।
[ 11/104-108
ग्यारहवाँ अध्याय
303
श्रीनिवासाचार्यने पुनः श्रीहरिदास ठाकुरकी समाधिको
प्रणाम करके जो विलाप किया, उसे सुनने मात्रसे हृदय
द्रवित हो जाता है।"] ॥ 104 ॥
श्रीचैतन्यचरितसिन्धुका बिन्दु भी हृदय
और कानोंके लिये रसायन :-
चैतन्यचरित्र एइ-अमृतेर सिन्धु।
कर्ण-मन तृप्त करे यार एकबिन्दु ॥ 106 ॥
अनुवाद-श्रीचैतन्य महाप्रभुका चरित्र तो अमृतका
सिन्धु है, उसकी एक बूँद भी कानों तथा मनको तृप्त
कर देती है ॥ 106 ॥
महाभागवत विद्वत्-संन्यासी परमहंसवर
ठाकुर-श्रीहरिदास :-
महाभागवत हरिदास-परम-विद्वान्।
ए सौभाग्य लागि' आगे करिला प्रयाण ॥ 105 ॥
अनुवाद-श्रीहरिदास ठाकुर उत्तम श्रेणीके भक्त
अर्थात् महाभागवत तो थे ही, साथमें वे परम विद्वान्
भी थे। उनका यह परम सौभाग्य था कि उन्होंने
महाप्रभुके सामने उनके दर्शन करते हुए और उनका
नाम लेते हुए देह त्याग दी ॥ 105 ॥
मायासे पार होकर श्रीकृष्णसेवाके इच्छुक व्यक्तिके लिये
श्रीचैतन्यचरितको श्रवण करनेकी कर्त्तव्यता :-
भवसिन्धु तरिवारे आछे यार चित्त।
श्रद्धा करि' शुन सेइ चैतन्यचरित ॥ 107 ॥
अनुवाद-जिसकी भवसागरसे पार होनेकी इच्छा
है, वह श्रद्धापूर्वक श्रीचैतन्यचरितका श्रवण करे ॥ 107 ॥
अनुभाष्य-'परम-विद्वान्', -जिसके द्वारा अविद्यारूपी
संसार-बन्धनसे मुक्त होकर अप्राकृत अक्षर वस्तु विष्णु,
अच्युत अथवा अधोक्षज-विषयक ज्ञान प्राप्त हो, वही
'विद्या' है। श्रीहरिदास ठाकुर सर्वोत्तमा कृष्णविद्यामें
पारदर्शी थे, क्योंकि वे विद्यावधू-जीवन श्रीहरिनामसङ्कीर्तनके
आचार्य और प्रचारकके रूपमें अवतीर्ण हुए हैं;
विशेषतः “इति पुंसार्पिता विष्णौ भक्तिश्चेन्नवलक्षणा। क्रियेत
भगवत्यधा तन्मन्येऽधीतमुत्तमम्॥" (भा: 7/5/24)
भागवत-वाक्यमें श्रीकृष्णकी नवविधा भक्तिके मध्य
सर्वश्रेष्ठ अङ्ग कीर्तनके अनुशीलनकारीको ही
'सर्वशास्त्राधीती' अर्थात् समस्त शास्त्रोंको जाननेवाला
कहा गया है ॥ 105 ॥
श्रीरूप-रघुनाथ-पदे यार आश।
चैतन्यचरितामृत कहे कृष्णदास ॥ 108 ॥
इति श्रीचैतन्यचरितामृते अन्त्यखण्डे श्रीहरिदास-निर्वाण-वर्णनं
नाम एकादशः परिच्छेदः।
अनुवाद-श्रीरूप-रघुनाथ गोस्वामीके चरणकमलोंकी
कृपाभिलाषा करते हुए कृष्णदास इस श्रीचैतन्यचरितामृतका
वर्णन कर रहा है ॥ 108 ॥
ग्यारहवें अध्यायका अनुभाष्य समाप्त।
श्रीचैतन्यचरितामृतके अन्त्यखण्डमें श्रीहरिदास-निर्वाण-वर्णन
नामक ग्यारहवें अध्यायका अनुवाद समाप्त।
इस पृष्ठ पर कोई पाठ (टेक्स्ट) उपलब्ध नहीं है (पृष्ठ रिक्त है)।
बारहवाँ अध्याय
कथासार—महाप्रभुका रात्रिमें प्रेमविकार और दिनमें
भी उसकी आलोचना चलने लगी। इधर (भक्तोंके
साथ) गौड़देशसे श्रीशिवानन्द-सेनने अपनी पत्नी और
तीनों पुत्रोंको साथ लेकर यात्रा की। मार्गमें श्रीनित्यानन्दप्रभुको
वासस्थान प्राप्त करनेमें देरी होनेपर उन्होंने श्रीशिवानन्दके
प्रति प्रेमकोप दिखाकर लात मारी थी। श्रीशिवानन्दके
उससे कृतार्थ होनेपर भी उनका भाँजा श्रीकान्त-सेन
दुःखी होकर पहले ही महाप्रभुके पास चला गया। उस
वर्ष परमेश्वरदास-मोदक सपरिवार महाप्रभुके दर्शनोंके
लिये गये थे। पूर्व-पूर्व वर्षोंकी भाँति भक्तोंने महाप्रभुको
निमन्त्रण किया। उनकी विदायीके समय महाप्रभुने
अनेक विनय-वाक्य प्रकाशित किये। पिछले वर्ष
श्रीजगदानन्द-पण्डितको श्रीशचीमाताके लिये प्रसाद-वस्त्र
साथ लेकर भेजा गया था। श्रीजगदानन्द पण्डित
श्रीशिवानन्दके घरसे 'चन्दनादि' नामक सुगन्धित तेलको
एक कलसी (मटकी)में लेकर आये और उन्होंने उस
तेलको श्रीगोविन्दको देकर उन्हें महाप्रभुके सिरपर
लगानेकी प्रार्थना की। महाप्रभुके द्वारा उस तेलको
स्वीकार नहीं करनेपर, श्रीजगदानन्दने उस तेल-सहित
मटकीको फेंककर तोड़ दिया और दो दिन तक
उपवास किया। महाप्रभुने उन्हें शान्त करनेके लिये
उनसे भिक्षाके (भोजनके) लिये प्रार्थना की, श्रीजगदानन्द
पण्डितने अन्न-व्यञ्जन आदि पकाकर महाप्रभुकी सेवा
करके प्रसादादि ग्रहण किया।
—(अमृतप्रवाह भाष्य)
भक्तोंको सदैव श्रीचैतन्यचरितामृतके श्रवण, कीर्तन
और स्मरण करनेका अनुरोध :—
श्रूयतां श्रूयतां नित्यं गीयतां गीयतां मुदा।
चिन्त्यतां चिन्त्यतां भक्ताश्चैतन्यचरितामृतम् ॥ 1 ॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 1 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—हे भक्तगण, इस चैतन्यचरितामृतका
नित्य श्रवण करो, गान करो और आनन्दपूर्वक चिन्तन
करो॥ 1 ॥
अनुभाष्य—
हे भक्ताः, मुदा (आनन्देन) चैतन्यचरितामृतं नित्यं (पुनः
पुनः) श्रूयतां श्रूयतां, (पुनः पुनः) गीयतां गीयतां, (पुनः पुनः)
चिन्त्यतां, चिन्त्यताम्।
श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 1 ॥
जय जय श्रीचैतन्य जय दयामय।
जय जय नित्यानन्द कृपासिन्धु जय ॥ 2 ॥
अनुवाद—दयामय श्रीचैतन्य महाप्रभुकी जय हो,
जय हो, जय हो। कृपासिन्धु श्रीनित्यानन्द प्रभुकी जय
हो, जय हो, जय हो॥ 2 ॥
जयाद्वैतचन्द्र जय करुणा सागर।
जय गौरभक्तगण कृपा-पूर्णान्तर ॥ 3 ॥
अनुवाद—करुणाके सागर श्रीअद्वैतचन्द्रकी जय हो,
जय हो। हृदयमें कृपासे परिपूर्ण श्रीगौरभक्तोंकी जय
हो॥ 3 ॥
महाप्रभुकी कृष्ण-विरहकी स्फूर्ति :—
अतःपर महाप्रभु विषण्ण-अन्तर ।
कृष्णेर वियोग-दशा स्फुरे निरन्तर ॥ 4 ॥
महाप्रभुकी कृष्णसङ्गके लिये व्याकुलता :—
“हा हा कृष्ण प्राणनाथ व्रजेन्द्रनन्दन !
काँहा याङ, काँहा पाङ मुरलीवदन ! !” 5 ॥
अनुवाद—हृदयमें निरन्तर कृष्णसे वियोग-दशा स्फुरित
306 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 12/4-14 ]
होनेके कारण महाप्रभुका हृदय अत्यन्त दुःखी रहता था
और वे यह कहकर विलाप करते, — “हा हा कृष्ण! हे
प्राणनाथ! हे व्रजेन्द्रनन्दन! मैं कहाँ जाऊँ? कहाँ
जानेसे हे मुरलीवदन आप मिलेंगे!”4-5 ॥
दिन-रात श्रीकृष्णविरहकी ज्वाला :-
रात्रिदिन एइ दशा, स्वस्ति नाहि मने।
कष्टे रात्रि गोङाय स्वरूप-रामानन्द-सने॥ 6 ॥
अनुवाद—महाप्रभु रात-दिन इसी दशामें रहते।
मनमें कभी शान्ति नहीं होनेपर वे श्रीस्वरूप दामोदर
और श्रीरामानन्द रायके साथ अत्यन्त कष्टमें रात्रि
व्यतीत करते॥ 6 ॥
अनुभाष्य—पाठान्तरमें,—'स्वास्थ्य नाहि माने' (अर्थात्
मनमें शान्ति नहीं थी अथवा मनमें दुःखका अभाव
नहीं था)॥ 6 ॥
प्रत्येक वर्षकी भाँति गौड़ीयभक्तोंका महाप्रभुके
दर्शनके लिये पुरीमें आनेका प्रयास :-
एथा गौड़देशे प्रभुर यत भक्तगण।
प्रभु देखिबारे सबे करिला गमन॥ 7 ॥
अनुवाद—इधर गौड़देशमें महाप्रभुके जितने भक्त थे,
वे सभी महाप्रभुके दर्शनोंके लिये चल पड़े॥ 7 ॥
सभी भक्तोंका नवद्वीपमें आगमन :-
शिवानन्द-सेन आर आचार्य-गोसाञि।
नवद्वीपे सब भक्त हैला एकठाञि॥ 8 ॥
अनुवाद—श्रीशिवानन्द सेन और श्रीअद्वैताचार्य गोसाईं
आदि समस्त भक्त श्रीनवद्वीपमें एकत्रित हुए॥ 8 ॥
कुलीनग्रामवासी आर यत खण्डवासी।
एकत्र मिलिला सब नवद्वीपे आसि' ॥ 9 ॥
अनुवाद—कुलीनग्रामवासी और श्रीखण्डवासी सब
भक्त भी नवद्वीपमें आकर एकत्रित हुए॥ 9 ॥
महाप्रभुके द्वारा निषेध किये जानेपर
भी श्रीनित्यानन्दकी यात्रा :-
नित्यानन्द-प्रभुरे यद्यपि आज्ञा नाइ।
तथापि देखिते चलेन चैतन्य-गोसाञि॥ 10 ॥
अनुवाद—यद्यपि महाप्रभुने श्रीनित्यानन्द प्रभुको आनेके
लिये निषेध किया था, तथापि वे श्रीचैतन्य महाप्रभुके
दर्शनके लिये श्रीजगन्नाथ पुरीकी ओर चल पड़े॥ 10 ॥
अनुभाष्य—अन्त्यलीला 10/5-8 संख्या देखें॥ 10 ॥
सपरिवार गृहस्थ गौरभक्तोंके द्वारा यात्रा :-
श्रीवासादि चारि भाइ, सङ्गेते मालिनी।
आचार्यरत्नेर सङ्गे ताँहार गृहिणी॥ 11 ॥
अनुवाद—श्रीवास पण्डितादि चारों भाई और उनके
साथमें श्रीवास पण्डितकी पत्नी श्रीमालिनी देवी भी
जगन्नाथ पुरीकी ओर चले। इसी प्रकार श्रीआचार्यरत्न
भी अपनी पत्नीके साथ आये॥ 11 ॥
शिवानन्द-पत्नी चले तिन-पुत्र लञा।
राघवपण्डित चले झालि साजाञा॥ 12 ॥
अनुवाद—श्रीशिवानन्द सेनकी पत्नी भी अपने
तीनों पुत्रोंको साथमें लेकर चल दीं। श्रीराघव पण्डित
अपनी झोलीको सजाकर चले॥ 12 ॥
दत्त, गुप्त, विद्यानिधि, आर यत जन।
दुइ-तिन शत भक्त करिला गमन॥ 13 ॥
अनुवाद—श्रीवासुदेव दत्त, श्रीमुरारि गुप्त, श्रीपुण्डरीक
विद्यानिधि और अन्य बहुतसे भक्त महाप्रभुसे मिलनेके
लिये चले। कुल मिलाकर दो-तीन सौ भक्त एक साथ
श्रीजगन्नाथपुरीकी ओर चल दिये॥ 13 ॥
शचीमाताको प्रणाम करके कीर्तन
करते हुए सभीके द्वारा यात्रा :-
शचीमाता देखि' सबे ताँर आज्ञा लञा।
आनन्दे चलिला कृष्णकीर्त्तन करिया॥ 14 ॥
[ 12/14-21 बारहवाँ अध्याय 307
अनुवाद—सभी भक्तोंने पहले श्रीशचीमाताके दर्शन
किये और उनकी आज्ञा ली। तब वे आनन्दपूर्वक
कृष्ण-कीर्तन करते हुए श्रीजगन्नाथ पुरीकी ओर चल
दिये ॥ 14 ॥
सम्पन्न श्रीशिवानन्दके द्वारा मार्गका कर देना और भक्तोंको साथ लाते हुए उनकी सेवा :—
शिवानन्द-सेन करे घाटी-समाधान।
सबारे पालन करि' सुखे लञा यान॥ 15 ॥
अनुवाद—श्रीशिवानन्द-सेन मार्गमें सब प्रकारके
कर-शुल्क आदि देते हुए और सभीका पालन करते
हुए सुखपूर्वक उन्हें श्रीजगन्नाथपुरी लेकर जा रहे
थे॥ 15 ॥
अनुभाष्य—'घाटि-समाधान,'—जमींदारके अधिकार क्षेत्रमें
यात्रियों अथवा पथिकोंके आवागमन करनेपर ही कर
लिया जाता था। पहलेसे ही पथकर जमा नहीं कराये
जानेपर, मार्ग-घाटके मालिक ही यह कर प्राप्त करते
थे। श्रीशिवानन्द-सेन जगन्नाथपुरीकी ओर जा रहे
यात्रियोंके द्वारा देय पथकरको स्थान-स्थानपर घाटपालोंको
चुका देते थे॥ 15 ॥
श्रीशिवानन्दको उड़ीसाके पथके विषयमें पूर्ण जानकारी :—
सबार सब कार्य करेन, देन वासस्थान।
शिवानन्द जाने उड़िया-पथेर सन्धान ॥ 16 ॥
अनुवाद—श्रीशिवानन्द सेन सभी भक्तोंकी सब
प्रकारसे देखभाल करते थे और उन्हें मार्गमें
आवश्यकतानुसार वासस्थान प्रदान करते थे। श्रीशिवानन्द
सेन उड़ीसा जानेके मार्गको भली-भाँति जानते थे ॥ 16 ॥
अनुभाष्य—'उड़िया-पथेर,'—उड़ीसा जानेके मार्गके ॥ 16 ॥
एकदिन सबलोक घाटिते राखिला।
सबा छाड़ाञा शिवानन्द अकेला रहिला ॥ 17 ॥
अनुवाद—एकदिन घाटपालने समस्त भक्तोंको रोक
लिया, किन्तु श्रीशिवानन्द सेनने उन सबको छुड़ाकर
आगे भेज दिया और स्वयं अकेले पथकर देनेके लिये
वहीं रह गये ॥ 17 ॥
अनुभाष्य—घाटपाल अन्यायपूर्वक यात्रियोंसे अधिक
कर लेने और निर्धारित करसे अतिरिक्त राशि प्राप्त
करनेके लिये यात्रियोंको घाटीपर अटकाकर रखते थे।
श्रीशिवानन्दने सभी यात्रियोंकी ओरसे स्वयं उनका
दायित्व लेकर उन्हें छुड़ा दिया ॥ 17 ॥
सबे गिया रहिला ग्राम-भितर वृक्षतले।
शिवानन्द बिना वासस्थान नाहि मिले ॥ 18 ॥
अनुवाद—श्रीशिवानन्द सेनके नहीं होनेके कारण
उन्हें वासस्थान नहीं मिल सकता था, इसलिये सभी
भक्त गाँवके अन्दर जाकर वृक्षके नीचे बैठ गये ॥ 18 ॥
श्रीनित्यानन्दका अप्राकृत व्रजगोपबालकके वेशमें भूखके कारण श्रीशिवानन्दपर कृत्रिम रोषाभासका प्रदर्शन :—
नित्यानन्दप्रभु भोके व्याकुल हञा।
शिवानन्दे गालि पाड़े वासा ना पाञा ॥ 19 ॥
“तिन पुत्र मरुक शिवार, एखन ना आइल।
भोके मरि' गेनु, मोरे वासा ना देओयाइल॥” 20 ॥
अनुवाद—श्रीनित्यानन्द प्रभु भूखसे व्याकुल हो रहे
थे और उन्हें रहनेके लिये स्थान भी नहीं मिला,
इसलिये वे श्रीशिवानन्द सेनको गाली निकालते हुए
कहने लगे,—“शिवानन्द अभी तक भी नहीं आया है।
मैं भूखसे मर रहा हूँ और ऊपरसे उसने मुझे रहनेका
स्थान भी नहीं दिलवाया, इसलिये उसके तीनों पुत्र मर
जाँय ॥” 19-20 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—'भोके,'—भूखसे ॥ 19 ॥
श्रीनित्यानन्दके शापको सुनकर श्रीशिवानन्दकी पत्नीका रोदन और श्रीशिवानन्दको शापके वृत्तान्तका वर्णन :—
शुनि' शिवानन्देर पत्नी कान्दिते लागिला।
हेनकाले शिवानन्द घाटि हैते आइला ॥ 21 ॥