सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

308 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 12/21-30 ]
अनुवाद—इस शापको सुनकर श्रीशिवानन्द सेनकी
पत्नी विलाप करने लगीं, उसी समय श्रीशिवानन्द सेन
करका भुगतान करके लौट आये॥21॥
शिवानन्देर पत्नी ताँरे कहेन कान्दिया।
“पुत्रे शाप दिछेन गोसाञि वासा ना पाञा॥”22॥
अनुवाद—श्रीशिवानन्द सेनकी पत्नी रोते हुए उनसे
कहने लगीं,—“श्रीनित्यानन्द गोसाईंको रहनेका स्थान
नहीं मिला, इसलिये उन्होंने हमारे पुत्रोंको मरनेका शाप
दिया है॥”22॥
श्रीशिवानन्दके द्वारा पत्नीको आश्वासन :—
तेंहो कहे,—“बाउलि, केने मरिस् कान्दिया?
मरुक आमार तिन पुत्र ताँर बालाइ लञा॥”23॥
अनुवाद—श्रीशिवानन्द सेनने कहा,—“पगली, तुम
रो-रोकर हताश क्यों हो रही है? उन्हें जो कष्ट मेरे
कारण हुआ है, उसके लिये मेरे तीनों पुत्र मरते हैं तो
मर जाँय॥”23॥
अनुभाष्य—‘बाउली’,—‘पगली’; पाठान्तरमें, ‘बाउनी’,—
ब्राह्मणी; शौक्र-ब्राह्मण नहीं होनेपर भी उन दिनों भद्र
महिलाओंको वैसा कहकर पुकारना उचित था॥23॥
श्रीशिवानन्दको श्रीनित्यानन्दके चरणके
आघातरूपी सौभाग्यकी प्राप्ति :—
एत बलि’ प्रभु-पाशे गेला शिवानन्द।
उठि’ ताँरे लाथि माइला प्रभु-नित्यानन्द॥24॥
अनुवाद—यह कहकर श्रीशिवानन्द सेन श्रीनित्यानन्द
प्रभुके पास गये। श्रीनित्यानन्द प्रभुने उठकर उन्हें लात
मारी॥24॥
आनन्दित हैला शिवाइ पादप्रहार पाञा।
शीघ्र वासा-घर कैला गौड़-घरे गिया॥25॥
अनुवाद—श्रीशिवानन्द सेन लात खाकर बड़े आनन्दित
हुए और उन्होंने शीघ्र ही किसी ग्वालेके घरमें जाकर
श्रीनित्यानन्द प्रभुके रहनेकी व्यवस्था की॥25॥
अनुभाष्य—‘गौड़-घरे’,—ग्वालेके घरमें॥25॥
श्रीनित्यानन्द प्रभुको उनके लिये चुने घरमें
लाकर उनकी स्तुति :—
चरणे धरिया प्रभुरे वासाय लञा गेला।
वासा दिया हृष्ट हञा कहिते लागिला॥26॥
निजजन मानकर ही प्रभुके द्वारा सेवककी भर्त्सना :—
“आजि मोरे भृत्य करि’ अङ्गीकार कैला।
येमन अपराध भृत्येर्, योग्य फल दिला॥27॥
ईश्वरके द्वारा दिया दण्ड अथवा दुःख ही
ढकी हुई परमकृपा और सुख :—
‘शास्ति’-छले कृपा कर,—ए तोमार ‘करुणा’।
त्रिजगते तोमार चरित्र बुझे कोन् जना?28॥
साक्षात् सर्वेश्वरेश्वर श्रीनित्यानन्द-पदधूलिको प्राप्त
करनेपर ही पुरुषार्थ श्रीकृष्णभक्तिकी प्राप्ति :—
ब्रह्मार दुर्लभ तोमार श्रीचरण-रेणु।
हेन-चरण स्पर्श पाइल मोर अधम तनु॥29॥
आजि मोर सफल हैल जन्म, कुल, धर्म।
आजि पाइनु कृष्णभक्ति, अर्थ, काम, धर्म॥”30॥
अनुवाद—तब श्रीशिवानन्द सेनने आकर श्रीनित्यानन्द
प्रभुके चरणकमलोंको पकड़ लिया और उनसे प्रार्थना
करके उन्हें वासस्थानपर ले गये। श्रीशिवानन्द सेन
उनको वहाँ ठहराकर कहने लगे,—“आज आपने मुझे
अपना दास मानकर अङ्गीकार किया है। आपने दासके
अपराधके अनुरूप ही उसे उचित फल प्रदान किया है।
आप दण्डके छलसे कृपा करते हैं, यह वास्तवमें
आपकी करुणा ही है। आपकी लीलाको त्रिभुवनमें
कौन समझ सकता है? आपके श्रीचरणकमलोंकी धूलि
ब्रह्माके लिये भी दुर्लभ है और आपके उन श्रीचरणकमलोंने
मेरी अधम देहको स्पर्श किया है। आज मेरा जन्म,
कुल और मेरे सब कार्य सफल हो गये हैं। आज मुझे
धर्म, अर्थ, काम और इन सबसे श्रेष्ठ कृष्णभक्तिकी
प्राप्ति हुई है॥”26-30॥

[ 12/31-38 बारहवाँ अध्याय 309

अपनी स्तुतिको सुनकर प्रभुको आनन्द :—
शुनि' नित्यानन्दप्रभुर आनन्दित मन।
उठि' शिवानन्दे कैला प्रेम-आलिङ्गन ॥ 31 ॥
आनन्दित शिवानन्द करे समाधान।
आचार्यादि-वैष्णवेरे दिला वासस्थान ॥ 32 ॥

एत बलि' श्रीकान्त-बालक आगे चलि' यान।
सङ्ग छाड़ि' आगे गेला महाप्रभुर स्थान ॥ 36 ॥

अनुवाद—यह कहकर श्रीकान्त, जो अभी बालक
ही था, भक्त मण्डलीका साथ छोड़कर पहले ही
महाप्रभुके वासस्थानपर चला गया ॥ 36 ॥

अनुवाद—श्रीशिवानन्द सेनके इन भावोंको सुनकर
श्रीनित्यानन्द प्रभुके मनमें आनन्द हुआ। उन्होंने
उठकर श्रीशिवानन्द सेनको प्रेमसे आलिङ्गन किया।
श्रीनित्यानन्द प्रभुके द्वारा आलिङ्गन प्राप्त करके श्रीशिवानन्द
सेन बहुत आनन्दित हुए। तब उन्होंने श्रीअद्वैताचार्य
आदि सभी वैष्णवोंके भी वासस्थानकी व्यवस्था की ॥ 31-32 ॥

श्रीकान्तको श्रीगोविन्दके द्वारा भगवद्विग्रहके
विषयमें मर्यादा-विधिको उपदेश :—
पेटाङ्गि-गाय करे दण्डवत्-नमस्कार।
गोविन्द कहे,—“श्रीकान्त, आगे पेटाङ्गि उतार ॥” 37 ॥

अनुवाद—श्रीकान्तने अपने शरीरपर अँगरखा (कुर्ता)
पहने हुए ही महाप्रभुको दण्डवत् प्रणाम किया, उसे ऐसा
करते देख श्रीगोविन्दने कहा,—“हे श्रीकान्त ! पहले तुम
अपना अँगरखा उतारो ॥” 37 ॥

श्रीनित्यानन्द (गुरुका) क्रोधाभास ही प्रच्छन्न परम-कृपा
और नित्यकल्याण-सूचक :—
नित्यानन्दप्रभुर सब चरित्र—'विपरीत'।
क्रुद्ध हञा लाथि मारि' करे तार हित ॥ 33 ॥

अनुवाद—श्रीनित्यानन्द प्रभुके समस्त विशिष्ट गुण
बाहरसे देखनेमें परस्पर विरोधी दिखलायी देते हैं।
श्रीनित्यानन्द प्रभुने क्रोधित होकर लात मारकर श्रीशिवानन्द
सेनका हित ही किया ॥ 33 ॥

अमृतप्रवाह भाष्य—'पेटाङ्गि', — अँगरखा, जामा
(कुर्ता) ॥ 37 ॥

अनुभाष्य—तन्त्रवाक्य—
“वस्त्रेणावृत-देहस्तु यो नरः प्रणमेद्धरिम्।
श्वित्री भवति मूढात्मा सप्त जन्मनि भाविनि ॥”

[अर्थात् “हे भाविनि, जो मनुष्य वस्त्रसे आवृत
देहसे युक्त होकर श्रीहरिको प्रणाम करता है, वह मूढ़
व्यक्ति सात जन्मों तक श्वेत कुष्ठ रोगी होता
है।”] ॥ 37 ॥

श्रीकान्त-सेनके वृत्तान्तका वर्णन :—
शिवानन्देर भागिना, —श्रीकान्त-सेन नाम।
मामार अगोचरे कहे करि' अभिमान ॥ 34 ॥

मामाको श्रीनित्यानन्दके द्वारा लात मारे जानेको देखकर
दुःखी होकर अकेले पुरीमें जाकर महाप्रभुके दर्शन :—
“चैतन्येर पार्षद मोर मातुलेर ख्याति।
'ठाकुरालि' करेन गोसाञि, ताँरे मारे लाथि ॥” 35 ॥

अनुवाद—श्रीशिवानन्द सेनका भाँजा, जिसका नाम
श्रीकान्त सेन था, मामाकी अनुपस्थितिमें वह बड़े
अभिमानसे कहने लगा,—“मेरे मामाकी श्रीचैतन्य महाप्रभुके
पार्षदके रूपमें ख्याति है। श्रीनित्यानन्द प्रभुने अपना
प्रभुत्व स्थापित करनेके लिये उन्हें लात मारी है॥” 34-35 ॥

अन्तर्यामी महाप्रभुके द्वारा श्रीकान्तके
मनोभावको बतलाना :—
प्रभु कहे,—“श्रीकान्त आसियाछे पाञा मनोदुःख।
किछु ना बलिह, करूक, याते इहार सुख ॥” 38 ॥

अनुवाद—महाप्रभुने श्रीगोविन्दसे कहा,—“यह श्रीकान्त
मनसे बहुत दुःखी होकर आया है। तुम इसे कुछ मत
कहो, इसे वैसा ही करने दो जिससे इसे सुख
हो ॥” 38 ॥

310 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 12/39-49 ]
महाप्रभुके द्वारा गौड़ीयभक्तोंका
समाचार पूछना और उत्तर :-
वैष्णवेर समाचार गोसाञि पुछिला।
एके एके सबार नाम श्रीकान्त जानाइला ॥ ३९ ॥
अनुवाद-महाप्रभुने श्रीकान्तसे वैष्णवोंका समाचार
पूछा और श्रीकान्तने एक-एकका नाम लेकर समस्त
वैष्णवोंके विषयमें बतलाया ॥ ३९ ॥
'दुःख पाञा आसियाछे,'-एइ प्रभुर वाक्य शुनि' ।
जानिला 'सर्वज्ञ प्रभु'-एत अनुमानि' ॥ ४० ॥
अपने मनके भावोंको जाननेवाले महाप्रभुको अन्तर्यामी
मानकर लात मारनेकी बातको गुप्त रखना :-
शिवानन्दे लाथि मारिला,-इहा ना कहिला।
एथा सब वैष्णवगण आसिया मिलिला ॥ ४१ ॥
अनुवाद- 'यह बहुत दुःखी होकर आया हैं'-महाप्रभुके
इस वाक्यको सुनकर श्रीकान्तने अनुमान लगाकर जान
लिया कि महाप्रभु सर्वज्ञ हैं। इसलिये श्रीकान्तसेनने
महाप्रभुको श्रीनित्यानन्द प्रभुने श्रीशिवानन्द सेनको लात
मारी-इस विषयमें नहीं बतलाया। इतनेमें सभी वैष्णव
भी आकर महाप्रभुसे मिले ॥ ४०-४१ ॥
गौड़ीय भक्तोंका आगमन और स्त्रियोंका
दूरसे ही महाप्रभुका दर्शन :-
पूर्ववत् प्रभु कैला सबार मिलन।
स्त्री-सब दूर हइते कैला प्रभुर दरशन ॥ ४२ ॥
अनुवाद-महाप्रभु पूर्व-पूर्व वर्षोंकी भाँति सभी
भक्तोंसे मिले। परन्तु स्त्रियोंने दूरसे ही महाप्रभुके दर्शन
किये ॥ ४२ ॥
सभीको वासस्थान आदि प्रदान :-
वासाघर पूर्ववत् सबारे देओआइला।
महाप्रसाद-भोजने सबारे बोलाइला ॥ ४३ ॥
अनुवाद-महाप्रभुने पहलेकी भाँति सभी भक्तोंको
रहनेका स्थान दिलवाया और फिर सभी भक्तोंको
महाप्रसादका भोजन करनेके लिये बुलाया ॥ ४३ ॥
पुत्र सहित श्रीशिवानन्दपर महाप्रभुकी कृपा :-
शिवानन्द तिनपुत्रे गोसाञिरे मिलाइला।
शिवानन्द-सम्बन्धे सबाय बहुकृपा कैला ॥ ४४ ॥
अनुवाद-श्रीशिवानन्द सेनने अपने तीनों पुत्रोंको
श्रीचैतन्य महाप्रभुसे मिलवाया। महाप्रभुने श्रीशिवानन्द
सेनके सम्बन्धसे उनके पुत्रोंपर बहुत कृपा की ॥ ४४ ॥
प्रश्नोत्तरमें छोटे पुत्रका परमानन्दपुरी-दास-नाम-श्रवण :-
छोटपुत्रे देखि' प्रभु नाम पुछिला।
'परमानन्ददास'-नाम सेन जानाइला ॥ ४५ ॥
अनुवाद-श्रीशिवानन्द सेनके सबसे छोटे पुत्रको
देखकर महाप्रभुने उसका नाम पूछा। श्रीशिवानन्द सेनने
बतलाया कि उसका नाम 'परमानन्ददास' है ॥ ४५ ॥
परमानन्दपुरी-दास-नामके आदि कारणके वृत्तान्तका वर्णन;
महाप्रभुकी आज्ञासे नामकरण :-
पूर्वे यबे शिवानन्द प्रभुस्थाने आइला।
तबे महाप्रभु ताँरे कहिते लागिला ॥ ४६ ॥
"एबार तोमार येइ हइबे कुमार।
'पुरीदास' बलि' नाम धरिह ताहार ॥" ४७ ॥
अनुवाद-पहले किसी समय जब श्रीशिवानन्द सेन
महाप्रभुके पास आये थे, तब महाप्रभु उनसे कहने
लगे, -"इस बार आपका जो पुत्र होगा, आप उसका
नाम 'पुरीदास' रखना ॥" ४६-४७ ॥
तबे मायेर गर्भे हय सेइ त' कुमार।
शिवानन्द घरे गेले, जन्म हैल तार ॥ ४८ ॥
अनुवाद-उस समय वह बालक अपनी माताके
गर्भमें था, जब श्रीशिवानन्द सेन अपने घर लौटकर
गये थे, तब उस बालकका जन्म हुआ था ॥ ४८ ॥
प्रभु-आज्ञाय धरिला नाम-'परमानन्द-दास' ।
'पुरीदास' करि' प्रभु करेन उपहास ॥ ४९ ॥

[ 12/49-58 बारहवाँ अध्याय 311
अनुवाद—श्रीशिवानन्द सेनने महाप्रभुकी आज्ञानुसार
उस बालकका नाम ‘परमानन्द-दास’ रखा था। महाप्रभु
उपहास करते हुए उस बालकको ‘पुरीदास’ कहकर
पुकारने लगे॥ 49॥
परमानन्द (पुरी)-दासके द्वारा महाप्रभुके
चरणके अँगूठेको चूसना :—
शिवानन्द यबे सेइ बालके मिलाइला।
महाप्रभु पादाङ्गुष्ठ तार मुखे दिला॥ 50॥
अनुवाद—श्रीशिवानन्द सेनने जब अपने उस बालकको
महाप्रभुसे मिलवाया, तब महाप्रभुने अपने चरणका
अँगूठा उस बालकके मुखमें दे दिया॥ 50॥
अनुभाष्य—परवर्तीकालमें पिताके साथ पुरीमें आगमन
और महाप्रभुके द्वारा कृष्ण-उच्चारण करनेके लिये
बहुत साध्य-साधनाके पश्चात् अन्तमें उस बालकके
द्वारा कृष्णलीलाके श्लोककी रचना—अन्त्यलीला 16/65-75
संख्या देखें॥ 50॥
श्रीशिवानन्दका परम सौभाग्य :—
शिवानन्देर भाग्यसिन्धु के पाइबे पार?
याँर सब गोष्ठीके प्रभु कहे ‘आपणार’॥ 51॥
अनुवाद—श्रीशिवानन्द सेनके भाग्यके समुद्रको
कौन पार कर सकता है? जिनके समस्त परिवारको
महाप्रभु ‘अपना’ कहते थे॥ 51॥
तबे सब भक्त लञा करिला भोजन।
गोविन्दरे आज्ञा दिला करि’ आचमन॥ 52॥
सपरिवार श्रीशिवानन्दको महाप्रभुके द्वारा
निजजन मानकर साक्षात् कृपा :—
“शिवानन्देर ‘प्रकृति’, पुत्र—यावत् एथाय।
आमार अवशेष-पात्र तारा येन पाय॥” 53॥
अनुवाद—तब महाप्रभुने सब भक्तोंके साथ भोजन
किया और आचमन करनेके पश्चात् श्रीगोविन्दको
आदेश दिया,—“शिवानन्द सेनकी पत्नी और पुत्र जब
तक यहाँ जगन्नाथ पुरीमें हैं, उन्हें मेरा उच्छिष्ट भोजन
अवश्य ही मिले॥” 52-53॥
अमृतप्रवाह भाष्य—‘शिवानन्देर ‘प्रकृति’’,—
श्रीशिवानन्दकी पत्नी॥ 53॥
श्रीमायापुरवासी परमेश्वर-मोदकका वृत्तान्त :—
नदीयावासी मोदक, तार नाम—‘परमेश्वर’।
मोदक बेचे, प्रभुर वाटीर निकट तार घर॥ 54॥
महाप्रभुकी बाल्यलीला और परमेश्वर :—
बालक-काले प्रभु तार घरे बार बार यान।
दुग्ध, खण्ड मोदक देय, प्रभु ताहा खान॥ 55॥
प्रभु-विषये स्नेह तार बालक-काल हैते।
से वत्सर से आइल प्रभुरे देखिते॥ 56॥
अनुवाद—मिष्ठान्न बेचनेवाले ‘परमेश्वर’-नामक एक
नदियावासी महाप्रभुके घरके निकट ही रहते थे।
महाप्रभु बाल्यकालमें बार-बार उनके घरमें जाते थे
और वे महाप्रभुको दूध, गुड़के लड्डू आदि देते थे एवं
महाप्रभु उन्हें खाते थे। श्रीपरमेश्वरका महाप्रभुके बाल्यकालसे
ही उनसे स्नेह था। उस वर्ष वे महाप्रभुके दर्शन
करनेके लिये जगन्नाथ पुरी आये॥ 54-56॥
परमेश्वरके द्वारा अपना परिचय देकर प्रणाम
और पत्नीका आगमन-ज्ञापन :—
“परमेश्वर्या मुञि” बलि’ दण्डवत् कैल।
तारे देखि’ प्रभु प्रीते ताहारे पुछिल॥ 57॥
“परमेश्वर कुशल हओ, भाल हैल, आइला।”
“मुकुन्दार माता आसियाछे,” प्रभुरे कहिला॥ 58॥
अनुवाद—उन्होंने महाप्रभुको दण्डवत् प्रणाम करते
हुए कहा,—“मैं परमेश्वर हूँ।” उन्हें देखकर महाप्रभुने
उनसे प्रीतिपूर्वक पूछा,—“परमेश्वर! आप कुशलसे तो
हैं ना। बहुत अच्छा हुआ कि आप श्रीजगन्नाथ पुरीमें
आये हैं।” श्रीपरमेश्वरने महाप्रभुसे कहा,—“मुकुन्दकी
माता (मेरी पत्नी) भी आयी है॥” 57-58॥

312 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 12/59-66 ]
माताके समान आयु होनेपर भी स्त्रीका नाम श्रवण करने
मात्रसे जगद्गुरु लोक-शिक्षक संन्यासी-लीलाका अभिनय
करनेवाले महाप्रभुको सङ्कोच-बोध :-
मुकुन्दार मातार नाम शुनि' प्रभु सङ्कोच हैला।
तथापि ताहार प्रीते किछु ना बलिा ॥ 59 ॥
अनुवाद-मुकुन्दकी माताका नाम सुनकर महाप्रभुको
कुछ सङ्कोच हुआ, किन्तु उन्होंने श्रीपरमेश्वरके प्रति
प्रीतिके कारण उन्हें कुछ भी नहीं कहा ॥ 59 ॥
सरल स्नेहके कारण बाहरी शिष्टाचार अथवा बाह्य-
मर्यादा-ज्ञानके अभावके कारण दोष होनेपर भी भावग्राही
महाप्रभुका उसके निष्कपट व्यवहार-गुणसे सन्तोष :-
प्रश्रय-प्रागल्भ्य शुद्ध-वैदग्धी ना जाने।
अन्तरे सुखी हैला प्रभु तार सेइ गुणे ॥ 60 ॥
अनुवाद-श्रीपरमेश्वर सरल स्नेहके कारण
वाक्-चतुरायी नहीं जानते थे, महाप्रभु उनके इसी
गुणके कारण हृदयमें बहुत प्रसन्न हुए ॥ 60 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य- 'मुकुन्दकी माता आयी हैं, '-यह
बात संन्यासीसे बोलना-केवल पूर्व-स्नेहके कारण
सरलतामात्र है। स्नेहके कारण सरलता कभी भी
शुद्ध-वैदग्धी अर्थात् शुद्ध वाक्-चातुर्यको नहीं जानती ॥ 60 ॥
अनुभाष्य-पाठान्तरमें, - 'प्रश्रय-पागल शुद्ध-वैदग्धी
ना जानें'; 'प्रश्रय' शब्दका अर्थ स्नेह, स्नेहयुक्त सम्मान,
विनय, विश्वास, आबदार [बाल-हठ] है। 'प्रागल्भ्य'-शब्दका
अर्थ प्रगल्भता, औधत्य, तेजस्विता है; 'वैदग्धी'- शब्दका
अर्थ चतुरता, रसिकता, शोभा, पटुता, पाण्डित्य, कौशल,
भङ्गिमा है ॥ 60 ॥
गुण्डिचा-मार्जन और रथके आगे नृत्य :-
पूर्ववत् सबा लञा गुण्डिचा-मार्जन।
रथ-आगे पूर्ववत् करिला नर्त्तन ॥ 61 ॥
अनुवाद-महाप्रभुने पूर्व वर्षोंकी भाँति सभी भक्तोंके
साथ गुण्डिचा मन्दिरका मार्जन किया और रथके आगे
नृत्य किया ॥ 61 ॥
ईश्वरकी यात्रादिके दर्शनके अन्तमें श्रीवासपत्नीके
द्वारा महाप्रभुको भिक्षा-प्रदान :-
चातुर्मास्य सब यात्रा कैला दरशन।
मालिनी प्रभृति प्रभुरे कैला निमन्त्रण ॥ 62 ॥
अनुवाद-गौड़ीय भक्तोंने चातुर्मास्यके अन्तर्गत आनेवाले
समस्त महोत्सवोंके दर्शन किये। श्रीमालिनी आदि
महिला भक्तोंने अपने पतियोंके माध्यमसे महाप्रभुको
निमन्त्रण किया ॥ 62 ॥
प्रभुर प्रिय नाना द्रव्य आनियाछे देश हैते।
सेइ व्यञ्जन करि' भिक्षा देन घर-भाते ॥ 63 ॥
अनुवाद-सभी महिला भक्त अपने साथ गौड़देशसे
महाप्रभुको प्रिय लगनेवाले अनेक द्रव्य लायी थीं,
उन्होंने उन द्रव्योंके साथ घरमें ही चावल-सब्जी आदि
बनाकर महाप्रभुको भोजन करवाया ॥ 63 ॥
दिनमें भक्तोंके साथ सङ्कीर्तन, रात्रिमें
निर्जनमें कृष्ण-विरह :-
दिने नाना क्रीड़ा करे लञा भक्तगण।
रात्र्ये कृष्ण-विच्छेदे प्रभु करेन रोदन ॥ 64 ॥
अनुवाद-महाप्रभु दिनके समय भक्तोंको साथमें
लेकर अनेक प्रकारकी लीलाएँ करते थे, किन्तु रात्रिमें
कृष्ण-विरहमें विलाप करते थे ॥ 64 ॥
चातुर्मास्यके अन्तमें गौड़-गमनके पहले
भक्तोंके प्रति महाप्रभुकी उक्ति :-
एइमत नाना लीलाय चातुर्मास्य गेल।
गौड़देशे याइते तबे भक्ते आज्ञा दिल ॥ 65 ॥
अनुवाद-महाप्रभुका इस प्रकार अनेक लीलाएँ
करते हुए चातुर्मास्यका समय व्यतीत हो गया, तब
उन्होंने भक्तोंको गौड़देश लौट जानेकी आज्ञा दी ॥ 65 ॥
सब भक्त करेन महाप्रभुर निमन्त्रण।
सर्वभक्ते कहेन प्रभु मधुर वचन ॥ 66 ॥

[ 12/66-77 बारहवाँ अध्याय 313

भक्तके दुःखमें भगवान्‌का दुःख :-
“प्रतिवर्षे आइस सबे आमारे देखिते।
आसिते याइते दुःख पाओ बहुमते ॥ 67 ॥
भक्तोंके दुःखके कारण महाप्रभुके द्वारा उनके दर्शनोंके
लिये निषेध-आज्ञा, किन्तु भक्तसङ्गका लोभ :-
तोमा-सबार दुःख जानि' चाहि निषेधिते।
तोमा-सबार सङ्गसुखे लोभ बाड़े चित्ते ॥ 68 ॥
अनुवाद—सभी गौड़ीय भक्त महाप्रभुको निमन्त्रण
देते। महाप्रभु उन सबसे इस प्रकारके मधुर वचन
कहते,—“आप सभी प्रतिवर्ष मुझसे मिलनेके लिये आते
हैं और आने-जानेमें आपको बहुत कष्ट होता है।
आप सभीके कष्टको जानकर मैं आपको यहाँ आनेके
लिये मना करना चाहता हूँ, किन्तु आप सभीके सङ्गसे
मुझे इतना सुख होता है कि मेरे मनमें आपका सङ्ग
प्राप्त करनेका लोभ वर्धित होता है ॥ 66-68 ॥
भगवान्‌के द्वारा भक्तोंके गुणोंका कीर्तन :-
नित्यानन्दे आज्ञा दिलुँ गौड़ेते रहिते।
आज्ञा लङ्घि' आइला, कि पारि बलिते?? 69 ॥
अनुवाद—मैंने श्रीनित्यानन्दको गौड़देशमें रहनेके
लिये आज्ञा दी थी, किन्तु वे मेरी आज्ञाका उल्लङ्घन
करके आ गये हैं। मैं उन्हें क्या कह सकता हूँ? 69 ॥
आइलेन आचार्य-गोसाञि मोरे कृपा करि'।
प्रेम-ऋणे बद्ध आमि, शुधिते ना पारि ॥ 70 ॥
अनुवाद—श्रीअद्वैताचार्य गोसाईं मुझपर कृपा करके
श्रीजगन्नाथपुरी आये हैं। मैं उनके प्रेमके ऋणसे बँधा
हुआ हूँ, मैं उनके ऋणको चुका नहीं सकता ॥ 70 ॥
मोर लागि' स्त्री-पुत्र-गृहादि छाड़िया।
नाना दुर्गम पथ लङ्घि' आइसेन धाञा ॥ 71 ॥
भक्तोंकी महाप्रभुके प्रति प्रीतिकी तुलनामें अपनी भक्तोंके
प्रति प्रीतिके अभावरूपी दीनताका ज्ञापन :-
आमि एइ नीलाचले रहि ये बसिया।
परिश्रम नाहि मोर सबार लागिया ॥ 72 ॥

भक्तोंके प्रति अपना चुकाया नहीं
जा सकनेवाला ऋण :-
संन्यासी मानुष मोर, नाहि कोन धन।
कि दिया तोमार ऋण करिमु शोधन?? 73 ॥
ऋणको चुकानेके उपायका वर्णन :-
देहमात्र धन तोमाय कैलुँ समर्पण।
ताँहा बिकाइ, याँहा बेचिते तोमार मन ॥” 74 ॥
अनुवाद—आप लोग मेरे लिये अपनी स्त्री-पुत्र-
गृहादिको छोड़कर अनेक दुर्गम पथोंको पार करके
दौड़कर आ जाते हैं। मैं तो यहाँ नीलाचलमें ही बैठा
रहता हूँ, मैं आप सबके लिये कोई भी परिश्रम नहीं
करता। मैं संन्यासी हूँ और मेरे पास कोई धन भी
नहीं है। मैं क्या देकर आप लोगोंके ऋणको
चुकाऊँगा? मेरे पास तो केवल अपना देहरूपी धन है,
मैं उसको आपको समर्पित करता हूँ। आप लोग उसे
जहाँ बेचना चाहेंगे, मैं वहीं बिक जाऊँगा॥” 71-74 ॥
भगवान्‌की दैन्य-विलापोक्तिको सुनकर भक्तोंका क्रन्दन :-
प्रभुर वचने सबार प्रीत हैल मन।
अझोर-नयने सबे करेन क्रन्दन ॥ 75 ॥
अनुवाद—महाप्रभुके मधुर वचन सुनकर सभीके
मनमें बहुत सुख हुआ और आनन्दके कारण सभीके
नेत्रोंसे अविरल अश्रुओँकी धारा प्रवाहित होने लगी
तथा सभी क्रन्दन करने लगे ॥ 75 ॥
भक्तोंको भगवान्‌के द्वारा आलिङ्गन :-
प्रभु सबार गला धरि' करेन रोदन।
कान्दिते कान्दिते सबाय कैला आलिङ्गन ॥ 76 ॥
अनुवाद—महाप्रभु सभी भक्तोंको गले लगाकर रोने
लगे। उन्होंने रोते-रोते सभीको आलिङ्गन किया ॥ 76 ॥
विरह-दुःखके भारके कारण सभीका जानेमें विलम्ब :-
सबाइ रहिल, केह चलिते नारिल।
आर दिन पाँच-सात एइमते गेल ॥ 77 ॥
अनुवाद—भावी विरह-दुःखके कारण कोई भी

314 | श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला | 12/77–87 ]


[बायाँ स्तम्भ]

भक्त गौड़देशके लिये चल नहीं पाया, सभी श्रीजगन्नाथ
पुरीमें ही रुक गये। इस प्रकार पाँच-सात दिन और
व्यतीत हो गये॥77॥

श्रीनित्यानन्द-अद्वैतके द्वारा महाप्रभुके वात्सल्यका वर्णन :—
अद्वैत-अवधूत किछु कहे प्रभु-पाय।
“सहजे तोमार गुणे जगत् बिकाय॥78॥

भगवद्वात्सल्य-प्रेममें भक्त आबद्ध :—
आबार ताते बान्ध’-ऐछे कृपा-वाक्य-डोरे।
तोमा छाड़ि’ केबा काँहा याइबारे पारे? ?’79॥

अनुवाद— श्रीअद्वैताचार्य और अवधूत श्रीनित्यानन्द
प्रभुने महाप्रभुके चरणोंमें निवेदन करते हुए कहा,—“आपके
गुणोंसे सहज ही सम्पूर्ण जगत् आपके हाथों बिक जाता
है। उसपर भी आप अपने ऐसे कृपा-वाक्योंकी डोरसे
बाँध रहे हैं। तब आपको छोड़कर कोई कहाँ जा
सकता है?”78–79॥

सभीको सान्त्वना और विदायी देना :—
तबे प्रभु सबाकारे प्रबोध करिया।
सबारे विदाय दिला सुस्थिर हञा॥80॥

अनुवाद— तब महाप्रभुने गौड़देशके समस्त भक्तोंको
सान्त्वना दी और उन्होंने सुस्थिर होकर सभीको विदायी
दी॥80॥

श्रीनित्यानन्दके प्रति आज्ञा :—
नित्यानन्दे कहिला,—“तुमि ना आसिह बारबार।
तथाइ आमार सङ्ग हइबे तोमार॥”81॥

अनुवाद— महाप्रभुने श्रीनित्यानन्द प्रभुसे कहा,—“आप
बार-बार श्रीजगन्नाथपुरीमें मत आइये। आपको गौड़देशमें
ही मेरा सङ्ग प्राप्त होगा॥”81॥

भक्त और भगवान्-परस्पर प्रेममें आबद्ध, दोनोंका ही दोनोंके विच्छेदमें विषाद :—
चले सब भक्तगण रोदन करिया।
महाप्रभु रहिला घरे विषण्ण हञा॥82॥


[दायाँ स्तम्भ]

अनुवाद— सभी भक्त लोग रोते-रोते गौड़देशकी
ओर चल दिये। महाप्रभु दुःखी होकर अपने वासस्थानपर
ही रह गये॥82॥

भगवान्का वात्सल्य-ऋण भी भक्तोंके द्वारा नहीं चुकाया जा सकनेवाला :—
निज-कृपागुणे प्रभु बान्धिला सबारे।
महाप्रभुर कृपा-ऋण के शोधिते पारे? ?83॥

अनुवाद— महाप्रभुने सभी भक्तोंको अपने कृपारूपी
गुणके द्वारा बाँध लिया, महाप्रभुके कृपा-ऋणको कौन
चुका सकता है? 83॥

सर्वेश्वरेश्वर महाप्रभु ही परिचालक, भक्त ही चलनेवाले :—
यारे यैछे नाचाय प्रभु स्वतन्त्र ईश्वर।
ताते ताँरे छाड़ि’ लोक याय देशान्तर॥84॥

अनुवाद— महाप्रभु स्वतन्त्र ईश्वर हैं और वे
सभीको अपनी इच्छानुसार नचाते हैं। इसके द्वारा ही
सम्भव हुआ कि भक्त महाप्रभुको छोड़कर विभिन्न
स्थानोंमें अपने-अपने घरकी ओर चल दिये॥84॥

काष्ठेर पुतली येन कुहके नाचाय।
ईश्वर-चरित्र किछु बुझन ना याय॥85॥

अनुवाद— बाजीगर जैसे लकड़ीकी पुतलीको नचाता
है, उसी प्रकार ईश्वरके स्वभावको कोई भी समझ नहीं
पाता॥85॥

श्रीजगदानन्दका नवद्वीपमें श्रीशचीके निकट आगमन और प्रणाम करनेके बाद महाप्रभुके द्वारा दिये गये द्रव्योंको प्रदान करना :—
पूर्ववर्षे जगदानन्द ‘आइ’ देखिबारे।
प्रभु-आज्ञा लञा आइला नदीया-नगरे॥86॥
आइर चरण याइ’ करिला वन्दन।
जगन्नाथेर वस्त्र-प्रसाद कैला निवेदन॥87॥

अनुवाद— पिछले वर्ष श्रीजगदानन्द पण्डित महाप्रभुकी

[ 12/86-97 बारहवाँ अध्याय 315
आज्ञा लेकर श्रीशचीमाताके दर्शन करनेके लिये
नदीया-नगरमें आये थे। उन्होंने श्रीशचीमाताके चरणोंमें
गिरकर उनकी वन्दना की और माताको भगवान्
श्रीजगन्नाथका प्रसादी-वस्त्र और प्रसाद प्रदान किया
था॥ 86-87 ॥
प्रभुर नामे मातारे दण्डवत् कैला।
प्रभुर विनति-स्तुति मातारे कहिला ॥ 88 ॥
अनुवाद—उन्होंने श्रीशचीमाताको महाप्रभुका नाम
लेकर उनकी ओरसे दण्डवत् प्रणाम किया और
महाप्रभुके द्वारा की गयी विनती-स्तुति भी श्रीशचीमाताको
सुनायी ॥ 88 ॥
श्रीशचीके द्वारा श्रीजगदानन्दसे पुत्रकी कथा-श्रवण :-
जगदानन्दे पाञा माता आनन्दित मने।
तेंहो प्रभुर कथा कहे, सुने रात्रि-दिने ॥ 89 ॥
अनुवाद—श्रीजगदानन्द पण्डितके आनेसे श्रीशचीमाताका
मन बहुत प्रसन्न हो गया। वे महाप्रभुकी बातें बतलाते
और श्रीशचीमाता दिन-रात उन्हें सुनतीं ॥ 89 ॥
श्रीशचीको बीच-बीचमें महाप्रभुके द्वारा
प्रसन्नतापूर्वक माताके द्वारा बनाये गये
भोजनके संवादके विषयमें बताना :-
जगदानन्द कहे, — 'माता, कोन कोन दिने।
तोमार एथा आसि' प्रभु करेन भोजने ॥ 90 ॥
भोजन करिया कहे आनन्दित हञा।
'माता आजि खाओयाइला आकण्ठ पूरिया ॥ 91 ॥
वात्सल्यसे परिपूर्ण होनेके कारण श्रीशचीके द्वारा महाप्रभुके
साक्षात् भोजनको स्वप्न मानना :-
आमि याइ' भोजन करि—माता नाहि जाने।
साक्षाते खाइ आमि, तँहो 'स्वप्न' हेन माने।' ॥ ”92 ॥
अनुवाद—श्रीजगदानन्द पण्डितने कहा,—'हे माता!
महाप्रभु किसी-किसी दिन आपके यहाँपर आकर
भोजन करते हैं। वे यहाँपर भोजन करनेके उपरान्त
श्रीजगन्नाथ पुरीमें आनन्दित होकर कहते हैं—'आज
माताने कण्ठ तक भरकर भोजन खिलाया है। मैं
जगन्नाथ पुरीसे जाकर उनके द्वारा बनाया गया भोजन
खाता हूँ, किन्तु माता इस बातको नहीं जानतीं। मैं
साक्षात् रूपमें जाकर खाता हूँ और वे इसे स्वप्न
मानती हैं।' ॥ ”90-92 ॥
श्रीशचीकी परम वात्सल्यपूर्ण उक्ति :-
माता कहे, — 'कत रान्धि उत्तम व्यञ्जन।
निमाञि इँहा खाय, — इच्छा हय मोर मन ॥ 93 ॥
निमाञि खाञाछे,—ऐछे हय मोर मन।
पाछे ज्ञान हय, — मुञि देखिनु 'स्वप्न' ॥ ”94 ॥
अनुवाद—श्रीशचीमाताने कहा, — 'मैं कितने प्रकारके
उत्तम व्यञ्जन बनाती हूँ और मेरे मनमें इच्छा होती
है कि निमाइ उन्हें खाये। फिर मेरे मनमें ऐसा अनुभव
भी होता है कि निमाइने मेरे द्वारा बनायी गयी सब
वस्तुओंको खाया है, किन्तु बादमें मुझे ऐसा लगता है
कि मैंने स्वप्न देखा है ॥ ”93-94 ॥
शचीमाता और गौड़ीय भक्तोंके साथ श्रीजगदानन्दका
चैतन्य-कथामें परमसुखपूर्वक दिन व्यतीत करना :-
एइमत जगदानन्द शचीमाता-सने।
चैतन्येर सुख-कथा कहे रात्रि-दिने ॥ 95 ॥
अनुवाद—इस प्रकार श्रीजगदानन्द पण्डित
श्रीशचीमाताके साथ रात-दिन श्रीचैतन्य महाप्रभुकी
आनन्द प्रदान करनेवाली कथाएँ करते रहते ॥ 95 ॥
नदीयार भक्तगणे सबारे मिलिला।
जगदानन्दे पाञा सबे आनन्दित हैला ॥ 96 ॥
अनुवाद—श्रीजगदानन्द पण्डित नदीयाके अन्य सभी
भक्तोंसे भी मिले थे। श्रीजगदानन्द पण्डितसे मिलकर
सभी भक्त आनन्दित हुए थे ॥ 96 ॥
आचार्य मिलिते तबे गेला जगदानन्द।
जगदानन्दे पाञा हैला आचार्य आनन्द ॥ 97 ॥

316 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 12/97-107 ]
अनुवाद—तब श्रीजगदानन्द पण्डित श्रीअद्वैताचार्यसे
मिलनेके लिये गये और श्रीजगदानन्द पण्डितको देखकर
श्रीअद्वैताचार्य बहुत आनन्दित हुए थे॥97॥
वासुदेव, मुरारि-गुप्त जगदानन्दे पाञा।
आनन्दे राखिला घरे, ना देन छाड़िया॥98॥
श्रीजगदानन्दके मुखसे श्रीचैतन्यकी कथा
सुनकर सभीको आत्म-विस्मृति :—
चैतन्येर मर्मकथा सुने ताँर मुखे।
आपना पासरे सबे चैतन्य-कथा-सुखे ॥99॥
अनुवाद—श्रीवासुदेव दत्त और श्रीमुरारि गुप्तको
श्रीजगदानन्द पण्डितको देखकर इतना आनन्द हुआ कि
उन्होंने श्रीजगदानन्द पण्डितको अपने घरमें रखा और
उनको कहीं जाने नहीं देते थे। वे उनके श्रीमुखसे
श्रीचैतन्य महाप्रभुकी गूढ़ कथाओंको सुनते और महाप्रभुकी
कथाओंके आनन्दमें स्वयंको भूल जाते थे॥98-99॥
जगदानन्द मिलिते याय येइ भक्त-घरे।
सेइ सेइ भक्त सुखे आपना पासरे ॥ 100॥
अनुवाद—श्रीजगदानन्द पण्डित जिस किसी भक्तके
घरपर जाकर उससे मिलते, वह भक्त आनन्दसे स्वयंको
भूल जाता था॥100॥
श्रीजगदानन्दकी गुणावली :—
चैतन्येर प्रेमपात्र जगदानन्द धन्य।
यारे मिले सेइ माने, -'पाइलुँ चैतन्य' ॥101 ॥
अनुवाद—श्रीचैतन्य महाप्रभुके प्रेमके पात्र श्रीजगदानन्द
पण्डित धन्य हैं। वे जिस किसी भक्तसे मिलते, वही
मानता था कि उसे श्रीचैतन्य महाप्रभुका सङ्ग मिल गया
है॥101॥
काञ्चनपल्लीसे चन्दनके तेलका संग्रह और पुरीमें जाकर
महाप्रभुके व्यवहारके लिये श्रीगोविन्दको प्रदान :—
शिवानन्दसेन-गृहे याञा रहिला।
'चन्दनादि' तैल ताँहा एकमात्र कैला ॥102 ॥
अनुवाद—श्रीजगदानन्द पण्डित कुछ दिनों तक
श्रीशिवानन्द सेनके घरपर भी जाकर रहे थे, उन्होंने
वहींपर सोलह सेर [1 सेर=933 ग्राम] चन्दन आदिके
तेलको एकत्रित किया था॥102॥
अमृतप्रवाह भाष्य—'एकमात्रा',—सोलह सेर ॥ 102॥
सुगन्धि करिया तैल गागरी भरिया।
नीलाचले लञा आइला यतन करिया ॥ 103॥
अनुवाद—श्रीजगदानन्द पण्डितने उस तेलमें कुछ
सुगन्धित द्रव्योंको मिलाकर उसे एक घड़ेमें भर लिया
और बड़ी सावधानीपूर्वक उसे नीलाचल श्रीजगन्नाथ
पुरीमें ले आये॥103॥
अमृतप्रवाह भाष्य—'गागरी',—घड़ा ॥ 103 ॥
गोविन्देर ठाञि तैल धरिया राखिला।
“प्रभु-अङ्गे दिह' तैल”—गोविन्दे कहिला ॥ 104 ॥
अनुवाद—श्रीजगदानन्द पण्डितने उस तेलको
श्रीगोविन्दके पास रखा और उनसे कहा, — "इस तेलको
महाप्रभुके श्रीअङ्गोंपर लगाना॥" 104॥
श्रीगोविन्दके द्वारा महाप्रभुको
श्रीजगदानन्दकी इच्छा बतलाना :—
तबे प्रभु-ठाञि गोविन्द कैल निवेदन।
“जगदानन्द चन्दनादि-तैल आनियाछेन ॥ 105 ॥
अप्राकृत नरशरीरधारी महाप्रभुके प्रति श्रीजगदानन्दका
अप्राकृत अतुलनीय-प्रेम :—
ताँर इच्छा, - प्रभु अल्प मस्तके लागाय।
पित्त-वायु-व्याधि-प्रकोप शान्त हञा याय ॥ 106 ॥
एक-कलस सुगन्धि तैल गौड़े करिया।
इँहा आनियाछेन बहु यतन करिया ॥” 107॥
अनुवाद—तब श्रीगोविन्दने महाप्रभुसे निवेदन
किया, — “श्रीजगदानन्द पण्डित आपके लिये चन्दन
आदिका तेल लाये हैं। उनकी इच्छा है कि— महाप्रभु
(आप) इस तेलको अल्प मात्रामें अपने सिरपर लगायें।
इस तेलसे पित्त-वायु-व्याधिका प्रकोप शान्त हो जाता

यहाँ पृष्ठ का संपूर्ण पाठ पंक्ति-दर-पंक्ति प्रस्तुत है:

[ 12/105-112 बारहवाँ अध्याय 317
[बायाँ स्तम्भ]
है। वे बहुत यत्नसे एक घड़ा सुगन्धित तेल गौड़देशसे
यहाँ लाये हैं॥" 105-107॥
अनुभाष्य- गौड़देशमें सुगन्धित तेल एकत्रित करके
श्रीक्षेत्रमें लाये॥ 107॥
जगद्गुरु लोकशिक्षक आचार्यरूपी महाप्रभुके
द्वारा आदर्श-आचारका प्रदर्शन :-
प्रभु कहे,-“संन्यासीर तैले नाहि अधिकार।
ताहाते सुगन्धि तैल, — परम धिक्कार ! ! 108 ॥
श्रीजगदानन्दको उपलक्ष्य करके जगद्गुरु महाप्रभुके द्वारा
साधकको सर्वोत्कृष्ट उपकरणके द्वारा एकमात्र भोक्ता
ईश्वरके ही स्वारसिकी सेवारूपी कर्त्तव्यका उपदेश;
उससे ही जीवके सेवा-श्रमकी सार्थकता :-
जगन्नाथे देह' तैल,-दीप येन ज्वले।
तार परिश्रम हवे परम-सफले ॥" 109 ॥
अनुवाद- महाप्रभुने कहा,–“संन्यासीको तेल लगानेका
अधिकार नहीं है। उसपर भी सुगन्धित तेल लगानेको
तो परम धिक्कार है! यह तेल जगन्नाथ मन्दिरमें दे दो,
जिससे वह मन्दिरमें दीपक प्रज्वलित करनेके काम
आयेगा। ऐसा करनेसे जगदानन्द पण्डितका परिश्रम भी
परम-सफल होगा॥" 108-109 ॥
अनुभाष्य-
“प्रातःस्नाने व्रते श्राद्धे द्वादश्यां ग्रहणे तथा।
मद्यलेपसमं तैलं तस्मात्तैलं विवर्जयेत् ॥"
[अर्थात् “प्रातः स्नानके समय, जिस किसी व्रतमें,
द्वादशी-तिथिमें (अथवा द्वादशी-व्रतमें) एवं सूर्य-चन्द्र
ग्रहणके समय तेलका उपयोग करना मद्य-लेपनके
समान है, अतएव उस समय तेलका प्रयोग निषेध है।"]
उपरोक्त 'व्रत' शब्दकी कोई-कोई 'यतिव्रत'के रूपमें
व्याख्या करते हैं [अर्थात् जिन्होंने संन्यास-व्रत लिया
है उनके लिये तेलका प्रयोग निषेध है, इसी भावसे]
तिथि-तत्त्वमें स्मार्त्त भट्टाचार्य रघुनन्दनने लिखा है,-
“घृतञ्च सार्षपं तैलं यत्तैलं पुष्पवासितम्।
अदुष्टं पक्वतैलञ्च तैलाभ्यङ्गे च नित्यशः॥”
[दायाँ स्तम्भ]
अर्थात् “घी, सरसोंका तेल, पुष्प-तेल एवं पके हुए
तेलको शरीरपर मलना 'गृहस्थ'के लिये दोषपूर्ण नहीं
है॥" 108 ॥
श्रीगोविन्दके द्वारा श्रीजगदानन्दको महाप्रभुकी आदेश-वाणी
बतलाना, श्रीजगदानन्दका प्रणयाभिमान-क्रोध :-
एइ कथा गोविन्द जगदानन्देरे कहिल।
मौन करि' रहिल पण्डित, किछु ना कहिल ॥ 110 ॥
अनुवाद- श्रीगोविन्दने श्रीजगदानन्द पण्डितको महाप्रभुका
आदेश बतलाया। उसे सुनकर श्रीजगदानन्द पण्डितने
कुछ भी नहीं कहा, मौन रहे॥ 110 ॥
बादमें श्रीगोविन्दके द्वारा पुनः महाप्रभुको
श्रीजगदानन्दकी इच्छा बतलाना :-
दिन दश गेले गोविन्द जानाइल आरबार।
“पण्डितेर इच्छा,-तैल करुन अङ्गीकार ॥" 111 ॥
अनुवाद- दस दिनके बाद श्रीगोविन्दने महाप्रभुको
पुनः निवेदन किया,—“श्रीजगदानन्द पण्डितकी इच्छा है
कि आप तेलको स्वीकार करें ॥" 111 ॥
जगद्गुरु लोकशिक्षक महाप्रभुके द्वारा साधक
अथवा आचार्यको आत्मेन्द्रिय तर्पणके लिये
भोग-चेष्टाके अनुचित होनेकी शिक्षा-प्रदान :-
शुनि प्रभु कहे किछु सक्रोध-वचन।
“मर्द्दनिया एक राख करिते मर्द्दन ! ! 112 ॥
अनुवाद- यह सुनकर महाप्रभुने कुछ क्रोधित
होकर कहा,-“मालिश करनेके लिये एक मालिश
करनेवाला भी रख लो ! 112 ॥
अनुभाष्य- सहायताहीन भिक्षु अर्थात् संन्यासीको
अन्यकी सहायता ग्रहण नहीं करनी चाहिये। यहाँपर
विलासके सहचर सुगन्धित-तेलको मलनेके लिये
विलास-परायण भोगी व्यक्तियोंकी भाँति दास जैसे एक
व्यक्तिको नियुक्त करनेपर विशेष सुखका विषय होगा,-यह
श्लेष उक्ति है अर्थात् इसका वास्तविक अर्थ शब्दार्थके
विपरीत है॥ 112 ॥

318 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 12/113-120 ]
एइ सुख लागि' आमि करिलुँ संन्यास!
आमार 'सर्वनाश'-तोमार 'परिहास'॥113॥
अपनी इन्द्रियोंके तर्पणरूपी सम्भोगको प्रिय
माननेवाले संन्यासी वेशधारियोंकी निन्दा :-
पथे याइते तैल गन्ध मोर येइ पाबे।
'दारी संन्यासी' करि' आमारे कहिबे॥"114॥
अनुवाद-मैंने ऐसे सुखके लिये ही संन्यास ग्रहण
किया है! तुम्हारे इस परिहाससे मेरा तो सर्वनाश होगा।
मार्गमें जाते हुए जिसको भी मेरे शरीरसे तेलकी सुगन्ध
अनुभव होगी, वह मुझे 'दारी संन्यासी' [स्त्रीके सङ्गमें
रहनेवाला संन्यासी] कहेंगे॥"113-114॥
अमृतप्रवाह भाष्य- 'दारी संन्यासी', - स्त्रीके साथ
रहनेवाला संन्यासी॥114॥
अनुभाष्य- 'दारी संन्यासी', - स्त्री-सम्भोगी, मिथ्याचारके
कारण भ्रष्ट, तान्त्रिक संन्यासी॥114॥
महाप्रभुके रोषके कारण श्रीगोविन्द मौन :-
शुनि' प्रभुर वाक्य गोविन्द मौन करिला।
प्रातःकाले जगदानन्द प्रभु-स्थाने आइला॥115॥
अनुवाद-महाप्रभुके वचन सुनकर श्रीगोविन्द मौन
रहे। अगले दिन प्रातःकालमें श्रीजगदानन्द पण्डित
महाप्रभुके वासस्थानपर आये॥115॥
स्वयं समस्त वस्तुओंके भोक्ता होनेपर भी श्रीजगदानन्दके
आगमनसे लोक-शिक्षक आचार्यरूपमें महाप्रभुके द्वारा
साधक अथवा आचार्यको इन्द्रियसुख-त्याग अथवा
आदर्श वैराग्यके आचरणका प्रदर्शन :-
प्रभु कहे,-"पण्डित, तैल आनिला गौड़ हइते।
आमि त' संन्यासी,-तैल ना पारि लइते॥116॥
श्रीजगदानन्दको उपदेशके छलसे समस्त चित् वस्तुओंके
भोक्ता भगवान्की सर्वोत्कृष्ट द्रव्योंके द्वारा सेवासे ही
जीवकी सेवाकी सफलताकी शिक्षा देना :-
जगन्नाथे देह' लञा दीप येन ज्वले।
तोमार सकल श्रम हइबे सफले॥"117॥
अनुवाद-महाप्रभुने कहा, - "हे जगदानन्द पण्डित!
तुम गौड़देशसे मेरे लिये सुगन्धित चन्दनका तेल लाये
हो। मैं तो संन्यासी हूँ, इसलिये मैं उस तेलको स्वीकार
नहीं कर सकता। तुम उस तेलको ले जाकर जगन्नाथ
मन्दिरमें दे दो, जिससे वह दीपक जलानेके काम आ
जायेगा। ऐसा होनेसे तुम्हारे द्वारा तेलको एकत्रित करके
बनाने और यहाँ लानेका समस्त परिश्रम भी सफल हो
जायेगा॥"116-117॥
महाप्रभुके प्रेमी श्रीजगदानन्दके द्वारा महाप्रभुके
प्रति प्रणयाभिमानरूपी रोष :-
पण्डित कहे,-"के तोमारे कहे मिथ्यावाणी?
आमि गौड़ हैते तैल कभु नाहि आनि॥"118॥
महाप्रभुके सामने ही तेलके पात्रको तोड़ना :-
एत बलि' घर हैते तैल-कलस आनिया।
प्रभुर आगे आङ्गिनाते फेलिला भाङ्गिया॥119॥
अपने घरमें स्वयंको बन्द करना :-
तैल भाङ्गि' सेइ पथे निज-घर गिया।
शुइया रहिला घरे कपाट खिलिया॥120॥
अनुवाद-श्रीजगदानन्द पण्डितने कहा,-"आपको
कौन यह मिथ्या बातें कह रहा है? मैं तो गौड़देशसे
कभी कोई तेल लाया ही नहीं।" यह कहकर वे
कमरेके भीतरसे तेलकी मटकी लाये और उन्होंने
महाप्रभुके सामने ही उस मटकीको आङ्गनमें फेंककर
तोड़ डाला। वे तेलकी मटकीको फोड़कर उसी
आङ्गनसे होते हुए अपने कमरेमें चले गये और
कमरेको भीतरसे बन्द करके लेट गये [और मान
करके खाना-पीना छोड़ दिया]॥118-120॥
अनुभाष्य-श्रीजगदानन्द समुद्रके तटपर श्रीहरिदास
ठाकुरकी समाधि-स्थलीके निकटमें वर्तमानकालके
'सात-आसन' नामक भजन-कुटी-समूहमें-से एक
'गिरिधारी'-आसनमें रहते थे, -ऐसा श्रीरघुनाथ वैद्यके
द्वारा लिखित ग्रन्थसे जाना जाता है॥120॥

[ 12/121-131 बारहवाँ अध्याय 319
भक्तके प्रेमके वशीभूत भगवान्‌के द्वारा भक्तके मानका भञ्जन अथवा कृपा-प्रार्थना :-
तृतीय दिवसे प्रभु ताँर द्वारे याञा।
“उठह पण्डित”—करि' कहेन डाकिया ॥ 121 ॥
भक्तके घरमें भगवान्‌का स्वयं याचकके रूपमें भिक्षा स्वीकार करना :-
“आजि भिक्षा दिबा आमाय करिया रन्धने।
मध्याह्ने आसिमु, एबे याइ दरशने ॥” 122 ॥
अनुवाद—तीन दिन बाद महाप्रभु उनके द्वारपर गये और उन्हें पुकारते हुए कहा, —“हे जगदानन्द पण्डित, उठो। आज तुम स्वयं भोजन पाक करके मुझे खिलाना। मैं दोपहरके समय आऊँगा, अभी श्रीजगन्नाथके दर्शन करने जा रहा हूँ॥” 121-122 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—'याइ दरशने',—श्रीजगन्नाथके दर्शन करने जा रहा हूँ ॥ 122 ॥
महाप्रभुके प्रेमी पण्डितका महाप्रभुके लिये भोग बनाना और समर्पण :-
एत बलि' प्रभु गेला, पण्डित उठिला।
स्नान करि' नाना व्यञ्जन रन्धन करिला ॥ 123 ॥
अनुवाद—यह कहकर महाप्रभु चले गये। इधर श्रीजगदानन्द उठे और स्नान करनेके पश्चात् उन्होंने अनेक व्यञ्जन बनाये ॥ 123 ॥
मध्याह्न करिया प्रभु आइला भोजने।
पादप्रक्षालन करि' बसिला आसने ॥ 124 ॥
अनुवाद—महाप्रभु मध्याह्न-कृत्य करनेके पश्चात् भोजन करनेके लिये आये। श्रीजगदानन्दने उनके चरण धुलवाये और महाप्रभु आसनपर बैठ गये ॥ 124 ॥
सघृत शाल्यन्न कलापाते स्तूप कैला।
कलार डोङ्गा भरि' व्यञ्जन चौदिके धरिला ॥ 125 ॥
अन्न-व्यञ्जनोपरि तुलसी-मञ्जरी।
जगन्नाथेर पिठा-पाना आगे आने धरि' ॥ 126 ॥
अनुवाद—श्रीजगदानन्द पण्डितने केलेके पत्तेपर घीसे मिश्रित शालि-चावलका स्तूप बनाकर उसके चारों ओर अनेक व्यञ्जनोंसे भरे केलेके पत्तोंसे बने दोने रख दिये। चावलके स्तूप और उन व्यञ्जनोंके ऊपर तुलसी मञ्जरी रखी हुई थी। फिर उन्होंने महाप्रभुके आगे भगवान् श्रीजगन्नाथका पीठा-पाना आदि प्रसाद भी लाकर रख दिया ॥ 125-126 ॥
अभिन्न-आत्मा प्रणयपात्र भक्तके साथ भक्तप्रेमवशतः भगवान्‌की एक साथ भोजन करनेकी इच्छा :-
प्रभु कहे, —“द्वितीय-पाते बाड़' अन्न-व्यञ्जन।
तोमाय आमाय आजि एकत्र करिमु भोजन ॥” 127 ॥
अनुवाद—महाप्रभुने कहा, —“एक और पत्तेपर चावल और व्यञ्जन आदि रखो, क्योंकि आज तुम और मैं एक साथ भोजन करेंगे ॥” 127 ॥
हस्त तुलि' रहेन प्रभु, ना करेन भोजन।
तबे पण्डित कहेन किछु सप्रेम वचन ॥ 128 ॥
श्रीजगदानन्दकी महाप्रभुसे प्रीतिपूर्ण उक्ति; बादमें बैठना ही स्वीकार :-
“आपने प्रसाद लह, पाछे मुञि लइमु।
तोमार आग्रह आमि केमने खण्डिमु ??” 129 ॥
अनुवाद—महाप्रभुने अपने हाथ ऊपर उठाकर रखे और कुछ खा नहीं रहे थे। तभी श्रीजगदानन्द पण्डितने प्रेमपूर्वक कहा, —“आप कृपया प्रसाद ग्रहण कीजिये, मैं बादमें ग्रहण करूँगा। मैं आपके आग्रहको कैसे मना कर पाऊँगा?” 128-129 ॥
महाप्रभुके द्वारा श्रीजगदानन्दके प्रेमपूर्वक बनाये गये प्रसादकी स्तुति करते हुए उनके भाग्यकी प्रशंसा :-
तबे महाप्रभु सुखे भोजने बसिला।
व्यञ्जनेर स्वाद पाञा कहिते लागिला ॥ 130 ॥
“क्रोधावेशेर पाकेर हय ऐछे स्वाद !
एइ त' जानिये तोमाय कृष्णेर 'प्रसाद' ॥ 131 ॥

320 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 12/130-140 ]
आपने खाइबे कृष्ण, ताहार लागिया।
तोमार हस्ते पाक कराय उत्तम करिया ॥ 132 ॥
ऐछे अमृत-अन्न कृष्णे कर समर्पण।
तोमार भाग्येर सीमा के करे वर्णन? ?" 133 ॥
अनुवाद-तब महाप्रभु आनन्दपूर्वक भोजन करने लगे और सभी व्यञ्जनोंका आस्वादन करते हुए कहने लगे, - "क्रोधके आवेशमें बनाये गये व्यञ्जनोंका ऐसा स्वाद! इससे ही पता चलता है कि तुम्हारे ऊपर कृष्णकी बहुत कृपा है। कृष्ण स्वयं खाना चाहते हैं, इसलिये वे तुम्हारे हाथोंसे स्वयंके लिये उत्तम-उत्तम वस्तुएँ पकवाते हैं। तुम कृष्णको ऐसे अमृत-तुल्य पकवान समर्पित करते हो, तुम्हारे भाग्यकी सीमाका कौन वर्णन कर सकता है?" 130-133 ॥
श्रीगौरको ही सर्वस्व माननेवाले, श्रीगौरगतप्राण
श्रीजगदानन्दका महाप्रभुको ही सब कुछ
करवानेवालेके रूपमें मानना :-
पण्डित कहे, - "ये खाइबे, सेइ पाककर्त्ता।
आमि सब, - केवलमात्र सामग्री-आहर्त्ता ॥ " 134 ॥
अनुवाद-श्रीजगदानन्द पण्डितने कहा, - "जो खायेंगे, वे ही पकवान बनानेवाले हैं। मैं तो केवलमात्र सामग्रीका संग्रह करनेवाला हूँ॥" 134 ॥
भक्तके अभिमानके भयसे भगवान्के
द्वारा प्रचुर भोजन करना :-
पुनः पुनः पण्डित नाना व्यञ्जन परिवेशे।
भये किछु ना बलेन प्रभु, खायेन हरिषे ॥ 135 ॥
अनुवाद-श्रीजगदानन्द पण्डित बार बार अनेक प्रकारके व्यञ्जन परोसने लगे। उनके भयके कारण महाप्रभु कुछ भी नहीं बोले, अपितु प्रसन्नतापूर्वक खाते रहे ॥ 135 ॥
आग्रह करिया पण्डित कराइला भोजन।
आर दिन हैते भोजन हैल दशगुण ॥ 136 ॥
अनुवाद-श्रीजगदानन्द पण्डितने बार बार आग्रह करके महाप्रभुको इतना भोजन कराया कि उन्होंने अन्य दिनोंकी तुलनामें दस गुणा अधिक भोजन किया ॥ 136 ॥
बारबार प्रभु उठिते करेन मन।
सेइकाले पण्डित परिवेशे व्यञ्जन ॥ 137 ॥
किछु बलिते नारेन प्रभु, खायेन तरासे।
ना खाइले जगदानन्द करिबे उपवासे ॥ 138 ॥
महाप्रभुका परिवेश समाप्त करनेके लिये
श्रीजगदानन्दको कातरभावसे अनुरोध :-
तबे प्रभु कहेन करि' विनय-सम्मान।
"दशगुण खाओयाइला, एबे कर समाधान ॥" 139 ॥
अनुवाद-बार बार महाप्रभु जैसे ही उठनेकी इच्छा करते, श्रीजगदानन्द पण्डित उसी समय उनके पत्तलमें और व्यञ्जन परोस देते। महाप्रभु उन्हें कुछ बोल नहीं पा रहे थे और सब खाते रहे। महाप्रभुको भय था कि यदि मैं नहीं खाऊँगा तो जगदानन्द उपवास करेगा। अन्तमें महाप्रभुने विनती करते हुए सम्मानपूर्वक श्रीजगदानन्द पण्डितसे कहा, - "तुमने मुझे अन्य दिनोंकी अपेक्षा दस गुणा भोजन करवा दिया है, अब कृपा करके और मत खिलाओ ॥" 137-139 ॥
अनुभाष्य- 'समाधान', - निष्पत्ति, समापन, विराम, अन्त ॥ 139 ॥
बारहवें अध्यायका अनुभाष्य समाप्त।
आचमनके बाद महाप्रभुके द्वारा श्रीजगदानन्दको अपने सामने बैठकर भोजन करनेके लिये अनुरोध :-
तबे महाप्रभु उठि' कैला आचमन।
पण्डित आनिल, मुखवास, माल्य, चन्दन ॥ 140 ॥
अनुवाद-तब महाप्रभुने उठकर आचमन किया। श्रीजगदानन्द पण्डित महाप्रभुके लिये मुखशुद्धि, माला और चन्दन ले आये ॥ 140 ॥

[ 12/141-150 बारहवाँ अध्याय 321
चन्दनादि लञा प्रभु बसिला सेइ स्थाने।
“आमार आगे आजि तुमि करह भोजने॥”141॥
अनुवाद—महाप्रभु चन्दनादि धारण करके वहीं बैठ
गये और उन्होंने श्रीजगदानन्द पण्डितसे कहा,—“आज
तुम मेरे सामने ही भोजन करो॥”141॥
वाम्यस्वभाव श्रीजगदानन्दका ऐश्वर्य-बुद्धिसे
महाप्रभुकी मर्यादाके संरक्षणके लिये महाप्रभुको
विश्रामके लिये जानेकी प्रार्थना :—
पण्डित कहे,—“प्रभु याइ' करुन विश्राम।
मुइ, एबे प्रसाद लइमु करि' समाधान॥142॥
श्रीगोविन्दके सङ्गी महाप्रभुके सेवक रामाइ
और रघुनाथभट्टके द्वारा उस भोगको बनानेके
पश्चात् महाप्रभुके प्रसादकी प्राप्ति :—
रसुइर कार्य करियाछे रामाइ, रघुनाथ।
इँहा-सबाय दिते चाहि किछु व्यञ्जन-भात॥”143॥
अनुवाद—श्रीजगदानन्द पण्डितने कहा,—“हे महाप्रभो!
आप जाकर विश्राम कीजिये, मैं सब कार्य निपटाकर
प्रसाद पा लूँगा। रसोईका कार्य रामाइ और रघुनाथने
किया है, मैं पहले इन्हें खानेके लिये कुछ व्यञ्जन
और चावल आदि देना चाहता हूँ॥”142-143॥
श्रीजगदानन्दके द्वारा किये गये भोजनके विषयमें बतलानेके
लिये श्रीगोविन्दको आदेश देकर महाप्रभुका घर जाना :—
प्रभु कहेन,—“गोविन्द, तुमि इँहाइ रहिबा।
पण्डित भोजन कैले, आमारे कहिबा॥”144॥
अनुवाद—महाप्रभुने श्रीगोविन्दसे कहा,—“तुम यहींपर
रहना। जब जगदानन्द पण्डित भोजन कर ले, तब मुझे
आकर बतलाना॥”144॥
महाप्रभुके सुखमें एकनिष्ठ श्रीजगदानन्दके द्वारा
आत्मेन्द्रिय-प्रीतिवाञ्छा नहीं करके श्रीगोविन्दको
महाप्रभुकी सेवाके लिये भेजना :—
एत कहि' महाप्रभु करिला गमन।
गोविन्देरे पण्डित किछु कहेन वचन॥145॥
“तुमि शीघ्र याह करिते पादसम्वाहने।
कहिह,—'पण्डित एबे बसिल भोजने॥'146॥
महाप्रभुकी निद्राके पश्चात् महाप्रभुके उच्छिष्टके
सम्मानके लिये आनेका अनुरोध :—
तोमार प्रभुर 'शेष' राखिमु धरिया।
प्रभु निद्रा गेले, तुमि खाइह आसिया॥”147॥
अनुवाद—यह कहकर महाप्रभु वहाँसे चले गये।
श्रीजगदानन्द पण्डितने श्रीगोविन्दसे कहा,—“तुम शीघ्र ही
जाकर महाप्रभुके चरण दबाओ। उनके पूछनेपर
कहना,—'जगदानन्द पण्डित अभी-अभी भोजन करनेके
लिये बैठे हैं।' मैं तुम्हारे लिये महाप्रभुका उच्छिष्ट रख
लूँगा, उनके सो जानेपर तुम आकर प्रसाद पा
लेना॥”145-147॥
सभीको प्रसाद बाँटनेके बाद महाप्रभुके
उच्छिष्टका सम्मान :—
रामाइ, नन्दाइ, आर गोविन्द, रघुनाथ।
सबारे बाँटिया दिला प्रभुर व्यञ्जन-भात॥148॥
अनुवाद—श्रीजगदानन्द पण्डितने श्रीरामाइ, श्रीनन्दाइ,
श्रीगोविन्द और श्रीरघुनाथके लिये महाप्रभुके उच्छिष्ट
चावल तथा व्यञ्जन आदिको पत्तोंमें बाँटकर रख
दिया॥148॥
स्वयं महाप्रभुके उच्छिष्टको ग्रहण करना :—
आपने प्रभुर 'शेष' करिला भोजन।
तबे गोविन्देरे प्रभु पाठाइला पुनः॥149॥
भक्तप्रेमके वशीभूत भगवान्‌के द्वारा भी अपने सुखकी
चेष्टा छोड़कर भक्तके सन्तोषका अनुसन्धान :—
“देख,—जगदानन्द प्रसाद पाय कि ना पाय।
शीघ्र आसि' समाचार कहिबे आमाय॥”150॥
अनुवाद—इसके बाद श्रीजगदानन्द पण्डितने स्वयं
भी महाप्रभुके बचे हुए उच्छिष्ट प्रसादको पा लिया।
तभी महाप्रभुने पुनः श्रीगोविन्दको श्रीजगदानन्दके निकट
भेजा और कहा,—“जाकर देखो कि जगदानन्द पण्डित

322 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 12/149-155 ]
प्रसाद पा भी रहा है या नहीं। तुम शीघ्र आकर मुझे
समाचार देना॥"149-150॥
श्रीजगदानन्दके भोजनके पश्चात् महाप्रभुका शयन;
भक्तकी तृप्ति अथवा सन्तुष्टिमें ही महाप्रभुके
द्वारा अपने कार्यके समाधानको समझना और सुख :-
गोविन्द आसि' देखि' कहिल पण्डितेर भोजन।
तबे महाप्रभु करिला स्वच्छन्दे शयन॥ 151 ॥
अनुवाद—श्रीगोविन्दने आकर देखा कि श्रीजगदानन्द
पण्डित भोजन कर रहे हैं और उन्होंने यह बात जाकर
महाप्रभुको बतलायी। तब महाप्रभुने निश्चिन्त होकर
शयन किया॥ 151 ॥
श्रीगौरको वशमें करनेवाले श्रीजगदानन्द और
महाप्रभुके प्रेमके साथ द्वापरमें सत्यभामा
और वासुदेवके प्रेमकी उपमा :-
जगदानन्दे-प्रभुते प्रेम चले एइमते।
सत्यभामा-कृष्णे यैछे शुनि भागवते॥ 152 ॥
अनुवाद—श्रीजगदानन्द पण्डित और महाप्रभुमें प्रेम
इस प्रकार ही चलता है जैसे भागवतमें सत्यभामा और
श्रीकृष्णके विषयमें सुना जाता है॥ 152 ॥
जगदानन्देर सौभाग्येर के कहिबे सीमा?
जगदानन्देर सौभाग्येर तँह से उपमा॥ 153 ॥
अनुवाद—श्रीजगदानन्द पण्डितके सौभाग्यकी सीमाको
कौन जान सकता है? श्रीजगदानन्द पण्डितके सौभाग्यकी
उपमा वे स्वयं ही हैं॥ 153 ॥
श्रीजगदानन्दके 'प्रेम-विवर्त्त'को सुननेसे
श्रीगौरकृष्णके प्रति प्रेमका उदय :-
जगदानन्देर 'प्रेमविवर्त्त' सुने येइ जन।
प्रेमेर 'स्वरूप' जाने, पाय प्रेमधन॥ 154 ॥
अनुवाद—श्रीजगदानन्द पण्डितके प्रेमविवर्त्तके विषयमें
अथवा उनके द्वारा रचित 'प्रेमविवर्त्त' नामक ग्रन्थका जो
कोई श्रवण करता है, वह प्रेमके स्वरूपको जान पाता
है और उसे प्रेमधनकी प्राप्ति होती है॥ 154 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—'प्रेमविवर्त्त',—इसका एक अर्थ
यह है कि प्रेमका 'विवर्त्त' अर्थात् प्रेमकार्यमें रोषका भ्रम
होना—ऐसा व्यवहार; दूसरा अर्थ यह है कि श्रीजगदानन्दने
महाप्रभुके चरित्रसे सम्बन्धित जो स्वरचित 'प्रेमविवर्त्त'-नामक
ग्रन्थ लिखा है, वह॥ 154 ॥
बारहवें अध्यायका अमृतप्रवाह भाष्य समाप्त।
श्रीरूप-रघुनाथ-पदे यार आश।
चैतन्यचरितामृत कहे कृष्णदास॥ 155 ॥
इति श्रीचैतन्यचरितामृते अन्त्यखण्डे जगदानन्द-तैल-भञ्जनं
नाम द्वादशः परिच्छेदः।
अनुवाद—श्रीरूप-रघुनाथ गोस्वामीके चरणकमलोंकी
कृपाभिलाषा करते हुए कृष्णदास इस श्रीचैतन्यचरितामृतका
वर्णन कर रहा है॥ 155 ॥
श्रीचैतन्यचरितामृतके अन्त्यखण्डमें जगदानन्द-तेल-भञ्जन
नाम बारहवें अध्यायका अनुवाद समाप्त।

तेरहवाँ अध्याय
कथासार—महाप्रभुके द्वारा केलेके तनेकी छालपर
शयन करनेसे उन्हें बड़ा कष्ट होता होगा, ऐसा
सोचकर श्रीजगदानन्दने तुलाई-तकिया आदि तैयार
करवाया, किन्तु महाप्रभुने उसे स्वीकार नहीं किया।
श्रीस्वरूप गोस्वामीने केलेके वृक्षकी छालको चीर-चीरकर
उसे तुलाई-तकियेकी भाँति तैयार कर दिया, महाप्रभुने
उसके लिये भी बहुत आपत्ति की, किन्तु अन्तमें उसे
स्वीकार कर लिया। श्रीजगदानन्दने महाप्रभुकी आज्ञा
लेकर वृन्दावन जाकर श्रीसनातनके साथ बहुत प्रकारसे
भक्तिका आस्वादन किया। उन्होंने मुकुन्द सरस्वतीके
बहिर्वासके सम्बन्धमें आचार्य-अभिमानरूपी परम उपाय
निर्धारित किया था। श्रीजगदानन्दके द्वारा सनातनकी
भेंटको महाप्रभुको देनेपर उसके द्वारा पीलूके फलको
खानेका रहस्य प्रकट हुआ। देवदासीके गानको सुनकर
महाप्रभु काँटोंकी मेड़को तोड़कर, गायक कोई स्त्री है,
इसे नहीं जानकर उसकी ओर दौड़ रहे थे। श्रीगोविन्दके
द्वारा रोके जानेपर, उन्होंने 'स्त्री' नाम सुनकर श्रीगोविन्दको
धन्यवाद दिया। संन्यासी अथवा वैष्णवके लिये परस्त्रीके
मुखसे कृष्णगीतका साक्षात् श्रवण करना अनुचित
है,—यह इस आख्यायिकामें (शिक्षाप्रद कथामें) मिलता
है। श्रीरघुनाथ भट्ट गोस्वामीको काशीसे श्रीपुरुषोत्तममें
आनेके समय मार्गमें कायस्थ रामदास-विश्वास-पण्डितका
सङ्ग प्राप्त हुआ था। विश्वास-पण्डितके हृदयमें विद्याका
गर्व होनेके कारण मुक्तिकी अभिलाषा रहनेपर महाप्रभुने
उसपर विशेष कृपा नहीं की। भट्टगोस्वामीकी आंशिक
जीवनी इस अध्यायके अन्तमें संक्षेपमें कही गयी है।
—(अमृतप्रवाह भाष्य)
श्रीकृष्णविरहमें कृश (दुबले) किन्तु भावके कारण
प्रफुल्लित महाप्रभुका आश्रय ग्रहण :-
कृष्णविच्छेदजातात्र्या क्षीणे चापि मनस्तनू।
दधाते फुल्लतां भावैर्यस्य तं गौरमाश्रये ॥ १॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ १ ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—कृष्णवियोगसे उत्पन्न आर्त्तिके
कारण मन और शरीरके दुर्बल होनेपर भी [सात्त्विकादि]
भावोदयके समय जो प्रफुल्लताको धारण करते थे, मैं
उन श्रीगौरचन्द्रका आश्रय ग्रहण करता हूँ ॥ १ ॥
अनुभाष्य—
यस्य (चैतन्यदेवस्य) मनः तनूः कृष्णविच्छेदजातात्र्या
(कृष्णविरहजनितपीड़या) क्षीणे अपि च भावैः (सात्त्विकादिभिः)
क्वचित् फुल्लतां (स्फीततां) दधाते (धारयतः), तं गौरम्
[अहम्] आश्रये (शरणं प्रपद्ये)।
श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ १ ॥
जय जय श्रीचैतन्य जय नित्यानन्द।
जयाद्वैतचन्द्र जय गौरभक्तवृन्द ॥ २ ॥
अनुवाद—श्रीचैतन्य महाप्रभुकी जय हो, जय हो।
श्रीनित्यानन्द प्रभुकी जय हो। श्रीअद्वैतचन्द्रकी जय हो।
समस्त गौर भक्तोंकी जय हो ॥ २ ॥
हेनमते महाप्रभु जगदानन्द-सङ्गे।
नानामते आस्वादय प्रेमेर तरङ्गे ॥ ३ ॥
अनुवाद—इस प्रकार महाप्रभु श्रीजगदानन्द पण्डितके
साथ अनेक भावोंसे प्रेमकी तरङ्गोंका आस्वादन करते
थे॥ ३॥
उक्त श्लोकका अर्थ :-
कृष्णविच्छेदे दुःखे क्षीण मन-काय।
भावावेशे प्रभु कभु प्रफुल्लित हय ॥ ४ ॥
अनुवाद—श्रीकृष्ण-विरहरूपी दुःखमें महाप्रभुका मन
क्लान्त और उनका शरीर क्षीण हो गया था। किन्तु
जब कभी उनमें भावका आवेश आता तो वे प्रफुल्लित
हो जाते थे ॥ ४ ॥

324 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 13/5-13 ]
महाप्रभुका कठोर वैराग्य :-
कलार शरलाते शयन, अति क्षीण काय।
शरलाते हाड़ लागे, व्यथा हय गाय॥ 5 ॥
अनुवाद—महाप्रभु भूमिपर केलेके तनेकी छालके
ऊपर सोते थे, इसलिये उनकी शय्या बहुत कठोर थी।
उनकी देहके अत्यन्त क्षीण होनेके कारण उनकी
हड्डियाँ उस छालपर लगती थी, जिसके फलस्वरूप
उनके शरीरमें पीड़ा होती थी॥ 5 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—'कलार शरलाते',—केलेके तनेकी
छालपर॥ 5 ॥
इसे देखकर महाप्रभुके सुखमें तत्पर भक्तोंको कष्ट;
श्रीजगदानन्दके द्वारा महाप्रभुके सुख विधानकी चेष्टा :-
देखि' सब भक्तगण महादुःख पाय।
सहिते नारे जगदानन्द, सृजिला उपाय॥ 6 ॥
महाप्रभुके लिये गेरुए रङ्गके कपड़ेसे
गद्दा और तकिया प्रस्तुत :-
सूक्ष्म वस्त्र आनि' गेरि दिया राङ्गाइला।
शिमुलीर तुला दिया ताहा पूराइला॥ 7 ॥
महाप्रभुके व्यवहारमें लानेके लिये श्रीगोविन्दसे अनुरोध :-
एक तुलि-बालिश गोविन्देर हाते दिला।
'प्रभुरे शोयाइह इहाय'—ताहारे कहिला॥ 8 ॥
अनुवाद—महाप्रभुको पीड़ामें देखकर सभी भक्त
अत्यन्त दुःखी होते। श्रीजगदानन्द पण्डित इस बातको
सहन नहीं कर पाये, इसलिये उन्होंने एक उपाय
निकाला। उन्होंने एक महीन वस्त्र लाकर उसे गेरुए
रङ्गमें रङ्ग दिया और फिर उसे सेमलकी रुईसे भर
दिया। उन्होंने एक तुलाई और एक तकिया श्रीगोविन्दके
हाथमें दिया और कहा,—“आप महाप्रभुको इसपर ही
सुलाना॥” 6-8 ॥
अनुभाष्य—'तुलि',—रुईका गद्दा॥ 8 ॥
श्रीस्वरूपसे भी अनुरोध :-
स्वरूप-गोसाञिके कहे जगदानन्द।
“आजि आपने याञा प्रभुरे कराइह शयन॥” 9 ॥
अनुवाद—श्रीजगदानन्द पण्डितने श्रीस्वरूप दामोदर
गोस्वामीसे भी कहा,—“आज आप स्वयं जाकर महाप्रभुको
शयन कराना॥” 9 ॥
श्रीस्वरूप और श्रीगोविन्दके द्वारा गद्दे और तकियेके द्वारा
शय्याकी रचना, उसे देखकर महाप्रभुका क्रोध :-
शयनेर काले स्वरूप ताँहाइ रहिला।
तुलि-बालिश देखि' प्रभु क्रोधाविष्ट हइला॥ 10 ॥
महाप्रभुके द्वारा उसे बनानेवालेके नामके विषयमें पूछना;
श्रीजगदानन्दका नाम श्रवण करके महाप्रभुका भय :-
गोविन्देरे पुछेन,—“इहा कराइल कोन् जन?”
जगदानन्देर नाम शुनि' सङ्कोच हैल मन॥ 11 ॥
तत्क्षणात् उस शय्याको दूर हटाना
और केलेके पत्तेपर शयन :-
गोविन्देरे कहि' सेइ तुलि दूर कैला।
कलार शरला-उपर शयन करिला॥ 12 ॥
अनुवाद—महाप्रभुके शयनके समय श्रीस्वरूप दामोदर
वहींपर रहे। तुलाई और तकियेको देखकर महाप्रभुने
क्रोधित होकर श्रीगोविन्दसे पूछा,—“इसे किसने बनवाया
है?” जब महाप्रभुने श्रीगोविन्दके मुखसे श्रीजगदानन्द
पण्डितका नाम सुना तो उनके मनमें सङ्कोच हुआ।
उन्होंने श्रीगोविन्दको कहकर उस तुलाईको वहाँसे
हटवाया और फिर केलेके तनेकी छालके ऊपर ही
शयन किया॥ 10-12 ॥
श्रीस्वरूपके द्वारा श्रीजगदानन्दके दुःखी
होनेकी सम्भावनाके विषयमें बतलाना :-
स्वरूप कहे,—“तोमार इच्छा, कि कहिते पारि?
शय्या उपेक्षिले पण्डित दुःख पाबे भारी॥” 13 ॥
अनुवाद—श्रीस्वरूप दामोदरने महाप्रभुसे
कहा,—“आपकी जैसी इच्छा, मैं क्या कह सकता हूँ?
किन्तु शय्याकी उपेक्षा करनेसे जगदानन्द पण्डितको
बहुत दुःख होगा॥” 13 ॥

[ 13/14-22 तेरहवाँ अध्याय 325
स्वयंको विरक्त संन्यासीके अभिमानसे महाप्रभुके
द्वारा कृत्रिम क्रोध करते हुए अभियोग :-
प्रभु कहेन, - “खाट एक आनह पाड़िते।
जगदानन्द चाहे आमाय विषय भुञाइते ॥ 14 ॥
संन्यासी मानुष आमार भूमिते शयन।
आमारे खाट-तुलि-बालिश-मस्तक मुण्डन!!” 15 ॥
अनुवाद-महाप्रभुने कहा, - “अब एक खाट भी
और ले आओ। जगदानन्द तो मुझे विषयोंका भोग
कराना चाहता है। मैं संन्यासी हूँ और मुझे भूमिपर ही
शयन करना चाहिये। मेरे लिये खाट-गद्दा-तकिया
प्रयोग करना लज्जाकी बात है!” 14-15 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य- 'मस्तक-मुण्डन', - लज्जित
करवानेकी बात ॥ 15 ॥
श्रीस्वरूपके द्वारा श्रीजगदानन्दको महाप्रभुके
वचन बतलाना, श्रीजगदानन्दको कष्ट :-
स्वरूप-गोसाञि आसि' पण्डिते कहिला।
शुनि' जगदानन्द मने महादुःख पाइला ॥ 16 ॥
अनुवाद-श्रीस्वरूप दामोदर गोस्वामीने आकर यह
बात श्रीजगदानन्द पण्डितको बतलायी। इसे सुनकर
श्रीजगदानन्द पण्डितके मनमें बहुत दुःख हुआ ॥ 16 ॥
सेवामें चतुर श्रीस्वरूपके द्वारा महाप्रभुकी
सेवाके लिये शय्या-द्रव्यका निर्माण :-
स्वरूप-गोसाञि तबे सृजिला प्रकार।
कदलीर शुष्कपत्र आनिला अपार ॥ 17 ॥
नखे चिरि' चिरि' ताहा अति सूक्ष्म कैला।
प्रभुर बहिर्वासेते से-सब भरिला ॥ 18 ॥
बहुत कठिनाईसे महाप्रभुके द्वारा उसे
ग्रहण करनेके लिये सम्मति-प्रदान :-
एइमत दुइ कैला ओड़न-पाड़ने।
अङ्गीकार कैला प्रभु अनेक यतने ॥ 19 ॥
अनुवाद-तब श्रीस्वरूप दामोदर गोस्वामीने एक
अन्य उपाय किया। वे केलेके बहुतसे सूखे पत्ते ले
आये। उन्होंने उन सूखे पत्तोंको अपने नाखूनोंसे
चीर-चीर कर बहुत सूक्ष्म कर दिया और फिर उन्हें
महाप्रभुके दो बहिर्वासमें भर लिया। इस प्रकार उन्होंने
दोनों बहिर्वासमें भरे हुए केलेके पत्तोंको हिला-डुलाकर
ऐसा कर दिया कि उनका एक तकिये और एक
गद्देका आकार बन गया। भक्तोंके द्वारा बहुत आग्रह
करनेपर ही महाप्रभुने उसे स्वीकार किया ॥ 17-19 ॥
अनुभाष्य- 'ओड़न-पाड़न', - ओत-प्रोत; किसी-किसीके
मतानुसार, - तकिया और गद्दा ॥ 19 ॥
महाप्रभुके शयनसे सभी सुखी,
केवलमात्र श्रीजगदानन्दको दुःख :-
ताते शयन करेन प्रभु, - देखि' सबे सुखी।
जगदानन्द-भितर-बाहिरे महादुःखी ॥ 20 ॥
अनुवाद-महाप्रभुको उस गद्देपर शयन करते देख
सब भक्त आनन्दित हुए। एकमात्र श्रीजगदानन्द पण्डित
ही भीतर-बाहरसे बहुत दुःखी थे ॥ 20 ॥
श्रीजगदानन्दकी वृन्दावन जानेकी इच्छा; पहलेसे
ही यह इच्छा रहनेपर भी महाप्रभुके
आदेशके बिना जानेमें असमर्थता :-
पूर्वे जगदानन्देर इच्छा वृन्दावन याइते।
प्रभु आज्ञा ना देन ताँरे, ना पारे चलिते ॥ 21 ॥
अब महाप्रभुके शयन-कार्यमें दुःखी होकर मथुरा
जानेके लिये महाप्रभुकी आज्ञाकी याचना :-
भितरेर दुःख बाह्ये प्रकाश ना कैला।
मथुरा याइते प्रभु-स्थाने आज्ञा मागिला ॥ 22 ॥
अनुवाद-श्रीजगदानन्द पण्डितकी पहले भी वृन्दावन
जानेकी इच्छा थी, किन्तु महाप्रभुने उन्हें जानेकी
अनुमति नहीं दी, इसलिये वे वृन्दावनके लिये नहीं जा
पाये। अब उन्होंने अपने भीतरके दुःखको बाहर
प्रकाशित नहीं किया और महाप्रभुसे मथुरा जानेके लिये
अनुमति माँगी ॥ 21-22 ॥

326 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 13/23-32 ]
महाप्रभुके द्वारा मधुर वचनोंसे सान्त्वना :-
प्रभु कहे,–‘मथुरा याइबा आमाय क्रोध करि’।
आमाय दोष लागाञा हइबा भिखारी ॥”23 ॥
अनुवाद—महाप्रभुने कहा, –“तुम मेरे प्रति क्रोध
करके मथुरा जाओगे, तो मुझपर दोष मढ़कर तुम
भिखारी बनोगे ॥”23 ॥
वाम्यस्वभाव होनेपर भी महाप्रभुके चरणोंमें
श्रीजगदानन्दके द्वारा सम्भ्रमपूर्वक कातर-निवेदन :-
जगदानन्द कहे प्रभुर धरिया चरण।
“पूर्व हइते इच्छा मोर याइते वृन्दावन ॥ 24॥
प्रभु-आज्ञा नाहि, ताते ना पारि याइते।
एबे आज्ञा देह', अवश्य याइमु निश्चिते ॥”25॥
अनुवाद—श्रीजगदानन्द पण्डित महाप्रभुके चरणकमलोंको
पकड़कर कहने लगे, – “मेरी पहलेसे ही वृन्दावन
जानेकी इच्छा थी। हे प्रभो! मुझे आपकी अनुमति नहीं
मिली, इसलिये मैं नहीं जा पाया। किन्तु अब आप
मुझे अनुमति प्रदान कीजिये, मैं अवश्य ही वहाँ
जाऊँगा ॥”24-25॥
भक्तवत्सल महाप्रभुके द्वारा निषेध, श्रीजगदानन्दका हठ :-
प्रभु प्रीते ताँर गमन ना करेन अङ्गीकार।
तेँहो प्रभुर ठाञि आज्ञा मागे बार बार॥ 26 ॥
अनुवाद—यद्यपि महाप्रभुने श्रीजगदानन्द पण्डितके
प्रति प्रीति होनेके कारण उनकी वृन्दावन जानेकी
बातको स्वीकार नहीं किया, तथापि श्रीजगदानन्द पण्डित
महाप्रभुसे बारम्बार जानेकी अनुमति माँगते रहे ॥ 26 ॥
श्रीस्वरूपसे श्रीजगदानन्दका निवेदन, महाप्रभुकी
श्रीजगदानन्दके जानेके विषयमें असहमति :-
स्वरूप-गोसाञिरे पण्डित कैला निवेदन।
“पूर्व हैते वृन्दावन याइते मोर मन ॥ 27 ॥
प्रभु-आज्ञा बिना ताँहा याइते ना पारि।
एबे आज्ञा ना देन मोरे, ‘क्रोधे याह’ बलि’॥ 28॥
अपने जानेके विषयमें महाप्रभुकी सम्मति
लेनेके लिये श्रीस्वरूपसे अनुरोध :-
सहजेइ मोर ताँहा याइते मन हय।
प्रभु-आज्ञा लञा देह', करिये विनय ॥”29 ॥
अनुवाद—श्रीजगदानन्द पण्डितने श्रीस्वरूप दामोदर
गोस्वामीसे निवेदन किया, –“मेरी बहुत पहलेसे ही
वृन्दावन जानेकी इच्छा थी, किन्तु मैं महाप्रभुकी
अनुमतिके बिना वृन्दावन नहीं जा सकता। अब
महाप्रभु मुझे यह कहकर अनुमति नहीं दे रहे कि ‘तुम
क्रोध करके जा रहे हो।’ मेरी वृन्दावन जानेकी
स्वाभाविक इच्छा है, इसलिये आप महाप्रभुसे विनती
करके मुझे जानेकी अनुमति दिलवाइये ॥”27-29॥
अनुभाष्य— ‘ ‘क्रोधे याह’ बलि’,—‘क्रोधित होकर
जा रहे हों’—ऐसा कहा ॥ 28 ॥
श्रीस्वरूपके द्वारा उसके लिये महाप्रभुके
चरणोंमें निवेदन और आज्ञाकी याचना :-
तबे स्वरूप गोसाञि कहे प्रभुर चरणे।
“जगदानन्देर इच्छा बड़ याइते वृन्दावने ॥ 30॥
तोमार ठाञि आज्ञा तेँहो मागे बार बार।
आज्ञा देह',—मथुरा देखि' आइसे एकबार ॥ 31 ॥
आइरे देखिते यैछे गौड़देशे याय।
तैछे एकबार वृन्दावन देखि' आय ॥”32 ॥
अनुवाद—तब श्रीस्वरूप दामोदर गोस्वामीने महाप्रभुके
चरणकमलोंमें निवेदन करते हुए कहा, –“जगदानन्दकी
वृन्दावन जानेकी बहुत इच्छा है। उन्होंने आपसे बार
बार वृन्दावन जानेकी अनुमति माँगी है, कृपया आप
उन्हें एकबार मथुराको देखकर आनेकी अनुमति दे

[ 13/30-38 तेरहवाँ अध्याय 327
दीजिये। वे जैसे गौड़देशमें आइके (श्रीशचीमाताके)
दर्शनके लिये जाते हैं, उसी प्रकार एक बार उन्हें
वृन्दावन देखकर भी आने दीजिये॥”30-32॥
श्रीस्वरूपके अनुरोधपर श्रीजगदानन्दको बुलाकर वहाँपर
जाकर करने योग्य कर्त्तव्यका उपदेश :—
स्वरूप-गोसाञिर बोले प्रभु आज्ञा दिला।
जगदानन्दे बोलाञा ताँरे शिखाइला॥ 33॥
मार्गके विषयमें उपदेश-प्रदान :—
“वाराणसी पर्यन्त स्वच्छन्दे याइबा पथे।
आगे सावधाने याइबा क्षत्रियादि-साथै॥ 34॥
अनुवाद—महाप्रभुने श्रीस्वरूप दामोदर गोस्वामीके
कहनेपर श्रीजगदानन्द पण्डितको वृन्दावन जानेकी अनुमति
दे दी। उन्होंने श्रीजगदानन्द पण्डितको बुलाकर उन्हें
समझाते हुए कहा,—“तुम्हें वाराणसी तकके मार्गमें कोई
असुविधा नहीं होगी, किन्तु उससे आगे सावधानीपूर्वक
किसी क्षत्रिय आदिके साथ ही जाना॥ 33-34॥
अनुभाष्य—‘क्षत्रियादि-साथै’,—डाकुओंसे रक्षा करनेवाले
क्षत्रियोंके साथमें॥ 34॥
केवल गौड़ीया पाइले 'बाटपाड़' करि' बान्धे।
सब लुटि' बाँधि' राखे, याइते विरोधे॥ 35॥
अनुवाद—गौड़ीयाको अकेले पाकर डाकू उन्हें बाँध
लेते हैं। उनको लूटकर उन्हें बाँधकर रखते हैं और
उन्हें कहीं जाने नहीं देते॥ 35॥
अनुभाष्य—गौड़ीया अर्थात् गौड़ अथवा बङ्गदेशके
मनुष्य—स्वाभाविक रूपमें पतले और दुर्बल दिखते हैं।
अकेले मिलनेपर निसहाय दुर्बल व्यक्तियोंको बाटपाड़
अर्थात् मार्गमें लूटनेवाले डाकू बाँधकर रख लेते हैं
और उनका समस्त धन ले लेते हैं एवं जानेके विषयमें
विरोध करते हैं अर्थात् जाने नहीं देते। किसी-किसीके
मतानुसार—गौड़ीयोंको 'सुचतुर' देखकर उनसे डाकूका
कार्य करवाते हैं और डाकूके कार्यमें नियुक्त करके
उन्हें कभी भी छोड़ते नहीं हैं॥ 35॥
मथुरा पहुँचनेपर कर्त्तव्यका उपदेश; ऐश्वर्य-ज्ञानहीन
रागमार्गके भक्तोंके साथ सङ्गके विषयमें सतर्क करना :—
मथुरा गेले सनातन-सङ्गे रहिबा।
मथुरार स्वामी-सबेर चरण वन्दिबा॥ 36॥
अनुवाद—तुम मथुरा पहुँचकर सनातनके सङ्गमें
रहना और मथुरावासी चौबे अर्थात् चतुर्वेदी ब्राह्मणोंके
चरणोंकी वन्दना करना॥ 36॥
अमृतप्रवाह भाष्य—'मथुरार स्वामी-सबेर',—मथुरावासी
चौबे लोगोंके॥ 36॥
दूरे रहिं' भक्ति करि' सङ्गे ना रहिबा।
ताँ-सबार आचार-चेष्टा लइते नारिबा॥ 37॥
अनुवाद—तुम उन चतुर्वेदी ब्राह्मणोंसे दूर रहकर
ही उनकी सेवा करना, उनके सङ्गमें मत रहना। तुम
उनके आचरण और क्रियाओंको ग्रहण नहीं कर
पाओगे॥ 37॥
अमृतप्रवाह भाष्य—कृष्णके प्रति शुद्धवात्सल्यभावसे
वे जो आचरण करते हैं, वह—स्मार्त्तमतके विरुद्ध है;
इसे देखकर (ऐश्वर्यभावमें रत) तुम्हारे मनमें अश्रद्धा
हो सकती है। किन्तु ब्रजमण्डलवासियोंके प्रति ऐसी
अश्रद्धा नहीं होनी चाहिये; क्योंकि, उनकी भक्ति
रागात्मिका है। अतएव (तुम्हारे जैसे ऐश्वर्यभावप्रिय
भक्तको उन रागमार्गीय लोगोंके साथमें नहीं रहकर) दूर
रहकर ही उनके प्रति भक्ति करना उचित है॥ 37॥
सदा श्रीसनातनके सङ्गमें रहनेका उपदेश :—
सनातन-सङ्गे करिह वन दरशन।
सनातनेर सङ्ग ना छाड़िबा एकक्षण॥ 38॥
अनुवाद—तुम सनातनके साथ जाकर ब्रजमण्डलके