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सर्वकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 2319

302 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 11/101-104 ]
क्षेत्रमें तोटा-गोपीनाथसे समुद्रके तटपर जानेपर समुद्रके
ऊपर ही ठाकुर श्रीहरिदासकी समाधि अभी भी विद्यमान
है। प्रत्येक वर्ष 'अनन्तचतुर्दशी'के दिन ठाकुर श्रीहरिदासका
विजयोत्सव होता है ॥ 101 ॥
ग्यारहवें अध्यायका अमृतप्रवाह भाष्य समाप्त।
भक्त-वाञ्छाको पूर्ण करनेवाले
भक्तवत्सल श्रीगौर-भगवान् :-
चैतन्येर भक्तवात्सल्य इहातेइ जानि।
भक्तवाञ्छा पूर्ण कैला न्यासी-शिरोमणि ॥ 102 ॥
अनुवाद—श्रीहरिदासके निर्याण और महाप्रभुके द्वारा
उन्हें समाधि एवं उनके विजयोत्सवको मनानेकी घटनासे
ही श्रीचैतन्य महाप्रभुका भक्त-वात्सल्य जाना जा सकता
है। महाप्रभुने संन्यासी-शिरोमणि होनेपर भी अपने भक्त
श्रीहरिदास ठाकुरकी इच्छाको पूर्ण किया ॥ 102 ॥
गोलोक-गमनकालमें श्रीहरिदासको साक्षात् कृपा दान :-
शेषकाले दिला ताँरे दर्शन-स्पर्शन।
ताँरे कोले करि' कैला आपने नर्त्तन ॥ 103 ॥
अनुवाद—महाप्रभुने श्रीहरिदास ठाकुरके अन्तिम
समयमें उन्हें अपना दर्शन और स्पर्श प्रदान किया एवं
उनके दिव्य कलेवरको अपनी गोदमें लेकर नृत्य
किया ॥ 103 ॥
आपने श्रीहस्ते कृपाय ताँरे बालु दिला।
आपने प्रसाद मागि' महोत्सव कैला ॥ 104 ॥
अनुवाद—महाप्रभुने कृपा करके अपने हाथोंसे
श्रीहरिदास ठाकुरके दिव्य कलेवरको बालूसे ढक दिया
और उन्होंने स्वयं ही प्रसाद भिक्षा माँगकर श्रीहरिदास
ठाकुरका विरह-महोत्सव आयोजित किया ॥ 104 ॥
अनुभाष्य—श्रीहरिदास ठाकुरके समाधि-क्षेत्रमें लगभग
एक सौ वर्ष पूर्व श्रीगौर, नित्यानन्द और अद्वैताचार्य-इन
तीनों विग्रहोंकी सेवा स्थापित हुई है। केन्द्रापाड़ाके
'भ्रमरधर' नामक एक उत्कलवासी भक्तकी वित्त सहायतासे
पुरीके स्वर्गद्वारमें स्थायी श्रीमन्दिर बना। यहाँकी
सेवा-तोटा-गोपीनाथके सेवायत गोस्वामियोंकी देखरेखमें
थी। किन्तु अब यह सम्पत्ति बिककर अन्योंके हाथोंमें
चली गयी है और वे ही सेवा चला रहे हैं। श्रीहरिदास
ठाकुरकी समाधि स्थलीके निकट ही श्रीमद्भक्तिविनोद
ठाकुरने अपनी भजन-स्थली 'भक्तिकुटी'का निर्माण
किया। बङ्गाब्द 1329 सालमें इस भक्तिकुटीमें श्रीपुरुषोत्तम
मठ संस्थापित हुआ है। भक्तिरत्नाकरकी तृतीय तरङ्गमें
वर्णन आता है—
“श्रीनिवास शीघ्र समुद्रेर कूले गेला।
हरिदास-ठाकुरेर समाधि देखिला ॥
भूमिते पडिया कैला प्रणति विस्तर।
भागवतगण श्रीसमाधि-सन्निधाने।
श्रीनिवासे स्थिर कैला सस्नेह-वचने ॥
पुनः श्रीनिवास श्रीसमाधि प्रणमिया।
ये विलाप कैला, ता शुनिते द्रवे हिया॥”
[अर्थात् “श्रीनिवासाचार्य जगन्नाथ पुरीमें आकर
शीघ्रतासे समुद्रके तटपर गये। वहाँ उन्होंने
श्रीहरिदास-ठाकुरकी समाधिके दर्शन किये और भूमिपर
गिरकर बहुत देर तक प्रणाम किया। श्रीसमाधिके
निकट जितने भक्तगण थे, उन्होंने अत्यन्त स्नेहपूर्ण
वचनोंके द्वारा श्रीनिवासाचार्यको शान्त किया।