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सर्वकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 2323

306 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 12/4-14 ]
होनेके कारण महाप्रभुका हृदय अत्यन्त दुःखी रहता था
और वे यह कहकर विलाप करते, — “हा हा कृष्ण! हे
प्राणनाथ! हे व्रजेन्द्रनन्दन! मैं कहाँ जाऊँ? कहाँ
जानेसे हे मुरलीवदन आप मिलेंगे!”4-5 ॥
दिन-रात श्रीकृष्णविरहकी ज्वाला :-
रात्रिदिन एइ दशा, स्वस्ति नाहि मने।
कष्टे रात्रि गोङाय स्वरूप-रामानन्द-सने॥ 6 ॥
अनुवाद—महाप्रभु रात-दिन इसी दशामें रहते।
मनमें कभी शान्ति नहीं होनेपर वे श्रीस्वरूप दामोदर
और श्रीरामानन्द रायके साथ अत्यन्त कष्टमें रात्रि
व्यतीत करते॥ 6 ॥
अनुभाष्य—पाठान्तरमें,—'स्वास्थ्य नाहि माने' (अर्थात्
मनमें शान्ति नहीं थी अथवा मनमें दुःखका अभाव
नहीं था)॥ 6 ॥
प्रत्येक वर्षकी भाँति गौड़ीयभक्तोंका महाप्रभुके
दर्शनके लिये पुरीमें आनेका प्रयास :-
एथा गौड़देशे प्रभुर यत भक्तगण।
प्रभु देखिबारे सबे करिला गमन॥ 7 ॥
अनुवाद—इधर गौड़देशमें महाप्रभुके जितने भक्त थे,
वे सभी महाप्रभुके दर्शनोंके लिये चल पड़े॥ 7 ॥
सभी भक्तोंका नवद्वीपमें आगमन :-
शिवानन्द-सेन आर आचार्य-गोसाञि।
नवद्वीपे सब भक्त हैला एकठाञि॥ 8 ॥
अनुवाद—श्रीशिवानन्द सेन और श्रीअद्वैताचार्य गोसाईं
आदि समस्त भक्त श्रीनवद्वीपमें एकत्रित हुए॥ 8 ॥
कुलीनग्रामवासी आर यत खण्डवासी।
एकत्र मिलिला सब नवद्वीपे आसि' ॥ 9 ॥
अनुवाद—कुलीनग्रामवासी और श्रीखण्डवासी सब
भक्त भी नवद्वीपमें आकर एकत्रित हुए॥ 9 ॥
महाप्रभुके द्वारा निषेध किये जानेपर
भी श्रीनित्यानन्दकी यात्रा :-
नित्यानन्द-प्रभुरे यद्यपि आज्ञा नाइ।
तथापि देखिते चलेन चैतन्य-गोसाञि॥ 10 ॥
अनुवाद—यद्यपि महाप्रभुने श्रीनित्यानन्द प्रभुको आनेके
लिये निषेध किया था, तथापि वे श्रीचैतन्य महाप्रभुके
दर्शनके लिये श्रीजगन्नाथ पुरीकी ओर चल पड़े॥ 10 ॥
अनुभाष्य—अन्त्यलीला 10/5-8 संख्या देखें॥ 10 ॥
सपरिवार गृहस्थ गौरभक्तोंके द्वारा यात्रा :-
श्रीवासादि चारि भाइ, सङ्गेते मालिनी।
आचार्यरत्नेर सङ्गे ताँहार गृहिणी॥ 11 ॥
अनुवाद—श्रीवास पण्डितादि चारों भाई और उनके
साथमें श्रीवास पण्डितकी पत्नी श्रीमालिनी देवी भी
जगन्नाथ पुरीकी ओर चले। इसी प्रकार श्रीआचार्यरत्न
भी अपनी पत्नीके साथ आये॥ 11 ॥
शिवानन्द-पत्नी चले तिन-पुत्र लञा।
राघवपण्डित चले झालि साजाञा॥ 12 ॥
अनुवाद—श्रीशिवानन्द सेनकी पत्नी भी अपने
तीनों पुत्रोंको साथमें लेकर चल दीं। श्रीराघव पण्डित
अपनी झोलीको सजाकर चले॥ 12 ॥
दत्त, गुप्त, विद्यानिधि, आर यत जन।
दुइ-तिन शत भक्त करिला गमन॥ 13 ॥
अनुवाद—श्रीवासुदेव दत्त, श्रीमुरारि गुप्त, श्रीपुण्डरीक
विद्यानिधि और अन्य बहुतसे भक्त महाप्रभुसे मिलनेके
लिये चले। कुल मिलाकर दो-तीन सौ भक्त एक साथ
श्रीजगन्नाथपुरीकी ओर चल दिये॥ 13 ॥
शचीमाताको प्रणाम करके कीर्तन
करते हुए सभीके द्वारा यात्रा :-
शचीमाता देखि' सबे ताँर आज्ञा लञा।
आनन्दे चलिला कृष्णकीर्त्तन करिया॥ 14 ॥