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सर्वकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 2308, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 2308

ग्यारहवाँ अध्याय
कथासार—इस अध्यायमें ब्रह्म-श्रीहरिदासठाकुरके
द्वारा महाप्रभुकी आज्ञा प्राप्त करके देहत्याग करनेपर
महाप्रभुने उन्हें विशेष भक्ति और समारोहके साथ ले
जाकर समुद्रके तटपर समाधि प्रदान की। अपने हाथोंसे
बालू देकर चबूतरा बना दिया, बादमें समुद्र स्नान
करके स्वयं भिक्षा करके श्रीहरिदासका विजय महोत्सव
किया।
—(अमृतप्रवाह भाष्य)
गोदमें श्रीहरिदासकी देहको उठाकर नृत्य
करनेवाले श्रीगौरको प्रणाम :-
नमामि हरिदासं तं चैतन्यं तञ्च तत्प्रभुम्।
संस्थितामपि यन्मूर्त्तिं स्वाङ्के कृत्वा ननर्त्त यः ॥ १ ॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ १ ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—मैं श्रीहरिदासको नमस्कार करता
हूँ और उनके प्रभु उन चैतन्यदेवको नमस्कार करता
हूँ,—जिन्होंने श्रीहरिदासके द्वारा परित्यक्त देहको गोदमें
उठाकर नृत्य किया था ॥ १ ॥
अनुभाष्य—
यः (चैतन्यदेवः) यन्मूर्त्तिं (यस्य हरिदासस्य मूर्त्तिं)
संस्थितां (समाधिप्राप्ताम्) अपि स्वाङ्के (स्वस्य क्रोड़े)
कृत्वा ननर्त्त, तं हरिदासं तत्प्रभुं तं चैतन्यं च नमामि।
श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ १ ॥
जय जय श्रीचैतन्य जय दयामय।
जयाद्वैतप्रिय नित्यानन्दप्रिय जय ॥ २ ॥
अनुवाद—श्रीअद्वैताचार्य प्रभु और श्रीनित्यानन्द प्रभुके
अति प्रिय दयामय श्रीचैतन्य महाप्रभुकी जय हो, जय
हो ॥ २ ॥
जय श्रीनिवासेश्वर हरिदासनाथ।
जय गदाधरप्रिय स्वरूप-प्राणनाथ ॥ ३ ॥
अनुवाद—श्रीनिवास पण्डितके ईश्वर, श्रीहरिदास
ठाकुरके नाथ, श्रीगदाधर पण्डितके प्रिय और श्रीस्वरूप
दामोदरके प्राणनाथ श्रीचैतन्य महाप्रभुकी जय हो ॥ ३ ॥
काशीश्वर-प्रिय जगदानन्द-प्राणेश्वर।
जय रूप-सनातन-रघुनाथेश्वर ॥ ४ ॥
अनुवाद—श्रीकाशीश्वर पण्डितके प्रिय, श्रीजगदानन्द
पण्डितके प्राणेश्वर और श्रीरूप-श्रीसनातन-श्रीरघुनाथदास
गोस्वामीके ईश्वर श्रीचैतन्य महाप्रभुकी जय हो ॥ ४ ॥
जय गौरदेह कृष्ण स्वयं भगवान्।
कृपा करि' देह' प्रभु, निज-पद-दान ॥ ५ ॥
अनुवाद—श्रीगौरदेहधारी स्वयं भगवान् श्रीकृष्णकी
जय हो, हे प्रभो ! कृपा करके अपने श्रीचरणकमलोंका
आश्रय प्रदान कीजिये ॥ ५ ॥
अनुभाष्य—'गौरदेह',-गौरवर्णकान्ति-देहधारी ॥ ५ ॥
नित्यानन्दचन्द्र जय चैतन्येर प्राण।
तोमार चरणारविन्दे भक्ति देह' दान ॥ ६ ॥
अनुवाद—श्रीचैतन्य महाप्रभुके प्राण-स्वरूप
श्रीनित्यानन्दचन्द्रकी जय हो, आप कृपा मुझे अपने
श्रीचरणकमलोंमें भक्ति प्रदान कीजिये ॥ ६ ॥
जय जयाद्वैतचन्द्र चैतन्येर आर्य।
स्वचरणे भक्ति देह' जयाद्वैताचार्य ॥ ७ ॥
अनुवाद—श्रीचैतन्य महाप्रभुके सम्माननीय
श्रीअद्वैतचन्द्रकी जय हो, जय हो। हे श्रीअद्वैताचार्य