श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें292 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 11/7-16 ]
प्रभो ! आप मुझे अपने श्रीचरणकमलोंकी भक्ति प्रदान
कीजिये ॥ 7 ॥
अनुभाष्य- 'चैतन्येर आर्य', - महाप्रभुके द्वारा
सम्माननीय ॥ 7 ॥
जय गौरभक्तगण-गौर याँर प्राण।
सब भक्त मिलि' मोरे भक्ति देह' दान ॥ 8 ॥
अनुवाद-श्रीगौरसुन्दर ही जिनके प्राणस्वरूप हैं,
उन समस्त गौरभक्तोंकी जय हो। आप सभी भक्त कृपा
करके मुझे भक्तिका दान दीजिये ॥ 8 ॥
जय रूप, सनातन, जीव, रघुनाथ।
रघुनाथ, गोपाल, -छय मोर प्राणनाथ ॥ 9 ॥
अनुवाद-मेरे प्राणनाथ श्रीरूप गोस्वामी, श्रीसनातन
गोस्वामी, श्रीजीव गोस्वामी, श्रीरघुनाथदास गोस्वामी, श्रीरघुनाथ
भट्ट गोस्वामी, श्रीगोपाल भट्ट गोस्वामी-इन छह गोस्वामियोंकी
जय हो ॥ 9 ॥
ग्रन्थकारकी दीनतापूर्वक उक्ति, स्वयंको शोधन
करनेके लिये श्रीचैतन्यगुणलीलाका वर्णन :-
ए-सब प्रसादे लिखि चैतन्य-लीला-गुण।
यैछे तैछे लिखि, करि आपन पावन ॥ 10 ॥
अनुवाद-मैं श्रीचैतन्य महाप्रभु और उनके समस्त
भक्तोंकी कृपासे ही श्रीचैतन्य महाप्रभुकी लीलाओं और
उनके गुणोंको लिख रहा हूँ। मैं ठीकसे लिखना भी
नहीं जानता हूँ, केवल स्वयंको पवित्र करनेके लिये
लिख रहा हूँ ॥ 10 ॥
भक्तोंके साथ महाप्रभुका नीलाचलमें कीर्तनविलास :-
एमत महाप्रभुर नीलाचले वास।
सङ्गे भक्तगण लञा कीर्त्तन-विलास ॥ 11 ॥
अनुवाद-इस प्रकार महाप्रभु अपने भक्तोंको साथमें
लेकर कीर्तन-विलास करते हुए श्रीजगन्नाथपुरीमें वास
कर रहे थे ॥ 11 ॥
दिनमें नामसङ्कीर्तन और श्रीजगन्नाथ-दर्शन,
रात्रिमें श्रीस्वरूप-रामानन्दके साथ
श्रीराधाके कृष्णप्रेमका रसास्वादन :-
दिने नृत्य-कीर्त्तन, ईश्वर-दरशन।
रात्र्ये राय-स्वरूप-सने रस-आस्वादन ॥ 12 ॥
अनुवाद-महाप्रभु दिनके समय नृत्य-कीर्तन और
श्रीजगन्नाथदेवके दर्शन करते थे। रात्रिके समय श्रीरामानन्द
और श्रीस्वरूप दामोदरके साथ रसका आस्वादन करते
थे ॥ 12 ॥
श्रीकृष्णविरहमें महाप्रभुकी देहमें सात्त्विकभावोंका उदय :-
एमत महाप्रभुर सुखे काल याय।
कृष्णेर विरह-विकार अङ्गे नाना हय ॥ 13 ॥
अनुवाद-इस प्रकार महाप्रभुका समय सुखपूर्वक
व्यतीत होता था। कृष्णविरहके कारण उनके अङ्गोंमें
अनेक विकार उत्पन्न होते थे ॥ 13 ॥
दिने दिने बाड़े विकार, रात्र्ये अतिशय।
चिन्ता, उद्वेग, प्रलापादि यत शास्त्रे कय ॥ 14 ॥
अनुवाद-दिन-प्रतिदिन महाप्रभुमें कृष्णविरहसे उत्पन्न
शास्त्रोंमें वर्णित चिन्ता, उद्वेग, प्रलापादि विकार वर्धित हो
रहे थे जो रात्रिमें बहुत अधिक बढ़ जाते थे ॥ 14 ॥
अप्राकृत विप्रलम्भ-लीलामें महाप्रभुके दो नित्य सङ्गी :-
स्वरूप गोसाञि, आर रामानन्द राय।
रात्रि-दिने करे दोँहे प्रभुर सहाय ॥ 15 ॥
अनुवाद-श्रीस्वरूप दामोदर और श्रीरामार्नन्द राय-ये
दोनों रात-दिन महाप्रभुके साथ रहकर उनको सान्त्वना
देते ॥ 15 ॥
श्रीहरिदासके वृत्तान्तका वर्णन; श्रीगोविन्दके द्वारा
श्रीहरिदासको प्रसाद देनेके लिये जाना :-
एकदिन गोविन्द महाप्रसाद लञा।
हरिदासे दिते गेला आनन्दित हञा ॥ 16 ॥