सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

[ 10/13-20 दसवाँ अध्याय 273
अनुभाष्य-इसके द्वारा ग्रन्थकारके विचित्र कृष्णनैवेद्य
(भोग) को प्रस्तुत करनेकी निपुणता प्रकाशित हो रही है;
मध्यलीला 14/26-34 और 15/68-91, 207-218 संख्या
देखें ॥ 13 ॥
श्रीराघवकी झोलीका विवरण :-
नाना अपूर्व भक्ष्यद्रव्य प्रभुर योग्य भोग।
वत्सरेक प्रभु याहा करेन उपयोग ॥ 14 ॥
अनुवाद-श्रीदमयन्ती महाप्रभुके भोगके योग्य अनेक
अपूर्व खाद्य सामग्रियाँ बनातीं। महाप्रभु सम्पूर्ण वर्ष उन
खाद्य सामग्रियोंको ग्रहण करते थे ॥ 14 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य- 'उपयोग',—व्यवहार, ग्रहण ॥ 14 ॥
आम्र-काशन्दि, आदा-झाल-काशन्दि नाम।
नेम्बू-आदा-आम्रकलि विविध सन्धान ॥ 15 ॥
आम्सि, आमखण्ड, तैलाम्र, आमसत्ता।
यत्न करि' गुण्डा करि' पुराण सुख्ता ॥ 16 ॥
अनुवाद-उन खाद्य-सामग्रियोंमें कुछ अचार और
चटनी-मसाले थे- 'आम्र-कासुन्दि', 'आदा-कासुन्दि' और
'झाल-कासुन्दि' आदि अचार जो क्रमशः आम, अदरक
और मिर्चको सरसों और नमक आदिमें मिलाकर
बनाये गये थे। उनके झोलेमें नींबू, अदरक और
आमकी कली आदिसे बनी विभिन्न भोजन सामग्रियाँ
थीं। उन भोजन-सामग्रियोंमें आमसि (सूखे हुए आमके
टुकड़े), आम्रखण्ड (आमका खट्टा-मीठा आचार),
तैलाम्र (तेलमें बना आमका आचार) और आमसत्ता
(आम-पापड़) था। श्रीदमयन्तीने सावधानीपूर्वक पीसकर
चूर्ण बनाकर पुराण सुख्ता भेजा ॥ 15-16 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य- 'पुराण सुख्ता', - सुखाया हुआ
कड़वा पाटका साग ॥ 16 ॥
अनुभाष्य- 'तैलाम्र', - सरसोंके तेलमें रक्षित आमका
आचार; 'गुण्डा'- पिसा हुआ चूर्ण ॥ 16 ॥
'सुख्ता' बलि' अवज्ञा ना करिह चित्ते।
सुख्ताय ये सुख हय, नहे पञ्चामृते ॥ 17 ॥
अप्राकृत भावग्राही भगवान् :-
भावग्राही महाप्रभु स्नेहमात्र लय।
सुख्तापाता-काशन्दिते महासुख हय ॥ 18 ॥
अनुवाद-सुख्ताको तुच्छ जानकर अपने चित्तमें
श्रीदमयन्तीके प्रति किसी प्रकारका अनादरका भाव मत
लाना। वास्तवमें सुख्ताको खानेसे जिस सुखकी प्राप्ति
होती है, वह पञ्चामृत (दूध, चीनी, घी, शहद और
दही) खानेसे भी प्राप्त नहीं होती। भावग्राही महाप्रभु
भक्तके स्नेहमात्रको ही ग्रहण करते हैं, उन्हें भक्तके द्वारा
स्नेहपूर्वक अर्पित किये गये सुख्ता-पत्ता और कासुन्दिको
खानेमें महासुख होता है ॥ 17-18 ॥
अनुभाष्य- 'भाव', - अप्राकृत अहैतुकी-कृष्णेन्द्रिय-
तोषण-परायण शुद्धसत्त्वमयी हृदयकी वृत्ति; प्राकृत
सहजियाओंकी स्वसुखपरायण घृणित चित्तवृत्ति नहीं ॥ 18 ॥
श्रीदमयन्तीकी शुद्ध स्वारसिकी अतीव
गाढ़ श्रीगौर-प्रीतिका उदाहरण :-
'मनुष्य'-बुद्धि दमयन्ती करे प्रभुर पाय।
'गुरु-भोजने उदरे कभु 'आम' हञा याय ॥ 19 ॥
सुख्ता पाइले सेइ आम हइबेक नाश।'
सेइ स्नेह मने भावि' प्रभुर उल्लास ॥ 20 ॥
अनुवाद-महाप्रभुके प्रति स्वाभाविक प्रीतिके कारण
श्रीदमयन्ती उनके प्रति साधारण 'मनुष्य'-बुद्धि रखती
थीं। वे मनमें विचार करती थीं- 'कभी यदि भारी
भोजन करनेसे महाप्रभुके उदरमें आँव (बलगम) हो
जायेगा तो वह सुख्ता चूर्ण खानेसे दूर हो जायेगा।'
श्रीदमयन्तीके उस स्नेहका विचार करनेसे ही महाप्रभु
उल्लसित हो उठते थे ॥ 19-20 ॥
अनुभाष्य- 'मनुष्य'- बुद्धि', - गौड़-व्रजवासियोंका शुद्ध
सत्त्वमय ऐश्वर्यज्ञानहीन चित्तमें मनुष्य-शरीरधारी गौर-

274 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 10/19–26 ]
[बायाँ स्तम्भ]
कृष्णको अपने शुद्ध केवल प्रेमके वशीभूत समझना;
'आम',—जठराग्निके मन्द होनेके कारण अजीर्णता-वशतः
अम्लपित्त-व्याधि॥ 19 ॥
प्रेमसे अर्पित वस्तु ही महागुणोंसे युक्त, प्रेमसे प्रदानकी
गयी वस्तुके बाहरी दोषों और गुणोंका विचार नहीं :—
भारवी-कृत किरातार्जुनीय (8/20) में—
प्रियेण संग्रथ्य विपक्ष-सन्निधा-
वुपाहितां वक्षसि पीवरस्तने।
स्रजं न काचिद्विजहौ जलाविलां
वसन्ति हि प्रेम्णि गुणा न वस्तुनि ॥ 21 ॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 21 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—किसी प्रियव्यक्तिने अपने हाथोंसे
मालाको गूँथकर विपक्षीकी (सौतनकी) उपस्थितिमें उन्नत
स्तनवाली पत्नीको पहनायी तो उस स्त्रीने मालाके ऊपर
लगे कीचड़को देखकर भी उसका परित्याग नहीं किया,
क्योंकि गुण वस्तुमें नहीं रहते, प्रेममें रहते हैं॥ 21 ॥
अनुभाष्य—
काचित् (कान्ता) प्रियेण (प्रेमपात्रेण वल्लभेन) संग्रथ्य
(स्वयमेव रचयित्वा) विपक्षसन्निधौ (सपत्नीजनसमीपे) पीवरस्तने
(समुन्नतपयोधरे) वक्षसि (उरसि) उपाहिताम् (अर्पितां योजितां)
जलाविलां (कर्द्दमादियुक्तामपि) स्रजं (मालां) न विजहौ (न
त्यक्तवती); हि (यस्मात्) गुणाः प्रेम्णि वसन्ति, न वस्तुनि
[प्रेमर्पितमेव वस्तु गुणवत्, अन्यत् तु गुणवदपि गुणहीनं
दोषयुक्तमेव, प्रेम तु वस्तुपरीक्षां नापेक्षते इति भावः]।
श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें। [प्रेमसे
अर्पित वस्तु ही गुणवान् है, अन्यथा वस्तु गुणवान्
होनेपर भी गुणहीन (दोषयुक्त) है, प्रेम वस्तुकी परीक्षाकी
अपेक्षा नहीं करता—यह भाव है] ॥ 21 ॥
धनिया-मोहरीर तण्डुल गुण्डा करिया।
नाडु बान्धियाछे चिनि-पाक करिया ॥ 22 ॥
शुण्ठीखण्ड, नाडु, आर आमपित्तहर।
पृथक् पृथक् बान्धि' वस्त्रेर कुथली-भितर ॥ 23 ॥
[दायाँ स्तम्भ]
अनुवाद—श्रीदमयन्तीने साबुत धनिया और सौंफका
चूर्ण बनाकर चीनीकी चासनीसे उनके लड्डू बना दिये।
उन्होंने आँव और पित्तका हरण करनेवाले सोंठके
लड्डू भी बनाये और दोनों प्रकारके लड्डुओंको
पृथक्-पृथक् छोटी-छोटी थैलियोंमें बाँधकर रख
दिया ॥ 22–23 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—'कुथली',—छोटी-छोटी थैलियाँ ॥ 23 ॥
कोलिशुन्ठि, कोलिचूर्ण, कोलिखण्ड आर।
कत नाम लइब, आर शतप्रकार 'आचार' ॥ 24 ॥
अनुवाद—उन्होंने सूखे बेर, बेरोंका चूर्ण, गुड़में
पकाये बेर और सैंकड़ों प्रकारके आचार बनाये, मैं
कितनोंका नाम गिनाऊँ॥ 24 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य— 'कोलिशुन्ठि',—सूखे बेर ॥ 24 ॥
नारिकेल-खण्ड, आर नाडु गङ्गाजलि।
चिरस्थायी खण्डविकार करिला सकलि ॥ 25 ॥
अनुवाद—उन्होंने नारियलके छोटे-छोटे टुकड़ोंकी
मिठाई और ऐसे लड्डू बनाये जो देखनेमें गङ्गाके
जलकी भाँति श्वेत थे। इस प्रकार उन्होंने ऐसे-ऐसे
लड्डू बनाये, जो बहुत दिनों तक उपयोग किये जा
सकते थे ॥ 25 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य— 'नाडु गङ्गाजलि',—सफेद
लड्डू ॥ 25 ॥
अनुभाष्य—'चिरस्थायी खण्डविकार',—कद्मा (कदम्ब
पुष्पके आकार जैसी गोल और सख्त मिठाई),
काटाफेणी, ओला, मठ, तिलमें खाजा, दम्दम्-मिश्री,
रेशमी मिठाई आदि ॥ 25 ॥
चिरस्थायी क्षीरसार, मण्डादि-विकार।
अमृत-कर्पूर आदि अनेकप्रकार ॥ 26 ॥
अनुवाद—उन्होंने बहुत दिनों तक नष्ट नहीं
होनेवाले खोये और चावलकी माँड़ आदिके अनेक

[ 10/26–35 दसवाँ अध्याय 275
पकवान बनाये तथा अमृत-कर्पूर आदि अनेक प्रकारके
पीठे भी बनाये ॥ 26 ॥
शालिकाचटि-धान्येर 'आतप' चिड़ा करि'।
नूतन-वस्त्रेर बड़ कुथली सब भरि' ॥ 27 ॥
अनुवाद—उन्होंने सूक्ष्म शालिकाचटि धानका उबाले
बिना सूर्यके तापसे चिड़वा बनाकर उसे नये वस्त्रसे
बनी बड़ी झोलीमें भर दिया ॥ 27 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—'शालिकाचटि धान्येर'—(एक
प्रकारके) सूखे धानका ॥ 27 ॥
कतेक चिड़ा हुडुम् करि' घृतेते भाजिया।
चिनि-पाके नाडु कैला कर्पूरादि दिया ॥ 28 ॥
अनुवाद—उन्होंने कुछ चिड़वा और मुड़िको घीमें
भूनकर तथा उसमें कर्पूर आदि मिलाकर चीनीकी
चासनीमें पकाकर लड्डू बनाये ॥ 28 ॥
अनुभाष्य—'हुडुम',—(पूर्वबङ्गालमें प्रसिद्ध) मुड़ि,
(पश्चिम बङ्गालमें 'हुडुम-चावल'-नामसे एक प्रकारका
पृथक् चावल मिलता है) ॥ 28 ॥
शालि-धान्येर तण्डुल-भाजा चूर्ण करिया।
घृतसिक्त चूर्ण कैला चिनि-पाक दिया ॥ 29 ॥
कर्पूर, मरिच, लवङ्ग, एलाचि, रसवास।
चूर्ण दिया नाडु कैला परम सुवास ॥ 30 ॥
अनुवाद—उन्होंने शालि-धानके चावलको भूनकर
उसका चूर्ण बनाया और पुनः उसे घीमें मिलाकर
चीनीकी चासनीमें पकाया, फिर उसमें कर्पूर, काली
मिर्च, लौंग, इलायची तथा रसवास आदिका चूर्ण
बनाकर परम सुगन्धित लड्डू बना दिये ॥ 29–30 ॥
शालि-धान्येर खई पुनः घृतेते भाजिया।
चिनि-पाक उखड़ा कैला कर्पूरादि दिया ॥ 31 ॥
अनुवाद—उन्होंने शालिधानकी बनी खीलको घीमें
भूनकर उसमें कर्पूर आदि मिलाकर चीनीकी चासनीमें
पकाकर मुड़कि (मुरुण्डा) बनाया ॥ 31 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—'उखड़ा'—मुड़कि ॥ 31 ॥
फुट्कलाइ चूर्ण करि' घृते भाजाइला।
चिनि-पाके कर्पूर दिया नाडु कैला ॥ 32 ॥
अनुवाद—उन्होंने तले हुए मटरोंका चूर्ण बनाकर
उसे घीमें भूना और फिर उसे कर्पूर मिश्रित चीनीकी
चासनीमें पकाकर लड्डू बनाये ॥ 32 ॥
अनुभाष्य—'फुट्कलाइ',—तले हुए मटर ॥ 32 ॥
सुस्वादिष्ट खाद्यको बनानेमें परम निपुण
होनेपर भी ग्रन्थकारका दैन्य :—
कहिते ना जानि नाम ए-जन्मे याहार।
ऐछे नाना भक्ष्यद्रव्य सहस्रप्रकार ॥ 33 ॥
अनुवाद—श्रीमदमयन्तीने ऐसी सैकड़ों खाद्य वस्तुएँ
बनायी जिनके नाम मैं पूर्ण जन्ममें भी नहीं कह
सकता ॥ 33 ॥
श्रीराघव और श्रीमदमयन्तीकी महाप्रभुके प्रति गाढ़ प्रीति :—
राघवेर आज्ञा, आर करेन दमयन्ती।
दुँहार प्रभुते स्नेह परम-भकति ॥ 34 ॥
अनुवाद—श्रीराघव पण्डितकी आज्ञानुसार श्रीमदमयन्ती
समस्त वस्तुओंको बनातीं। उन दोनोंका महाप्रभुके प्रति
बहुत स्नेह और परम-भक्ति थी ॥ 34 ॥
गङ्गा-मृत्तिका आनि' वस्त्रेते छानिया।
पाँचकुड़ि करिया दिला गन्धद्रव्य दिया ॥ 35 ॥
अनुवाद—श्रीमदमयन्तीने गङ्गाकी मिट्टीको लाकर
उसे वस्त्रके द्वारा छाना और उसके पाँच भाग किये
एवं उनमें भिन्न-भिन्न सुगन्धित द्रव्य देकर पाँच पोटलियाँ
बाँध दी ॥ 35 ॥
अनुभाष्य—'पाँचकुड़ि',—पाठान्तरमें 'पाकौड़ि', पाठान्तरमें,
'पाँपड़ि' अर्थात् दला अथवा 'पर्पटी' ॥ 35 ॥

276 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 10/36-44 ]
पातल मृत्पात्रे चन्दनादि भरि’ ।
आर सब वस्तु भरे वस्त्रेर कुथली ॥ ३६ ॥
अनुवाद—उन्होंने मिट्टीके बने हल्के पात्रोंमें चन्दन
आदिको भर दिया और अन्य समस्त वस्तुओंको
वस्त्रोंसे बनी थैलियोंमें भर दिया ॥ ३६ ॥
अनुभाष्य—‘पातल’,—पतला, हल्का, छोटा; किसी-
किसीके मतानुसार पत्थर ॥ ३६ ॥
सामान्य झालि हैते द्विगुण झालि कैला।
परिपाटि करि’ सब झालि भराइला ॥ ३७ ॥
अनुवाद—उन्होंने सामान्य थैलीसे दो गुनी आकारकी
थैलियाँ बनायी और बड़ी सावधानीसे सभी छोटी-छोटी
थैलियोंको बड़ी थैलियोंमें भर दिया ॥ ३७ ॥
झालि बान्धि’ मोहर दिला आग्रह करिया।
तिन बोझारि झालि बहे क्रम करिया ॥ ३८ ॥
अनुवाद—उन्होंने बड़ी सावधानीपूर्वक थैलियोंको
बाँधा और उनपर मोहर लगा दी। तीन भारवाहक उन
झोलोंको एकके बाद एक करके उठा रहे थे ॥ ३८ ॥
अनुभाष्य—‘मोहर दिला,’—अन्य लोग जिससे खोल
न पायें, इस प्रकारसे सील मोहर लगा दी; ‘बोझारि’,—बोझको
(भारको) अरि (कम करनेवाले)—भारवाही, ‘कुली’
अथवा बोझ उठानेवाला ॥ ३८ ॥
इसलिये ही ‘राघवकी झोली’-नाम :—
संक्षेपे कहिलुँ एइ झालिर विचार।
‘राघवेर झालि’ बलि’ ख्याति याहार ॥ ३९ ॥
अनुवाद—मैंने संक्षेपमें इन झोलियोंका वर्णन किया
जो ‘श्रीराघव पण्डितकी झोली’के नामसे विख्यात
हैं ॥ ३९ ॥
श्रीमकरध्वजके द्वारा यत्नपूर्वक झोलियोंकी रक्षा :—
झालिर उपर ‘मुन्सिब’ मकरध्वज-कर।
प्राणरूपे झालि राखे हञा तत्पर ॥ ४० ॥
अनुवाद—श्रीमकरध्वज-कर उन झोलियोंके ‘मुन्सिब’
(परिचालक) बने और वे सदा तत्पर रहकर झोलियोंकी
अपने प्राणोंकी भाँति देखभाल करते थे ॥ ४० ॥
अनुभाष्य—‘मुन्सिब’,—(अरबी भाषा) ‘मन्सिफ’,
परिदर्शक, परिचालक; ‘मकरध्वज-कर’—पाणिहाटी ग्रामवासी,
राघव पण्डितके अनुगत गौरभक्त; अब भी पाणिहाटीमें
उनके घरकी नींव दिखलायी पड़ती है ॥ ४० ॥
गौड़ीयभक्तोंके पुरीमें आनेवाले दिन नरेन्द्र-सरोवरमें
श्रीगोविन्द-देवके जलक्रीड़ा-उत्सवका होना :—
एइमते वैष्णव सब नीलाचले आइला।
दैवे जगन्नाथेर से दिन जल-लीला ॥ ४१ ॥
अनुवाद—इस प्रकार सब वैष्णव श्रीजगन्नाथ पुरीमें
आये। सौभाग्यसे वह दिन भगवान् श्रीजगन्नाथका
जलक्रीड़ा-उत्सवका था ॥ ४१ ॥
नरेन्द्रेर जले ‘गोविन्द’ नौकाते चड़िया।
जलक्रीड़ा करे सब भक्तगण लञा ॥ ४२ ॥
अनुवाद—भगवान् श्रीगोविन्ददेवने नौकापर चढ़कर
नरेन्द्र सरोवरके जलमें सब भक्तोंके साथ जलक्रीड़ा
की ॥ ४२ ॥
उस समय महाप्रभुका भी पुरीवासी भक्तोंके साथ
श्रीकृष्णकी जल-केलिका दर्शन :—
सेइकाले महाप्रभु भक्तगण-सङ्गे।
नरेन्द्रे आइला देखिते जलकेलि-रङ्गे ॥ ४३ ॥
अनुवाद—उसी समय महाप्रभु भक्तोंके साथ भगवान्
गोविन्दकी आनन्दमय जलक्रीड़ाको देखनेके लिये नरेन्द्र
सरोवरपर आये ॥ ४३ ॥
उस समय ही महाप्रभुके साथ गौड़ीय-भक्तोंका मिलन :—
सेइकाले सब गौड़ेर भक्तगण।
नरेन्द्रेते प्रभु-सङ्गे हइल मिलन ॥ ४४ ॥
अनुवाद—उसी समय गौड़देशसे आये समस्त भक्तोंका
नरेन्द्र सरोवरपर महाप्रभुके साथ मिलन हुआ ॥ ४४ ॥

[ 10/45–53 दसवाँ अध्याय 277
भक्तोंके द्वारा प्रणाम, महाप्रभुके द्वारा आलिङ्गन :-
भक्तगण पड़े आसि' प्रभुर चरणे।
उठाञा प्रभु सबारे कैला आलिङ्गने ॥ 45 ॥
अनुवाद—सभी गौड़ीय भक्त आकर महाप्रभुके चरणकमलोंमें पड़ गये। महाप्रभुने उन सबको उठाकर उनका आलिङ्गन किया॥ 45 ॥
गौड़ीय-भक्तोंका कीर्त्तन-गान, भक्तोंके द्वारा क्रन्दन :-
गौड़ीय-सम्प्रदाय सब करेन कीर्त्तन।
प्रभुर मिलने उठे प्रेमेर क्रन्दन ॥ 46 ॥
अनुवाद—गौड़ीय-सम्प्रदायके समस्त भक्त कीर्त्तन कर रहे थे और महाप्रभुके साथ मिलन होनेपर वे प्रेममें क्रन्दन करने लगे ॥ 46 ॥
भक्तोंके साथ श्रीगोविन्ददेवकी जलक्रीड़ा :-
जलक्रीड़ा, वाद्य, गीत, नर्त्तन, कीर्त्तन।
महाकोलाहल तीरे, सलिले खेलन ॥ 47 ॥
अनुवाद—श्रीगोविन्द देवकी जलक्रीड़ाके उपलक्ष्यमें नरेन्द्र सरोवरके तटपर वाद्य-यन्त्र बज रहे थे, गान, नृत्य, कीर्त्तन और कोलाहल हो रहा था। कुछ भक्त नरेन्द्र सरोवरके जलमें क्रीड़ा भी कर रहे थे ॥ 47 ॥
कीर्त्तन और क्रन्दन-ध्वनिका एकसाथ मिलकर महाध्वनि होना :-
गौड़ीया-सङ्कीर्त्तने आर रोदन मिलिया।
महाकोलाहल-शब्द हैल ब्रह्माण्ड भरिया ॥ 48 ॥
अनुवाद—गौड़ीय भक्तोंके सङ्कीर्त्तन और उच्च स्वरसे रोदनके मिल जानेपर महाकोलाहल हुआ जिससे सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड गूँज उठा ॥ 48 ॥
भक्तोंके साथ महाप्रभुकी जल-क्रीड़ा :-
सब भक्त लञा प्रभु नामिलेन जले।
सबा लञा जलक्रीड़ा करेन कुतूहले ॥ 49 ॥
अनुवाद—सभी भक्तोंको लेकर महाप्रभु भी नरेन्द्र सरोवरके जलमें उतरे और उन्होंने सभी भक्तोंके साथ बड़े आनन्दसे जलक्रीड़ा की ॥ 49 ॥
चैतन्यभागवतमें महाप्रभुकी जलक्रीड़ा वर्णित :-
प्रभुर एइ जलक्रीड़ा दास-वृन्दावन।
'चैतन्यमङ्गले' विस्तारि' करियाछे वर्णन ॥ 50 ॥
अनुवाद—महाप्रभुकी इस जलक्रीड़ाका श्रीवृन्दावनदास ठाकुरने अपने ग्रन्थ चैतन्यमङ्गलमें (श्रीचैतन्यभागवतमें) विस्तारसे वर्णन किया है॥ 50 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य— 'चैतन्यमङ्गले', — चैतन्यभागवतमें अन्त्य-खण्डका नौवाँ अध्याय देखें ॥ 50 ॥
ग्रन्थके बड़े होनेके भयसे पुनरुक्ति नहीं :-
पुनः इँहा वर्णिले पुनरुक्ति हय।
व्यर्थ लिखन हय, मोर ग्रन्थ बाड़य ॥ 51 ॥
अनुवाद—पुनः इसी प्रसङ्गका वर्णन करनेसे पुनरुक्ति होगी, इसलिये इसे लिखना व्यर्थ ही होगा और मेरे ग्रन्थका आकार भी बढ़ जायेगा॥ 51 ॥
अपने-अपने भक्तोंके साथ श्रीगोविन्ददेव और महाप्रभुका अपने-अपने स्थानके लिये प्रस्थान :-
जललीला करि' गोविन्द चलिला आलय।
निजगण लञा प्रभु गेला देवालय ॥ 52 ॥
अनुवाद—जलक्रीड़ा करनेके उपरान्त भगवान् श्रीगोविन्द अपने मन्दिरकी ओर चल दिये। महाप्रभु भी अपने भक्तोंको साथमें लेकर श्रीजगन्नाथ मन्दिर चले गये ॥ 52 ॥
अनुभाष्य—श्रीजगन्नाथ मन्दिरमें विजयमूर्ति श्रीगोविन्ददेवके विग्रह हैं; वे ही नरेन्द्र सरोवरमें जलक्रीड़ा करने जाते हैं॥ 52 ॥
श्रीजगन्नाथ-दर्शनके पश्चात् भक्तोंको भोजन करानेके बाद उनको अपने-अपने स्थानपर भेजना :-
जगन्नाथ देखि' पुनः निज-घरे आइला।
प्रसाद आनाञा भक्तगणे खाओयाइला ॥ 53 ॥
अनुवाद—महाप्रभु भगवान् श्रीजगन्नाथके दर्शन करके

278 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 10/53-63 ]
पुनः अपने वासस्थानपर लौट आये। उन्होंने मन्दिरसे
प्रसाद मँगवाकर भक्तोंको खिलाया ॥ 53 ॥
इष्टगोष्ठी सबा लञा कतक्षण कैला।
निज-निज-पूर्व-वासाय सबाय पाठाइला ॥ 54 ॥
अनुवाद-महाप्रभुने कुछ समय तक अपने समस्त
भक्तोंके साथ इष्टगोष्ठी करके सभी भक्तोंको उनके
पूर्व-पूर्व वर्षोंवाले अपने-अपने वासस्थानपर भेज
दिया ॥ 54 ॥
श्रीराघवके द्वारा श्रीगोविन्दको अपनी झोली देना :-
गोविन्द-ठाञि राघव झालि समर्पिला।
भोजन-गृहेर कोणे झालि राखिला ॥ 55 ॥
अनुवाद-श्रीराघव पण्डितने श्रीगोविन्दको झोलीको
समर्पित कर दिया और श्रीगोविन्दने उस झोलीको
भोजन-गृहके एक कोनेमें रख दिया ॥ 55 ॥
पूर्व-वत्सरेर झालि आजाड़ करिया।
द्रव्य भरिवारे राखे अन्य गृहे लञा ॥ 56 ॥
अनुवाद-श्रीगोविन्दने पिछले वर्षमें आयी झोलीको
भली-भाँति खाली और साफ करके अन्य वस्तुओंको
भरनेके लिये अन्य कमरेमें रख दिया ॥ 56 ॥
अनुभाष्य- 'आजाड़'-खाली, शून्य ॥ 56 ॥
अगले दिन प्रातः महाप्रभुका भक्तोंके
साथ श्रीजगन्नाथ-दर्शन :-
आर दिन महाप्रभु निजगण लञा।
जगन्नाथ देखिलेन शय्योत्थाने यात्रा ॥ 57 ॥
अनुवाद-अगले दिन महाप्रभुने अपने भक्तोंको
साथ ले जाकर भगवान् श्रीजगन्नाथके शय्यासे उठते हुए
दर्शन किये ॥ 57 ॥
सात-सम्प्रदायोंमें बेड़ा-सङ्कीर्त्तन-वर्णन :-
बेड़ा-सङ्कीर्त्तन ताँहा आरम्भ करिला।
सात-सम्प्रदाये तबे गाइते लागिला ॥ 58 ॥
अनुवाद-महाप्रभुने वहाँ बेड़ा-सङ्कीर्त्तन आरम्भ
किया। उन्होंने तब भक्तोंकी सात-मण्डलियाँ बनायीं
और सभीमें कीर्तन होने लगा ॥ 58 ॥
अनुभाष्य- बेड़ा-सङ्कीर्त्तन,'-मध्यलीला 11/215-238
संख्या देखें ॥ 58 ॥
सात-सम्प्रदाये नृत्य करे सात जन।
अद्वैत-आचार्य, आर प्रभु नित्यानन्द ॥ 59 ॥
वक्रेश्वर, अच्युतानन्द, पण्डित-श्रीवास।
सत्यराज-खाँन, आर नरहरिदास ॥ 60 ॥
महाप्रभुके द्वारा महैश्वर्यका प्रकाश :-
सात-सम्प्रदाये प्रभु करेन भ्रमण।
'मोर सम्प्रदाये प्रभु'-ऐछे सबार मन ॥ 61 ॥
अनुवाद-श्रीअद्वैताचार्य, श्रीनित्यानन्द प्रभु, श्रीवक्रेश्वर
पण्डित, श्रीअच्युतानन्द, श्रीवास पण्डित, श्रीसत्यराज
खाँन और श्रीनरहरिदास-सात मण्डलियोंमें क्रमशः ये
सात भक्त नृत्य कर रहे थे। महाप्रभु एक-एक करके
सातों मण्डलियोंमें भ्रमण कर रहे थे, परन्तु सभी
मण्डलियोंके भक्तोंको ऐसा प्रतीत हो रहा था, -'महाप्रभु
हमारी ही मण्डलीमें हैं'॥ '59-61 ॥
महासङ्कीर्त्तन-ध्वनि :-
सङ्कीर्त्तन-कोलाहले आकाश भेदिल।
सब जगन्नाथवासी देखिते आइल ॥ 62 ॥
अनुवाद-सङ्कीर्त्तनमें आकाश-भेदी ध्वनि हो रही
थी। समस्त जगन्नाथपुरीवासी सङ्कीर्त्तनका दर्शन करनेके
लिये आये ॥ 62 ॥
रानियोंके साथ राजाके द्वारा सङ्कीर्त्तनका दर्शन :-
राजा आसि' दूरे देखे निजगण लञा।
राजपत्नी सब देखे अट्टाली चड़िया ॥ 63 ॥
अनुवाद-राजा प्रतापरुद्रने भी अपने गणोंके साथ
आकर दूरसे और रानियोंने अट्टालिकापर चढ़कर
सङ्कीर्त्तनका दर्शन किया ॥ 63 ॥

[ 10/64-71 दसवाँ अध्याय 279
महासङ्कीर्त्तनका वेग :—
कीर्त्तन-आवेशे पृथिवी करे टलमल।
'हरिध्वनि' करे लोक, हैल कोलाहल ॥ 64 ॥
अनुवाद—महाप्रभु और उनके भक्तोंके द्वारा आवेशमें
किये गये कीर्त्तनसे पृथ्वी भी टलमल करने लगी। जब
सब लोग 'हरि, हरि' बोलने लगे, तब कोलाहल होने
लगा॥ 64॥
अनुभाष्य—'कीर्त्तन-आवेशे'—पाठान्तरमें
'कीर्त्तनाटोपे'—कीर्त्तनके वेग अथवा संरम्भ-वशतः
(आवेश-वशतः) ॥ 64 ॥
महाप्रभुकी नृत्य करनेकी इच्छा :—
एइमत कतक्षण कराइला कीर्त्तन।
आपने नाचिते तबे प्रभुर हैल मन ॥ 65 ॥
अनुवाद—महाप्रभुने इस प्रकार कुछ समय तक
कीर्त्तन करवाया, तब स्वयं महाप्रभुकी नृत्य करनेकी
इच्छा हुई॥ 65 ॥
सात सम्प्रदायोंमें महाप्रभुका नृत्य :—
सात-दिके सात-सम्प्रदाय गाय, बाजाय।
मध्ये प्रेमावेशे नाचे गौर-राय ॥ 66 ॥
अनुवाद—सातों दिशाओंमें सात मण्डलियाँ गाने-बजाने
लगीं और बीचमें श्रीगौरराय महाप्रेमके आवेशमें नृत्य
करने लगे॥ 66 ॥
श्रीस्वरूपको उड़िया-गानका पद गानेकी आज्ञा :—
उड़िया-पद महाप्रभुर मने स्मृति हैल।
स्वरूपेरे सेइ पद गाइते आज्ञा दिल ॥ 67 ॥
अनुवाद—उस समय महाप्रभुके मनमें एक उड़िया-पद
स्मरण हो आया और उन्होंने श्रीस्वरूप दामोदरको उस
पदका गान करनेकी आज्ञा दी॥ 67॥
यथा पदम् :—
“जगमोहन-परिमुण्डा याङ्”॥ 68 ॥ ध्रु॥
अनुवाद—जगमोहन नामक नाट्य मन्दिरमें भगवान्
श्रीजगन्नाथके प्रति मेरा मस्तक समर्पित हो॥ 68 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीजगन्नाथदेवके मन्दिरके मध्य
एक बहुत बड़े स्थानको 'जगमोहन' कहते हैं। उसकी
एक दिशामें (एकान्तमें) 'गरुड़-स्तम्भ' है। उस जगमोहनके
जिस स्थानपर भक्त नृत्य करते हैं, उसे 'परिमण्डल'
कहते हैं; परिमण्डलका ही उत्कलदेशीय अपभ्रंश—
'परिमुण्डा' है; उड़िया-पदको इस स्थानपर सम्पूर्ण रूपमें
नहीं देनेसे सुन्दर अर्थ नहीं होता। इस प्रकारके पद
आजकल उत्कलमें प्रसिद्ध नहीं हैं,—किन्तु अवश्य ही
किसी विशेष भावके ही सूचकमात्र हैं॥ 68 ॥
अनुभाष्य—'जगमोहन',—जगमोहन-नामक
श्रीजगन्नाथदेवका नाट्यमन्दिर; 'परि',—प्रति; 'मुण्डा',—मस्तक;
'याङ्',—अर्पित हो, प्रेरित हो॥ 68 ॥
प्रेमके आवेशमें महाप्रभुके नृत्यसे सभीको आनन्द :—
एइ पदे नृत्य करेन आपन-आवेशे।
सबलोक चौदिके प्रभुर प्रेमे भासे ॥ 69 ॥
अनुवाद—इस पदको श्रवण करके महाप्रभु अपने
आवेशमें नृत्य करने लगे। चारों ओर खड़े समस्त लोग
महाप्रभुके प्रेममें निमग्न हो गये॥ 69॥
महाप्रभुके मुखसे केवल 'हरिबोल' ध्वनि :—
'बोल्' 'बोल्' बलेन प्रभु श्रीबाहु तुलिया।
हरिध्वनि करे लोक आनन्दे भासिया ॥ 70 ॥
अनुवाद—महाप्रभु अपनी श्रीभुजाओंको उठाकर
कहने लगे—'बोलो', 'बोलो'। दिव्यानन्दमें निमग्न होकर
सभी लोग हरिध्वनि करने लगे॥ 70॥
महाप्रभुके सात्त्विक विकारसमूह :—
प्रभु पड़ि' मूर्च्छा याय, श्वास नाहि आर।
आचम्बिते उठे प्रभु करिया हुङ्कार ॥ 71 ॥
अनुवाद—महाप्रभु मूर्च्छित होकर भूमिपर गिर पड़े
और उनका श्वास-प्रश्वास बन्द हो गया। तभी वे
अचानक हुङ्कार करते हुए उठकर खड़े हो गये॥ 71॥

280 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 10/72–81 ]
सघन पुलक,—येन शिमुलॆर तरु।
कभु प्रफुल्लित अङ्ग, कभु हय सरु॥ 72॥
अनुवाद—महाप्रभुके शरीरपर पुलक हो गया अर्थात् रोम खड़े हो गये मानो सेमलकी रुईके वृक्षके ऊपर रोयें हों। कभी महाप्रभुके समस्त अङ्ग फूल जाते और कभी वे सब सङ्कुचित हो जाते॥ 72॥
प्रति रोमे हय प्रस्वेद, रक्तोद्गम्।
‘जज’ ‘गग’ ‘परि’ ‘मुमु’—गद्गद वचन॥ 73॥
अनुवाद—महाप्रभुके प्रत्येक रोमसे पसीना और रक्त प्रवाहित होने लगा। कण्ठके अवरुद्ध होनेके कारण ‘जगमोहन परिमुण्डा याड्’ पदको पूर्ण रूपसे ना कहकर उनके मुखसे ‘जज’ ‘गग’ ‘परि’ ‘मुमु’ गद्गद वचन ही निकले॥ 73॥
दाँतोंका हिलना :—
एक एक दन्त सब पृथक् पृथक् नड़े।
ऐछे नड़े दन्त—येन भूमे खसि’ पड़े॥ 74॥
अनुवाद—महाप्रभुका एक-एक दाँत हिलने लगा मानो वे सब अलग-अलग हैं। उनके दाँत ऐसे हिलने लगे, मानो वे भूमिपर गिरनेवाले ही हैं॥ 74॥
आनन्द-समुद्रका वर्धन :—
क्षणे क्षणे बाड़े प्रभुर आनन्द-आवेश।
तृतीय प्रहर हइल, नृत्य नहे शेष॥ 75॥
अनुवाद—महाप्रभुके आनन्दका आवेश क्षण-क्षणमें वर्धित होता जा रहा था। तृतीय प्रहर हो गया, किन्तु महाप्रभुका नृत्य समाप्त नहीं हुआ॥ 75॥
सभीको ही देह अथवा बाहरी जगत्की विस्मृति :—
सब लोकेर उथलिल आनन्द-सागर।
सब लोक पासरिल देह-आत्म-घर॥ 76॥
अनुवाद—सभी लोगोंके हृदयमें आनन्दरूपी सागर उमड़ पड़ा और वे अपनी देह, मन तथा घरको भूल गये॥ 76॥
श्रीनित्यानन्द प्रभुके द्वारा कीर्तनको भङ्ग करनेका उपाय निकालना :—
तबे नित्यानन्द प्रभु सृजिला उपाय।
क्रमे-क्रमे कीर्त्तनीया राखिल सबाय॥ 77॥
अनुवाद—बहुत देर हो जानेके कारण श्रीनित्यानन्द प्रभुने कीर्तनको विराम देनेका एक उपाय निकाला। उन्होंने क्रमशः कीर्तनीयोंके उच्च स्वरके कीर्तनको बन्द करवा दिया॥ 77॥
श्रीस्वरूपादिका मृदुस्वरमें गान :—
प्रधान प्रधान येबा हय सम्प्रदाय।
स्वरूपेर सङ्गे सेइ मन्दस्वर गाय॥ 78॥
अनुवाद—सातों मण्डलियोंके प्रधान-प्रधान कीर्तन करनेवाले भक्त श्रीस्वरूप दामोदरके साथ मन्द-मन्द स्वरमें गान करने लगे॥ 78॥
महाप्रभुका अर्द्धबाह्यदशामें आगमन :—
कोलाहल नाहि, प्रभुर किछु बाह्य हैल।
तबे नित्यानन्द सबार श्रम जानाइल॥ 79॥
अनुवाद—उच्च स्वरसे कीर्तनको नहीं सुननेके कारण महाप्रभु कुछ बाह्य दशामें आये। तब श्रीनित्यानन्द प्रभुने महाप्रभुको समस्त कीर्तन और नृत्य करनेवाले भक्तोंके परिश्रमके विषयमें बतलाया॥ 79॥
श्रीनित्यानन्दके कहनेसे भक्तोंके परिश्रमको जानकर कीर्तन समाप्ति और सभीके द्वारा समुद्रस्नान :—
भक्तश्रम जानि’ कैला कीर्त्तन समापन।
सबा लञा आसि’ कैला समुद्रे स्नपन॥ 80॥
अनुवाद—भक्तोंके परिश्रमको जानकर महाप्रभुने कीर्तनको विश्राम दिया। तब महाप्रभुने सभी भक्तोंको अपने साथमें ले आकर समुद्रमें स्नान किया॥ 80॥
सभीके द्वारा प्रसादका सम्मान :—
सब लञा प्रभु कैला प्रसाद-भोजन।
सबारे विदाय दिला करिते शयन॥ 81॥

[ 10/81-90 दसवाँ अध्याय 281
अनुवाद—स्नानके पश्चात् महाप्रभुने समस्त भक्तोंको
अपने साथ लेकर प्रसाद ग्रहण किया और उन्हें शयन
करनेके लिये विदायी दी॥ 81 ॥
महाप्रभुका शयन, श्रीगोविन्दके द्वारा चरण दबाना :—
गम्भीरार द्वारे करेन आपने शयन।
गोविन्द आसिया करे पाद-सम्वाहन ॥ 82 ॥
अनुवाद—महाप्रभु गम्भीराके द्वारपर शयन करने
लगे और श्रीगोविन्द उनके चरण दबानेके लिये
आये ॥ 82 ॥
अनुभाष्य— 'गम्भीरा', – घरके भीतरकी कोठरी ॥ 82 ॥
प्रतिदिन धीरे-धीरे चरण दबानेके फलस्वरूप
महाप्रभुके नींद आ जानेपर श्रीगोविन्दके द्वारा
महाप्रभुके उच्छिष्टको प्राप्त करनेकी रीति :—
सर्वकाल आछे एइ सुदृढ़ 'नियम'।
'प्रभु यदि प्रसाद पाञा करेन शयन ॥ 83 ॥
गोविन्द आसिया करे पादसम्वाहन।
तबे याइ' प्रभुर 'शेष' करेन भोजन ॥' 84 ॥
अनुवाद—श्रीगोविन्दका सर्वदाका यह सुदृढ़ नियम
था,—'जब महाप्रभु प्रसाद पाकर शयन करते, तब
श्रीगोविन्द आकर उनके चरण दबाते। वे उसके बाद
ही जाकर महाप्रभुके उच्छिष्ट प्रसादका भोजन
करते ॥' 83-84 ॥
थके हुए महाप्रभुके द्वारा पूरे द्वारको घेरकर शयन :—
सब द्वार युड़ि' प्रभु करियाछेन शयन।
भितरे याइते नारे, गोविन्द करे निवेदन ॥ 85 ॥
चरणको दबानेके लिये श्रीगोविन्दके द्वारा महाप्रभुको
करवट लेनेकी प्रार्थना, महाप्रभुके द्वारा अपने अङ्गोंको
हिलानेमें असमर्थता जतलाना :—
“एकपाश हओ, मोरे देह' भितरे याइते।”
प्रभु कहे,—“शक्ति नाहि अङ्ग चालाइते ॥” 86 ॥
अनुवाद—उस दिन महाप्रभु बहुत देर तक नृत्य
करनेके कारण बहुत थक गये थे, इसलिये वे द्वारपर
ही मार्ग अवरुद्ध करके लेट गये थे। श्रीगोविन्द भीतर
नहीं जा पा रहे थे। इसलिये उन्होंने महाप्रभुसे निवेदन
किया,—“आप कृपया एक ओर हो जाइये। मुझे भीतर
जाने दीजिये।” महाप्रभुने कहा,—“मुझमें अपने शरीरको
हिलाने तककी भी शक्ति नहीं है॥”85-86॥
श्रीगोविन्दके द्वारा पुनः पुनः प्रार्थना करनेपर
भी महाप्रभुका एक ही उत्तर :—
बार बार गोविन्द कहे एकदिक् हइते।
प्रभु कहे,—“अङ्ग आमि नारि चालाइते ॥” 87 ॥
अनुवाद—यद्यपि श्रीगोविन्दने महाप्रभुको बार बार
एक ओर हो जानेके लिये कहा, तथापि महाप्रभुने
प्रत्येक बार यही उत्तर दिया,—“मैं अपने शरीरको
हिला तक भी नहीं पा रहा हूँ॥” 87 ॥
श्रीगोविन्दके द्वारा चरण दबानेकी सेवाकी इच्छा,
थकावटके कारण महाप्रभुकी उदासीनता :—
गोविन्द कहे,—“करिते चाहि पाद-सम्वाहन।”
प्रभु कहे,—“कर वा ना कर, येइ तोमार मन ॥” 88 ॥
अनुवाद—श्रीगोविन्दने कहा,—“मैं आपके चरण
दबाना चाहता हूँ।” महाप्रभुने कहा,—“तुम करो अथवा
ना करो, जैसी तुम्हारी इच्छा हो वैसा करो ॥” 88 ॥
श्रीगोविन्दके द्वारा महाप्रभुके बहिर्वासको महाप्रभुकी
देहके ऊपर रखकर उसको पार करना :—
तबे गोविन्द तार बहिर्वास उपरे दिया।
भितर-घरे गेला गोविन्द प्रभुरे लङ्घिया ॥ 89 ॥
अनुवाद—तब श्रीगोविन्दने महाप्रभुके बहिर्वास (उत्तरीय
वस्त्र)को उनके ऊपर डाल दिया और उनको लाँघकर
गम्भीराके भीतर चले गये ॥ 89 ॥
श्रीगोविन्दके कोमल-मधुर मलनेसे
महाप्रभुकी थकावट दूर होना :—
पाद-सम्वाहन कैल, कटि-पृष्ठ चापिल।
मधुर-मर्दने प्रभुर परिश्रम गेल ॥ 90 ॥

282 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 10/90-97 ]
अनुवाद—श्रीगोविन्दने प्रतिदिनकी भाँति महाप्रभुके
चरणोंको दबाया और फिर उनकी कमर और पीठको
भी धीरे-धीरे मला। श्रीगोविन्दके कोमल-मधुर मलनेसे
महाप्रभुका सारा परिश्रम दूर हो गया॥90॥
महाप्रभुकी प्रायः एक घण्टे तक निद्रा :—
सुखे निद्रा हैल प्रभुर, गोविन्द चापे अङ्ग।
दण्ड-दुइ बइ प्रभुर हैल निद्रा-भङ्ग॥91॥
अनुवाद—श्रीगोविन्दके द्वारा महाप्रभुके अङ्गोंकी
सेवा करनेपर उनको बहुत अच्छी नींद आ गयी। दो
दण्ड (48 मिनट)के बाद महाप्रभुकी नींद खुल गयी॥91॥
निद्रा भङ्ग होनेके बाद भी भूखे बैठे श्रीगोविन्दको
प्रतीक्षा करते देख महाप्रभुके द्वारा भर्त्सना :—
गोविन्दे देखिया प्रभु बले क्रुद्ध हञा।
“आजि केने एतक्षण आछिस् बसिया??92॥
महाप्रभुके द्वारा श्रीगोविन्दकी शुद्धसेवा-प्रवृत्तिकी परीक्षा;
महाप्रभुके सोये होनेपर भी श्रीगोविन्दके द्वारा प्रसादके
सम्मानके लिये नहीं जानेके कारणकी जिज्ञासा :—
मोर निद्रा हैले केने ना गेला प्रसाद लैते?”
गोविन्द कहे,—“द्वारे शुइला, याइते नाहि पथे॥”93॥
अनुवाद—महाप्रभुने श्रीगोविन्दको अभी तक भी
वहीं बैठे देखकर कुछ क्रोधित होकर कहा, —“तुम
आज अब तक भी यहाँ क्यों बैठे हुए हो? मुझे नींद
आ जानेपर तुम प्रसाद पानेके लिये क्यों नहीं गये?”
श्रीगोविन्दने उत्तर दिया, —“आप तो द्वारके बीचमें ही सो
गये, जानेके लिये मार्ग ही नहीं था॥”92-93॥
जैसे भीतर गये, वैसे बाहर नहीं
जानेके कारणकी जिज्ञासा :—
प्रभु कहे,—“भितर तबे आइला केमने?
तैछे केने प्रसाद लैते ना कैला गमने??”94॥
अनुवाद—महाप्रभुने पूछा, —“फिर तुम भीतर किस
प्रकार आये? और फिर उसी प्रकारसे प्रसाद पानेके
लिये क्यों नहीं गये?” 94॥
शुद्ध अनुरागी श्रीगौर-कृष्णके सेवककी ही सर्वोत्तम
सेवाके आदर्शका वर्णन; श्रीगौर-कृष्णकी इन्द्रियोंके
तर्पणकी इच्छा ही सेवकका एकमात्र लक्ष्य :—
गोविन्द कहे,—“आमार सेवा से 'नियम'।
अपराध हउक, किबा नरके गमन॥95॥
अनुवाद—श्रीगोविन्दने मन-ही-मन कहा, —“मेरा तो
सेवा करनेका ही नियम है, भले ही उसमें मेरा अपराध
हो या फिर नरकमें गमन॥95॥
श्रीगौर-कृष्णकी इन्द्रियोंके तर्पणमें बिन्दुमात्र
आत्मेन्द्रिय तर्पणकी इच्छाके प्रति भी शुद्धभक्तकी
घृणा और अपराधकी आशङ्का :—
'सेवा' लागि' कोटि 'अपराध' नाहि गणि।
स्व-निमित्त 'अपराधाभासे' भय मानि॥”96॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥96॥
अमृतप्रवाह भाष्य—मैं महाप्रभुकी सेवाके लिये
करोड़ों-करोड़ों अपराधोंकी भी गिनती नहीं करता;
किन्तु अपने भोगोंके लिये अपराधके आभाससे भी भय
करता हूँ॥”96॥
अनुभाष्य—आदिलीला 4/201 संख्या देखें—
“निज-प्रेमानन्दे कृष्ण-सेवानन्द बाधे।
से आनन्देर प्रति भक्तेर हय महाक्रोधे।”
[अर्थात् “जब प्रेममें अपने आनन्दसे श्रीकृष्णके
सेवानन्दमें बाधा उत्पन्न होती है, तो उस निज
आनन्दके प्रति भक्तको अत्यधिक क्रोध होता है।”]॥96॥
महाप्रसादमें साक्षात् ब्रह्म-वस्तु और तदीय-वस्तुकी भावना
रहनेपर भी व्यक्तिगत निज-सम्बन्धके कारण आत्मेन्द्रिय
प्रीति वाञ्छाकी आशङ्कासे श्रीगोविन्दके द्वारा महाप्रभुकी
निद्रा भङ्ग होने तक प्रतीक्षा :—
एत सब मने करि' गोविन्द रहिला।
प्रभु ये पुछिला, तार उत्तर ना दिला॥97॥
अनुवाद—श्रीगोविन्दने मन-ही-मन यह सब सोचा।
उन्होंने महाप्रभुकी बातका कोई उत्तर नहीं दिया॥97॥

यहाँ प्रस्तुत पृष्ठ का सटीक लिप्यन्तरण (Transcription) दिया गया है:

[ 10/98–105 दसवाँ अध्याय 283
अन्य दिनोंमें महाप्रभुके सो जानेपर श्रीगोविन्दके द्वारा
प्रसादके सम्मानके लिये जाना :–
प्रत्यह प्रभुर निद्राय यान प्रसाद लइते।
से दिवसेर श्रम देखि' लागिला चापिते॥ 98 ॥
अनुवाद—श्रीगोविन्द प्रतिदिन महाप्रभुको नींद आ
जानेके बाद प्रसाद ग्रहण करनेके लिये जाते थे। किन्तु
उस दिन महाप्रभुकी अधिक थकानको देखकर वे
महाप्रभुके सो जानेपर भी उनकी सेवा करते रहे॥ 98 ॥
उस दिन प्रसादके सम्मानके लिये
जानेमें असुविधाका कारण :–
याइतेह पथ नाहि, याइबेन केमने?
महा-अपराध हय प्रभुर लङ्घने॥ 99 ॥
अनुवाद—बाहर जानेका मार्ग ही नहीं था, जाते तो
कैसे जाते? महाप्रभुको लाँघनेसे तो महा-अपराध
होता॥ 99 ॥
श्रीचैतन्य-कृपा-पात्रको ही शुद्धभक्तिके रहस्यका ज्ञान :–
एइ सब हय भक्तिशास्त्र-सूक्ष्ममर्म।
चैतन्येर कृपाय जाने एइ सब धर्म॥ 100 ॥
अनुवाद—ये सब भक्तिशास्त्रोंके सूक्ष्म मर्म हैं,
श्रीगोविन्द श्रीचैतन्य महाप्रभुकी कृपासे इन सब विचारोंको
भली-भाँति जानते थे॥ 100 ॥
अनुभाष्य—कर्मी लोग भक्तिशास्त्रोंके सूक्ष्म मर्मको
नहीं समझ पानेके कारण अनुष्ठान-मात्रको ही भक्तिके
समान मानते हैं; किन्तु जिससे भगवत्सेवा साधित होती
है, उसका नाम-‘भक्ति’ है और जिससे अपने धर्म,
अर्थ, काम और मोक्ष आदि प्राकृत-फलकी प्राप्ति होती
है, वही ‘कर्म’ है। प्राकृतसहजिया कर्मी लोग विश्रम्भ-सख्य,
वात्सल्य और मधुरभावकी सेवा-मर्यादाको नहीं समझ
पानेके कारण श्रीचैतन्यकी कृपाको प्राप्त करनेसे
वञ्चित होते हैं॥ 100 ॥
अपने भक्तोंकी शुद्धभक्तिके माहात्म्यको
प्रकाशित करनेवाले महाप्रभु :–
भक्त-गुण प्रकाशिते प्रभु बड़ रङ्गी।
एइ सब प्रकाशिते कैला एत भङ्गी॥ 101 ॥
अनुवाद—महाप्रभुको भक्तोंके गुणोंको प्रकाशित करनेमें
बहुत आनन्द होता है, इसलिये उन्होंने अपने सेवक
श्रीगोविन्दकी महिमाको प्रकाशित करनेके उद्देश्यसे ही
यह लीला की॥ 101 ॥
गौरभक्तोंके द्वारा नित्य गान किये जानेवाले
महाप्रभुका मण्डली बद्ध-नृत्य :–
सङ्केपे कहिलुँ एइ परिमुण्डा-नृत्य।
अद्यापि गाय याहा चैतन्येर भृत्य॥ 102 ॥
अनुवाद—मैंने संक्षेपमें ही मण्डली बनाकर किये
गये उस नृत्यका वर्णन किया, जिसका गान श्रीचैतन्य
महाप्रभुके दास आज तक भी करते हैं॥ 102 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—‘परिमुण्डा-नृत्य’,—मण्डली बनाकर
किया गया नृत्य॥ 102 ॥
भक्तोंके साथ गुण्डिचा-मार्जन :–
एइमत महाप्रभु लञा निजगण।
गुण्डिचा-गृहे कैला क्षालन, मार्जन॥ 103 ॥
अनुवाद—इस प्रकार रथयात्रासे एक दिन पहले
महाप्रभुने अपने भक्तोंको साथमें लेकर गुण्डिचा मन्दिरका
मार्जन किया और उसे जल आदिके द्वारा धोया॥ 103 ॥
आइटोटामें प्रसाद-सेवन :–
पूर्ववत् कैला प्रभु कीर्त्तन, नर्त्तन।
पूर्ववत् टोटाय कैला वन्य-भोजन॥ 104 ॥
अनुवाद—महाप्रभुने पहलेकी भाँति ही कीर्त्तन और
नृत्य किया तथा फिर बगीचेमें वन-भोजन किया॥ 104 ॥
रथके आगे नृत्य और हेरा-पञ्चमी-दर्शन :–
पूर्ववत् रथ-आगे करिला नर्त्तन।
हेरापञ्चमी-यात्रा कैला दरशन॥ 105 ॥

284 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 10/105-115 ]
अनुवाद—पहलेकी भाँति महाप्रभुने भगवान्
श्रीजगन्नाथदेवके रथके आगे नृत्य किया और हेरापञ्चमी-
यात्राका भी दर्शन किया॥ 105॥
चातुर्मास्य तक गौड़ीयभक्तोंका पुरीमें रहना :—
चारिमास वर्षाय रहिला सब भक्तगण।
जन्माष्टमी-आदि यात्रा कैला दरशन॥ 106॥
अनुवाद—गौड़देशसे आये सभी भक्त श्रीजगन्नाथ
पुरीमें वर्षाके चार मास तक रहे और उन्होंने श्रीकृष्ण
जन्माष्टमी आदि महोत्सवोंका दर्शन किया॥ 106॥
गौड़से भक्तोंके द्वारा संगृहीत नैवेद्य :—
पूर्वे यदि गौड़ हइते भक्तगण आइल।
प्रभुरे किछु खाओयाइते सबार इच्छा हैल॥ 107॥
उनके द्वारा महाप्रभुकी सेवाके लिये
श्रीगोविन्दको सब वस्तुएँ देना :—
केह कोन प्रसाद आनि' देय गोविन्द-ठाञि।
“इहा येन अवश्य भक्षण करेन गोसाञि॥” 108॥
नैवेद्योंकी विचित्रता :—
केह पेड़ा, केह नाडु, केह पिठापाना।
बहुमूल्य उत्तम-प्रसाद, प्रकार यार नाना॥ 109॥
अनुवाद—जब गौड़देशसे भक्तगण आये थे, तब
सभीकी महाप्रभुको कुछ-न-कुछ खिलानेकी इच्छा हुई
थी। वे कोई-न-कोई प्रसाद लाकर श्रीगोविन्दको देते
उनसे कहते,—“कृपया ऐसा करना कि महाप्रभु इसको
अवश्य ही खायें।” कोई पेड़ा, कोई लड्डू और कोई
पीठा-पाना आदि लेकर आये। इस प्रकार सभी भक्त
महाप्रभुके लिये अनेक प्रकारके बहुमूल्य उत्तम प्रसाद
लाये॥ 107-109॥
अनुभाष्य—पाठान्तरमें—‘पैड़’ (नारियल), ‘बहुमूल्य
प्रसाद सब, पद्मचिनि छाना’॥ 109॥
महाप्रभुके द्वारा नहीं खानेके कारण
बहुतसे नैवेद्योंका इकट्ठा होना :—
“अमुक् एइ दियाछे” गोविन्द करे निवेदन।
“धरि’ राख” बलि’ प्रभु ना करेन भक्षण॥ 110॥
अनुवाद—श्रीगोविन्द भक्तोंके द्वारा लाये गये प्रसादमें-से
एक-एक वस्तुको महाप्रभुको दिखाकर उनसे निवेदन
करते,—“अमुक् व्यक्तिने यह वस्तु दी है।” महाप्रभु
श्रीगोविन्दसे कहते,—“इसे अपने पास रखो” और उसे
खाते नहीं थे॥ 110॥
धरिते धरिते घरेर भरिल एक कोण।
शत-जनेर भक्ष्य यत हैल सञ्चयन॥ 111॥
अनुवाद—प्रसादको रखते-रखते कमरेका एक कोना
भर गया। इस प्रकार इतना प्रसाद एकत्रित हो गया कि
वह सौ लोगोंके लिये भी पर्याप्त था॥ 111॥
अपने-अपने द्वारा दिये गये नैवेद्यके सेवनके
विषयमें भक्तोंके द्वारा श्रीगोविन्दसे पूछना :—
गोविन्दरे सबे पुछे करिया यतन।
“आमा-दत्त प्रसाद प्रभुरे कि कराइला भक्षण??” 112॥
अनुवाद—सभी भक्त श्रीगोविन्दसे बड़ी उत्सुकतासे
पूछते,—“क्या आपने मेरे द्वारा दिये गये प्रसादको
महाप्रभुको खिलाया?” 112॥
छलपूर्ण वचनोंसे श्रीगोविन्दके द्वारा
नैवेद्य देनेवालेको सान्त्वना :—
काँहा किछु कहि’ गोविन्द करेन वञ्चन।
आर दिन प्रभुरे कहे निर्वेद-वचन॥ 113॥
महाप्रभुसे श्रीगोविन्दका निवेदन :—
“आचार्यादि महाशय करिया यतने।
तोमारे खाओयाइते वस्तु देन मोर स्थाने॥ 114॥
तुमि से ना खाओ, ताँरा पुछे बार बार।
कत वञ्चना करिमु, केमने आमार निस्तार॥” 115॥
अनुवाद—श्रीगोविन्द कुछ ना कुछ मिथ्या बात
कहकर भक्तोंकी वञ्चना करते। एकदिन श्रीगोविन्दने
निराश होकर महाप्रभुसे कहा,—“आपको खिलानेके
लिये श्रीअद्वैताचार्य आदि महाशय बहुत विश्वाससे मुझे
अनेक प्रकारके व्यञ्जन आदि देकर जाते हैं। आप

[ 10/113-124 दसवाँ अध्याय 285
उन्हें खाते नहीं और वे मुझसे बार-बार पूछते हैं कि
क्या आपने उन्हें खा लिया? मैं उन सबकी कितनी
वञ्चना करूँ, मेरा इससे कैसे छुटकारा होगा?"॥ 113-115 ॥
महाप्रभुके द्वारा भक्तोंके दुःखके कारणकी जिज्ञासा :—
प्रभु कहे,—“आदिवस्या' दुःख काँहे माने?
केबा कि दियाछे, ताहा आनह एखाने॥”116॥
अनुवाद—महाप्रभुने कहा,—“जो मेरे साथमें पहलेसे
रहते आये हैं, वे दुःख क्यों करेंगे? किसने क्या दिया
है, तुम उसे यहाँ लेकर आओ॥”116॥
अमृतप्रवाह भाष्य—'आदिवस्या',—पहलेसे ही जिनका
वास है, उन्हें 'आदिवस्या' कहते हैं। महाप्रभुने कहा,—जो
'आदिवस्या' अर्थात् पहलेसे ही मेरे साथ इकट्ठे रहते
आये हैं, उनका इसमें कोई दुःख नहीं है; क्योंकि अभी
जो गौड़से [मेरे पूर्व सङ्गी] आये हैं, वे ही तो इन सब
सुस्वादिष्ट खाद्य वस्तुओंको लाये हैं॥ 116 ॥
अनुभाष्य—'आदिवस्या',—किसी-किसीके मतानुसार
'भाग्यहीन' अथवा अबोध अथवा निर्बोध, चञ्चलमति
अथवा आ-देखला (अतिव्यग्र, किसी वस्तुके लिये
बहुत लोभी जैसे उसने कभी वैसी वस्तु देखी नहीं है)
आदि अर्थोंमें प्रयोग होता है॥ 116 ॥
महाप्रभुका भोजनके लिये बैठना, श्रीगोविन्दके
द्वारा प्रत्येक नैवेद्य देनेवाले गौड़ीय-भक्तके
नामका उल्लेख करके नैवेद्य परोसना :—
एत बलि' महाप्रभु बसिला भोजने।
नाम धरि' गोविन्द करे निवेदने॥ 117 ॥
“आचार्येर एइ पैड़, नाना-रस-पूपी।
एइ अमृत-गुटिका, मण्डा, कर्पूर-कुपी ॥ 118 ॥
अनुवाद—यह कहकर महाप्रभु भोजन करनेके
लिये बैठ गये। तब श्रीगोविन्द भक्तोंके नामके साथ जो
वे लेकर आये थे, वह बताने लगे,—“श्रीअद्वैताचार्य यह
नारियल, अनेक प्रकारके रसयुक्त मिष्ठान्न, यह
अमृत-गुटिका, मण्डा और कर्पूर-कुपी लेकर आये
हैं॥ 117-118 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—'पैड़',—(उत्कल-शब्द)
नारियल ॥ 118 ॥
अनुभाष्य—'पूपी'—पिष्टक (पीठा) ; 'कुपी',—मिट्टीका
पात्र (कर्पूर जलानेके लिये ?) ॥ 118 ॥
श्रीवास-पण्डितेर एइ अनेक प्रकार।
पिठा, पाना, अमृतमण्डा, पद्म-चिनि आर॥ 119 ॥
आचार्यरत्नेर एइ सब उपहार।
आचार्यनिधिर एइ, अनेक प्रकार॥ 120 ॥
वासुदेव-दत्तेर, मुरारिगुप्तेर आर।
बुद्धिमन्त-खाँनेर एइ विविध प्रकार ॥ 121 ॥
श्रीमान्-सेन, श्रीमान्-पण्डित, आचार्यनन्दन।
ताँ-सबार दत्त एइ करह भोजन ॥ 122 ॥
कुलीनग्रामेर एइ आगे देख यत।
खण्डवासी लोकेर एइ देख तत॥” 123 ॥
अनुवाद—श्रीवास पण्डित पिठा, पाना, अमृतमण्डा
और पद्मचीनी लाये हैं। श्रीआचार्यरत्न ये सब उपहार
लाये हैं और श्रीआचार्यनिधि ये अनेक प्रकारकी भेंट
लाये हैं। श्रीवासुदेव दत्त, श्रीमुरारि गुप्त और श्रीबुद्धिमन्त
खाँन इन विविध प्रकारकी खाद्य वस्तुओंको लाये हैं।
श्रीमान् सेन, श्रीमान् पण्डित, श्रीआचार्य नन्दनके द्वारा
लायी सब वस्तुओंको आप खाइये। अब आपके आगे
रखे द्रव्य कुलीनग्रामवासी लाये हैं और इधर खण्डवासी
भक्तों द्वारा लाये गये द्रव्योंको भी देखिये॥” 119-123 ॥
महाप्रभुके द्वारा सभीके द्वारा प्रदान
किये गये नैवेद्योंका भोजन :—
ऐछे सबार नाम लञा प्रभुर आगे धरे।
सन्तुष्ट हञा प्रभु सब भोजन करे ॥ 124 ॥
अनुवाद—श्रीगोविन्द इस प्रकार सभी भक्तोंका नाम
लेकर उनके द्वारा लायी वस्तुओंको महाप्रभुके आगे
रखते गये। महाप्रभु उन प्रेमपूर्वक दी गयीं भेंटोंसे
सन्तुष्ट हुए और उन सबको खाने लगे॥ 124 ॥

286 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 10/125-133
बासा होनेपर भी ताजे बनाये गये प्रसादकी भाँति स्वादिष्ट और सुगन्धित :-
यद्यपि मासेकेर बासि मुकुता नारिकेल।
अमृत-गुटिकादि, पानादि सकल ॥ 125 ॥
तथापि नूतनप्राय सब द्रव्येर स्वाद।
'बासि' विस्वाद नहे, सेइ प्रभुर प्रसाद ॥ 126 ॥
अनुवाद—यद्यपि नारियलकी बनी मिठाइयाँ, अमृत-गुटिका आदि और शरबत एक मास पहलेके बने थे, तथापि सभी द्रव्योंका स्वाद ऐसा था जैसे वे अभी ही बने हों। वे बासी या स्वादरहित नहीं थे, यह महाप्रभुकी ही कृपा है॥ 125-126॥
अमृतप्रवाह भाष्य—'मुकुता',—मुखछोला ॥ 125 ॥
दसवें अध्यायका अमृतप्रवाह भाष्य समाप्त।
शत-जनेर भक्ष्य प्रभु दण्डके खाइला।
“आर किछु आछे?” बलि' गोविन्दे पुछिला ॥ 127 ॥
अनुवाद—महाप्रभुने सौ व्यक्तियोंके द्वारा खाने योग्य उन खाद्य वस्तुओंको एक दण्डमें (24 मिनटमें) ही खा लिया। फिर उन्होंने श्रीगोविन्दसे पूछा,—“और कुछ है?”127 ॥
सब प्रकारके नैवेद्योंके भोजनके अन्तमें श्रीराघवकी झोलीका बाकी रह जाना :-
गोविन्द बले,—“राघवेर झालि मात्र आछे।”
प्रभु कहे,—“आजि रहु, ताहा देखिमु पाछे ॥” 128 ॥
अनुवाद—श्रीगोविन्दने कहा,—“अब केवल श्रीराघव पण्डितकी झोली ही बची है।” महाप्रभुने कहा,—“उसे आज रहने दो, उसे मैं बादमें देखूँगा॥” 128 ॥
अगले दिन महाप्रभुके द्वारा अकेले भोजन करते समय श्रीराघवकी झोलीमें रखे उत्तम नैवेद्योंका भोजन और उनकी प्रशंसा :-
आर दिन प्रभु यदि निभृते भोजन कैला।
राघवेर झालि खुलि' सकल देखिला ॥ 129 ॥
सब द्रव्येर किछु किछु उपयोग कैला।
स्वादु, सुगन्धि देखि' बहु प्रशंसिला ॥ 130 ॥
अनुवाद—अगले दिन जब महाप्रभुने एकान्तमें भोजन किया, तब उन्होंने श्रीराघव पण्डितकी झोलियोंको खोलकर उनमें रखी समस्त सामग्रियोंको देखा। महाप्रभुने उन समस्त द्रव्योंमें-से कुछ-कुछ ग्रहण किया और उनके स्वाद तथा सुगन्धकी बहुत प्रशंसा की॥ 129-130 ॥
अनुभाष्य—'उपयोग',—स्वीकार, ग्रहण॥ 130 ॥
एक वर्षके बाद भी श्रीराघवकी झोलीके विकाररहित नैवेद्य-भोजन :-
वत्सरेक तरे आर राखिला धरिया।
भोजनकाले स्वरूप परिवेशे खसाञा ॥ 131 ॥
अनुवाद—महाप्रभुने पूरे वर्षके लिये खानेके लिये उन झोलियोंमें लायी वस्तुओंको सम्भालकर रख लिया। महाप्रभुके मध्याह्न-भोजनके समय श्रीस्वरूप दामोदर उन झोलियोंमें-से निकालकर उन्हें वे वस्तुएँ परोसते थे॥ 131 ॥
भक्तोंके द्वारा श्रद्धापूर्वक प्रदान किये गये नैवेद्योंको स्वीकार करना :-
कभु रात्रिकाले किछु कराय उपयोग।
भक्तेर श्रद्धार द्रव्य अवश्य करेन उपभोग ॥ 132 ॥
अनुवाद—कभी रात्रिके समय महाप्रभु उन झोलियोंमें-से कुछ ग्रहण करते थे। क्योंकि महाप्रभु भक्तोंके द्वारा श्रद्धापूर्वक प्रदान किये गये द्रव्योंको अवश्य ही ग्रहण करते हैं॥ 132 ॥
अपने भक्तोंके साथ महाप्रभुके द्वारा श्रीकृष्णकथामें चातुर्मास्य व्यतीत करना :-
एइमत महाप्रभु भक्तगण-सङ्गे।
चातुर्मास्य गोङाइला कृष्णकथा-रङ्गे ॥ 133 ॥
अनुवाद—इस प्रकार महाप्रभुने अपने भक्तोंके साथ चातुर्मास्यको कृष्णकथाके आनन्दमें व्यतीत किया॥ 133 ॥

[ 10/134–144 दसवाँ अध्याय 287
अपने-अपने घरमें श्रीअद्वैताचार्यादिके द्वारा निमन्त्रण :-
मध्ये मध्ये आचार्यादि करेन निमन्त्रण।
घरे भात रान्धे आर विविध व्यञ्जन ॥ 134 ॥
महाप्रभुके प्रिय विचित्र नैवेद्योंका वर्णन :-
मरिचेर झाल, आर मधुराम्ल आर।
आदा, लवण, लेम्बु, दुग्ध, दधि, खण्डसार ॥ 135 ॥
शाक दुइ चारि, आर सुक्तार झोल।
निम्ब-वार्त्ताकी, आर भृष्ट-पटोल ॥ 136 ॥
भृष्ट-फुलबड़ी, आर मुद्ग-डालि-सूप।
विविध व्यञ्जन रान्धे प्रभुर अनुरूप ॥ 137 ॥
अनुवाद—श्रीअद्वैताचार्य आदि भक्तगण महाप्रभुको
बीच-बीचमें निमन्त्रण करते थे और वे अपने घरपर
ही चावल और विविध व्यञ्जनोंको पकाते थे। वे
महाप्रभुके प्रिय मिर्च डालकर बनाये गये तीखे, कुछ
खट्टे-मीठे व्यञ्जन, अदरक, नमक, नींबू, दूध, दही
और खण्डसारका उपयोग करके अन्य कुछ व्यञ्जन,
दो-चार प्रकारके साग, सूखे कड़वे पाट सागको
पीसकर बनाया गया सुख्ताका झोल, नीम-बैंगन, भरे
हुए परवल, भरी हुई फूलवड़ी, पतली मूँगकी दाल
आदि विविध व्यञ्जनोंको प्रस्तुत करते थे॥ 134-137॥
अनुभाष्य—यहाँपर ग्रन्थकारकी पाककलाकी निपुणता
प्रकाशित हुई है॥ 135-137॥
महाप्रभुका प्रसादके साथ नैवेद्य-भोजन :-
जगन्नाथेर प्रसाद आने करिते मिश्रित।
काँहा एका यायेन, काँहा गणेर सहित ॥ 138 ॥
अनुवाद—वे इन सब सामग्रियोंको भगवान् श्रीजगन्नाथके
प्रसादके साथ मिलाकर महाप्रभुको खिलाते। महाप्रभु
कहीं-कहींपर तो अकेले ही जाते थे और कहीं-कहींपर
अपने भक्तोंके साथमें जाते थे॥ 138 ॥
निमन्त्रण करनेवाले अन्यान्य गौड़ीय भक्तगण :-
आचार्यरत्न, आचार्यनिधि, नन्दन, राघव।
श्रीवास-आदि यत भक्त, विप्र सब ॥ 139 ॥
एइमत निमन्त्रण करेन यत्न करि'॥
वासुदेव, गदाधर, गुप्त-मुरारि ॥ 140 ॥
कुलीनग्रामी, खण्डवासी, आर यत जन।
जगन्नाथेर प्रसाद आनि' करेन निमन्त्रण ॥ 141 ॥
अनुवाद—श्रीआचार्य रत्न, श्रीआचार्य निधि, श्रीनन्दन
आचार्य, श्रीराघव पण्डित, श्रीवास पण्डित आदि जितने
सब ब्राह्मण भक्त थे, वे इस प्रकार महाप्रभुको निमन्त्रण
करके अत्यन्त प्रीतिपूर्वक भोजन कराते थे। श्रीवासुदेव
दत्त, श्रीगदाधर दास, श्रीमुरारि गुप्त, कुलीन-ग्रामवासी,
खण्डवासी तथा अन्य जितने समस्त भक्त जो ब्राह्मण
नहीं थे, वे सभी महाप्रभुको निमन्त्रण करके श्रीजगन्नाथदेवके
प्रसादको लाकर उन्हें भोजन कराते थे॥ 139-141॥
अनुभाष्य—'कुलीनग्रामी',—सत्यराज-खाँन, रामानन्द
वसु आदि; 'खण्डवासी',—मुकुन्ददास, नरहरि-दास,
रघुनन्दनादि॥ 141 ॥
श्रीशिवानन्दके पुत्र श्रीचैतन्यदासके वृत्तान्तका वर्णन :-
शिवानन्द-सेनेर शुन निमन्त्रणाख्यान।
शिवानन्देर बड़-पुत्रेरे 'चैतन्यदास' नाम ॥ 142 ॥
अनुवाद—अब श्रीशिवानन्द सेनके निमन्त्रणके
उपाख्यानका श्रवण करो। श्रीशिवानन्द सेनके बड़े
पुत्रका नाम 'चैतन्यदास' था॥ 142॥
अनुभाष्य—'चैतन्यदास',—कृष्णकर्णामृतकी संस्कृत-टीका
इन्हींके द्वारा रचित है; कोई-कोई कहते हैं कि
चैतन्यचरितामृत-महाकाव्यके भी यही रचियता हैं॥ 142 ॥
प्रभुरे मिलाइते ताँरे सङ्गेइ आनिला।
मिलाइले, प्रभु ताँर नाम त' पुछिला ॥ 143 ॥
निज-दास्यसूचक नामको सुनकर महाप्रभुके द्वारा
आत्मगोपन और अज्ञानता दिखलाना :-
'चैतन्यदास' नाम शुनि' कहे गौरराय।
“कि नाम धराञाछ, बुझन ना याय ॥” 144 ॥

288 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 10/143-153 ]
अनुवाद—श्रीशिवानन्द सेन अपने पुत्र श्रीचैतन्यदासको
महाप्रभुसे मिलवानेके लिये अपने साथ लेकर आये।
महाप्रभुने उन दोनोंसे मिलनेपर श्रीशिवानन्दसे उनके
पुत्रका नाम पूछा। उनके पुत्रका 'चैतन्यदास' नाम
सुनकर श्रीगौररायने कहा,—“आपने अपने पुत्रका कैसा
नाम रखा है? इसे समझना बड़ा कठिन है॥”143-144 ॥
श्रीशिवानन्दका उत्तर और महाप्रभुको निमन्त्रण :—
सेन कहे,—“ये जानिलुँ, सेइ नाम धरिल।”
एत बलि' महाप्रभुरे निमन्त्रण कैल ॥ 145 ॥
जगन्नाथेर बहुमूल्य प्रसाद आनाइला।
भक्तगणे लञा प्रभु भोजने बसिला ॥ 146 ॥
बहुत अधिक भोजनके कारण महाप्रभुकी अप्रसन्नता :—
शिवानन्देर गौरवे प्रभु करिला भोजन।
अतिगुरु-भोजने प्रसन्न नहे मन ॥ 147 ॥
अनुवाद—श्रीशिवानन्द सेनने उत्तर दिया,—“मुझे
जो समझमें आया, मैंने उसके अनुसार नाम रखा है।”
यह कहकर श्रीशिवानन्द सेनने महाप्रभुको निमन्त्रण
दिया। श्रीशिवानन्द सेनने श्रीजगन्नाथदेवका बहुमूल्य
प्रसाद मँगवाया था और उसे महाप्रभुको निवेदन किया।
महाप्रभु भक्तोंको अपने साथ लेकर भोजनके लिये बैठे।
महाप्रभुने श्रीशिवानन्द सेनके सम्मान हेतु वह सब
भोजन तो खाया, किन्तु मात्रामें बहुत अधिक और
गरिष्ठ (कठिनतासे पचनेवाला भारी) होनेके कारण
उनका मन प्रसन्न नहीं हुआ॥ 145-147 ॥
महाप्रभुके अभिप्रायको समझकर श्रीशिवानन्दके
पुत्र श्रीचैतन्यदासके द्वारा जठराग्नि-मन्दनाशक
द्रव्यके द्वारा 'स्वारसिकी' सेवा :—
आर दिन चैतन्यदास कैला निमन्त्रण।
प्रभुर 'अभीष्ट' बुझि' आनिला व्यञ्जन ॥ 148 ॥
दधि, लेम्बु, आदा, आर फुलबड़ा-लवण।
सामग्री देखि' प्रभुर प्रसन्न हैल मन ॥ 149 ॥
अनुवाद—अगले दिन श्रीचैतन्यदासने महाप्रभुको
निमन्त्रण किया और उन्होंने महाप्रभुके अभीष्टको
समझकर व्यञ्जन मँगवाये और दही, नींबू, अदरक,
फूल-बड़ी तथा नमक आदिको महाप्रभुको निवेदन
किया। यह सब सामग्री देखकर महाप्रभु अत्यन्त प्रसन्न
हुए॥ 148-149 ॥
अन्तर्यामी महाप्रभुको श्रीचैतन्यदासकी यथार्थ
शुद्धसेवा-प्रवृत्ति देखकर आनन्द :—
प्रभु कहे,—“ए बालक आमार मत जाने।
सन्तुष्ट हइलाङ् आमि इहार निमन्त्रणे॥” 150 ॥
अपने दासको महाप्रभुके द्वारा अपना उच्छिष्ट प्रदान :—
एत बलि' दधि-भात करिला भोजन।
चैतन्यदासरे दिला उच्छिष्ट-भाजन ॥ 151 ॥
अनुवाद—महाप्रभुने कहा,—“यह बालक मेरे मनको
जानता है, मैं इसके निमन्त्रणसे अत्यन्त सन्तुष्ट हुआ
हूँ।” यह कहकर महाप्रभुने दही-भातका भोजन किया
और श्रीचैतन्यदासको अपना उच्छिष्ट दे दिया॥ 150-151 ॥
अनुभाष्य—'भाजन',—सहभाजन (साँझा करना),
पात्र ॥ 151 ॥
चार मास तक भक्तोंके द्वारा महाप्रभुको निमन्त्रण :—
चारिमास एइमत निमन्त्रणे याय।
कोन कोन वैष्णव 'दिवस' नाहि पाय ॥ 152 ॥
अनुवाद—चार मास इसी प्रकार महाप्रभुके द्वारा
प्रतिदिन निमन्त्रण स्वीकार करते हुए व्यतीत हो गये।
किसी-किसी वैष्णवको तो निमन्त्रण करनेके लिये
खाली दिन ही नहीं मिला ॥ 152 ॥
श्रीगदाधर और श्रीसार्वभौमका महाप्रभुको
निमन्त्रण करनेका निर्दिष्ट नियम :—
गदाधर-पण्डित, आचार्य-सार्वभौम।
इँहा सबार आछे भिक्षार दिवस-नियम ॥ 153 ॥
अनुवाद—श्रीगदाधर पण्डित और श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यके

[ 10/153–162 दसवाँ अध्याय 289

मासमें दिन निर्धारित थे जब महाप्रभु उनके निमन्त्रणको
स्वीकार करते थे॥ 153 ॥
बीच-बीचमें निमन्त्रण करनेवाले भक्त :—
गोपीनाथाचार्य, जगदानन्द, काशीश्वर।
भगवान्, रामभद्राचार्य, शङ्कर, वक्रेश्वर ॥ 154 ॥
मध्ये मध्ये घर–भाते करे निमन्त्रण।
अन्येर निमन्त्रणे प्रसादे कौड़ि दुइपण ॥ 155 ॥
अनुवाद—श्रीगोपीनाथ आचार्य, श्रीजगदानन्द पण्डित,
श्रीकाशीश्वर पण्डित, श्रीभगवान् आचार्य, श्रीरामभद्राचार्य,
श्रीशङ्कर पण्डित और श्रीवक्रेश्वर पण्डित बीच-बीचमें
अपने घरपर अन्न-व्यञ्जन आदि बनाकर महाप्रभुको
निमन्त्रण करते थे। अन्य भक्त महाप्रभुको निमन्त्रण
करके दो पण कौड़ीका (दो आनेका) प्रसाद मँगवाते
थे॥ 154-155 ॥
अनुभाष्य—महाप्रभु जो जन्मसे ब्राह्मण थे उनके
घरमें बना भोजन स्वीकार करते थे। अथवा जो जन्मसे
ब्राह्मण थे, किन्तु उनके घरका बना भोजन नहीं खाया
जा सकता था अथवा अन्यान्य व्यक्तियोंके निमन्त्रणमें
महाप्रभु दो पण अथवा चार पण कौड़ीके मूल्यका
महाप्रसाद स्वीकार करते थे॥ 154-155 ॥
रामचन्द्रपुरीके भयसे आधा-भोजन :—
प्रथमे आछिल ‘निर्वन्ध’ कौड़ि चारिपण।
रामचन्द्रपुरी-भये घटाइला निमन्त्रण ॥ 156 ॥
अनुवाद—पहले महाप्रभुके प्रसादके लिये चार पण
कौड़ी खर्च करने तकका नियम था, किन्तु रामचन्द्रपुरीके
भयसे उसे कम करके आधा कर दिया गया था॥ 156 ॥
अनुभाष्य—'घटाइला',—कम कर दिया॥ 156 ॥
दसवें अध्यायका अनुभाष्य समाप्त।
गौड़ीयभक्तोंका गौड़में जाना, पुरीवासियोंका पुरीमें रहना :—
चारिमास रहि' गौड़ेर भक्ते विदाय दिला।
नीलाचलेर सङ्गी भक्त सङ्गेइ रहिला ॥ 157 ॥
अनुवाद—महाप्रभुने गौड़देशसे आये भक्तोंको चार
मास तक रहनेके बाद विदायी दी। उसके बाद
श्रीजगन्नाथपुरीके सङ्गी भक्त ही महाप्रभुके साथ रहे॥ 157 ॥
महाप्रभुकी भिक्षाकी रीति, भक्तोंके द्वारा प्रदान किये
गये द्रव्य और परिमुण्डा-नृत्यादि वर्णित :—
एइ त' कहिलुँ प्रभुर भिक्षा-निमन्त्रण।
भक्त-दत्त वस्तु यैछे कैला आस्वादन ॥ 158 ॥
तार मध्ये राघवेर झालि-विवरण।
तार मध्ये परिमुण्डा-नृत्य-कथन ॥ 159 ॥
अनुवाद—इस प्रकार मैंने यह बतलाया कि महाप्रभुने
कैसे भोजनके निमन्त्रणको स्वीकार किया और कैसे
उन्होंने भक्तोंके द्वारा प्रदत्त वस्तुओंका आस्वादन किया।
मैंने इसी प्रसङ्गके बीचमें ही श्रीराघव पण्डितकी
झोलीका विवरण और महाप्रभुके परिमुण्डा (मण्डलीबद्ध)
नृत्यका वर्णन किया है॥ 158-159 ॥
श्रीकृष्णचैतन्य-कथाके श्रवणसे श्रीगौर-कृष्णके
चरणोंमें प्रेमका उदय :—
श्रद्धा करि' शुने येइ चैतन्येर कथा।
चैतन्यचरणे प्रेम पाइबे सर्वथा ॥ 160 ॥
श्रीगौरकथा—जीवोंके हृदय और कानोंके लिये रसायन :—
शुनिते अमृत-सम जुड़ाय कर्ण-मन।
सेइ भाग्यवान्, येइ करे आस्वादन ॥ 161 ॥
अनुवाद—जो व्यक्ति श्रद्धापूर्वक श्रीचैतन्य महाप्रभुकी
कथाका श्रवण करता है, उसे अवश्य ही श्रीचैतन्य
महाप्रभुके चरणकमलोंमें प्रेमकी प्राप्ति होगी। महाप्रभुकी
कथा सुननेमें अमृतके समान है और वह कानों तथा
मनको परम तृप्त कर देती है। जो व्यक्ति इसका
आस्वादन करता है, वह अत्यन्त सौभाग्यशाली
है॥ 160-161 ॥
श्रीरूप-रघुनाथ-पदे यार आश।
चैतन्यचरितामृत कहे कृष्णदास ॥ 162 ॥

290 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 10/162 ]
इति श्रीचैतन्यचरितामृते अन्त्यखण्डे भक्तदत्तास्वादनं वर्णन कर रहा है॥162॥
नाम दशमः परिच्छेदः। श्रीचैतन्यचरितामृतके अन्त्यखण्डमें 'भक्तोंके द्वारा प्रदत्त
अनुवाद—श्रीरूप-रघुनाथ गोस्वामीके चरणकमलोंकी भेंटका आस्वादन' नामक दसवें अध्यायका अनुवाद
कृपाभिलाषा करते हुए कृष्णदास इस श्रीचैतन्यचरितामृतका समाप्त।

ग्यारहवाँ अध्याय
कथासार—इस अध्यायमें ब्रह्म-श्रीहरिदासठाकुरके
द्वारा महाप्रभुकी आज्ञा प्राप्त करके देहत्याग करनेपर
महाप्रभुने उन्हें विशेष भक्ति और समारोहके साथ ले
जाकर समुद्रके तटपर समाधि प्रदान की। अपने हाथोंसे
बालू देकर चबूतरा बना दिया, बादमें समुद्र स्नान
करके स्वयं भिक्षा करके श्रीहरिदासका विजय महोत्सव
किया।
—(अमृतप्रवाह भाष्य)
गोदमें श्रीहरिदासकी देहको उठाकर नृत्य
करनेवाले श्रीगौरको प्रणाम :-
नमामि हरिदासं तं चैतन्यं तञ्च तत्प्रभुम्।
संस्थितामपि यन्मूर्त्तिं स्वाङ्के कृत्वा ननर्त्त यः ॥ १ ॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ १ ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—मैं श्रीहरिदासको नमस्कार करता
हूँ और उनके प्रभु उन चैतन्यदेवको नमस्कार करता
हूँ,—जिन्होंने श्रीहरिदासके द्वारा परित्यक्त देहको गोदमें
उठाकर नृत्य किया था ॥ १ ॥
अनुभाष्य—
यः (चैतन्यदेवः) यन्मूर्त्तिं (यस्य हरिदासस्य मूर्त्तिं)
संस्थितां (समाधिप्राप्ताम्) अपि स्वाङ्के (स्वस्य क्रोड़े)
कृत्वा ननर्त्त, तं हरिदासं तत्प्रभुं तं चैतन्यं च नमामि।
श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ १ ॥
जय जय श्रीचैतन्य जय दयामय।
जयाद्वैतप्रिय नित्यानन्दप्रिय जय ॥ २ ॥
अनुवाद—श्रीअद्वैताचार्य प्रभु और श्रीनित्यानन्द प्रभुके
अति प्रिय दयामय श्रीचैतन्य महाप्रभुकी जय हो, जय
हो ॥ २ ॥
जय श्रीनिवासेश्वर हरिदासनाथ।
जय गदाधरप्रिय स्वरूप-प्राणनाथ ॥ ३ ॥
अनुवाद—श्रीनिवास पण्डितके ईश्वर, श्रीहरिदास
ठाकुरके नाथ, श्रीगदाधर पण्डितके प्रिय और श्रीस्वरूप
दामोदरके प्राणनाथ श्रीचैतन्य महाप्रभुकी जय हो ॥ ३ ॥
काशीश्वर-प्रिय जगदानन्द-प्राणेश्वर।
जय रूप-सनातन-रघुनाथेश्वर ॥ ४ ॥
अनुवाद—श्रीकाशीश्वर पण्डितके प्रिय, श्रीजगदानन्द
पण्डितके प्राणेश्वर और श्रीरूप-श्रीसनातन-श्रीरघुनाथदास
गोस्वामीके ईश्वर श्रीचैतन्य महाप्रभुकी जय हो ॥ ४ ॥
जय गौरदेह कृष्ण स्वयं भगवान्।
कृपा करि' देह' प्रभु, निज-पद-दान ॥ ५ ॥
अनुवाद—श्रीगौरदेहधारी स्वयं भगवान् श्रीकृष्णकी
जय हो, हे प्रभो ! कृपा करके अपने श्रीचरणकमलोंका
आश्रय प्रदान कीजिये ॥ ५ ॥
अनुभाष्य—'गौरदेह',-गौरवर्णकान्ति-देहधारी ॥ ५ ॥
नित्यानन्दचन्द्र जय चैतन्येर प्राण।
तोमार चरणारविन्दे भक्ति देह' दान ॥ ६ ॥
अनुवाद—श्रीचैतन्य महाप्रभुके प्राण-स्वरूप
श्रीनित्यानन्दचन्द्रकी जय हो, आप कृपा मुझे अपने
श्रीचरणकमलोंमें भक्ति प्रदान कीजिये ॥ ६ ॥
जय जयाद्वैतचन्द्र चैतन्येर आर्य।
स्वचरणे भक्ति देह' जयाद्वैताचार्य ॥ ७ ॥
अनुवाद—श्रीचैतन्य महाप्रभुके सम्माननीय
श्रीअद्वैतचन्द्रकी जय हो, जय हो। हे श्रीअद्वैताचार्य

292 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 11/7-16 ]
प्रभो ! आप मुझे अपने श्रीचरणकमलोंकी भक्ति प्रदान
कीजिये ॥ 7 ॥
अनुभाष्य- 'चैतन्येर आर्य', - महाप्रभुके द्वारा
सम्माननीय ॥ 7 ॥
जय गौरभक्तगण-गौर याँर प्राण।
सब भक्त मिलि' मोरे भक्ति देह' दान ॥ 8 ॥
अनुवाद-श्रीगौरसुन्दर ही जिनके प्राणस्वरूप हैं,
उन समस्त गौरभक्तोंकी जय हो। आप सभी भक्त कृपा
करके मुझे भक्तिका दान दीजिये ॥ 8 ॥
जय रूप, सनातन, जीव, रघुनाथ।
रघुनाथ, गोपाल, -छय मोर प्राणनाथ ॥ 9 ॥
अनुवाद-मेरे प्राणनाथ श्रीरूप गोस्वामी, श्रीसनातन
गोस्वामी, श्रीजीव गोस्वामी, श्रीरघुनाथदास गोस्वामी, श्रीरघुनाथ
भट्ट गोस्वामी, श्रीगोपाल भट्ट गोस्वामी-इन छह गोस्वामियोंकी
जय हो ॥ 9 ॥
ग्रन्थकारकी दीनतापूर्वक उक्ति, स्वयंको शोधन
करनेके लिये श्रीचैतन्यगुणलीलाका वर्णन :-
ए-सब प्रसादे लिखि चैतन्य-लीला-गुण।
यैछे तैछे लिखि, करि आपन पावन ॥ 10 ॥
अनुवाद-मैं श्रीचैतन्य महाप्रभु और उनके समस्त
भक्तोंकी कृपासे ही श्रीचैतन्य महाप्रभुकी लीलाओं और
उनके गुणोंको लिख रहा हूँ। मैं ठीकसे लिखना भी
नहीं जानता हूँ, केवल स्वयंको पवित्र करनेके लिये
लिख रहा हूँ ॥ 10 ॥
भक्तोंके साथ महाप्रभुका नीलाचलमें कीर्तनविलास :-
एमत महाप्रभुर नीलाचले वास।
सङ्गे भक्तगण लञा कीर्त्तन-विलास ॥ 11 ॥
अनुवाद-इस प्रकार महाप्रभु अपने भक्तोंको साथमें
लेकर कीर्तन-विलास करते हुए श्रीजगन्नाथपुरीमें वास
कर रहे थे ॥ 11 ॥
दिनमें नामसङ्कीर्तन और श्रीजगन्नाथ-दर्शन,
रात्रिमें श्रीस्वरूप-रामानन्दके साथ
श्रीराधाके कृष्णप्रेमका रसास्वादन :-
दिने नृत्य-कीर्त्तन, ईश्वर-दरशन।
रात्र्ये राय-स्वरूप-सने रस-आस्वादन ॥ 12 ॥
अनुवाद-महाप्रभु दिनके समय नृत्य-कीर्तन और
श्रीजगन्नाथदेवके दर्शन करते थे। रात्रिके समय श्रीरामानन्द
और श्रीस्वरूप दामोदरके साथ रसका आस्वादन करते
थे ॥ 12 ॥
श्रीकृष्णविरहमें महाप्रभुकी देहमें सात्त्विकभावोंका उदय :-
एमत महाप्रभुर सुखे काल याय।
कृष्णेर विरह-विकार अङ्गे नाना हय ॥ 13 ॥
अनुवाद-इस प्रकार महाप्रभुका समय सुखपूर्वक
व्यतीत होता था। कृष्णविरहके कारण उनके अङ्गोंमें
अनेक विकार उत्पन्न होते थे ॥ 13 ॥
दिने दिने बाड़े विकार, रात्र्ये अतिशय।
चिन्ता, उद्वेग, प्रलापादि यत शास्त्रे कय ॥ 14 ॥
अनुवाद-दिन-प्रतिदिन महाप्रभुमें कृष्णविरहसे उत्पन्न
शास्त्रोंमें वर्णित चिन्ता, उद्वेग, प्रलापादि विकार वर्धित हो
रहे थे जो रात्रिमें बहुत अधिक बढ़ जाते थे ॥ 14 ॥
अप्राकृत विप्रलम्भ-लीलामें महाप्रभुके दो नित्य सङ्गी :-
स्वरूप गोसाञि, आर रामानन्द राय।
रात्रि-दिने करे दोँहे प्रभुर सहाय ॥ 15 ॥
अनुवाद-श्रीस्वरूप दामोदर और श्रीरामार्नन्द राय-ये
दोनों रात-दिन महाप्रभुके साथ रहकर उनको सान्त्वना
देते ॥ 15 ॥
श्रीहरिदासके वृत्तान्तका वर्णन; श्रीगोविन्दके द्वारा
श्रीहरिदासको प्रसाद देनेके लिये जाना :-
एकदिन गोविन्द महाप्रसाद लञा।
हरिदासे दिते गेला आनन्दित हञा ॥ 16 ॥