श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 2301, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें284 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 10/105-115 ]
अनुवाद—पहलेकी भाँति महाप्रभुने भगवान्
श्रीजगन्नाथदेवके रथके आगे नृत्य किया और हेरापञ्चमी-
यात्राका भी दर्शन किया॥ 105॥
चातुर्मास्य तक गौड़ीयभक्तोंका पुरीमें रहना :—
चारिमास वर्षाय रहिला सब भक्तगण।
जन्माष्टमी-आदि यात्रा कैला दरशन॥ 106॥
अनुवाद—गौड़देशसे आये सभी भक्त श्रीजगन्नाथ
पुरीमें वर्षाके चार मास तक रहे और उन्होंने श्रीकृष्ण
जन्माष्टमी आदि महोत्सवोंका दर्शन किया॥ 106॥
गौड़से भक्तोंके द्वारा संगृहीत नैवेद्य :—
पूर्वे यदि गौड़ हइते भक्तगण आइल।
प्रभुरे किछु खाओयाइते सबार इच्छा हैल॥ 107॥
उनके द्वारा महाप्रभुकी सेवाके लिये
श्रीगोविन्दको सब वस्तुएँ देना :—
केह कोन प्रसाद आनि' देय गोविन्द-ठाञि।
“इहा येन अवश्य भक्षण करेन गोसाञि॥” 108॥
नैवेद्योंकी विचित्रता :—
केह पेड़ा, केह नाडु, केह पिठापाना।
बहुमूल्य उत्तम-प्रसाद, प्रकार यार नाना॥ 109॥
अनुवाद—जब गौड़देशसे भक्तगण आये थे, तब
सभीकी महाप्रभुको कुछ-न-कुछ खिलानेकी इच्छा हुई
थी। वे कोई-न-कोई प्रसाद लाकर श्रीगोविन्दको देते
उनसे कहते,—“कृपया ऐसा करना कि महाप्रभु इसको
अवश्य ही खायें।” कोई पेड़ा, कोई लड्डू और कोई
पीठा-पाना आदि लेकर आये। इस प्रकार सभी भक्त
महाप्रभुके लिये अनेक प्रकारके बहुमूल्य उत्तम प्रसाद
लाये॥ 107-109॥
अनुभाष्य—पाठान्तरमें—‘पैड़’ (नारियल), ‘बहुमूल्य
प्रसाद सब, पद्मचिनि छाना’॥ 109॥
महाप्रभुके द्वारा नहीं खानेके कारण
बहुतसे नैवेद्योंका इकट्ठा होना :—
“अमुक् एइ दियाछे” गोविन्द करे निवेदन।
“धरि’ राख” बलि’ प्रभु ना करेन भक्षण॥ 110॥
अनुवाद—श्रीगोविन्द भक्तोंके द्वारा लाये गये प्रसादमें-से
एक-एक वस्तुको महाप्रभुको दिखाकर उनसे निवेदन
करते,—“अमुक् व्यक्तिने यह वस्तु दी है।” महाप्रभु
श्रीगोविन्दसे कहते,—“इसे अपने पास रखो” और उसे
खाते नहीं थे॥ 110॥
धरिते धरिते घरेर भरिल एक कोण।
शत-जनेर भक्ष्य यत हैल सञ्चयन॥ 111॥
अनुवाद—प्रसादको रखते-रखते कमरेका एक कोना
भर गया। इस प्रकार इतना प्रसाद एकत्रित हो गया कि
वह सौ लोगोंके लिये भी पर्याप्त था॥ 111॥
अपने-अपने द्वारा दिये गये नैवेद्यके सेवनके
विषयमें भक्तोंके द्वारा श्रीगोविन्दसे पूछना :—
गोविन्दरे सबे पुछे करिया यतन।
“आमा-दत्त प्रसाद प्रभुरे कि कराइला भक्षण??” 112॥
अनुवाद—सभी भक्त श्रीगोविन्दसे बड़ी उत्सुकतासे
पूछते,—“क्या आपने मेरे द्वारा दिये गये प्रसादको
महाप्रभुको खिलाया?” 112॥
छलपूर्ण वचनोंसे श्रीगोविन्दके द्वारा
नैवेद्य देनेवालेको सान्त्वना :—
काँहा किछु कहि’ गोविन्द करेन वञ्चन।
आर दिन प्रभुरे कहे निर्वेद-वचन॥ 113॥
महाप्रभुसे श्रीगोविन्दका निवेदन :—
“आचार्यादि महाशय करिया यतने।
तोमारे खाओयाइते वस्तु देन मोर स्थाने॥ 114॥
तुमि से ना खाओ, ताँरा पुछे बार बार।
कत वञ्चना करिमु, केमने आमार निस्तार॥” 115॥
अनुवाद—श्रीगोविन्द कुछ ना कुछ मिथ्या बात
कहकर भक्तोंकी वञ्चना करते। एकदिन श्रीगोविन्दने
निराश होकर महाप्रभुसे कहा,—“आपको खिलानेके
लिये श्रीअद्वैताचार्य आदि महाशय बहुत विश्वाससे मुझे
अनेक प्रकारके व्यञ्जन आदि देकर जाते हैं। आप