श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ 10/113-124 दसवाँ अध्याय 285
उन्हें खाते नहीं और वे मुझसे बार-बार पूछते हैं कि
क्या आपने उन्हें खा लिया? मैं उन सबकी कितनी
वञ्चना करूँ, मेरा इससे कैसे छुटकारा होगा?"॥ 113-115 ॥
महाप्रभुके द्वारा भक्तोंके दुःखके कारणकी जिज्ञासा :—
प्रभु कहे,—“आदिवस्या' दुःख काँहे माने?
केबा कि दियाछे, ताहा आनह एखाने॥”116॥
अनुवाद—महाप्रभुने कहा,—“जो मेरे साथमें पहलेसे
रहते आये हैं, वे दुःख क्यों करेंगे? किसने क्या दिया
है, तुम उसे यहाँ लेकर आओ॥”116॥
अमृतप्रवाह भाष्य—'आदिवस्या',—पहलेसे ही जिनका
वास है, उन्हें 'आदिवस्या' कहते हैं। महाप्रभुने कहा,—जो
'आदिवस्या' अर्थात् पहलेसे ही मेरे साथ इकट्ठे रहते
आये हैं, उनका इसमें कोई दुःख नहीं है; क्योंकि अभी
जो गौड़से [मेरे पूर्व सङ्गी] आये हैं, वे ही तो इन सब
सुस्वादिष्ट खाद्य वस्तुओंको लाये हैं॥ 116 ॥
अनुभाष्य—'आदिवस्या',—किसी-किसीके मतानुसार
'भाग्यहीन' अथवा अबोध अथवा निर्बोध, चञ्चलमति
अथवा आ-देखला (अतिव्यग्र, किसी वस्तुके लिये
बहुत लोभी जैसे उसने कभी वैसी वस्तु देखी नहीं है)
आदि अर्थोंमें प्रयोग होता है॥ 116 ॥
महाप्रभुका भोजनके लिये बैठना, श्रीगोविन्दके
द्वारा प्रत्येक नैवेद्य देनेवाले गौड़ीय-भक्तके
नामका उल्लेख करके नैवेद्य परोसना :—
एत बलि' महाप्रभु बसिला भोजने।
नाम धरि' गोविन्द करे निवेदने॥ 117 ॥
“आचार्येर एइ पैड़, नाना-रस-पूपी।
एइ अमृत-गुटिका, मण्डा, कर्पूर-कुपी ॥ 118 ॥
अनुवाद—यह कहकर महाप्रभु भोजन करनेके
लिये बैठ गये। तब श्रीगोविन्द भक्तोंके नामके साथ जो
वे लेकर आये थे, वह बताने लगे,—“श्रीअद्वैताचार्य यह
नारियल, अनेक प्रकारके रसयुक्त मिष्ठान्न, यह
अमृत-गुटिका, मण्डा और कर्पूर-कुपी लेकर आये
हैं॥ 117-118 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—'पैड़',—(उत्कल-शब्द)
नारियल ॥ 118 ॥
अनुभाष्य—'पूपी'—पिष्टक (पीठा) ; 'कुपी',—मिट्टीका
पात्र (कर्पूर जलानेके लिये ?) ॥ 118 ॥
श्रीवास-पण्डितेर एइ अनेक प्रकार।
पिठा, पाना, अमृतमण्डा, पद्म-चिनि आर॥ 119 ॥
आचार्यरत्नेर एइ सब उपहार।
आचार्यनिधिर एइ, अनेक प्रकार॥ 120 ॥
वासुदेव-दत्तेर, मुरारिगुप्तेर आर।
बुद्धिमन्त-खाँनेर एइ विविध प्रकार ॥ 121 ॥
श्रीमान्-सेन, श्रीमान्-पण्डित, आचार्यनन्दन।
ताँ-सबार दत्त एइ करह भोजन ॥ 122 ॥
कुलीनग्रामेर एइ आगे देख यत।
खण्डवासी लोकेर एइ देख तत॥” 123 ॥
अनुवाद—श्रीवास पण्डित पिठा, पाना, अमृतमण्डा
और पद्मचीनी लाये हैं। श्रीआचार्यरत्न ये सब उपहार
लाये हैं और श्रीआचार्यनिधि ये अनेक प्रकारकी भेंट
लाये हैं। श्रीवासुदेव दत्त, श्रीमुरारि गुप्त और श्रीबुद्धिमन्त
खाँन इन विविध प्रकारकी खाद्य वस्तुओंको लाये हैं।
श्रीमान् सेन, श्रीमान् पण्डित, श्रीआचार्य नन्दनके द्वारा
लायी सब वस्तुओंको आप खाइये। अब आपके आगे
रखे द्रव्य कुलीनग्रामवासी लाये हैं और इधर खण्डवासी
भक्तों द्वारा लाये गये द्रव्योंको भी देखिये॥” 119-123 ॥
महाप्रभुके द्वारा सभीके द्वारा प्रदान
किये गये नैवेद्योंका भोजन :—
ऐछे सबार नाम लञा प्रभुर आगे धरे।
सन्तुष्ट हञा प्रभु सब भोजन करे ॥ 124 ॥
अनुवाद—श्रीगोविन्द इस प्रकार सभी भक्तोंका नाम
लेकर उनके द्वारा लायी वस्तुओंको महाप्रभुके आगे
रखते गये। महाप्रभु उन प्रेमपूर्वक दी गयीं भेंटोंसे
सन्तुष्ट हुए और उन सबको खाने लगे॥ 124 ॥