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श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

[ 23/41-46 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
व्यक्ति ही चमत्कृत होते हैं। किन्तु भक्ति-सिद्धान्तको
जाननेवाले व्यक्ति उसे 'रतिका आभास' कहते हैं॥41॥
पाँच रसोंसे ही श्रीकृष्ण वशीभूत :—
एइ पञ्च स्थायिभावे हय पञ्च 'रस'।
ये-रसे भक्त 'सुखी', कृष्ण हय 'वश'॥42॥
अनुवाद—इन पाँच स्थायी भावोंमें पाँच रस होते
हैं। जिस रसमें भक्त सुखी होता है, श्रीकृष्ण भी उसी
रसमें ही उसके वशीभूत हो जाते हैं॥42॥
अनुभाष्य—'स्थायी भाव'—(भःरःसिः दःविः 5म लः
प्रथम श्लोक)—
“अविरुद्धान् विरुद्धांश्च भावान् यो वशतां नयन्।
सु-राजेव विराजेत स स्थायी भाव उच्यते॥
स्थायी भावोऽत्र स प्रोक्तः श्रीकृष्णविषया रतिः।”
अर्थात् “हास्यादि अविरुद्ध भाव और क्रोधादि
विरुद्ध भावसमूहको जो भाव वशीभूत करके उत्तम
राजाकी भाँति विराजित होता है, वही स्थायी भाव है।
इस स्थानपर श्रीकृष्ण-विषयक रतिको ही 'स्थायी भाव'
कहा जाता है॥”42॥
स्थायीभाव अथवा रतिके साथ सामग्रीके मिलनसे रसकी
उत्पत्ति; रति ही रसका 'मूल' :—
प्रेमादिक स्थायिभाव सामग्री-मिलने।
कृष्णभक्तिरसरूपे पाय परिणामे॥43॥
अनुवाद—प्रेमादि स्थायी-भावके साथ सामग्रीके
मिलनसे श्रीकृष्णभक्ति रसरूपमें परिणत हो जाती
है॥43॥
चार प्रकारकी सामग्री :—
विभाव, अनुभाव, सात्त्विक, व्यभिचारी।
स्थायिभाव 'रस' हय एइ चारि मिलि'॥44॥
उपमा :—
दधि येन खण्ड-मरिच-कर्पूर-मिलने।
'रसालाख्य' रस हय अपूर्वास्वादने॥45॥
अनुवाद—दही जिस प्रकार चीनी, काली मिर्च और
कर्पूरके मिलानेपर अपूर्व आस्वादनीय 'रसाला' रूपी रस
बन जाती है, स्थायीभाव भी उसी प्रकार विभाव,
अनुभाव, सात्त्विक और व्यभिचारी—इन चारोंसे मिलकर
'रस' बन जाता है॥44-45॥
अनुभाष्य—(भःरःसिः दःविः प्रथम लः श्लोक)—
“अथास्याः केशवरतेर्लक्षिताया निगद्यते।
सामग्रीपरिपोषेण परमा रसरूपता॥
विभावैरनुभावैश्च सात्त्विकैर्व्यभिचारिभिः।
स्वाद्यत्वं हृदि भक्तानामानीता श्रवणादिभिः।
एषा कृष्णरतिः स्थायी भावो भक्तिरसो भवेत्॥”
[अर्थात् “बादमें इस कृष्णरतिकी विभावादि सामग्रीके
द्वारा परिपोषणके कारण जो परम रसरूपता प्राप्त होती
है, उसे ही यहाँ कहा गया है। श्रवणादि साधनभक्तिके
अङ्गोंके द्वारा भक्तोंके हृदयमें यह श्रीकृष्णरति-रूप
स्थायी भाव—विभाव, अनुभाव, सात्त्विक और व्यभिचारी
भावोंके द्वारा आस्वादनीय होनेपर भक्तिरसमें परिणत
होता है।”]॥43-44॥
रसके हेतु विभावके दो प्रकार—
(1) आलम्बन और (2) उद्दीपन :—
द्विविध 'विभाव',—आलम्बन, उद्दीपन।
वंशीस्वरादि-उद्दीपन, कृष्णादि-आलम्बन॥46॥
अनुवाद—विभाव दो प्रकारके होते हैं—आलम्बन
और उद्दीपन। श्रीकृष्णआदि आलम्बन और वंशीध्वनि
आदि उद्दीपन कहलाते हैं॥46॥
अनुभाष्य—(भःरःसिः दःविः प्रथम लः श्लोक)—
“तत्र ज्ञेया विभावास्तु रत्यास्वादन-हेतवः।
ते द्विधालम्बना एके तथैवोद्दीपनाः परे॥”
इस विषयमें अग्निपुराणमें—
“विभाव्यते हि रत्यादिर्यत्र येन विभाव्यते।
विभावो नाम स द्वेधालम्बनोद्दीपनात्मकः॥”
अर्थात् “श्रीकृष्णरतिके आस्वादनके कारणको 'विभाव'
कहते हैं; वह दो प्रकारका होता है—आलम्बन और
386 |

तेइसवाँ अध्याय 23/46-48 ]
उद्दीपन। जिससे और जिसके द्वारा रति आदि विभावित
होती है, वही अग्निपुराणादिमें 'विभाव' (आलम्बनमय
और उद्दीपनमय)के नामसे कहा गया है।"
'आलम्बन'-(भःरःसिः दःविः प्रथम लः श्लोक)-
“कृष्णश्च कृष्णभक्ताश्च बुधैरालम्बना मताः।
रत्यादेर्विषयत्वेन तथाधारतयापि च॥”
अर्थात् “रति आदिके (अर्थात् गौण हास्यादि
रसके) विषयरूपमें 'श्रीकृष्ण' और आधार-स्वरूपमें
'श्रीकृष्णभक्त'-इन दोनोंको पण्डितगण 'आलम्बन' कहते
हैं।"
'उद्दीपन'-(भःरःसिः दःविः प्रथम लः श्लोक)-
“उद्दीपनास्तु ते प्रोक्ता भावमुद्दीपयन्ति ये।
ते तु श्रीकृष्णचन्द्रस्य गुणाश्चेष्टाः प्रसाधनम्॥
स्मिताङ्गसौरभे वंशशृङ्गनूपुरकम्बरः।
पदाङ्क-क्षेत्र-तुलसी-भक्त-तद्वासरादयः॥”
अर्थात् “जो भाव प्रकाशित करते हैं, वे ही उद्दीपन
हैं। जैसे-श्रीकृष्णके गुण, चेष्टा और प्रसाधन (कंघे
आदिके द्वारा केश-सँवारना आदि देहकी सज्जाके
उपकरण) और स्मित (मृदुहास्य), अङ्गगन्ध, वंशी,
शृङ्ग, नूपुर, शङ्ख, पदचिह्न, क्षेत्र, तुलसी, भक्त, हरिवासरादि
एकादशी-व्रत ॥" 46॥
रसके 'कार्य' अनुभावके 13 प्रकारके भेद; आठ प्रकारके
सात्त्विक भी रसके 'कार्य' :-
‘अनुभाव’—स्मित, नृत्य, गीतादि उद्भास्वर।
स्तम्भादि-‘सात्त्विक’ अनुभावेर भितर॥ 47 ॥
अनुवाद—मन्दहास्य, नृत्य, गीतादि उद्भास्वर (देहके
विविध अङ्गोंमें प्रकट होनेवाले)—ये 'अनुभाव' हैं। और
स्तम्भादि 'सात्त्विक' भाव अनुभावके अन्तर्भुक्त ही
हैं॥ 47 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—'उद्भास्वर'-विशेष आङ्गिक
अनुभाव हैं, (वे) पाँच प्रकारके हैं-वेशभूषाका ढीला
होना, शरीरको मोड़ना, जम्भाई, सांसका फूलना, सांस
छोड़ना और सांस भीतर लेना॥ 47 ॥
अनुभाष्य-‘अनुभाव’-(भःरःसिः दःविः द्वितीय लहरी
प्रथम श्लोक)-
“अनुभावास्तु चित्तस्थभावानामवबोधकः।
ते बहिर्विक्रियाप्रायाः प्रोक्ता उद्भास्वराख्या ॥
नृत्यं विलुठितं गीतं क्रोशनं तनुमोटनम्।
हुङ्कारो जृम्भणं श्वासभूमा लोकानपेक्षिता।
लालास्रावोऽट्टहासश्च घूर्णा-हिक्कादयोऽपि च॥
ते शीताः क्षेपणाश्चेति यथाथ्र्याख्या द्विधोदिताः।
शीताः स्युर्गीतजृम्भाद्या नृत्याद्याः क्षेपणाभिधाः॥”
अर्थात् “चित्तमें स्थित भावसमूहके प्रकाशक प्राय
बाह्य-विकार होकर जो 'उद्भास्वर'-नामसे प्रसिद्ध हैं, वे
ही 'अनुभाव' हैं। नृत्य, भूमिपर लोट-पोट, गान,
चिल्लाना, शरीरको मरोड़ना, हुङ्कार, जम्भाई लेना, लम्बी
सांसे लेना, लोगोंकी परवाह नहीं करना, लारका बहना,
अट्टहास, घूर्णा और हिचकी आदि। ये 'शीत' और
'क्षेपण'-इन दो नामोंसे जाने जाते हैं; इनमेंसे गीत
और जम्भाई आदिको 'शीत' और नृत्यादिको 'क्षेपण'
कहते हैं।"
‘उद्भास्वर’—
“उद्भासन्ते स्वधाम्नीति प्रोक्ता उद्भास्वरा बुधैः।
नीव्युत्तरीयधम्मिल्लशंसनं गात्रमोटनम्।
जृम्भा घ्राणस्य फुल्लत्वं निश्वासाद्याश्च ते मताः॥”
अर्थात् “भावयुक्त व्यक्तिके शरीरमें जो-जो प्रकाशित
होता है, पण्डितगण उसे 'उद्भास्वर' कहते हैं। ये नाड़े,
उत्तरीय-वस्त्र और जूड़ेका खुलना या ढीला होना,
शरीरको मोड़ना, जम्भाई, नाकको फुलाना, श्वास
छोड़ना, लोट-पोट खाना और हिचकी आदि पूर्वलिखित
बाह्य विकारसमूह हैं।"
'स्तम्भादि'-मध्यलीला 14/167 संख्या देखें ॥ 47 ॥
रसके 'सहायक' व्यभिचारी भाव-तैंतीस :-
निर्वेद-हर्षादि-तेत्रिश 'व्यभिचारी'।
सब मिलि' 'रस' हय चमत्कारकारी॥ 48 ॥
अनुवाद—निर्वेद-हर्षादि तैंतीस व्यभिचारी भाव हैं।
। 387

[ 23/48-52 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
इन सबके मिलनेपर अत्यन्त चमत्कारी 'रस' बनता अनुवाद—अनुभाष्य देखें॥ 50-51 ॥
है॥ 48 ॥ अनुभाष्य—शान्तरसमें 'रति'की बढ़ते हुए 'प्रेम'
अनुभाष्य—'निर्वेद-हर्षादि'—मध्यलीला 14/167 संख्या तक सीमा है। दास्यरसमें 'दास्यरति' स्नेह, मान, प्रणय
देखें। और राग तक वर्द्धित होती है। सख्यरसमें 'सख्यरति'
'व्यभिचारी'—(भःरःसिः दःविः चतुर्थ लहरी प्रथम स्नेह, मान, प्रणय, राग और अनुराग तक बढ़ती है।
श्लोक)— वात्सल्यरसमें 'वात्सल्यरति' स्नेह, मान, प्रणय, राग और
“त्रयस्त्रिंशद्भावाः ये व्यभिचारिणः। अनुराग तक वर्द्धित होती है। विशेषता यह है कि
विशेषेणाभिमुख्येन चरन्ति स्थायिनं प्रति। सख्यरसाश्रित होनेपर भी सुबलादिकी सख्यरति स्नेह,
वागङ्गसत्त्वसूच्या ये ज्ञेयास्ते व्यभिचारिणः॥ मान, प्रणय, राग, अनुराग और भाव तक वर्द्धित होती
सञ्चारयन्ति भावस्य गतिं सञ्चारिणोऽपि ते। है॥ 50-51 ॥
उन्मज्जन्ति निमज्जन्ति स्थायिन्यमृतवारिधौ।
ऊर्मिवद्वर्द्धयन्त्येनं यान्ति तद्रूपताञ्च ते॥” शान्तादि पाँच रसोंके भेदकी विचित्रता :—
अर्थात् “व्यभिचारी भावसमूह तैंतीस होते हैं। वे शान्तादि रसेर ‘योग’, ‘वियोग’—दुइ भेद।
विशेषतः प्रधानरूपमें स्थायी-भावोंके प्रति विचरण करते सख्य-वात्सल्ये योगादिर अनेक विभेद॥ 52 ॥
हैं। वाक्य, अङ्ग (भ्रू-नेत्रादि) और सत्त्वसे उत्पन्न
अनुभावके द्वारा व्यभिचारी भावसमूह भावकी गतिका अनुवाद—शान्तादि रसोंके दो भेद हैं—'योग' और
सञ्चार करते हैं, इसलिये उन्हें 'सञ्चारी' कहा जाता 'वियोग'। सख्य और वात्सल्य रसमें योग-वियोगके
है। ये स्थायी-भावरूपी अमृत-सागरमें निमग्न होकर अनेक भेद हैं॥ 52 ॥
तरङ्गकी भाँति उसे वर्द्धित कराके स्थायी-भावरूपताको अनुभाष्य—(भःरःसिः पःविः द्वितीय लहरी 41
प्राप्त करते हैं॥”48॥ श्लोक)—
पाँच प्रकारके रसोंका वर्णन :— “अयोगयोगावेतस्य प्रभेदौ कथितावुभौ”
पञ्चविध रस—शान्त, दास्य, सख्य, वात्सल्य। अर्थात् “इस प्रीतिभक्तिरसके ‘अयोग और योग’—ये
मधुर-रस शृङ्गार-भावेते प्राबल्य॥ 49 ॥ दो भेद कहे गये हैं।”
अनुवाद—शान्त, दास्य, सख्य, वात्सल्य और ‘अयोग’—
मधुर—ये पाँच प्रकारके रस हैं। इन सबमेंसे शृङ्गारभाव “सङ्गाभावो हरेर्धीरेरयोग इति कथ्यते।
ही प्रबल है॥ 49 ॥ अयोगे तन्मनस्कत्वं तद्गुणाद्यनुसन्धयः।
'प्रेम' तक शान्तरसके और 'राग' तत्प्राप्त्युपायचिन्ताद्याः सर्वेषां कथिताः क्रियाः॥”
तक दास्यरसकी सीमा :— अर्थात् “पण्डितगण भगवान्‌के साथ सङ्गके अभावको
शान्तरसे शान्ति-रति ‘प्रेम’ पर्यन्त हय। ‘अयोग’ कहते हैं। अयोगमें हरिमनस्कता अर्थात् हरिमें
दास्य-रति ‘राग’ पर्यन्त क्रमेते बाड़य॥ 50 ॥ मनका समर्पण और हरिके गुणों आदिका अनुसन्धान
‘अनुराग’ तक सख्य और वात्सल्यकी सीमा; उनमेंसे किया जाता है। श्रीकृष्ण प्राप्तिके उपायका चिन्तनादि
सुबलादि प्रियनर्म सखाओंकी भी ‘भाव’ तक सीमा :— दासादि सभी भक्तोंकी क्रिया कही जाती है।”
सख्य-वात्सल्य-रति पाय ‘अनुराग’-सीमा। ‘योग’—
सुबलाद्येर ‘भाव’ पर्यन्त प्रेमेर महिमा॥ 51 ॥ “कृष्णेन सङ्गमो यस्तु स योग इति कीर्त्त्यते”
388 ।

तेइसवाँ अध्याय 23/52-57 ]
अर्थात् “श्रीकृष्णके साथ मिलनको 'योग' कहते हैं। द्वारकामें 'रूढ़' और गोकुलमें ही केवल 'अधिरूढ़'-
हैं।” भाव देखा जाता है ॥ 53 ॥
'शान्तादि रसेर'- शान्त और दास्यमें 'योग और अधिरूढ़-महाभाव भी दो प्रकार का-(1) सम्भोगमें
वियोग', ये दो प्रकारके भेद हैं; उनमें योग और 'मादन'-संज्ञा, (2) विप्रलम्भमें 'मोहन'-संज्ञा :-
अयोगके अनेक भेद नहीं हैं। यद्यपि पाँच प्रकारके अधिरूढ़-महाभाव-दुइ त' प्रकार।
रसोंमें ही योग और अयोगका भेद है, किन्तु सख्य सम्भोगे 'मादन', विरहे 'मोहन' नाम तार ॥ 54 ॥
और वात्सल्यमें बहुतसे विभेद हैं।
'योगविभेद'- अनुवाद-अधिरूढ़ महाभाव दो प्रकारका होता
“योगोऽपि कथितः सिद्धिस्तुष्टिस्थितिरिति त्रिधा" है-सम्भोगमें उसका नाम 'मादन' और विरहमें उसका
अर्थात् “योगके तीन प्रकारके भेद हैं-सिद्धि, तुष्टि नाम 'मोहन' होता है ॥ 54 ॥
और स्थिति।” सम्भोगमय 'मादन' और विप्रलम्भमय 'मोहन'में अनेक
'अयोगविभेद'- प्रकारके भाव-भेदका वैचित्र्य :-
“उत्कण्ठत्वं वियोगश्चेत्ययोगोऽपि द्विधोच्यते” 'मादने'- चुम्बनादि हय अनन्त विभेद ।
अर्थात् “'अयोग' दो प्रकारका होता है- 'उत्कण्ठित' 'उद्घूर्णा', 'चित्रजल्प' - 'मोहने' दुइ भेद ॥ 55 ॥
और 'वियोग' ॥" 52 ॥ अनुवाद- 'मादन'में चुम्बनादि अनन्त भेद हैं।
'मोहन'में 'उद्घूर्णा' और 'चित्रजल्प'-ये दो भेद होते
द्वारकामें ऐश्वर्यमयी स्वकीया मधुर-रतिमें हैं ॥ 55 ॥
'रूढ़-महाभाव' और वृन्दावनमें माधुर्यमयी केवला
पारकीया मधुर-रतिमें 'अधिरूढ़-महाभाव' :- भाः 10/47 अध्याय - भ्रमर-गीतमें विप्रलम्भमें श्रीराधिकादि
'रूढ़', 'अधिरूढ़' भाव- केवल 'मधुरे'। गोपियोंका दिव्योन्माद :-
महिषीगणेरे 'रूढ़', 'अधिरूढ़' गोपिका-निकरे ॥ 53 ॥ चित्रजल्पेर दश अङ्ग- प्रजल्पादि-नाम।
'भ्रमर-गीता'र दश श्लोक ताहाते प्रमाण ॥ 56 ॥
अनुवाद-रूढ़ और अधिरूढ़ महाभाव तो केवल अनुवाद-प्रजल्पादि चित्रजल्पके दस अङ्ग हैं।
मधुररसमें हैं। महिषियोंमें 'रूढ़' महाभाव और व्रजगोपियोंमें भ्रमर-गीताके दस श्लोक इसके प्रमाण हैं ॥ 56 ॥
'अधिरूढ़' महाभाव रहता है ॥ 53 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-चित्रजल्प दस प्रकारका है-
अनुभाष्य- 'अधिरूढ़'- (उःनीः स्थायिभाव-प्रः 170)- प्रजल्प, परिजल्प, विजल्प, उज्जल्प, संजल्प, अवजल्प,
“रूढ़ोक्तेभ्योऽनुभावेभ्यः कामप्याप्ता विशिष्टताम् । अभिजल्प, आजल्प, प्रतिजल्प और सुजल्प। 'भ्रमर-गीता'—
यत्रानुभावा दृश्यन्ते सोऽधिरूढ़ो निगद्यते ॥” श्रीमद्भागवतके दशम स्कन्धके 47वें अध्यायमें है ॥ 56 ॥
[अर्थात् “जिस समय उक्त अनुभावसमूह रूढ़भावमें विप्रलम्भमें दिव्योन्मादकी चरम अवस्था - अप्राकृत-
कहे गये अनुभावोंसे भी उत्तरोत्तर किसी विशेष दशाको श्रीकृष्णसेवामयी परम-चमत्कारिणी सर्वोत्तमावस्था :-
प्राप्त होते हैं, उसे अधिरूढ़ महाभाव कहते हैं।”] उद्घूर्णा, विरह-चेष्टा - दिव्योन्माद-नाम।
मधुररसमें मधुर-रति स्नेह, मान, प्रणय, राग, विरहे कृष्णस्फूर्त्ति, आपनाके 'कृष्ण' ज्ञान ॥ 57 ॥
अनुराग, भाव और महाभाव तक वर्धित होती है। रूढ़
और अधिरूढ़-महाभाव केवलमात्र मधुर-रसमें ही विद्यमान अनुवाद-उद्घूर्णा और विरहमें भ्रममय चेष्टाओंका
। 389

[ 23/57-59 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
नाम दिव्योन्माद है। इसमें विरहमें श्रीकृष्णकी स्फूर्त्ति
होती है और भक्त स्वयंको ही 'कृष्ण' मानने लगता
है॥ 57 ॥
अनुभाष्य-मध्यलीला 1/87 संख्या देखें॥ 54-57 ॥
दो प्रकारके शृङ्गार-रस-(1) सम्भोग और
(2) विप्रलम्भ; सम्भोग असंख्य प्रकारका :-
'सम्भोग'-'विप्रलम्भ'-भेदे द्विविध शृङ्गार।
'सम्भोगे'र अनन्त अङ्ग, नाहि अन्त तार॥ 58 ॥
अनुवाद-'सम्भोग' और 'विप्रलम्भ'के भेदसे शृङ्गार
रस दो प्रकारका होता है। 'सम्भोग'के अनन्त अङ्ग हैं,
उनका अन्त नहीं है॥ 58 ॥
अनुभाष्य- 'विप्रलम्भ'-(उःनीः विप्रलम्भ-प्रकरणमें
2-3 श्लोक)-
“यूनोरयुक्तयोर्भावो युक्तयोर्वाथ यो मिथः।
अभीष्टालिङ्गनादीनामनाप्तौ प्रकृष्यते।
स विप्रलम्भो विज्ञेयः सम्भोगोन्नतिकारकः॥”
“न विना विप्रलम्भेन सम्भोगः पुष्टिमश्नुते।”
अर्थात् “नायक-नायिकाके प्रथम मिलनसे पहले
अयुक्त, मिलन होनेके बाद युक्त-इन दोनों समयमें
परस्पर अभीष्ट आलिङ्गनादिकी अप्राप्तिसे जो भाव
होता है, उसे 'विप्रलम्भ' कहते हैं; वह सम्भोगका
पुष्टिकारक है।”
'सम्भोग'-
“दर्शनालिङ्गनादीनामानुकूल्यान्निषेवया।
यूनोरुल्लासमारोहन् भावः सम्भोग ईर्यते॥”
अर्थात् “दर्शन और आलिङ्गनादिके परस्पर
सुख-तात्पर्यमूलक व्यवहारके द्वारा नायक और नायिकाके
उल्लास-प्राप्त भावको 'सम्भोग' कहते हैं।”
इस श्लोककी (1) श्रीजीव-प्रभुकृत-टीका-
'आनुकूल्यादिति काममयः सम्भोगो व्यावृतः।'
अर्थात् “आनुकूल्य कहनेसे काममय अथवा
यथेच्छाचारको पृथक् किया है।”
(2) श्रीचक्रवर्त्ति-टीका-
'पशुवच्छृङ्गारो व्यावृतः।'
अर्थात् “यहाँपर शास्त्रोक्त रीतिसे आचरण-दर्शनादिका
सेवन कहकर पशुवत् शृङ्गारका स्थान नहीं है।”
जाग्रत-अवस्थामें मुख्य-सम्भोग चार प्रकारका है
(1) पूर्वरागके बाद 'संक्षिप्त', (2) मानके बाद 'सङ्कीर्ण',
(3) अल्प दूर प्रवासके बाद 'सम्पन्न' और (4) सुदूर
प्रवासके बाद 'समृद्धिमान्'। स्वप्नावस्थामें गौण-सम्भोग
भी पहलेकी भाँति चार प्रकारका है॥ 58 ॥
चार प्रकारका विप्रलम्भ :-
'विप्रलम्भ' चतुर्विध-पूर्वराग, मान।
प्रवासाख्य, आर प्रेमवैचित्त्य-आख्यान॥ 59 ॥
अनुवाद-'विप्रलम्भ' पूर्वराग, मान, प्रवास और
प्रेम-वैचित्त्यके भेदसे चार प्रकारका है॥ 59 ॥
अनुभाष्य- 'पूर्वराग'-(उःनीः विप्रलम्भ-प्रकरण पाँचवाँ
श्लोक)-
“रतिर्या सङ्गमात् पूर्वं दर्शनश्रवणादिजा॥
तयोरुन्मीलति प्राज्ञैः पूर्वरागः स उच्यते॥”
अर्थात् “जो रति सङ्गमसे पहले दर्शन-श्रवणादिसे
उत्पन्न होकर दोनोंके विभावादिके मिश्रणसे आस्वादमयी
होती है, वही 'पूर्वराग' है।”
'मान'-
“दम्पत्योर्भाव एकत्र सतोरप्यनुरक्तयोः।
स्वाभीष्टाश्लेषवीक्षादिनिरोधी मान उच्यते॥”
अर्थात् “परस्पर अनुरक्त एकत्र अवस्थित अथवा
भिन्न स्थानपर स्थित नायक और नायिकाके अपने
अभीष्टके दर्शन और आलिङ्गनादिका निरोध करनेवाले
भावको 'मान' कहते हैं।”
'प्रवास'-
“पूर्वसङ्गतयोर्यूनोर्भवेद्देशान्तरादिभिः।
व्यवधानस्तु यत्प्राज्ञैः स प्रवास इतीर्यते॥”
अर्थात् “पूर्व-सङ्गमसे युक्त दम्पत्तिकी देशान्तरमें
390 |

तेइसवाँ अध्याय 23/59–63 ]
(दूसरे स्थानमें) गमनादिके कारण उत्पन्न हुई बाधाको
बुद्धिमान् जन 'प्रवास' कहते हैं।”
'प्रेमवैचित्य'—
“प्रियस्य सन्निकर्षेऽपि प्रेमोत्कर्षस्वभावतः।
या विश्लेषधियार्त्तिस्तत् प्रेमवैचित्यमुच्यते॥”
अर्थात् “प्रेमोत्कर्ष-स्वभावसे प्रियके सङ्गमें रहनेपर
भी उसके साथ विरहके भयसे जो आर्त्ति उपस्थित होती
है, वही 'प्रेमवैचित्य' है॥”59॥
अनुभाष्य—द्वारकामें भगवान् श्रीकृष्ण लीलाविलासके
द्वारा महिषियोंके चित्तका हरण करनेपर वे उनमें
आविष्ट होनेके कारण अति निकट होनेपर भी सदैव
'अभी खो बैठेंगी' 'अभी खो बैठेंगी' भावसे युक्त होकर
उन्मत्तकी भाँति इस प्रकार कहती थीं, —
हे कुररि, ईश्वरः (कृष्णः) रात्र्यां गुप्तबोधः (सुप्तचेतनः
इव) स्वपिति (शेते); त्वं तु जगति [एका] वीतनिद्रा [सती]
न शेषे (न स्वपिषि, शयनेच्छामपि न कुरुषे, परन्तु निद्राभङ्गं
कुर्वती) विलपसि (तदनुचितमित्यर्थः)। हे सखि, [अथवा
नापराधस्तव, यतः] वयं इव त्वं नलिन-नयनहासोदारलीलेक्षितेन
(पद्मलोचनस्य भगवतः हासेन सहितम् उदारं यत् लीलेक्षितं
तेन अकुण्ठितस्मितकटाक्षेण) कच्चित् गाढ़-निर्व्विद्धचेता (अतिशयेन
आकृष्टचित्ता)?
श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥61॥
ब्रजमें राधिकादि गोपियों और द्वारकाकी महिषियोंके
विप्रलम्भ भावकी विचित्रता :—
राधिकाद्ये 'पूर्वराग' प्रसिद्ध 'प्रवास', 'माने'।
'प्रेमवैचित्य' श्रीदशमे महिषीगणे॥60॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥60॥
श्रीकृष्ण—नायक-शिरोमणि, श्रीराधा-नायिका-शिरोमणि :—
व्रजेन्द्रनन्दन कृष्ण—नायक-शिरोमणि।
नायिकार शिरोमणि—राधा-ठाकुराणी ॥ 62 ॥
अनुवाद—व्रजेन्द्रनन्दन श्रीकृष्ण नायक शिरोमणि
और श्रीमती राधा ठाकुरानी नायिकाओंमें शिरोमणि
हैं॥62॥
अमृतप्रवाह भाष्य—चार प्रकारके विप्रलम्भमेंसे
राधिकादि गोपियोंके 'पूर्वराग', 'प्रवास' और 'मान'—ये
तीन प्रसिद्ध हैं; [भागवत दशम स्कन्धमें] द्वारकामें
महिषियोंमें 'प्रेमवैचित्य' प्रसिद्ध है॥60॥
महिषियोंको श्रीकृष्णवियोगकी आशङ्का :—
श्रीमद्भागवत (10/90/15)—
कुररि विलपसि त्वं वीतनिद्रा न शेषे
स्वपिति जगति रात्र्यामीश्वरो गुप्तबोधः।
वयमिव सखि कच्चिद्गाढ़निर्व्विद्धचेता
नलिन-नयन-हासोदार-लीलेक्षितेन॥61॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥61॥
प्रमाण :—
भक्तिरसामृतसिन्धु (2/1/17)—
नायकानां शिरोरत्नं कृष्णस्तु भगवान् स्वयम्।
यत्र नित्यतया सर्वे विराजन्ते महागुणाः ॥ 63 ॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥63॥
अमृतप्रवाह भाष्य—स्वयं भगवान् श्रीकृष्ण ही
नायकोंके चूड़ामणि हैं; उन श्रीकृष्णमें सभी महान् गुण
नित्यरूपमें विराजमान हैं॥63॥
अमृतप्रवाह भाष्य—हे सखि, कुररि, देखो ! इस
रात्रिकालमें सुप्तचेतनके जैसे ईश्वर श्रीकृष्ण सो रहे हैं
और तुम्हें निद्रा नहीं आनेके कारण तुम सो नहीं रही
हो, केवल विलाप [करके निद्रा भङ्ग] कर रही हो [यह
अनुचित है]। अथवा [तुम्हारा भी अपराध नहीं है]
कमलनयन श्रीकृष्णके हास्य और उदारलीलाके दर्शनसे
हमारी भाँति क्या तुम्हारा चित्त भी अतिशय आकृष्ट
होनेसे ऐसा कर रही हो?॥61॥
अनुभाष्य—
नायकानां मध्ये स्वयं भगवान् कृष्णस्तु शिरोरत्नं (चूड़ामणिः);
यत्र (कृष्णे) सर्वे महागुणाः नित्यतया विराजन्ते (शोभन्ते)।
श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥63॥
। 391

[ 23/64–72 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला ]


[बायाँ स्तम्भ]

श्रीराधिकाके आठ विशेषण :—
बृहद्-गौतमीय तन्त्र-वाक्य—
देवी कृष्णमयी प्रोक्ता राधिका परदेवता।
सर्वलक्ष्मीमयी सर्वकान्तिः सम्मोहिनी परा ॥ 64 ॥

**अनुवाद—**श्रीराधा 'देवी', 'साक्षात्कृष्णमयी', 'राधिका', 'परदेवता', 'सर्वलक्ष्मीमयी', 'सर्वकान्ति', 'कृष्णसम्मोहिनी' और 'पराशक्ति' नामसे कही गयी हैं॥64॥

**अनुभाष्य—**आदिलीला 4/83 संख्या देखें ॥ 64 ॥

श्रीकृष्णके असंख्य सद्गुणोंमेंसे चौंसठ प्रधान गुण :—
अनन्त कृष्णेर गुण, चौषष्टि—प्रधान।
एक एक गुण शुनि' जुड़ाय भक्त-काण ॥ 65 ॥

**अनुवाद—**श्रीकृष्णके अनन्त गुणोंमेंसे उनके चौंसठ प्रधान गुण हैं। उन असंख्य गुणोंमेंसे एक-एक गुणके विषयमें सुनकर भक्तोंके कान तृप्त होते हैं॥65॥

चौंसठ गुणोंकी तालिका; पहले पचास गुणोंका वर्णन :—
भक्तिरसामृतसिन्धु (2/1/23-29)—
अयं नेता सुरम्याङ्गः सर्वसल्लक्षणान्वितः।
रुचिरस्तेजसा युक्तो बलीयान् वयसान्वितः ॥ 66 ॥
विविधाद्भुतभाषावित् सत्यवाक्यः प्रियंवदः।
वावदूकः सुपाण्डित्यो बुद्धिमान् प्रतिभान्वितः ॥ 67 ॥
विदग्धश्चतुरो दक्षः कृतज्ञः सुदृढ़व्रतः।
देशकाल-सुपात्रज्ञः शास्त्रचक्षुः शुचिर्वशी ॥ 68 ॥
स्थिरो दान्तः क्षमाशीलो गम्भीरो धृतिमान् समः।
वदान्यो धार्मिकः शूरः करुणो मान्यमानकृत् ॥ 69 ॥
दक्षिणो विनयी ह्रीमान् शरणागतपालकः।
सुखी भक्तसुहृत् प्रेमवश्यः सर्वशुभङ्करः ॥ 70 ॥
प्रतापी कीर्त्तिमान् रक्तलोकः साधुसमाश्रयः।
नारीगण-मनोहारी सर्वाराध्यः समृद्धिमान् ॥ 71 ॥
वरीयानीश्वरश्चेति गुणास्तस्यानुकीर्त्तिताः॥
समुद्रा इव पञ्चाशद्दुर्विगाहा हरेरमी ॥ 72 ॥


[दायाँ स्तम्भ]

**अनुवाद—**अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 66-72 ॥

**अमृतप्रवाह भाष्य—**ये नायकरूपी श्रीकृष्ण—1) परम रमणीय अङ्गोंसे युक्त, 2) सब प्रकारके सुलक्षणोंसे युक्त, 3) सुन्दर, 4) महातेजवान्, 5) बलवान्, 6) किशोर अवस्थासे युक्त, 7) विविध अद्भुत भाषाओंको जाननेवाले, 8) सत्यवचन, 9) प्रियवचनोंसे युक्त, 10) वाक्पटु (बात करनेमें निपुण), 11) सुपाण्डित, 12) बुद्धिमान्, 13) प्रतिभायुक्त, 14) विदग्ध (निपुण), 15) चतुर, 16) दक्ष, 17) कृतज्ञ, 18) सुदृढ़व्रत, 19) देश-काल और पात्रको जाननेवाले, 20) शास्त्र दृष्टियुक्त, 21) शुचि (पवित्र), 22) स्वयंको वशमें रखनेवाले, 23) स्थिर, 24) दमनशील, 25) क्षमाशील, 26) गम्भीर, 27) धृतिमान्, 28) समसौम्यचरित्र, 29) वदान्य, 30) धार्मिक, 31) शूर, 32) करुण, 33) मान देनेवाले, 34) दक्षिण, 35) विनयी, 36) लज्जायुक्त, 37) शरणागतपालक, 38) सुखी, 39) भक्तबन्धु, 40) प्रेमवश्य, 41) सर्वशुभकारी, 42) प्रतापी, 43) कीर्त्तिमान्, 44) लोकानुरक्त, 45) साधुओंके समाश्रय, 46) नारीके मनका हरण करनेवाले, 47) सर्वाराध्य, 48) समृद्धिमान्, 49) श्रेष्ठ और 50) ऐश्वर्ययुक्त—इन पचास गुणोंसे युक्त हैं॥66-72॥

अनुभाष्य—
अयं नेता (नायकः कृष्णः) सुरम्याङ्गः (परम-रमणीयाङ्ग-सन्निवेशयुक्तः) सर्वसल्लक्षणान्वितः (सामुद्रिक-शास्त्रोक्त-गुणोत्थद्वात्रिंशच्छुभचिह्नयुक्तः अङ्गोत्थषोडशरेखासमन्वितश्च) रुचिरः (लोचनानन्दिसौन्दर्यविशिष्टः) तेजसायुक्तः (तेजस्वी,) बलीयान् (बली), वयसान्वितः (नित्यकिशोरवयः) विविधाद्भुतभाषावित् (नानापूर्व-भावभाषाकुशलः) सत्यवाक्यः (ऋतगीः), प्रियम्वदः, वावदूकः (श्रुतिमधुररसालङ्कारादियुक्तवचन-प्रयोगक्षमः), सुपाण्डित्यः (अप्राकृतविद्यानिपुणः) प्रतिभान्वितः (नवनवप्रकाश-शालिनीबुद्धियुक्तः), विदग्धः (कलाविलासकुशलः), चतुरः (धीमान्), दक्षः (निपुणः), कृतज्ञः (भक्तप्रेमप्रतिदानकारी), सुदृढ़व्रतः (सत्यसन्धः), देशकालसुपात्रज्ञः (देशकालपात्रवित्), शास्त्रचक्षुः (वेददृक्), शुचिः, वशी (आत्मवशः), स्थिरः (अचलः आफलोदयकर्मकृत्), दान्तः (क्लेशसहिष्णुः), क्षमाशीलः


392 |

तेइसवाँ अध्याय 23/66-75 ]
(पराधसहिष्णुः), गम्भीरः, धृतिमान् (अवरुद्धसौरतः, जितेन्द्रियः), पचास गुण बूँद-बूँदरूपमें सभी जीवोंमें विद्यमान :-
समः (रागद्वेषविहीनः), वदान्यः (उदारः), धार्मिकः, शूरः भक्तिरसामृतसिन्धु (2/1/30)—
(समरे उत्साहान्वितः), करुणः (दयालु), मान्यमानकृत् जीवष्वेते वसन्तोऽपि बिन्दुबिन्दुतया क्वचित्।
(माननीयजनेषु पूजकः), दक्षिणः (सरलोदारः), विनयी (अमानी), परिपूर्णतया भान्ति तत्रैव पुरुषोत्तमे॥73॥
ह्रीमान् (आत्मप्रशंसायां लज्जाशीलः), शरणागतपालकः
(प्रपन्नरक्षकः), सुखी (नित्यामोदी), भक्तसुहृत् (सेवकबन्धुः), अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥73॥
प्रेमवश्यः (प्रेमबाध्यः), सर्वशुभङ्करः (सर्वेषां हितकारी), प्रतापी अमृतप्रवाह भाष्य—ये पचास गुण बिन्दु-बिन्दुरूपमें
(प्रभावशाली), कीर्त्तिमान् (सुभद्रश्रवाः), लोक-रक्तः सभी जीवोंमें हैं, किन्तु परिपूर्ण-समुद्ररूपमें पुरुषोत्तम
(लोकानुरागभाक्), साधुसमाश्रयः (जगति सज्जनपक्षाश्रितः), श्रीकृष्णमें विद्यमान हैं॥73॥
नारीगणमनोहारी (भुवनमनोमोहनः), सर्वाराध्यः (सर्वेश्वरः), समृद्धिमान्
(वैभवशाली), वरीयान् (श्रेष्ठः), ईश्वरः (प्रभुः) च-इति अमी अनुभाष्य—
पञ्चाशत् गुणाः समुद्राः (पाररहिताः सिन्धवः) इव दुर्विगाहाः एते गुणाः बिन्दुबिन्दुतया क्वचित् जीवेषु वसन्तः अपि
(सम्यक् ज्ञातुम अशक्याः अगाधाः इत्यर्थः)। तत्रैव पुरुषोत्तमे परिपूर्णतया भान्ति।
श्लोक-भावानुवाद—ये नायकरूपी श्रीकृष्ण—परमरमणीय श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥73॥
अङ्गोंसे युक्त, सामुद्रिक-शास्त्रमें कहे गये गुणोंसे उत्पन्न और भी पाँच अधिक गुणोंका वर्णन;
बत्तीस शुभ चिह्नोंसे और अङ्गोंसे उत्पन्न सोलह रुद्रादि श्रेष्ठ-जीवोंमें ये पचपन गुण आंशिकरूपमें
रेखाओंसे युक्त, नेत्रोंको आनन्द देनेवाले सौन्दर्यसे युक्त, और विष्णुमें पूर्णरूपमें नित्य विद्यमान :-
तेजस्वी, बलवान्, नित्यकिशोर अवस्थाके, नाना अपूर्व भक्तिरसामृतसिन्धु (2/1/37-38)—
भाव-भाषामें कुशल, सत्यवचन, प्रिय वचन कहनेवाले, अथ पञ्चगुणा ये स्युरंशेन गिरिशादिषु।
सुननेमें मधुर रस-अलङ्कारादियुक्त वचनोंके प्रयोग करनेमें सदा स्वरूपसम्प्राप्तः सर्वज्ञो नित्यनूतनः ॥74॥
सक्षम, अप्राकृतविद्यामें निपुण, नव-नव प्रकाशशालिनी सच्चिदानन्दसान्द्राङ्गश्चिदानन्दघनाकृतिः।
बुद्धिसे युक्त, कलाविलासमें कुशल, चतुर, निपुण,
भक्तके प्रेमके प्रतिदानकारी, सुदृढ़व्रत, देश-काल-पात्रको स्ववशाखिलसिद्धिः स्यात् सर्वसिद्धिनिषेवितः ॥75॥
जाननेवाले, वेद-शास्त्रोंके पूर्ण ज्ञाता, पवित्र, आत्मवशकारी, अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥74-75॥
फलोदय होने तक कर्म करनेमें अटल, क्लेश सहनेमें अमृतप्रवाह भाष्य—उपरोक्त पचास गुणोंके ऊपर
सहिष्णु, दूसरोंके अपराधके प्रति सहनशील, गम्भीर, और भी पाँच महागुण परिपूर्ण मात्रामें श्रीकृष्णमें
जितेन्द्रिय, रागद्वेषविहीन, उदार, धार्मिक, युद्धमें उत्साहयुक्त, (विष्णुमें) और आंशिक रूपमें शिवादि-देवताओंमें
दयालु, माननीयजनोंके पूजक, सरल और उदार, अपने विद्यमान हैं—(1) सदैव स्वरूपमें स्थित, (2) सर्वज्ञ,
मानकी इच्छा नहीं करनेवाले, आत्मप्रशंसामें लज्जाशील, (3) नित्य-नवीन, (4) सच्चिदानन्दघनीभूतस्वरूप,
शरणागतपालक, नित्य-आमोदी, सेवकबन्धु, प्रेमके वशीभूत, (5) समस्त प्रकारकी सिद्धियोंको वशमें रखनेवाले,
सबके हितकारी, प्रभावशाली, कीर्तिमान्, लोगोंके अनुरागके इसलिये सभी सिद्धियोंके द्वारा भलीभाँति सेवित॥74-75॥
पात्र, साधुजनोंके आश्रय, त्रिभुवनके मनको मोहन
करनेवाले, सर्वेश्वर, वैभवशाली, श्रेष्ठ, और प्रभु हैं। अनुभाष्य—
उनके ये पचास गुण अपार सिन्धुके समान हैं जिन्हें अथ गिरिशादिषु (शिवादिषु) ये पञ्चगुणाः अंशेन (अपूर्णभावेन)
सम्पूर्ण रूपसे जाननेमें कोई भी सक्षम नहीं है-यह स्युः (वर्त्तन्ते, ते उच्यन्ते);-सदास्वरूप-सम्प्राप्तः (मायया
अर्थ है॥66-72॥ अनभिभाव्यानुभूतिविशिष्टः), सर्वज्ञः (अभिज्ञः, भूतभविष्यद्वर्त्तमानेति
। 393

[ 23/74-80 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
त्रिकालज्ञः), नित्यनूतनः (स्वमाधुरीभिः अननुभूतः इव
नवनवायमानः), सच्चिदानन्दसान्द्राङ्गश्चिदानन्दघनाकृतिः (घन-
सच्चिदानन्दविग्रहाकारः) सर्वसिद्धिनिषेवितः (सर्वैः प्राप्यफलैरर्चित-
चरणः) स्ववशाखिलसिद्धिः स्यात् [पाठान्तरे, स्ववशेत्यादि-
शेषद्विचरणयोरभावः]।
श्लोक-भावानुवाद—[श्रीकृष्णमें (विष्णुमें) परिपूर्ण
मात्रामें] अन्य पाँच महागुण आंशिक रूपमें
शिवादि-देवताओंमें विद्यमान हैं—(1) मायाकार्यके वशीभूत
नहीं हैं, (2) सर्वज्ञ अर्थात् भूत-वर्तमान-भविष्य-तीनों
कालोंको जाननेवाले, (3) नित्य-नवीन अर्थात् जो
अननुभूतके समान अपनी माधुरीके द्वारा चमत्कारिता
सम्पादन करते हैं, (4) सच्चिदानन्दघनीभूतस्वरूप,
(5) समस्त प्रकारकी सिद्धियाँ जिनकी सदा सेवा करती
हैं, इसलिये वे समस्त सिद्धियोंको वशमें रखनेवाले हैं।
[पाठान्तरमें—श्लोकमें स्ववशादि दो चरण नहीं हैं] ॥ 74-75 ॥
श्रीनारायणमें और भी पाँच अधिक गुण अर्थात्
साठ गुण परिपूर्ण रूपमें अवस्थित :—
भक्तिरसामृतसिन्धु (2/1/39-40)—
अथोच्यन्ते गुणाः पञ्च ये लक्ष्मिशादि-वर्त्तिनः।
अविचिन्त्यमहाशक्तिः कोटिब्रह्माण्डविग्रहः॥ 76 ॥
अवतारावलीबीजं हतारिगतिदायकः।
आत्मारामगणाकर्षीत्यमी कृष्णे किलाद्भुताः॥ 77 ॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 76-77 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—परव्योमनाथ श्रीनारायणादिमें और
भी पाँच गुण विद्यमान हैं। वे श्रीकृष्णमें भी परिपूर्ण
मात्रामें रहते हैं, किन्तु शिवादि देवताओं अथवा जीवोंमें
नहीं हैं। (1) असीम महाशक्तिशाली, (2) करोड़ों
ब्रह्माण्डोंमें व्याप्त विग्रहवाले, (3) सब अवतारोंके बीज
स्वरूप, (4) मारे गये शत्रुओंको भी सुगति प्रदान
करनेवाले, (5) आत्मारामजनोंको (ब्रह्मभूत मुक्त
परमहंसजनोंको) भी आकर्षित करनेवाले—ये पाँच गुण
श्रीनारायणादिमें होनेपर भी श्रीकृष्णमें अद्भुतरूपमें
विराजमान हैं॥ 76-77 ॥
अनुभाष्य—
अथ लक्ष्मिशादिवर्त्तिनः (लक्ष्मीपति-नारायणादि-विग्रहे
वर्त्तमानाः) ये पञ्चगुणाः, ते उच्यन्ते—अविचिन्त्य-महाशक्तिः
(अपरिमेय-महाशक्तिशाली), कोटिब्रह्माण्डविग्रहः (कोटिब्रह्माण्ड-
व्यापी विग्रहो यस्य सः), अवतारावलीबीजं (निखिलावतार-कारणं),
हतारिगतिदायकः (निहतशत्रूणामपि मुक्तिदाता), आत्मारामगणाकर्षी
(ब्रह्मभूतमुक्तपरमहंसानामपि आकर्षकः) इति अमी (गुणाः)
कृष्णे अद्भुताः किल।
श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 76-77 ॥
स्वयं श्रीकृष्णमें श्रीनारायणकी अपेक्षा और भी
चार निजी अधिक गुण अर्थात् कुल चौंसठ
गुण परिपूर्णमात्रामें नित्य-विद्यमान :—
भक्तिरसामृतसिन्धु (2/1/41-44)—
सर्वाद्भुतचमत्कार-लीलाकल्लोलवारिधिः।
अतुल्यमधुरप्रेम-मण्डितप्रियमण्डलः॥ 78 ॥
त्रिजगन्मानसाकर्षि-मुरलीकलकूजितः।
असमानोर्ध्वरूपश्री-विस्मापितचराचरः॥ 79 ॥
लीला-प्रेम्णा प्रियाधिक्यं माधुर्यं वेणुरूपयोः।
इत्यसाधारणं प्रोक्तं गोविन्दस्य चतुष्टयम्।
एवं गुणाश्चतुर्भेदाश्चतुःषष्टिरुदाहृताः॥ 80 ॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 78-80 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—इन साठ गुणोंके अतिरिक्त और
भी चार गुण श्रीकृष्णमें प्रकाशित है; वे श्रीनारायणमें भी
प्रकाशित नहीं हैं—(1) सभी लोगोंको चमत्कृत कर
देनेवाली लीलाओंका कल्लोल-समुद्र, (2) शृङ्गाररसके
अतुलनीय प्रेमकी शोभासे युक्त प्रियाओंके द्वारा सदा
परिवेष्टित, (3) [गोलोक, परव्योम और देवीधाम, इन]
तीनों लोकोंके चित्तको आकर्षित करनेवाली मुरलीके
गीतका गान करनेवाले, (4) जिनके समान और जिनसे
श्रेष्ठ कोई नहीं है और जो चराचरको अपने सौन्दर्यसे
विस्मित करते हैं। इस प्रकारकी (प्रेममयी) लीला, अति
उत्कृष्ट प्रियाका सङ्ग (अर्थात् प्रेमिक-प्रियजनोंके प्रति
वात्सल्य), रूपमाधुर्य और वेणुमाधुर्य—ये चार श्रीकृष्णके
394 ।

तेइसवाँ अध्याय 23/78-86 ]
असाधारण गुण हैं। चार प्रकारके भेदसे अर्थात्
साधारण-जीव, शिवादि देवता, श्रीनारायणादि परमेश्वर-
स्वरूप और साक्षात् (स्वयंरूप) श्रीगोविन्दके भेदसे,
कुल मिलाकर चौंसठ गुण बतलाये गये हैं॥78-80॥
अनुभाष्य-
सर्वाद्भुतचमत्कार-लीला-कल्लोल-वारिधिः (सर्वेषाम् अद्भुतानां
चमत्कारः विस्मयोत्पादकः यतः एवम्भूता या लीलाकल्लोलानां
तरङ्गाणां वारिधिः, सकलविचित्रविस्मयकारिणी-लीलाश्रयः)
अतुल्यमधुरप्रेममण्डितप्रियमण्डलः (अतुल्येन मधुर-प्रेम्णा मण्डितः
प्रियजनसमूहः येन सः, अनुपम-मधुरप्रेमालङ्कृत निजप्रेष्ठजनः)
त्रिजगन्मानसाकर्षिमुरलीकल-कूजितः (गोलोक-परव्योम-देवीधामेति
त्रयाणां त्रिजगतां मानसानि आकृष्टं शीलमस्य तथाभूतं मुरल्याः
वंश्याः कलं मधुरास्फुटं कूजितं ध्वनिः यस्य सः),
असमानोध्र्वरूपश्रीविस्मापित-चराचरः (येन सह समं यतः
ऊर्ध्वं रूपम् अन्येषां नास्ति, तादृशाद्वितीय-सौन्दर्य-श्रिया विस्मापितं
कौतुहलोत्पादितं चराचरं स्थिर-जङ्गमं येन सः)। लीलाप्रेम्णा
प्रियाधिक्यं वेणुरूपयोः माधुर्यम् इति गोविन्दस्य असाधारणं
चतुष्टयं [लक्षणं] प्रोक्तम्-एवं चतुर्भेदाः गुणाः [सर्वसाकल्येन]
चतुःषष्टिः उदाहृताः।
श्लोक-भावानुवाद- अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥78-80॥
श्रीराधिकाके श्रीकृष्णको आकर्षित करनेवाले
पचीस गुणोंका वर्णन :-
अनन्त गुण श्रीराधिकार, पँचिश-प्रधान।
येइ गुणेर 'वश' हय कृष्ण भगवान्॥81॥
अनुवाद- श्रीमती राधिकाके भी अनन्त गुण हैं,
जिनमेंसे पचीस प्रधान गुण हैं। श्रीमती राधिकाके इन
गुणोंके द्वारा भगवान् श्रीकृष्ण भी वशीभूत हो जाते
हैं॥81॥
उज्ज्वलनीलमणिमें श्रीराधाप्रकरण (11-15)में :-
अथ वृन्दानेश्वर्याः कीर्त्यन्ते प्रवरा गुणाः।
मधुरेयं नववयाश्चलापाङ्गोज्ज्वलस्मिता॥82॥
चारु-सौभाग्यरेखाढ्या गन्धोन्मादितमाधवा।
सङ्गीतप्रसराभिज्ञा रम्यवाक् नर्मपण्डिता॥83॥
विनीता करुणापूर्णा विदग्धा पाटवान्विता।
लज्जाशीला सुमर्यादा धैर्या गाम्भीर्यशालिनी॥84॥
सुविलासा महाभावपरमोत्कर्षतर्षिणी।
गोकुलप्रेमवसतिर्जगच्छ
गुर्वर्पितगुरुस्नेहा सखीप्रणयितावशा।
कृष्णप्रियावलीमुख्या सन्तताश्रव-केशवा॥86॥
अनुवाद- अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥82-86॥
अमृतप्रवाह भाष्य- अब वृन्दानेश्वरी श्रीराधिकाके
प्रधान-प्रधान गुणोंका वर्णन किया जा रहा है,-
(1) माधुर्यवती, (2) नवीनवयसयुक्ता अर्थात् किशोरी,
(3) चञ्चल-नेत्रोंवाली, (4) उज्ज्वल-हास्यसे युक्त,
(5) सुन्दर-सौभाग्य रेखाओंसे युक्त, (6) अपनी सुगन्धसे
श्रीकृष्णको उन्मादित करनेवाली, (7) सङ्गीतके विस्तारमें
पारदर्शी, (8) रमणीय वाणीसे युक्त, (9) नर्म-परिहासादि
गुणोंमें पण्डिता, (10) विनीता, (11) करुणा-पूर्णा,
(12) चतुरा, (13) कर्त्तव्य-कुशला, (14) लज्जाशीला,
(15) सुमर्यादा पालनकारिनी, (16) धैर्ययुक्ता,
(17) गाम्भीर्यमयी, (18) सुविलासयुक्ता, (19) परमोत्कर्षमें
महाभावमयी, (20) गोकुलवासियोंके प्रेमकी आश्रय,
(21) अखिल ब्रह्माण्डमें यश-युक्ता, (22) गुरुजनोंमें
समर्पित गुरुस्नेहवती, (23) सखियोंके प्रणयके वशीभूत
रहनेवाली, (24) श्रीकृष्णप्रिया रमणियोंमें मुख्या,
(25) सदा श्रीकेशवको अपने अधीन करनेवाली॥82-86॥
अनुभाष्य-
अथ वृन्दानेश्वर्याः (श्रीराधिकायाः) प्रवराः (प्रधानाः)
गुणाः कीर्त्यन्ते,- इयं (श्रीराधिका) मधुरा (माधुर्यवती), नववयाः
(नवं वयः यस्याः सा, किशोरी), चलपाङ्गा (चलः चञ्चलः
अपाङ्गः यस्याः सा), चारुसौभाग्यरेखाढ्या (चारवः सौभाग्यरेखाः
ताभिः आढ्या युक्ता), गन्धोन्मादितमाधवा (गन्धेन स्वीयाङ्गसुरभिणा
उन्मादितः माधवो यया), सङ्गीत-प्रसराभिज्ञा (सङ्गीतस्य प्रसरे
विस्तारे अभिज्ञा पारदर्शिनी), रम्यवाक् (रम्या श्रुतिमनोज्ञा
वाक् यस्याः सा), नर्मपण्डिता (नर्मणि परिहासकर्मणि पण्डिता
। 395

अभिज्ञा), विनीता (नम्रा), करुणापूर्णा (स्वाश्रित गोपी-दुःखसहने
असमर्था, परम-दयामयी), विदग्धा (रतिकलाभिज्ञा) पाटवान्विता
(कर्त्तव्य-कुशला), लज्जाशीला (स्वप्रशंसायां वीतस्पृहा), सुमर्यादा
(कृष्ण-गौरविणी), धैर्या (धीरा) गाम्भीर्यशालिनी (अचञ्चला),
सुविलासा (लीलामयी), महाभावपरमोत्कर्षतर्षिणी (महाभावस्य
परमोत्कर्षविषये तृष्णान्विता), गोकुलप्रेमवसतिः (गोकुलवासिनां
प्रेमास्पदं), जगच्छ्र
लसन्ति यशांसि यस्याः सा), गुर्वर्पित-गुरुस्नेहा (गुरुजनानामधिक-
स्नेह पात्री), सखीप्रणयितावशा (सखीनां प्रणयितस्य प्रणयभावस्य
वशा वशीभूता), कृष्णप्रियावली-मुख्या (कृष्णप्रेष्ठा),
सन्तताश्रवकेशवा (सन्ततं अविरतम् आश्रवः वशंवदः केशवः
यस्याः सा)।
श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 82-86 ॥

दो प्रकारके आलम्बन—(1) एकमात्र ‘विषय’ श्रीकृष्ण
और (2) बहुत प्रकारके ‘आश्रय’,
उनमेंसे श्रीराधाकी सर्वश्रेष्ठता :—
नायक-नायिका,—दुइ रसेर ‘आलम्बन’।
सेइ दुइ श्रेष्ठ,—राधा, व्रजेन्द्रनन्दन ॥ 87 ॥

अनुवाद—नायक और नायिका,—ये दोनों रसके
आलम्बन हैं। श्रीराधा और श्रीव्रजेन्द्रनन्दन श्रीकृष्ण ही
सर्वश्रेष्ठ नायिका और नायक हैं॥ 87 ॥

शान्तके अतिरिक्त अन्य सेवकोंकी चार प्रकारके रसोंमें
श्रीकृष्णसेवाका वर्णन :—
एइमत दास्ये दास, सख्ये सखागण।
वात्सल्ये माता पिता आश्रयालम्बन ॥ 88 ॥
एइ रस अनुभावे यैछे भक्त-गण।
यैछे रस हय, शुन ताहार लक्षण ॥ 89 ॥

अनुवाद—अनुभाष्य देखें ॥ 88-89 ॥
अनुभाष्य—जिस प्रकार व्रजेन्द्रनन्दन और वृषभानु-
कुमारी मधुर-रसमें दो श्रेष्ठ आलम्बन हैं, उसी प्रकार
दास्यरसमें व्रजेन्द्रनन्दन और चित्रक, रक्तक, पत्रक
आदि एवं सख्यरसमें व्रजेन्द्रनन्दन और श्रीदाम, सुदाम,
सुबलादि सखा और वात्सल्यरसमें व्रजेन्द्रनन्दन और
नन्द-यशोदादि ही श्रेष्ठ ‘आलम्बन’ हैं॥ 88-89 ॥

भक्तिरसामृतसिन्धु (2/1/7-10)—
भक्तिनिर्धूत-दोषाणां प्रसन्नोज्ज्वलचेतसाम्।
श्रीभागवतरक्तानां रसिकासङ्गरङ्गिणाम् ॥ 90 ॥
जीवनीभूत-गोविन्दपादभक्तिसुखाश्रियाम्।
प्रेमान्तरङ्गभूतानि कृत्यान्येवानुतिष्ठताम् ॥ 91 ॥
भक्तानां हृदि राजन्ती संस्कारयुग्लोज्ज्वला।
रतिरानन्दरूपैव नीयमाना तु रस्यताम् ॥ 92 ॥
कृष्णादिभिर्विभावाद्यैर्गतैरनुभवाध्वनि।
प्रौढानन्दचमत्कारकाष्ठामपद्यते पराम् ॥ 93 ॥

अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 90-93 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—जो भक्तिके द्वारा सम्पूर्णरूपसे
धोये गये दोषोंसे मुक्त, प्रसन्न और उज्ज्वलचित्त,
श्रीभागवतमें अनुरक्त, रसिकोंके सङ्गमें रङ्गयुक्त
(आनन्दित), श्रीगोविन्दचरणोंकी भक्तिसुखश्री ही जिनका
जीवनस्वरूप है, प्रेमके अन्तरङ्ग सभी कार्योंका अनुष्ठान
करनेवाले उन भक्तोंके हृदयमें प्राचीन और आधुनिक
संस्कारोंके द्वारा उज्ज्वला आनन्दरूपी रति रसता प्राप्त
करके विराजमान होती है। वह श्रीकृष्णादि विभावादिके
द्वारा अनुभवके पथपर प्रौढ़ानन्द-चमत्काररूपी
पराकाष्ठाको प्राप्त होती है॥ 90-93 ॥

अनुभाष्य—
भक्तिनिर्धूतदोषाणां (भक्त्या निर्धूताः क्षालिताः दोषाः येषां)
प्रसन्नोज्ज्वलचेतसां (प्रसन्नम् उज्ज्वलं चेतः येषां) श्रीभागवतरक्तानां
(श्रीभागवतार्थानां आस्वादने अनुरक्तानां) रसिकासङ्गरङ्गिणां
(रसिकैः सह रसास्वादन-तत्पराणां) जीवनीभूत-
गोविन्दपादभक्तिसुखश्रिया (जीवनीभूता गोविन्दपाद-भक्तिसुखश्रीः
कृष्णसेवामुखसम्पत्तिः येषां) प्रेमान्तरङ्गभूतानि (प्रेम्णः अन्तरङ्ग-
भूतानि) कृत्यानि (अनुष्ठानादीनि) अनुतिष्ठतां भक्तानां हृदि
संस्कारयुग्लोज्ज्वला आनन्दरूपा रतिः एव राजन्ती। तु

तेइसवाँ अध्याय 23/90-99 ]
अनुभावाध्वनि (अनुभव-मार्गे) कृष्णादिभिः विभावाद्यैः गतैः
रस्यतां (रसत्वं) नीयमाना परां प्रौढ़ानन्दचमत्कारकाष्ठां
(सान्द्रानन्दपराकाष्ठाम्) आपद्यते (प्राप्नोति)।
श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 90-93॥
यह चिन्मय अप्राकृत रसास्वादन-अद्वयज्ञान-श्रीकृष्णसे
युक्त मुक्त श्रीकृष्ण-भक्तोंके लिये ही सम्भव,
जड़ीय कुरसिकोंके पक्षमें असम्भव :-
एइ रस आस्वाद नाहि अभक्तेर गणे।
कृष्णभक्तगण करे रस आस्वादने॥ 94॥
अनुवाद—इन रसोंका आस्वादन अभक्तगण नहीं
कर सकते, केवल श्रीकृष्णके शुद्धभक्त ही इन रसोंका
आस्वादन करते हैं॥ 94॥
शास्त्रप्रमाण :-
भक्तिरसामृतसिन्धु (2/5/131)—
सर्वथैव दुरूहोऽयमभक्तैर्भगवद्रसः।
तत्पादाम्बुजसर्वस्वैर्भक्तैरेवानुरस्यते॥ 95॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 95॥
अमृतप्रवाह भाष्य—अभक्तोंके लिये यह भगवद्-रस
सब प्रकारसे दुर्लभ है, श्रीकृष्ण-चरणकमल ही जिनके
सर्वस्व हैं, भक्तिरस—उन्हींको ही प्राप्त होता है॥ 95॥
अनुभाष्य—
अभक्तैः (भुक्तिमुक्तिपिपासुभिः हरिविमुखैः जनैः) अयं भगवद्रसः
सर्वथा एव दुरूहः (दुर्लभः), किन्तु तत्पादाम्बुजसर्वस्वैः
(ऐकान्तिकभक्तैः) एव अनुरुस्यते (आस्वाद्यः स्यात्)।
श्लोक-भावानुवाद—भुक्ति-मुक्ति-पिपासु हरिविमुख-
जनोंके लिये यह भगवद्-रस सर्वथा दुर्लभ है, किन्तु
श्रीकृष्णके ऐकान्तिक भक्त ही उसका आस्वादन करते
हैं॥ 95॥
प्रयोजन-तत्त्व-विचार संक्षेपमें वर्णित :-
संक्षेपे कहिलुँ एइ 'प्रयोजन'-विवरण।
पञ्चम-पुरुषार्थ—एइ 'कृष्णप्रेम' महाधन॥ 96॥
अनुवाद—मैंने 'प्रयोजन' तत्त्वका संक्षेपमें वर्णन
किया है। श्रीकृष्ण प्रेमरूपी महाधन ही पञ्चम-पुरुषार्थ
है॥ 96॥
पहले प्रयागमें दशाश्वमेध घाटपर श्रीरूपको
श्रीकृष्णरसकी शिक्षा-प्रदान :-
पूर्वे प्रयागे आमि रसेर विचारे।
तोमार भाइ रूपे कैलुँ शक्तिसञ्चारे॥ 97॥
अनुवाद—मैंने कुछ समय पूर्व प्रयागमें तुम्हारे भाई
रूपमें शक्तिका सञ्चार करके उसे रस-तत्त्वके विचारका
श्रवण कराया था॥ 97॥
महाप्रभुके द्वारा वैष्णवाचार्य श्रीसनातनको आचार्योचित चार
साम्प्रदायिक सेवाओंका दायित्व देना :-
तुमिह करिह भक्तिशास्त्रेर प्रचार।
मथुराय लुप्ततीर्थेर करिह उद्धार॥ 98॥
वृन्दावने कृष्णसेवा, वैष्णव-आचार।
भक्तिस्मृतिशास्त्र करि' करिह प्रचार॥ "99॥
अनुवाद—तुम भी भक्ति-शास्त्रोंका प्रचार करना
और मथुरामें लुप्त-तीर्थोंका उद्धार करना। वृन्दावनमें
श्रीकृष्णकी सेवाको प्रकाशित करना और वैष्णव-आचार
और भक्तिमूलक स्मृतिशास्त्रोंके द्वारा वैष्णवोंके लिये
उचित आचरणका प्रचार करना॥ "98-99॥
अमृतप्रवाह भाष्य—'भक्ति-स्मृतिशास्त्र'—
'हरिभक्तिविलास'-ग्रन्थ॥ 99॥
अनुभाष्य—'भक्तिशास्त्रेर प्रचार'—श्रीदशम-स्कन्धकी
टिप्पणी 'बृहद्-वैष्णवतोषणी' और बृहद्भागवतामृतादि ग्रन्थ
प्रकाश करके (1) शुद्धभक्तिके सिद्धान्तका संस्थापन,
(2) लुप्त तीर्थोंका उद्धार—वृन्दावनके कुण्डादि और
अन्यअन्य स्थानोंका निरूपण, (3) वृन्दावनमें श्रीकृष्णसेवा—
श्रीमूर्तिको प्रकट करके सेवाका प्रकाश, (4) वैष्णव-
आचार—वैष्णव-स्मृतिग्रन्थका सङ्कलन करके वैष्णव-
सदाचारका प्रवर्तन और प्रचार एवं वैष्णव-समाजमें
। 397

[ 23/99-103 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
संस्थापन,—महाप्रभुने इन चार साम्प्रदायिक सेवाओंका
भार श्रीसनातन गोस्वामीको प्रदान किया॥99॥
युक्त-वैराग्य ही जीवका काम्य और साध्य
एवं फल्गु-वैराग्य-सब प्रकारसे त्यागने योग्य :-
युक्तवैराग्य स्थिति सब शिखाइल।
शुष्कवैराग्य-ज्ञान सब निषेधिल॥100॥
अनुवाद-महाप्रभुने श्रीसनातन गोस्वामीको युक्त-
वैराग्यमें स्थित रहनेकी सम्पूर्ण शिक्षा प्रदान की और
जिस ज्ञानसे शुष्क-वैराग्य होता है, उसका निषेध
किया॥100॥
अमृतप्रवाह भाष्य-श्रीकृष्ण-सम्बन्धसे जगत्‌को
व्यवहार करनेसे ही 'युक्त-वैराग्य' होता है, जगत्‌को
'तुच्छ' मानकर संन्यास ग्रहण करनेसे ही 'शुष्क-वैराग्य'
होता है॥100॥
अनुभाष्य-यहाँ पाठान्तरमें भक्तिरसामृतसिन्धुके
पूर्वविभागकी द्वितीय लहरीसे ये दो श्लोक उद्धृत हुए
हैं,—
“अनासक्तस्य विषयान् यथार्हमुपयुञ्जतः।
निर्बन्धः कृष्णसम्बन्धे युक्तं वैराग्यमुच्यते॥”
“प्रापञ्चिकतया बुद्ध्या हरिसम्बन्धि-वस्तुनः।
मुमुक्षुभिः परित्यागो वैराग्यं फल्गु कथ्यते॥”
[अर्थात् “कृष्णेतर विषयोंमें आसक्तिरहित होकर
और श्रीकृष्णके साथ सम्बन्ध स्थापितकर, उनके
सेवानुकूल विषयमात्र ग्रहण करनेको ही युक्त वैराग्य
कहते हैं।” “मुमुक्षुगण शास्त्र, श्रीमूर्त्ति, नाम, महाप्रसाद,
गुरु आदि हरि सम्बन्धी वस्तुको भी प्राकृत समझकर
उनका परित्याग कर देते हैं, इसीको फल्गु वैराग्य कहते
हैं।”]॥100॥
गीतामें श्रीकृष्णप्रिय भक्तोंके तटस्थ-लक्षणोंका निर्देश :-
श्रीमद्भगवद्गीता (12/13-20)में—
अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च।
निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी॥101॥
सन्तुष्टः सततं योगी यतात्मा दृढनिश्चयः।
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्यो मद्भक्तः स मे प्रियः॥102॥
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥101-102॥
अमृतप्रवाह भाष्य-जो भक्त सभी प्राणियोंसे द्वेष-
रहित, मित्रतासे युक्त, करुण, ममता-रहित (उदासीन),
अहङ्कारशून्य, सुख और दुःखके प्रति समान बुद्धि
रखनेवाला, क्षमाशील, सदैव सन्तुष्ट, संयत स्वभाववाला,
दृढ़-निश्चयकारी, भक्ति-योगी और मुझमें मन और
बुद्धिको अर्पित करनेवाला होता है—वह मेरा प्रिय
है॥101-102॥
अनुभाष्य-
सर्वभूतानां (सकलजीवानाम्) अद्वेष्टा (हिंसारहितः), मैत्रः
(उत्तमेषु द्वेषशून्यः समेषु मित्रतया वर्त्तते यः सः), करुणः
(हीनेषु कृपालुः), निर्ममः (ममतारहितः, उदासीनः), निरहङ्कारः,
समदुःखसुख (सुखदुःखे तुल्यभावविशिष्टः), क्षमी
(अपराधसहनशीलः), सततं (लाभेऽलाभे च) सन्तुष्टः
(सुप्रसन्न-चित्तः), योगी (अप्रमत्तः), यतात्मा (संयतस्वभावः),
दृढनिश्चयः (मद्विषये निश्चयः यस्य सः), मयि अर्पितमनोबुद्धि
(अर्पिते मनोबुद्धी येन, एवम्भूतः) यः मद्भक्तः, सः मे प्रियः।
श्लोक-भावानुवाद-सभी जीवोंके प्रति हिंसारहित,
उत्तमसे द्वेषशून्य, समानसे मित्रता, हीनके प्रति कृपालु,
उदासीन, निरहङ्कार, सुख-दुःखमें समभावयुक्त, क्षमाशील
अर्थात् अपराधसहनशील, सदा लाभ-हानिमें सुप्रसन्न-
चित्त, अप्रमत्त, संयतस्वभाव, मेरे विषयमें दृढ़ निश्चयकारी,
मुझमें अर्पित मनोबुद्धि जो मेरा भक्त है, वह मुझे प्रिय
है॥101-102॥
यस्मान्नोद्विजते लोको लोकान्नोद्विजते च यः।
हर्षामर्षभयोद्वेगैर्मुक्तो यः स च मे प्रियः॥103॥
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥103॥
अमृतप्रवाह भाष्य-जिससे किसीको उद्वेग नहीं
मिलता, जो किसीसे उद्वेगको नहीं प्राप्त होता और
हर्ष-क्रोध-भयरूप उद्वेगसे मुक्त है, वही मेरा प्रिय
है॥103॥
398 ।

तेइसवाँ अध्याय 23/103-107 ]
अनुभाष्य-
यस्मात् (सकाशात्) लोकः न उद्विजते (भयशङ्कया संक्षोभं
ना प्राप्नोति), यः च लोकान् न उद्विजते, यः च हर्षामर्षभयोद्वेगैः
(हर्षः स्वस्य इष्टार्थलाभे उत्साहः, अमर्षः परस्य लाभे
अंसहनं, भयं त्रासः, उद्वेगः भयादिनिमित्तचित्तक्षोभः, एतैः) यः
मुक्तः स च मे प्रियः।
श्लोक-भावानुवाद-जिससे किसीको भय, शङ्का
अथवा क्षोभ नहीं होता, जो लोगोंसे उद्वेगको नहीं प्राप्त
करता, जो हर्ष (अर्थात् अपने वाञ्छित लाभमें
उत्साह), अमर्ष (अर्थात् दूसरोंके लाभमें असहनशील)
और भयादिसे चित्तमें क्षोभसे मुक्त है, वह मुझे प्रिय
है ॥ 103 ॥
अनपेक्षः शुचिर्दक्ष उदासीनो गतव्यथः ।
सर्वारम्भपरित्यागी यो मद्भक्तः स मे प्रियः ॥ 104 ॥
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 104 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य-मेरा जो भक्त-अपेक्षाशून्य,
पवित्र, दक्ष, उदासीन, व्यथारहित, सर्वारम्भत्यागी है,
वह-मेरा प्रिय है ॥ 104 ॥
अनुभाष्य-
यः अनपेक्षः (अन्यापेक्षारहितः यदृच्छयोपस्थितेऽप्यर्थे निःस्पृहः),
शुचिः (बाह्याभ्यन्तर-शौचसम्पन्नः), दक्षः (अनलसः), उदासीनः
(पक्षपातरहितः), गतव्यथः (आधिशून्यः), सर्वारम्भपरित्यागी
(सर्वान् दृष्टादृष्टार्थान् आरम्भानुद्यमान् परित्यक्तु
एवम्भूतः भक्तः), स मे प्रियः।
श्लोक-भावानुवाद-जो अपेक्षाशून्य अर्थात् वञ्छित
वस्तु उपलब्ध होनेपर भी उसमें स्पृहाहीन, बाहर और
भीतरसे पवित्र, आलस्यशून्य, पक्षपातरहित, व्यथाशून्य,
सभी दृष्ट और अदृष्ट कार्यके आरम्भको त्यागनेका
स्वभाववाला है, ऐसा भक्त मुझे प्रिय है ॥ 104 ॥
यो न हृष्यति न द्वेष्टि न शोचति न काङ्क्षति ।
शुभाशुभपरित्यागी भक्तिमान् यः स मे प्रियः ॥ 105 ॥
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 105 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य-जो-हर्ष, द्वेष, शोक और
आकाङ्क्षारहित है और जो शुभ-अशुभ फलत्यागी और
भक्तिमान् है, वह-मेरा प्रिय है ॥ 105 ॥
अनुभाष्य-
यः [प्रियं प्राप्य] न हृष्यति, [अप्रियं प्राप्य] न द्वेष्टि,
[इष्टार्थनाशे सति यः] न शोचति, [अप्राप्तमर्थं यः] न
काङ्क्षति, शुभाशुभपरित्यागी (शुभाशुभे पुण्यपापे परित्यक्तु
यस्य सः) [एवम्भूतः भूत्वा यः मयि] भक्तिमान् स मे प्रियः।
श्लोक-भावानुवाद-जो प्रिय वस्तुको प्राप्त करके
हर्षित नहीं होता, अप्रियकी प्राप्तिसे द्वेष नहीं करता,
इष्ट वस्तुके नाश होनेपर शोक नहीं करता, अप्राप्त
वस्तुके लिये कामना नहीं करता, पुण्य और पाप-
दोनोंको त्याग करनेवाला है, ऐसा वह भक्तिमान् मेरा
प्रिय है ॥ 105 ॥
समः शत्रौ च मित्रे च तथा मानापमानयोः ।
शीतोष्णसुखदुःखेषु समः सङ्गविवर्जितः ॥ 106 ॥
तुल्यनिन्दास्तुतिर्मौनी सन्तुष्टो येन केनचित्।
अनिकेतः स्थिरमतिर्भक्तिमान् मे प्रियो नरः ॥ 107 ॥
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 106-107 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य-शत्रु-मित्र और मान-अपमानमें
समबुद्धि, सर्दी-गर्मी और सुख-दुःखमें समबुद्धि,
आसक्तिरहित, निन्दा और स्तुतिमें एक जैसा विचार
रखनेवाला, मौनी (संयत वाणी), जैसे-तैसे जो प्राप्त हो
उसमें ही सन्तुष्ट, गृहरहित, स्थिरमतिवाला भक्तिमान्
व्यक्ति मेरा प्रिय है ॥ 106-107 ॥
अनुभाष्य-
शत्रौ मित्रे च तथा मानापमानयोः (सम्मानासम्मानेषु) अपि
समः (एकः तुल्यव्यवहारः इत्यर्थः), शीतोष्ण-सुखदुःखेषु
(शीतोष्णयोः सुखदुःखयोः च), समः (तुल्यः), सङ्गविवर्जितः
(क्वचिदप्यनासक्तः, अपरसहायहीनः वा), तुल्यनिन्दास्तुतिः (तुल्या
निन्दा स्तुतिश्च यस्य सः, प्रशंसा-निन्दा-सम-बुद्धिः इत्यर्थः)
मौनी (संयतवाक्), येन केनचित् (यथालब्धेन) सन्तुष्टः,
अनिकेतः (नियतवासशून्यः गृहवर्जितः इत्यर्थ), स्थिरमतिः
। 399

[ 23/106-111 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
(व्यवस्थितचित्तः, एवम्भूतः यः मयि) भक्तिमान् नरः, सः मे प्रियः।
श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 106-107 ॥
ये तु धर्मामृतमिदं यथोक्तं पर्युपासते।
श्रद्दधाना मत्परमा भक्तास्तेऽतीव मे प्रियाः ॥ 108 ॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 108 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—जो इस (गीताके बारहवें अध्यायके श्लोक 2 से 19 तक वर्णित) धर्मामृतमें श्रद्धायुक्त और मेरे परायण होकर उपासना करते हैं, वे मेरे भक्त हैं और मुझे अतिशय प्रिय हैं॥ 108 ॥
अनुभाष्य—
ये (भक्ताः) यथोक्तं (उक्तप्रकारम्) इदं धर्मामृतं (धर्ममेवामृतम् अमृतसाधनत्वात्) पर्युपासते (अनुतिष्ठन्ति), श्रद्दधानाः (श्रद्धां कुर्वन्तः) मत्परमाः च (मन्निष्ठाः सन्तः) मद्भक्ताः ते मे अतीव प्रियाः [भवन्ति]।
श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 108 ॥
भक्तिके अनुगामी शुद्ध-वैराग्य-मूलक-वाक्य :—
श्रीमद्भागवत (2/2/5)में—
चीराणि किं पथि न सन्ति दिशन्ति भिक्षां
नैवाङ्घ्रिपाः परभृतः सरितोऽप्यशुष्यन्।
रुद्धा गुहाः किमजितोऽवति नोपसन्नान्
कस्माद्भजन्ति कवयो धनदुर्मदान्धान् ॥ 109 ॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 109 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—अहो, क्या मार्गमें फटे-पुराने वस्त्र नहीं पड़े रहते, सभी वृक्ष क्या भिक्षा दान नहीं करते, क्या सब नदियाँ आदि सूख गयी हैं? गुफाएँ क्या बन्द हो गयी हैं? ईश्वर क्या शरणागत व्यक्तियोंका पालन नहीं करते? यदि ऐसा ही है, तो पण्डित लोग धनके दुर्मदमें अन्धे (नष्ट-विवेक) व्यक्तियोंका क्यों भजन करते हैं? ॥ 109 ॥
अनुभाष्य—श्रीशुकदेव परीक्षितको स्थूल-जगत्के धारणामय भोगके प्रति स्पृहाशून्य होकर अनासक्त भावसे जितनेमें निर्वाह हो जाय, उतनी ही वस्तुओंको ग्रहण करनेके युक्त-वैराग्यकी बात बतला रहे हैं,—
पथि चीराणि (छिन्नवस्त्रखण्डानि) किं न सन्ति (त्यक्तानि, न वर्तन्ते)? परभृतः (परान् बिभ्रति फलादिभिः पुष्णन्ति ये तथाभूताः) अङ्घ्रिपाः (वृक्षाः) भिक्षां न एव दिशन्ति (न दास्यन्ति किम्)? सरितः (सरांसि नद्यः) अपि अशुष्यन् (शुष्काः किम्)? गुहाः (गिरिदर्यः) रुद्धाः किम्? अजितः (विष्णुः) उपसन्नान् (शरणागतान्) किं न अवति (रक्षति)? [यद्येवं, तदा] कवयः (हरिरसविदः पण्डिताः) कस्मात् (केन हेतुना) धनदुर्मदान्धान् (धनेन यः दुर्मदः तेन अन्धान् नष्ट-विवेकान्) भजन्ति (अनुगच्छन्ति)?
श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 109 ॥
श्रीसनातनके परिप्रश्नके उत्तरमें महाप्रभुके द्वारा भागवतके गूढ़ सिद्धान्तका वर्णन :—
तबे सनातन सब सिद्धान्त पुछिला।
भागवत-गूढ़सिद्धान्त प्रभु सकलि कहिला॥ 110 ॥
हरिवंशे कहियाछे गोलोके नित्यस्थिति।
इन्द्र आसिं करिल यबे श्रीकृष्णरे स्तुति॥ 111 ॥
अनुवाद—महाप्रभुके मुखसे इन सब विचारोंको श्रवण करनेके बाद श्रीसनातन गोस्वामीने बहुतसे सिद्धान्तोंके विषयमें प्रश्न किये। महाप्रभुने श्रीसनातन गोस्वामीको श्रीमद्भागवतके समस्त गूढ़-सिद्धान्तोंका श्रवण कराया। महाप्रभुने श्रीसनातन गोस्वामीको हरिवंश नामक ग्रन्थमें इन्द्रके द्वारा श्रीकृष्णकी स्तुति करते समय वर्णित गोलोककी नित्य स्थितिके विषयमें भी समझाया ॥ 110-111 ॥
अनुभाष्य—हरिवंशमें विष्णुपर्वके 19वें अध्यायमें—
“मनुष्यलोकादूर्ध्वं तु खगानां गतिरुच्यते।
आकाशस्योपरि रविर्द्वारं स्वर्गस्य भानुमान् ॥
स्वर्गादूर्ध्वं ब्रह्मलोको ब्रह्मर्षिगण-सेवितः।
तत्र सोमगतिश्चैव ज्योतिषाञ्च महात्मनाम् ॥
तस्योपरि गवां लोकः साध्यास्तं पालयन्ति हि।
स हि सर्वगतः कृष्णः महाकाशगतो महान्।
400 ।

उपर्युपरि तत्रापि गतिस्तव तपोमयी।
यां न विद्मो वयं सर्वे पृच्छन्तोऽपि पितामहम् ॥
ब्राह्मे तपसि युक्तानां ब्रह्मलोकः परा गतिः।
गवामेव तु गोलोको दुरारोहा हि सा गतिः ॥
सः तु लोकस्त्वया कृष्ण सीदमानः कृतात्मना।
धृतो धृतिम्रता वीर निघ्नतोपद्रवान् गवाम् ॥"

अर्थात् गोवर्धन-धारणके बाद इन्द्रने श्रीकृष्णका इस
प्रकारसे स्तव किया था, — “मनुष्यलोकके उच्च भागमें
पक्षियोंकी गति है। आकाशके ऊपर स्वर्गका प्रकाशमान
सूर्यद्वार और स्वर्गके ऊपरी भागमें ब्रह्मर्षियोंके द्वारा
सेवित ब्रह्मलोक है। देवीधामके ऊपरमें स्थित उस
धाममें उमाके साथ शिव वर्तमान हैं; वह तेजःसम्पन्न
ब्रह्मादि मुक्तपुरुषोंका आवास-स्थान है। वैकुण्ठके ऊपर
गोलोक, वहाँ श्रीमती राधिकादि और नन्द-यशोदादि
साध्यगण पालन करते हैं। वैकुण्ठादि धाम-गोलोककी
तुलनामें स्वल्प-आकाश मात्र हैं; गोलोक ही महा-
आकाश है। हम ब्रह्मासे जिज्ञासा करके भी आपकी
तपोमयी गतिरूपा सर्वोपरि गोलोकपतिकी उपलब्धि नहीं
कर पाये। श्रीनारायणके दास्यसे ही वैकुण्ठ-प्राप्ति होती
है; किन्तु गो-गणोंके लोक उस गोलोक तक पहुँचना
अत्यन्त कठिन है। हे कृष्ण, उसी गोलोकके साथ आप
यहाँ अवतीर्ण हुए हो और मैंने जो उपद्रव किया है,
वह मेरी मूर्खताका ही परिणाम है, उसीको मैं स्तवके
द्वारा बतला रहा हूँ।"

इस स्थानपर नीलकण्ठने अपनी टीकामें लिखा
है,—
“तथा च मन्त्रवर्णः (ऋक् सं 1/21/154/6)-
“ता वां वास्तुन्युश्मसि गमध्यै यत्र गावो भूरिशृङ्गा अयासः।
अत्राह तदुरुगायस्य वृष्णः परमं पदमवभाति भूरि” इति।
तानि वां युवयोः रामकृष्णयोर्वास्तूनि रम्यस्थानानि गमध्ये
गन्तुम् उश्मसि उश्मः कामयामहे, न तु तत्र गन्तुं प्रभव्रामः,
यत्र येषु वास्तुषु भूरिश्रृङ्गाः महाशृङ्गवत्यो गावः आयासः
सञ्चरन्ति। अत्र भूलोके अह निश्चितं तत् गोलोकाख्यं परमं पदं
भूरि अत्यन्तं मुख्यादपि विशिष्टम् अवभाति अत्यन्तं शोभते।
वृष्णः आनन्दवर्षकस्य उरुगायस्य महाकीर्त्तेरित्यर्थः।

[अर्थात् “उस विषयमें वैदिक मन्त्रवर्ण प्रमाण हैं,
जैसे ऋक्संहितामें “ता वां” आदि। आप दोनोंके अर्थात्
श्रीराम-कृष्णके उस रम्य स्थानसमूहमें गमन करनेकी
कामना की, किन्तु वहाँ जानेमें समर्थ नहीं हूँ। वहाँ
अर्थात् जिस भूमिसमूहमें बड़े-बड़े सींगोंवाली गायें
विचरण करती हैं। इस भूलोकमें निश्चितरूपसे वही
गोलोक-नामक परमपद मूलधामसे भी अत्यन्त विशिष्ट
रूपमें शोभित है। यह आनन्दवर्षण करनेवाले महाकीर्ति
श्रीकृष्णका परम पद है-यह अर्थ है।"] ॥ 111 ॥

कुछ असुरमोहिनी अनित्य प्राकृत घटनाएँ :-
मौषल-लीला, आर कृष्ण-अन्तर्धान।
केशावतार, आर विरुद्ध व्याख्यान ॥ 112 ॥

महाप्रभुके द्वारा कही गयी मूसल-लीलादिके
सम्बन्धमें वास्तविक सिद्धान्त-व्याख्या :-
महिषी-हरण आदि, सब-मायामय।
व्याख्या शिखाइल यैछे सुसिद्धान्त हय ॥ 113 ॥

अनुवाद-मूसल-लीला, श्रीकृष्णका अन्तर्धान होना,
केशावतार और अन्यान्य विरुद्ध व्याख्यान, महिषी-
हरणादि, ये सब मायामय हैं, इन सबकी महाप्रभुने
व्याख्या करके श्रीसनातन गोस्वामीको सुसिद्धान्तकी
शिक्षा प्रदान की ॥ 112-113 ॥

अमृतप्रवाह भाष्य- 'काककृष्णकेश'-रूपी श्रीकृष्ण-
अवतार-यह जो विरुद्ध व्याख्यान हैं, उसे धिक्कार
देकर 'क+ईश=केश' अर्थात् श्रीकृष्ण- 'ब्रह्माके ईश्वर'
इस प्रकार शुद्ध व्याख्याकी शिक्षा दी ॥ 112 ॥

तेइसवें अध्यायका अमृतप्रवाह भाष्य समाप्त।

अनुभाष्य-महाभारतकी मूसल-लीला, श्रीकृष्णके
अन्तर्धानकी लीला, केशावतार और महिषी-हरण आदि
आख्यान,-सभी मिथ्या हैं, नित्य अप्राकृतलीला नहीं
हैं। मूढ़मति प्रापञ्चिक विष्णुविद्वेषी असुर लोगोंके मोह
और भ्रमको उत्पन्न करनेके उद्देश्यसे ही इन सबका
वर्णन हुआ है।

[ 23/111-113 ] श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
'केशावतार'-(भा: 2/7/26 देखें); विष्णुपुराणमें-
“उज्जहारात्मनः केशौ सितकृष्णौ महाबल”
महाभारतमें-
“स चापि केशौ हरिरुच्चकर्त्त एकं शुक्लमपरञ्चापि कृष्णम्।
तौ चापि केशावाविशतां यदूनां कुले स्त्रियो रोहिणीं देवकीञ्च॥
तयोरेको बलभद्रो बभूवः योऽसौ श्वेतस्तस्य देवस्य केशः।
कृष्णो द्वितीयः केशवः संबभूव केशः योऽसौ वर्णतः कृष्ण
उक्त इति॥”
अर्थात् भागवत, विष्णुपुराण और महाभारतमें
केशावतारका इस प्रकार उल्लेख है, - “श्रीहरिने अपने
मस्तकसे शुक्लवर्ण (सफेद) और कृष्णवर्ण (काले)-दो
केशोंको तोड़ा था। दो केश यदुकुलकी स्त्रियों रोहिणी
और देवकीमें प्रविष्ट होनेपर पहले सफेद केशसे वर्णके
अनुसार 'बलदेव' और दूसरे काले-केशसे 'श्रीकृष्ण'
उत्पन्न हुए, ऐसा कहा जाता है। असुरोंके द्वारा रौंदी
हुई पृथ्‍वीके क्लेश नाशके लिये जो अंशके द्वारा
श्वेतकृष्ण हुए, वे हरि अवतीर्ण होकर अपनी महिमा
दिखलानेवाले कार्य करेंगे॥” इस स्थानपर लघुभागवतामृतमें
कृष्णामृत-नामक पूर्वखण्डकी 156-164 संख्यामें
“श्रीकृष्ण-क्षीरोदशायीके केशके अवतार' इस पूर्वपक्षके
खण्डनके लिये श्रीरूपप्रभुके और लघुभागवतामृतके
टीकाकार श्रीबलदेव विद्याभूषण प्रभुके विचार और
षट्-सन्दर्भके अन्तर्गत कृष्णसन्दर्भकी 29 संख्या और
सर्वसम्वादिनीमें श्रीजीवप्रभुके विचार आलोच्य हैं॥112-113॥
तेइसवें अध्यायका अनुभाष्य समाप्त।
अमृताणुकणा- 'मौषललीला, आर कृष्ण-अन्तर्धान'-
मूसललीला और श्रीकृष्णके देह-त्यागादिकी लीला जो
इन्द्रजालके समान भगवद्-मायाबलसे रचित है, यह
बात भगवान् श्रीकृष्णचन्द्रने स्वयं ही अपने सारथी
दारुकको बतलायी, (भा: 11/30/49)-
“त्वं तु मद्धर्ममास्थाय ज्ञाननिष्ठ उपेक्षकः।
मन्मायारचितामेतां विज्ञायोपशमं व्रज॥”
अर्थात् “अभी लोगोंके प्राकृत-नेत्रोंके सामने प्रकाशित
'मूसल' और 'देहत्यागादि' समस्त लीलाएँ ही जो
इन्द्रजालके समान मेरी मायाके द्वारा रचित हैं, इसे
विशेषरूपसे जानकर तुम उसके प्रति उपेक्षाशील
होवो।”
'तु'-शब्दसे यह कहा गया है कि मेरे विरोधी अन्य
प्राकृत लोग उससे मुग्ध होते हों, तो हों, किन्तु तुम्हारा
मोहित होना युक्तिसङ्गत नहीं है।'- (क्रमसन्दर्भ)। बादमें
श्रीशुकदेव गोस्वामीने भी महाराज परीक्षितको यह रहस्य
बतलाया। (भा: 11/31/11)-
“राजन् परस्य तनुभृज्जननाप्ययेहा,
मायाविडम्बनमवेहि यथा नटस्य।”
अर्थात् “हे राजन्! नट अर्थात् ऐन्द्रजालिक जिस
प्रकार रङ्गमञ्चपर सबके सामने काटने, जलाने, मूर्च्छा
आदिके द्वारा अपने शरीरको त्याग करना दिखाकर
सबका विश्वास उत्पन्न करता है, परन्तु नटका अपना
देह धारण ही जैसे सत्य है और उसका अपना
देहत्याग ही मिथ्या है, उसी प्रकार परतत्त्व श्रीकृष्णकी
आविर्भाव-तिरोभाव-लीलाको भी मायाका अभिनय मात्र
जानना होगा। अन्यथा वे यमलोकसे गुरुपुत्रको सशरीर
लेकर आये थे, ब्रह्मास्त्रसे तुम्हारी भी रक्षा की थी,
मृत्युञ्जय शङ्करको संग्राममें पराजित किया था और
व्याधको सशरीर स्वर्गमें भेजा था, तो वे श्रीकृष्ण क्या
अपनी रक्षा करनेमें असमर्थ हैं?”
मूसललीला और उसके बाद श्रीकृष्ण-अन्तर्धानादि
लीलाएँ किस प्रकार मायासे रचित हैं, उसे “एते घोराः”
(भा: 11/30/5)-श्लोककी टीकामें श्रीविश्वनाथ चक्रवर्त्ती
ठाकुरने बतलाया है,-“कुरुक्षेत्र यात्रामें मुझसे (श्रीकृष्णसे)
मिलनेके लिये अनेक दिशाओंमें स्थित देशोंसे आये हुए
लोगोंके बीचमें अलक्षित रूपसे 'कलि' भी आया था
और उसने मुझसे कहा था,- 'प्रभो! पृथ्वीपर मेरा
अधिकार कब होगा?' उसके उत्तरमें मैंने कहा
था,- 'मेरी लीला-समाप्तिके बाद ही मेरे द्वारा दिये गये
अधिकारको प्राप्त करके तुम (कलि) पृथ्वीपर अधिकार
करोगे।' किन्तु मेरे अवतारमें अभी इस धर्म चार-पैररूपमें
ही है, यहाँ तक कि सत्ययुगकी अपेक्षा भी अधिकतर
402 |

तेइसवाँ अध्याय 23/111-113 ]
उसकी वृद्धि हुई है। धर्मका ऐसी प्रबलता रहनेपर कलि
किस प्रकारसे अधिकार प्राप्त कर सकेगा? क्योंकि
धर्मका एक पैर मात्र बचनेपर ही कलिकी अधिकार
प्राप्त करनेकी योग्यता होती है, — ऐसा नियम है। (यदि
कहें,) 'कारणका नाश होनेपर कार्यका भी नाश होता
है, इस न्यायके अनुसार जगत्में मेरे अप्रकट होनेपर
वह चार पैरवाला धर्म भी लुप्त हो जायेगा' — ऐसा नहीं
कहा जा सकता, क्योंकि मेरी सर्वजगत्-पावनी महाकीर्ति
सब समयके लिये जागरूक होकर वर्तमान रहती है।
और मेरे अनुकूल, प्रतिकूल और तटस्थ लोगोंमें-से
प्रतिकूल लोगोंका मेरे द्वारा संहार हुआ है। अब
श्रीरामावतारके जैसे ही सभी लोगोंके समक्ष अपने
धामवासियोंके साथ वैकुण्ठमें आरोहण करनेपर अनुकूल
लोग दोगुना भक्त होंगे, अति-अनुकूल लोग परम
उत्कण्ठायुक्त होकर सौगुना प्रेमवान् होंगे और तटस्थ
लोग परम-आश्चर्यके दर्शनसे भक्त होंगे — इसके द्वारा
धर्म अपितु और भी वृद्धि प्राप्त करेगा। ऐसा होनेपर
किस प्रकारसे कलिका लेशमात्र भी प्रभुत्व सम्भव
होगा? इसलिये धर्मको सङ्कुचित करनेके लिये अधर्म-
मतको किसी प्रकारसे ऊपर उठाऊँगा। यहाँपर यही
उपाय है, — मैं अपने निजलीला-परिकरों यदुगणोंके साथ
द्वारकामें पहलेके जैसे विराजमान होऊँगा, किन्तु सब
प्रापञ्चिक लोगोंके नेत्रोंके लिये अदृश्य रहूँगा। इधर
प्रद्युम्न, साम्बादि मेरे नित्य परिकरोंमें उनके-उनके
विभूति-स्वरूप कन्दर्प (कामदेव), कार्तिकेयादि जो
देवतागण प्रविष्ट हुए हैं, उनको योगबलके प्रभावसे
उन-उन देहोंसे अलक्षितरूपसे पृथक् करूँगा। तभी
प्रद्युम्नादि रूपमें अभिमानकारी उन देवताओंको उस
समय सभी लोगोंके सामने ही उन रूपोंमें ही प्रकाशित
करके अन्य द्वारकावासियोंके साथ प्रभासमें भेजकर
दान-ध्यान-मधुपानादि कराऊँगा। बादमें उन-उन
अधिकारिक देवताओंको स्वर्गमें उनके-उनके अधिकारमें
स्थापित करूँगा और मैं अपने नित्य परिकरोंके साथ
श्रीदशरथनन्द श्रीरामचन्द्रकी भाँति वैकुण्ठमें प्रस्थान
करूँगा। किन्तु लोगोंके नेत्रोंमें मायाका दोष प्रवेश
होनेके कारण वे इस प्रकार सोचेंगे, — ब्राह्मणके शापसे
ग्रस्त यदुवंशियोंने प्रभासमें जाकर मधुपान करके मत्त
होकर एक-दूसरेपर प्रहार करके देह-त्याग किया है
और परमेश्वर श्रीकृष्णने भी श्रीबलदेवके साथ मनुष्य
देह त्याग करके निजधाममें आरोहण किया है। इस
कारणसे कोई-कोई मुझको अनित्य और मायिक मनुष्य
शरीरवाला कहकर व्याख्या करेंगे। इस प्रकारसे अवज्ञा
करनेपर महा अपराध होगा, क्योंकि मैंने कहा है, (गीता
9/11) —
“अवजानन्ति मां मूढ़ा मानुषीं तनुमाश्रितम्”
[“मेरे चिन्मय विग्रहको देखकर भी मूर्ख व्यक्ति
सोचते हैं कि मैंने यह प्राकृत मनुष्य शरीर धारण किया
है।”] अन्य कुछ लोग कहेंगे कि जिस प्रकार
कुरुवंशका विनाश हुआ है, उसी प्रकारसे श्रीकृष्ण
वंशसहित प्रभासमें विनाशको प्राप्त हुए हैं, — इस प्रकार
अधम, ज्ञानके अभिमानी दुर्जन लोगोंके कुमत सुनने,
बोलने, अनुमोदन करने और प्रचारके द्वारा धर्म तुरन्त
ही एक पैरका रह जायेगा। पित्तादि दोषयुक्त नेत्र जिस
प्रकार उज्ज्वल श्वेत शङ्खको भी पीला और मलिनरूपमें
देखते हैं, उसी प्रकार मायादोषसे दूषित मानव मेरी
सच्चिदानन्दमयी निर्याणलीलाको भी दुर्गति और प्राकृत-
रूपमें ही दर्शन करेंगे और मेरी भक्तिसे दूर होंगे।
केवल प्राकृत लोग ही नहीं, किन्तु मेरे अंशसे प्रकटित
अर्जुनादि भी और उसी प्रकारसे वैशम्पायन, पराशरादि
मुनिगण भी मेरी मायासे मोहित होकर अपनी-अपनी
संहितामें (यथाक्रमसे महाभारत, विष्णुपुराणमें) उसको
वर्णन करेंगे।' इत्यादि।
इसलिये देखा जाता है, (ब्रह्मपुराण) —
“अजात-जातवद्विष्णुरमृत-मृतवत् तथा।
मायया दर्शयेन्नित्यमज्ञानां मोहनाय च॥”
“भगवान् विष्णु मायाबलसे अज्ञानी व्यक्तियोंको
मोहित करनेके लिये अजन्मा होनेपर भी जन्म लिये
। 403

[ 23/111-113 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
हुए जीवके जैसे और अमर होनेपर भी मृत जीवके
जैसे अपनेको प्रदर्शन करते हैं और ऋषिगणोंको भी
उसी प्रकार तात्कालिक भावोंसे मोहित करके उनके
द्वारा शास्त्रोंमें मोहजनक वाक्यजालका विस्तार करके
अपने आपको शुद्धभक्तिरहित जीवोंसे गोपन रखते हैं।”
(भाः 11/22/4)—
“युक्तञ्च सन्ति सर्वत्र भाषन्ते ब्राह्मणा यथा।
मायां मदीयामुद्गृह्य वदतां किं नु दुर्घटम्॥”
“ऋषियोंने जिसको जिस रूपमें वर्णन किया है, वह
उस रूपमें सत्य है, क्योंकि मेरी (श्रीकृष्णकी) मायासे
मोहित होकर व्याख्या करनेवालोंके कोई भी वाक्य
असम्भव नहीं हैं।” किन्तु सुमेधागण (अति बुद्धिमान
व्यक्ति) उस प्रकारके वाक्योंसे भ्रमित नहीं होते हैं,
जैसा श्रीउद्धवने श्रीविदुरसे कहा, (भाः 3/2/10)—
“देवस्य मायया स्पृष्टा ये चान्यदसदाश्रिताः।
भ्राम्यते धीर्न तद्वाक्यैरात्मन्युपाहृतात्मनो हरौ॥”
“जो भगवान्‌की मायासे मुग्ध हैं और अन्य जो
असत्-मतावलम्बी हैं, उनके वाक्योंसे परमात्मा श्रीहरिमें
जिनका चित्त निविष्ट है, ऐसे मानवोंकी बुद्धि भ्रान्त
नहीं होती है।” क्योंकि वे शास्त्रयुक्तिमें सुनिपुण हैं।
शास्त्रोंमें स्थान-स्थानपर शुद्ध सिद्धान्त भी प्रकाशित हैं,
जैसे स्कन्दपुराणमें कहा गया है,—
“पृथिवीलोकसंत्‍यागो देहत्यागो हरेः स्मृतः।
नित्यानन्दस्वरूपत्वादत्रैवोपलभ्यते॥”
“श्रीहरिके ‘देहत्याग’-शब्दसे उनके पृथ्वीलोकके
त्यागको ही कहा गया है (‘यस्य पृथिवी शरीरम्’—इस
श्रुतिमें ही उसका प्रमाण है), क्योंकि वे नित्यानन्दस्वरूप
हैं, इसलिये उनकी अन्य प्रकारके अर्थके द्वारा
उपलब्धि नहीं होती।” इस प्रसङ्गमें श्रीचैतन्यभागवतमें
आदिखण्डमें १४ अध्यायमें १०४ संख्यामें
श्रीश्रीमद्भक्तिसिद्धान्त सरस्वती गोस्वामी प्रभुपाद-कृत
‘गौड़ीय-भाष्य’ भी देखें।
‘केशावतार’—(भाः 1/2/28 में)—“कृष्णस्तु भगवान्
स्वयम्”—इस प्रकारसे श्रीकृष्णकी स्वयं भगवत्ता प्रमाणित
हुई है। तथापि (भाः 2/7/26)—“भूमः सुरेतरवरूथ”
श्लोकमें “क्लेशव्ययाय कलया सितकृष्णकेशः” अर्थात्
श्वेत और कृष्णवर्ण केशवाले श्रीक्षीरोदशायी विष्णु
अंशरूपमें पृथ्वीके क्लेश नाश करनेके लिये आविर्भूत
होंगे, इस रूपसे इस ब्रह्मा-वाक्यमें जो आपातरूपसे
श्रीकृष्णका श्रीविष्णुके केशावतार होना दिखायी देता है,
वह मायाके द्वारा भ्रान्ति उत्पादन करके श्रीकृष्णकी
असमोर्ध्व-महिमाको सङ्गोपन करनेके लिये ही है।
किन्तु जैसा कृष्णसन्दर्भमें कहा है,—“यैस्तु यथाश्रुतमेवेदं
व्याख्यातं ते न सम्यक् परामृष्टवन्तः अर्थात् जो
श्लोकको जैसे सुना है, वैसे अर्थकी व्याख्या करते हैं,
वे सम्पूर्ण रूपसे विचारपरायण नहीं हैं।” जैसे, विष्णुपुराणमें
कहा गया है,—‘हे महामुने ! भगवान् परमेश्वरने अपने
श्वेत और कृष्ण दो केशोंको तोड़ा और देवताओंको
कहा,—मेरे ये दो केश पृथ्वीपर अवतीर्ण होकर
पृथ्वीका भार हरण करेंगे।’ और महाभारतमें भी उसी
प्रकार कहा गया है,—‘उन श्रीविष्णुने दो केशोंको तोड़ा,
उनमेंसे एक श्वेत और दूसरा कृष्णवर्णका था; वे दो
केश ही यदुगणके कुलमें देवकी और रोहिणी—दो
स्त्रियोंमें प्रविष्ट हुए थे। उनमेंसे एक जो श्वेतवर्ण-केश
हैं, वे बलदेव हुए थे और दूसरे जो श्रीकृष्णवर्ण-केश
हैं, वे श्रीकेशव-‘श्रीकृष्ण’-नामसे कहे गये थे।’
उस-उस स्थानपर जो अर्थ आपात प्रकट हुए,
उनपर विचार करनेपर उनमें कोई सङ्गति दिखायी नहीं
देती। क्योंकि, इनके द्वारा त्रिगुणातीत, अविकारी,
चिदानन्दघन-विग्रह श्रीविष्णुकी आयुके परिणामस्वरूप सफेद
और काले केश होना समझना होगा। परन्तु शास्त्रमें
(भाः 3/28/17)—‘सन्तं वयसि कैशोरे’ इस रूपमें
उनकी नित्य किशोर अवस्था ही दिखायी देती है। और
फिर (भाः 1/3/28)—“कृष्णस्तु भगवान् स्वयम्”—इस
रूपसे श्रीकृष्णमें स्वयं भगवत्ता ही वर्णित है। इसलिये
विद्वान लोग उसकी इस प्रकारसे व्याख्या करते हैं,
जैसे, श्रीधरस्वामीपाद-कृत व्याख्या,—‘सितकृष्णकेशत्व’—
404 |

तेइसवाँ अध्याय 23/111-113 ]
सफेद-काले केशोंका होना यह विष्णुकी शोभास्वरूप ही
है, आयुका कोई परिणाम नहीं है। ‘भारहरण-रूप
कार्यकी बात ही क्या, वह तो मेरे दो केश भी करनेमें
समर्थ हैं’– इस बातको प्रकाश करते हुए और उसके
साथ श्रीबलरामके और श्रीकृष्णके वर्णकी सूचना करते
हुए उन्होंने उक्त केशोंको तोड़ा था, ऐसा जानना होगा।
अन्यथा शास्त्रमें कहे गये पूर्व और बादके वाक्योंका
परस्परमें विरोध उपस्थित होता है एवं ‘कृष्णस्तु भगवान्
स्वयम्’– इस वाक्यसे भी विरोध होता है। इसलिये
‘सितकृष्णकेश’ (अर्थात् उज्ज्वलकृष्णकेश)– स्वयं भगवान्
ही हैं, वे अपने अंश श्रीबलरामके साथ जन्म ग्रहण
करते हैं। श्रीलघुभागवतामृतमें श्रीरूपगोस्वामि-कृत
व्याख्या,– ‘कलया सितकृष्णकेशः’ (भाः 2/7/26) ‘कलया’
अर्थात् शिल्पमें विशेष निपुणताके द्वारा ‘सित’– बद्ध जो
‘कृष्णकेश’ हैं अर्थात् अति सुन्दर श्यामवर्ण केशयुक्त
जो विग्रह वे ही श्रीकृष्ण हैं,–उनकी विशेष वैदग्धीके
कारण इस प्रकारसे कहा गया है। अथवा जो ‘कलया’
अर्थात् एक अंश रूपमें ‘सितकृष्णकेशः’ अर्थात्
श्वेतकृष्णकेश युक्त क्षीरोदकशायी विष्णु हैं, वे लीला
पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण ही यदुवंशमें आविर्भूत हुए हैं।
सन्दर्भमें श्रील जीवगोस्वामि-कृत व्याख्या,–
“अंशवो ये प्रकाशन्ते मम ते केशसंज्ञिता।
सर्वज्ञाः केशवं तस्मान्नामाहुर्मुनिसत्तम॥”
अर्थात् “हे मुनिश्रेष्ठतम! मेरा जो अंशसमूह
(ज्योतिसमूह) प्रकाशित हो रहा है उसको ‘केश’–नामसे
कहते हैं। इसलिये सर्वज्ञगण मुझको ‘केशव’ कहते
हैं–इस महाभारत-वाक्यके अनुसार मेरे (अर्थात्
क्षीरोकशायी विष्णुके) सिरपर धारण किये श्वेत और
कृष्णवर्णकी दो ज्योतिरूप दो प्रभु अवतरित होंगे’,
इसकी सूचना देनेके लिये ही (विष्णुपुराणमें) दो
केशोंकी बात कही गयी है।” और भी विष्णुपुराण,
महाभारतमें सब जगह ‘केश’-शब्दका ही मात्र प्रयोग
दिखायी देता है, किन्तु उसके समानार्थक ‘चिकुर’,
‘कुन्तल’ आदि किसी शब्दका प्रयोग नहीं देखा जाता।
इसलिये (भाः 11/21/35)– “परोक्षवादा ऋषयः परोक्षञ्च
मम प्रियः” अर्थात् “ऋषिगण परोक्षवादी हैं और परोक्ष
ही मुझे (श्रीकृष्णको) प्रिय हैं”–इस प्रकारसे भगवान्‌की
इच्छानुसार परोक्षवादी ऋषियोंके मनोभावको ही उन-उन
वाक्योंमें समझना होगा, उनके वाक्योंका बाह्य अर्थ
नहीं लेने होंगे आदि।’– (श्रीविश्वनाथ)
‘महिषीहरण’–(भाः 1/15/20)–
“अध्वन्युरुक्रमपरिग्रहमङ्ग रक्षन्
गोपैरसद्भिरबलेव विनिर्जितोऽस्मि॥”
श्रीकृष्णके अन्तर्धान होनेके बाद द्वारकापुरीसे वापिस
लौटे श्रीअर्जुन महाराज श्रीयुधिष्ठिरको श्रीकृष्णके विरहमें
अनेक प्रकारसे विलाप करते करते कहने
लगे,–“श्रीकृष्णविहीन होकर मैं इस प्रकार बलहीन हो
गया हूँ कि उनकी (आठ प्रधान महिषियोंके अतिरिक्त
अन्य) सोलह हजार स्त्रियोंकी रक्षा करते हुए जब मैं
आ रहा था, तब मार्गमें कुछ नीच गोपोंके द्वारा मैं
अबलाकी भाँति पराजित हो गया।” श्रीभगवान्‌के जो
सखा हैं, उन प्रबल-पराक्रमशाली श्रीअर्जुनके निकटसे
उनके सखाकी पत्नियोंका हरण नितान्त असम्भव है।
वहाँपर रहस्य यह है कि,–‘उन अपनी प्रेयसियोंको
(व्रजमें) अप्रकट-प्रकाशमें प्रवेश करानेके लिये उस-
उस रूपमें भगवान्‌ने उनका आकर्षण किया, क्योंकि
उनकी इस प्रकारसे अभिलाषा थी। जैसे (महिषियोंने
द्रौपदीसे कहा था), (भाः 10/83/43)–
“व्रजस्त्रियो यद् वाञ्छन्ति पुलिन्द्यस्तृणवीरुधः।
गावश्चारयतो गोपाः पादस्पर्शं महात्मनः॥”
“जिस प्रकार गोचारणशील श्रीकृष्णकी चरणरजको
व्रजरमणियोंने, गोपगणोंने और यहाँतक कि तृण-लतासे
संलग्न उस चरणरजको उठाकर पुलिन्द-रमणियोंने भी
प्राप्त किया था, हमें भी उसकी चाह है।”
महिषियोंके इस प्रकारके वाक्योंमें व्रजस्त्रियोंके
द्वारा वाञ्छित भगवद्-स्वरूप ही (अर्थात् श्रीकृष्णका
गोपस्वरूप ही) है। उनके मनोरथको जानकर भगवान्‌ने
गोपरूपमें उनका आकर्षण किया था, अन्यथा वे
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