श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1837, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंतेइसवाँ अध्याय 23/59–63 ]
(दूसरे स्थानमें) गमनादिके कारण उत्पन्न हुई बाधाको
बुद्धिमान् जन 'प्रवास' कहते हैं।”
'प्रेमवैचित्य'—
“प्रियस्य सन्निकर्षेऽपि प्रेमोत्कर्षस्वभावतः।
या विश्लेषधियार्त्तिस्तत् प्रेमवैचित्यमुच्यते॥”
अर्थात् “प्रेमोत्कर्ष-स्वभावसे प्रियके सङ्गमें रहनेपर
भी उसके साथ विरहके भयसे जो आर्त्ति उपस्थित होती
है, वही 'प्रेमवैचित्य' है॥”59॥
अनुभाष्य—द्वारकामें भगवान् श्रीकृष्ण लीलाविलासके
द्वारा महिषियोंके चित्तका हरण करनेपर वे उनमें
आविष्ट होनेके कारण अति निकट होनेपर भी सदैव
'अभी खो बैठेंगी' 'अभी खो बैठेंगी' भावसे युक्त होकर
उन्मत्तकी भाँति इस प्रकार कहती थीं, —
हे कुररि, ईश्वरः (कृष्णः) रात्र्यां गुप्तबोधः (सुप्तचेतनः
इव) स्वपिति (शेते); त्वं तु जगति [एका] वीतनिद्रा [सती]
न शेषे (न स्वपिषि, शयनेच्छामपि न कुरुषे, परन्तु निद्राभङ्गं
कुर्वती) विलपसि (तदनुचितमित्यर्थः)। हे सखि, [अथवा
नापराधस्तव, यतः] वयं इव त्वं नलिन-नयनहासोदारलीलेक्षितेन
(पद्मलोचनस्य भगवतः हासेन सहितम् उदारं यत् लीलेक्षितं
तेन अकुण्ठितस्मितकटाक्षेण) कच्चित् गाढ़-निर्व्विद्धचेता (अतिशयेन
आकृष्टचित्ता)?
श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥61॥
ब्रजमें राधिकादि गोपियों और द्वारकाकी महिषियोंके
विप्रलम्भ भावकी विचित्रता :—
राधिकाद्ये 'पूर्वराग' प्रसिद्ध 'प्रवास', 'माने'।
'प्रेमवैचित्य' श्रीदशमे महिषीगणे॥60॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥60॥
श्रीकृष्ण—नायक-शिरोमणि, श्रीराधा-नायिका-शिरोमणि :—
व्रजेन्द्रनन्दन कृष्ण—नायक-शिरोमणि।
नायिकार शिरोमणि—राधा-ठाकुराणी ॥ 62 ॥
अनुवाद—व्रजेन्द्रनन्दन श्रीकृष्ण नायक शिरोमणि
और श्रीमती राधा ठाकुरानी नायिकाओंमें शिरोमणि
हैं॥62॥
अमृतप्रवाह भाष्य—चार प्रकारके विप्रलम्भमेंसे
राधिकादि गोपियोंके 'पूर्वराग', 'प्रवास' और 'मान'—ये
तीन प्रसिद्ध हैं; [भागवत दशम स्कन्धमें] द्वारकामें
महिषियोंमें 'प्रेमवैचित्य' प्रसिद्ध है॥60॥
महिषियोंको श्रीकृष्णवियोगकी आशङ्का :—
श्रीमद्भागवत (10/90/15)—
कुररि विलपसि त्वं वीतनिद्रा न शेषे
स्वपिति जगति रात्र्यामीश्वरो गुप्तबोधः।
वयमिव सखि कच्चिद्गाढ़निर्व्विद्धचेता
नलिन-नयन-हासोदार-लीलेक्षितेन॥61॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥61॥
प्रमाण :—
भक्तिरसामृतसिन्धु (2/1/17)—
नायकानां शिरोरत्नं कृष्णस्तु भगवान् स्वयम्।
यत्र नित्यतया सर्वे विराजन्ते महागुणाः ॥ 63 ॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥63॥
अमृतप्रवाह भाष्य—स्वयं भगवान् श्रीकृष्ण ही
नायकोंके चूड़ामणि हैं; उन श्रीकृष्णमें सभी महान् गुण
नित्यरूपमें विराजमान हैं॥63॥
अमृतप्रवाह भाष्य—हे सखि, कुररि, देखो ! इस
रात्रिकालमें सुप्तचेतनके जैसे ईश्वर श्रीकृष्ण सो रहे हैं
और तुम्हें निद्रा नहीं आनेके कारण तुम सो नहीं रही
हो, केवल विलाप [करके निद्रा भङ्ग] कर रही हो [यह
अनुचित है]। अथवा [तुम्हारा भी अपराध नहीं है]
कमलनयन श्रीकृष्णके हास्य और उदारलीलाके दर्शनसे
हमारी भाँति क्या तुम्हारा चित्त भी अतिशय आकृष्ट
होनेसे ऐसा कर रही हो?॥61॥
अनुभाष्य—
नायकानां मध्ये स्वयं भगवान् कृष्णस्तु शिरोरत्नं (चूड़ामणिः);
यत्र (कृष्णे) सर्वे महागुणाः नित्यतया विराजन्ते (शोभन्ते)।
श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥63॥
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