सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1844, कुल 2549 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1844

[ 23/99-103 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
संस्थापन,—महाप्रभुने इन चार साम्प्रदायिक सेवाओंका
भार श्रीसनातन गोस्वामीको प्रदान किया॥99॥
युक्त-वैराग्य ही जीवका काम्य और साध्य
एवं फल्गु-वैराग्य-सब प्रकारसे त्यागने योग्य :-
युक्तवैराग्य स्थिति सब शिखाइल।
शुष्कवैराग्य-ज्ञान सब निषेधिल॥100॥
अनुवाद-महाप्रभुने श्रीसनातन गोस्वामीको युक्त-
वैराग्यमें स्थित रहनेकी सम्पूर्ण शिक्षा प्रदान की और
जिस ज्ञानसे शुष्क-वैराग्य होता है, उसका निषेध
किया॥100॥
अमृतप्रवाह भाष्य-श्रीकृष्ण-सम्बन्धसे जगत्‌को
व्यवहार करनेसे ही 'युक्त-वैराग्य' होता है, जगत्‌को
'तुच्छ' मानकर संन्यास ग्रहण करनेसे ही 'शुष्क-वैराग्य'
होता है॥100॥
अनुभाष्य-यहाँ पाठान्तरमें भक्तिरसामृतसिन्धुके
पूर्वविभागकी द्वितीय लहरीसे ये दो श्लोक उद्धृत हुए
हैं,—
“अनासक्तस्य विषयान् यथार्हमुपयुञ्जतः।
निर्बन्धः कृष्णसम्बन्धे युक्तं वैराग्यमुच्यते॥”
“प्रापञ्चिकतया बुद्ध्या हरिसम्बन्धि-वस्तुनः।
मुमुक्षुभिः परित्यागो वैराग्यं फल्गु कथ्यते॥”
[अर्थात् “कृष्णेतर विषयोंमें आसक्तिरहित होकर
और श्रीकृष्णके साथ सम्बन्ध स्थापितकर, उनके
सेवानुकूल विषयमात्र ग्रहण करनेको ही युक्त वैराग्य
कहते हैं।” “मुमुक्षुगण शास्त्र, श्रीमूर्त्ति, नाम, महाप्रसाद,
गुरु आदि हरि सम्बन्धी वस्तुको भी प्राकृत समझकर
उनका परित्याग कर देते हैं, इसीको फल्गु वैराग्य कहते
हैं।”]॥100॥
गीतामें श्रीकृष्णप्रिय भक्तोंके तटस्थ-लक्षणोंका निर्देश :-
श्रीमद्भगवद्गीता (12/13-20)में—
अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च।
निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी॥101॥
सन्तुष्टः सततं योगी यतात्मा दृढनिश्चयः।
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्यो मद्भक्तः स मे प्रियः॥102॥
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥101-102॥
अमृतप्रवाह भाष्य-जो भक्त सभी प्राणियोंसे द्वेष-
रहित, मित्रतासे युक्त, करुण, ममता-रहित (उदासीन),
अहङ्कारशून्य, सुख और दुःखके प्रति समान बुद्धि
रखनेवाला, क्षमाशील, सदैव सन्तुष्ट, संयत स्वभाववाला,
दृढ़-निश्चयकारी, भक्ति-योगी और मुझमें मन और
बुद्धिको अर्पित करनेवाला होता है—वह मेरा प्रिय
है॥101-102॥
अनुभाष्य-
सर्वभूतानां (सकलजीवानाम्) अद्वेष्टा (हिंसारहितः), मैत्रः
(उत्तमेषु द्वेषशून्यः समेषु मित्रतया वर्त्तते यः सः), करुणः
(हीनेषु कृपालुः), निर्ममः (ममतारहितः, उदासीनः), निरहङ्कारः,
समदुःखसुख (सुखदुःखे तुल्यभावविशिष्टः), क्षमी
(अपराधसहनशीलः), सततं (लाभेऽलाभे च) सन्तुष्टः
(सुप्रसन्न-चित्तः), योगी (अप्रमत्तः), यतात्मा (संयतस्वभावः),
दृढनिश्चयः (मद्विषये निश्चयः यस्य सः), मयि अर्पितमनोबुद्धि
(अर्पिते मनोबुद्धी येन, एवम्भूतः) यः मद्भक्तः, सः मे प्रियः।
श्लोक-भावानुवाद-सभी जीवोंके प्रति हिंसारहित,
उत्तमसे द्वेषशून्य, समानसे मित्रता, हीनके प्रति कृपालु,
उदासीन, निरहङ्कार, सुख-दुःखमें समभावयुक्त, क्षमाशील
अर्थात् अपराधसहनशील, सदा लाभ-हानिमें सुप्रसन्न-
चित्त, अप्रमत्त, संयतस्वभाव, मेरे विषयमें दृढ़ निश्चयकारी,
मुझमें अर्पित मनोबुद्धि जो मेरा भक्त है, वह मुझे प्रिय
है॥101-102॥
यस्मान्नोद्विजते लोको लोकान्नोद्विजते च यः।
हर्षामर्षभयोद्वेगैर्मुक्तो यः स च मे प्रियः॥103॥
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥103॥
अमृतप्रवाह भाष्य-जिससे किसीको उद्वेग नहीं
मिलता, जो किसीसे उद्वेगको नहीं प्राप्त होता और
हर्ष-क्रोध-भयरूप उद्वेगसे मुक्त है, वही मेरा प्रिय
है॥103॥
398 ।