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सर्वकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1835, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 1835

तेइसवाँ अध्याय 23/52-57 ]
अर्थात् “श्रीकृष्णके साथ मिलनको 'योग' कहते हैं। द्वारकामें 'रूढ़' और गोकुलमें ही केवल 'अधिरूढ़'-
हैं।” भाव देखा जाता है ॥ 53 ॥
'शान्तादि रसेर'- शान्त और दास्यमें 'योग और अधिरूढ़-महाभाव भी दो प्रकार का-(1) सम्भोगमें
वियोग', ये दो प्रकारके भेद हैं; उनमें योग और 'मादन'-संज्ञा, (2) विप्रलम्भमें 'मोहन'-संज्ञा :-
अयोगके अनेक भेद नहीं हैं। यद्यपि पाँच प्रकारके अधिरूढ़-महाभाव-दुइ त' प्रकार।
रसोंमें ही योग और अयोगका भेद है, किन्तु सख्य सम्भोगे 'मादन', विरहे 'मोहन' नाम तार ॥ 54 ॥
और वात्सल्यमें बहुतसे विभेद हैं।
'योगविभेद'- अनुवाद-अधिरूढ़ महाभाव दो प्रकारका होता
“योगोऽपि कथितः सिद्धिस्तुष्टिस्थितिरिति त्रिधा" है-सम्भोगमें उसका नाम 'मादन' और विरहमें उसका
अर्थात् “योगके तीन प्रकारके भेद हैं-सिद्धि, तुष्टि नाम 'मोहन' होता है ॥ 54 ॥
और स्थिति।” सम्भोगमय 'मादन' और विप्रलम्भमय 'मोहन'में अनेक
'अयोगविभेद'- प्रकारके भाव-भेदका वैचित्र्य :-
“उत्कण्ठत्वं वियोगश्चेत्ययोगोऽपि द्विधोच्यते” 'मादने'- चुम्बनादि हय अनन्त विभेद ।
अर्थात् “'अयोग' दो प्रकारका होता है- 'उत्कण्ठित' 'उद्घूर्णा', 'चित्रजल्प' - 'मोहने' दुइ भेद ॥ 55 ॥
और 'वियोग' ॥" 52 ॥ अनुवाद- 'मादन'में चुम्बनादि अनन्त भेद हैं।
'मोहन'में 'उद्घूर्णा' और 'चित्रजल्प'-ये दो भेद होते
द्वारकामें ऐश्वर्यमयी स्वकीया मधुर-रतिमें हैं ॥ 55 ॥
'रूढ़-महाभाव' और वृन्दावनमें माधुर्यमयी केवला
पारकीया मधुर-रतिमें 'अधिरूढ़-महाभाव' :- भाः 10/47 अध्याय - भ्रमर-गीतमें विप्रलम्भमें श्रीराधिकादि
'रूढ़', 'अधिरूढ़' भाव- केवल 'मधुरे'। गोपियोंका दिव्योन्माद :-
महिषीगणेरे 'रूढ़', 'अधिरूढ़' गोपिका-निकरे ॥ 53 ॥ चित्रजल्पेर दश अङ्ग- प्रजल्पादि-नाम।
'भ्रमर-गीता'र दश श्लोक ताहाते प्रमाण ॥ 56 ॥
अनुवाद-रूढ़ और अधिरूढ़ महाभाव तो केवल अनुवाद-प्रजल्पादि चित्रजल्पके दस अङ्ग हैं।
मधुररसमें हैं। महिषियोंमें 'रूढ़' महाभाव और व्रजगोपियोंमें भ्रमर-गीताके दस श्लोक इसके प्रमाण हैं ॥ 56 ॥
'अधिरूढ़' महाभाव रहता है ॥ 53 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-चित्रजल्प दस प्रकारका है-
अनुभाष्य- 'अधिरूढ़'- (उःनीः स्थायिभाव-प्रः 170)- प्रजल्प, परिजल्प, विजल्प, उज्जल्प, संजल्प, अवजल्प,
“रूढ़ोक्तेभ्योऽनुभावेभ्यः कामप्याप्ता विशिष्टताम् । अभिजल्प, आजल्प, प्रतिजल्प और सुजल्प। 'भ्रमर-गीता'—
यत्रानुभावा दृश्यन्ते सोऽधिरूढ़ो निगद्यते ॥” श्रीमद्भागवतके दशम स्कन्धके 47वें अध्यायमें है ॥ 56 ॥
[अर्थात् “जिस समय उक्त अनुभावसमूह रूढ़भावमें विप्रलम्भमें दिव्योन्मादकी चरम अवस्था - अप्राकृत-
कहे गये अनुभावोंसे भी उत्तरोत्तर किसी विशेष दशाको श्रीकृष्णसेवामयी परम-चमत्कारिणी सर्वोत्तमावस्था :-
प्राप्त होते हैं, उसे अधिरूढ़ महाभाव कहते हैं।”] उद्घूर्णा, विरह-चेष्टा - दिव्योन्माद-नाम।
मधुररसमें मधुर-रति स्नेह, मान, प्रणय, राग, विरहे कृष्णस्फूर्त्ति, आपनाके 'कृष्ण' ज्ञान ॥ 57 ॥
अनुराग, भाव और महाभाव तक वर्धित होती है। रूढ़
और अधिरूढ़-महाभाव केवलमात्र मधुर-रसमें ही विद्यमान अनुवाद-उद्घूर्णा और विरहमें भ्रममय चेष्टाओंका
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