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सर्वकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1833, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 1833

तेइसवाँ अध्याय 23/46-48 ]
उद्दीपन। जिससे और जिसके द्वारा रति आदि विभावित
होती है, वही अग्निपुराणादिमें 'विभाव' (आलम्बनमय
और उद्दीपनमय)के नामसे कहा गया है।"
'आलम्बन'-(भःरःसिः दःविः प्रथम लः श्लोक)-
“कृष्णश्च कृष्णभक्ताश्च बुधैरालम्बना मताः।
रत्यादेर्विषयत्वेन तथाधारतयापि च॥”
अर्थात् “रति आदिके (अर्थात् गौण हास्यादि
रसके) विषयरूपमें 'श्रीकृष्ण' और आधार-स्वरूपमें
'श्रीकृष्णभक्त'-इन दोनोंको पण्डितगण 'आलम्बन' कहते
हैं।"
'उद्दीपन'-(भःरःसिः दःविः प्रथम लः श्लोक)-
“उद्दीपनास्तु ते प्रोक्ता भावमुद्दीपयन्ति ये।
ते तु श्रीकृष्णचन्द्रस्य गुणाश्चेष्टाः प्रसाधनम्॥
स्मिताङ्गसौरभे वंशशृङ्गनूपुरकम्बरः।
पदाङ्क-क्षेत्र-तुलसी-भक्त-तद्वासरादयः॥”
अर्थात् “जो भाव प्रकाशित करते हैं, वे ही उद्दीपन
हैं। जैसे-श्रीकृष्णके गुण, चेष्टा और प्रसाधन (कंघे
आदिके द्वारा केश-सँवारना आदि देहकी सज्जाके
उपकरण) और स्मित (मृदुहास्य), अङ्गगन्ध, वंशी,
शृङ्ग, नूपुर, शङ्ख, पदचिह्न, क्षेत्र, तुलसी, भक्त, हरिवासरादि
एकादशी-व्रत ॥" 46॥
रसके 'कार्य' अनुभावके 13 प्रकारके भेद; आठ प्रकारके
सात्त्विक भी रसके 'कार्य' :-
‘अनुभाव’—स्मित, नृत्य, गीतादि उद्भास्वर।
स्तम्भादि-‘सात्त्विक’ अनुभावेर भितर॥ 47 ॥
अनुवाद—मन्दहास्य, नृत्य, गीतादि उद्भास्वर (देहके
विविध अङ्गोंमें प्रकट होनेवाले)—ये 'अनुभाव' हैं। और
स्तम्भादि 'सात्त्विक' भाव अनुभावके अन्तर्भुक्त ही
हैं॥ 47 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—'उद्भास्वर'-विशेष आङ्गिक
अनुभाव हैं, (वे) पाँच प्रकारके हैं-वेशभूषाका ढीला
होना, शरीरको मोड़ना, जम्भाई, सांसका फूलना, सांस
छोड़ना और सांस भीतर लेना॥ 47 ॥
अनुभाष्य-‘अनुभाव’-(भःरःसिः दःविः द्वितीय लहरी
प्रथम श्लोक)-
“अनुभावास्तु चित्तस्थभावानामवबोधकः।
ते बहिर्विक्रियाप्रायाः प्रोक्ता उद्भास्वराख्या ॥
नृत्यं विलुठितं गीतं क्रोशनं तनुमोटनम्।
हुङ्कारो जृम्भणं श्वासभूमा लोकानपेक्षिता।
लालास्रावोऽट्टहासश्च घूर्णा-हिक्कादयोऽपि च॥
ते शीताः क्षेपणाश्चेति यथाथ्र्याख्या द्विधोदिताः।
शीताः स्युर्गीतजृम्भाद्या नृत्याद्याः क्षेपणाभिधाः॥”
अर्थात् “चित्तमें स्थित भावसमूहके प्रकाशक प्राय
बाह्य-विकार होकर जो 'उद्भास्वर'-नामसे प्रसिद्ध हैं, वे
ही 'अनुभाव' हैं। नृत्य, भूमिपर लोट-पोट, गान,
चिल्लाना, शरीरको मरोड़ना, हुङ्कार, जम्भाई लेना, लम्बी
सांसे लेना, लोगोंकी परवाह नहीं करना, लारका बहना,
अट्टहास, घूर्णा और हिचकी आदि। ये 'शीत' और
'क्षेपण'-इन दो नामोंसे जाने जाते हैं; इनमेंसे गीत
और जम्भाई आदिको 'शीत' और नृत्यादिको 'क्षेपण'
कहते हैं।"
‘उद्भास्वर’—
“उद्भासन्ते स्वधाम्नीति प्रोक्ता उद्भास्वरा बुधैः।
नीव्युत्तरीयधम्मिल्लशंसनं गात्रमोटनम्।
जृम्भा घ्राणस्य फुल्लत्वं निश्वासाद्याश्च ते मताः॥”
अर्थात् “भावयुक्त व्यक्तिके शरीरमें जो-जो प्रकाशित
होता है, पण्डितगण उसे 'उद्भास्वर' कहते हैं। ये नाड़े,
उत्तरीय-वस्त्र और जूड़ेका खुलना या ढीला होना,
शरीरको मोड़ना, जम्भाई, नाकको फुलाना, श्वास
छोड़ना, लोट-पोट खाना और हिचकी आदि पूर्वलिखित
बाह्य विकारसमूह हैं।"
'स्तम्भादि'-मध्यलीला 14/167 संख्या देखें ॥ 47 ॥
रसके 'सहायक' व्यभिचारी भाव-तैंतीस :-
निर्वेद-हर्षादि-तेत्रिश 'व्यभिचारी'।
सब मिलि' 'रस' हय चमत्कारकारी॥ 48 ॥
अनुवाद—निर्वेद-हर्षादि तैंतीस व्यभिचारी भाव हैं।
। 387