श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
अठारहवाँ अध्याय 18/194–201 ]
स्थापित करके अन्तमें उसका खण्डन करके ईश्वरकी
'एबादत्' अर्थात् सेवाकी श्रेष्ठता ही स्थापित हुई
है॥ 194॥
भगवद्-प्रेमकी महिमा :-
मोक्षादि आनन्द यार नहे एक 'कण'।
पूर्णानन्द-प्राप्ति ताँर चरण-सेवन॥ 195॥
अनुवाद— ईश्वरमें सायुज्य मोक्षका आनन्द उनके
चरणोंकी सेवासे प्राप्त पूर्णानन्दके एक कणके समान
भी नहीं है॥ 195॥
कुरानमें पहले 'कर्म', 'ज्ञान', 'योग'के विषयमें बतलाकर
अन्तमें भगवद्भक्ति ही संस्थापित :-
'कर्म', 'ज्ञान', 'योग' आगे करिया स्थापन।
सब खण्डि' स्थापे 'ईश्वर', 'ताँहार सेवन' ॥ 196॥
अनुवाद— तुम्हारे शास्त्र कुरानमें पहले 'कर्म', 'ज्ञान',
'योग'की स्थापना की गयी है, परन्तु अन्तमें इन सबका
खण्डन करके सविशेष 'ईश्वर' और उनकी सेवाकी ही
स्थापना की गयी है॥ 196॥
साधारणतः मुस्लिम-पण्डितोंमें कुरानके वास्तविक तात्पर्यके
ज्ञानका अभाव; पूर्वमें वर्णित कर्म और ज्ञानकी विधिकी
अपेक्षा बादमें वर्णित भक्तिकी विधि ही बलवान :-
तोमार पण्डित-सबार नाहि शास्त्र-ज्ञान।
पूर्वापर-विधि-मध्ये 'पर'-बलवान् ॥ 197॥
मौलानाको कुरानके वास्तविक-निर्णय
करनेका अनुरोध :-
निज-शास्त्र देखि' तुमि विचार करिया।
कि लिखियाछे शेषे कह निर्णय करिया॥" 198॥
अनुवाद— तुम्हारे पण्डितोंको शास्त्र-ज्ञान नहीं है।
वास्तवमें 'पूर्व' (पहलेवाली) और 'पर' (बादवाली)
विधिमें-से 'पर' विधि ही बलवान् होती है। अपने
शास्त्र कुरानको देखकर उसमें अन्तमें क्या लिखा है,
उसपर विचार करके तुम मुझे अपना निर्णय
बतलाओ॥" 197-198॥
मौलानाके द्वारा महाप्रभुके वचनोंकी 'सत्यता'का अनुमोदन;
मुस्लिम पण्डितोंके हृदय-दौर्बल्यको स्वीकार करना :-
म्लेच्छ कहे,—“येइ कह, सेइ 'सत्य' हय।
शास्त्रे लिखियाछे, केह लइते ना पारय॥ 199॥
अनुवाद— उस म्लेच्छाचार्यने कहा,—“आप जो कह
रहे हैं, वही 'सत्य' है। कुरानमें तो ऐसा ही लिखा है,
किन्तु हमारे कोई भी पण्डित लोग न तो उसे समझते
हैं और न ही उसे स्वीकार करते हैं॥ 199॥
उनकी निर्विशेषत्वमें ही दृढ़ आस्था, चिन्मय
सविशेषत्वकी सेवामें आस्था नहीं :-
'निर्विशेष-गोसाञि' लञा करेन व्याख्यान।
'साकार-गोसाञि'-सेव्य, कारो नाहि ज्ञान॥ 200॥
अनुवाद— निर्विशेष ईश्वरको लेकर ही सभी
कुरानकी व्याख्या करते हैं, किन्तु ईश्वर साकार तथा
सेव्य हैं, इसका किसीको भी ज्ञान नहीं है॥ 200॥
अमृतप्रवाह भाष्य— पीरके जैसे काले वस्त्रधारी
म्लेच्छाचार्यने कहा,—हमारे शास्त्रकी गूढ़ बात साधारण
पण्डित नहीं समझ सकते; इसलिये वे हमारे अल्लाके
'निराकार भाव'को लेकर ही लोगोंको व्याख्या करते हैं।
इस बातको अधिकांश लोग नहीं जानते कि चरम
अवस्थामें ईश्वरका सच्चिदानन्द आकार ही सेव्य
है॥ 199-200॥
अठारहवें अध्यायका अमृतप्रवाह भाष्य समाप्त।
अनुभाष्य— 'गोसाञि'—आराध्य वस्तु भगवान्;
'साकार'—मनुष्यके अपने जड़ीय ज्ञानका अतिक्रम
करके त्रिगुणातीत अप्राकृत सविशेष विग्रह अथवा
चिन्मय आकारसे युक्त विग्रह॥ 200॥
महाप्रभुको 'परमेश्वर' मानना और कृपाकी याचना :-
सेइत 'गोसाञि' तुमि—साक्षात् 'ईश्वर'।
मोरे कृपा कर, मुञि—अयोग्य पामर॥ 201॥
अनुवाद— आप साक्षात् वही ईश्वर हैं। मुझपर
कृपा कीजिये, मैं अयोग्य तथा पतित हूँ॥ 201॥
। 165
[ 18/202–211 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
मौलानाके द्वारा स्वयं साधन और साध्य वस्तुकी
मीमांसाकी चेष्टामें असमर्थताको मानना :-
अनेक देखिनु मुञि म्लेच्छ-शास्त्र हैते।
'साध्य-साधन-वस्तु' नारि निर्द्धारिते ॥ 202 ॥
अनुवाद-मैंने मुस्लिम-शास्त्रोंमें बहुत ढूँढ़ा है,
किन्तु साध्य-वस्तु क्या है और उसे पानेका साधन
क्या है, मैं इसको निर्धारित नहीं कर पाया हूँ ॥ 202 ॥
महाप्रभुके दर्शनसे मौलानाकी जिह्वापर स्वतः ही
श्रीकृष्णनामकी स्फूर्ति और जड़ीय अभिमान दूर होना :-
तोमा देखि' जिह्वा मोर बले 'कृष्णनाम'।
'आमि-बड़ ज्ञानी'-एड़ गेल अभिमान ॥ 203 ॥
महाप्रभुको प्रणाम करके साध्य-साधनकी जिज्ञासा :-
कृपा करि' बल मोरे 'साध्य-साधने'।"
एत बलि' पड़े महाप्रभुर चरणे ॥ 204 ॥
अनुवाद-आपको देखकर मेरी जिह्वा श्रीकृष्णनाम
बोल रही है। 'मैं बहुत बड़ा ज्ञानी हूँ'-मेरा यह
अभिमान भी दूर हो गया है। आप कृपा करके मुझे
परम 'साध्य' और उसे पानेके 'साधन'के विषयमें
बतलाइये।" इतना कहकर वे महाप्रभुके चरणोंमें गिर
पड़े॥ 203-204 ॥
महाप्रभुके द्वारा उसे आश्वासन, श्रीकृष्णनामके
आभाससे ही उसके पापपुञ्जका विनाश :-
प्रभु कहे,-“उठ, कृष्णनाम तुमि लइला।
कोटि जन्मेरे पाप गेल, 'पवित्र' हइला ॥"205 ॥
महाप्रभुके आदेशसे सभीके द्वारा श्रीकृष्णनाम-ग्रहण :-
'कृष्ण' कह, 'कृष्ण' कह, -कैला उपदेश।
सबे 'कृष्ण' कहे, सबार हैल प्रेमावेश ॥ 206 ॥
अनुवाद-महाप्रभुने कहा, - "उठो, तुमने कृष्णनामका
उच्चारण किया है, इसलिये तुम्हारे करोड़ों जन्मोंके पाप
नष्ट हो गये हैं। अब तुम 'पवित्र' हो गये हो।" 'कृष्ण'
बोलो, 'कृष्ण' बोलो-महाप्रभुने यह उपदेश उन सब
पठानोंको दिया। जैसे ही वे 'कृष्ण'का उच्चारण करने लगे, सभीमें प्रेमका आवेश हो गया ॥ 205-206 ॥
महाप्रभुके द्वारा उसका 'रामदास'-नाम-संस्कार प्रदान :-
'रामदास' बलि' प्रभु ताँर कैल नाम।
आर एक पाठान, ताँर नाम - 'बिजली-खाँन' ॥ 207 ॥
पठानोंके सरदार बिजली खाँका परिचय :-
अल्प वयस ताँर, राजार कुमार।
'रामदास' आदि पाठान-चाकर ताँहार ॥ 208 ॥
अनुवाद-महाप्रभुने उस म्लेच्छाचार्यको परोक्षरूपसे
हरिनामकी दीक्षा देते हुए उसे 'रामदास' कहकर उसका
नामकरण किया। उन लोगोंमें-से एक 'बिजली खाँन'
नामका पठान था। उसकी आयु बहुत कम थी और
वह राजाका पुत्र था। 'रामदास' आदि पठान उसके दास
थे॥ 207-208 ॥
उसके द्वारा भी महाप्रभुके श्रीचरणोंमें शरण-ग्रहण,
महाप्रभुका उसके मस्तकपर पदार्पण :-
'कृष्ण' बलि' पड़े सेइ महाप्रभुर पाय।
प्रभु श्रीचरण दिल ताँहार माथाय ॥ 209 ॥
अनुवाद-वह बिजली-खाँन भी 'कृष्ण' बोलते हुए
महाप्रभुके चरणोंमें पड़ गया। महाप्रभुने अपने
श्रीचरणकमलको उसके मस्तकपर रख दिया ॥ 209 ॥
महाप्रभुकी यात्रा, उन सब पठानोंके द्वारा
वैराग्यधर्मको ग्रहण करना :-
ताँ-सबारे कृपा करि' प्रभु त' चलिला।
सेइत पाठान सब 'वैरागी' हइला ॥ 210 ॥
अनुवाद-उन सबपर कृपा करके महाप्रभु तो चल
दिये। वे सब पठान वैरागी बन गये ॥ 210 ॥
उनकी 'पठान-वैष्णव'के रूपमें ख्याति और उनके द्वारा
सर्वत्र महाप्रभुके गुणोंका गान :-
'पाठाम-वैष्णव' बलि' हैल ताँर ख्याति।
सर्वत्र गाहिया बुले महाप्रभुर कीर्त्ति ॥ 211 ॥
166
अठारहवाँ अध्याय 18/211-220 ]
अनुवाद—वे सब 'पठान-वैष्णव'के नामसे प्रसिद्ध
हो गये। वे सर्वत्र महाप्रभुके गुणोंका गान करते हुए
भ्रमण करने लगे॥ 211 ॥
सर्वत्र महाभागवत बिजली खाँकी महिमाका विस्तार :—
सेइ बिजली-खाँन हैल 'महा-भागवत'।
सर्वतीर्थे हैल ताँर परम-महत्त्व॥ 212 ॥
अनुवाद—वे बिजली-खाँन महाभागवत बन गये
और सभी तीर्थोंमें उनकी महिमा फैल गयी॥ 212 ॥
पश्चिम-भारतमें आकर महाप्रभुके द्वारा
म्लेच्छोंका उद्धार :—
ऐछे लीला करे प्रभु श्रीकृष्णचैतन्य।
'पश्चिमे' आसिया कैल यवनादि धन्य॥ 213 ॥
अनुवाद—श्रीकृष्णचैतन्य महाप्रभु ऐसी लीलाएँ करते
हैं। पश्चिम भारतमें आकर उन्होंने यवनोंको भी धन्य
कर दिया॥ 213 ॥
सोरोक्षेत्रमें गङ्गास्नान और गङ्गातटक
पथसे प्रयागमें गमन :—
सोरो क्षेत्रे आसि' प्रभु कैला गङ्गास्नान।
गङ्गातीर-पथे कैला प्रयागे पयान॥ 214 ॥
अनुवाद—सोरोक्षेत्रमें आकर महाप्रभुने गङ्गास्नान
किया और फिर गङ्गातटके मार्गसे उन्होंने प्रयागकी
ओर यात्रा की॥ 214 ॥
सनोड़िया-ब्राह्मण और कृष्णदासको
विदायी देनेकी इच्छा :—
सेइ विप्रे, कृष्णदासे, प्रभु विदाय दिला।
मोड़-हाते दुइजन कहिते लागिला॥ 215 ॥
अनुवाद—सोरोक्षेत्रमें महाप्रभुने सनोड़िया ब्राह्मण
तथा कृष्णदासको घर लौट जानेके लिये कहा, तब वे
दोनों हाथ जोड़कर कहने लगे॥ 215 ॥
अनुभाष्य—'सेइ विप्रे, कृष्णदासे'—श्रीमाधवेन्द्रपुरीके
शिष्य सनोड़िया ब्राह्मणको और कृष्णदास-राजपूतको
सोरोसे विदायी दी॥ 215 ॥
उनकी प्रयाग तक अनुगमनकी प्रार्थना :—
“प्रयाग पर्यन्त दुँहे तोमा-सङ्गे याब।
तोमार चरण-सङ्ग पुनः काँहा पाब?॥ 216 ॥
म्लेच्छदेश, केह काँहा करये उत्पात।
भट्टाचार्य-पण्डित, कहिते ना जानेन बातू॥” 217 ॥
अनुवाद—“हम दोनों प्रयाग तक आपके साथ
जायेंगे। आपके चरणकमलोंका सङ्ग पुनः हमें कहाँ
प्राप्त होगा? म्लेच्छ देश है, कौन कहाँ क्या उत्पात
खड़ा कर दे? बलभद्र भट्टाचार्य यद्यपि पण्डित हैं,
किन्तु वे यहाँकी भाषा नहीं जानते हैं॥” 216-217 ॥
महाप्रभुका मन्द-मुसकाना और उनका
महाप्रभुके पीछे-पीछे चलना :—
शुनि' महाप्रभु ईषत् हासिते लागिला।
सेइ दुइजन प्रभुर सङ्गे चलि' आइला॥ 218 ॥
अनुवाद—उन दोनोंकी बात सुनकर महाप्रभु मन्द-मन्द
मुस्करा दिये। वे दोनों महाप्रभुके साथ चले आये॥ 218 ॥
मार्गमें महाप्रभुका दर्शन करनेवाले प्रत्येक
व्यक्तिके द्वारा ही श्रीकृष्णनाम-ग्रहण :—
येइ येइ जन प्रभुर पाइल दरशन।
सेइ प्रेमे मत्त हय, करे कृष्ण-सङ्कीर्त्तन॥ 219 ॥
उससे किसी दूसरे व्यक्तिको श्रवण करनेका
सुयोग, इस प्रकार श्रवण-कीर्त्तनधाराकी
परम्परासे सभी देशोंका उद्धार :—
ताँर सङ्गे अन्योन्ये, ताँर सङ्गे आन।
एइमत 'वैष्णव' कैला सब देश-ग्राम॥ 220 ॥
अनुवाद—जिस-जिस व्यक्तिको महाप्रभुके दर्शन
प्राप्त हुए, वही प्रेममें मत्त हो गया और श्रीकृष्ण-सङ्कीर्त्तन
करने लगा। महाप्रभुके दर्शनसे जो व्यक्ति वैष्णव बना,
उसका जिसने सङ्ग किया, वह भी वैष्णव बन गया।
। 167
[ 18/219–228 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
इस प्रकार सभी नगरों और गाँवोंके लोग एकके बाद
एक वैष्णव बन गये॥ 219-220॥
दक्षिणकी भाँति पश्चिमदेशका भी उद्धार करना :-
दक्षिण याइते यैछे शक्ति प्रकाशिला।
सेइमत ‘पश्चिमदेश’ प्रेमे भासाइला॥ 221॥
अनुवाद—दक्षिण भारतमें जाते समय महाप्रभुने
जैसे अपनी शक्तिको प्रकाशित किया था, उसी प्रकार
उन्होंने 'पश्चिम-भारत'को भी श्रीकृष्णप्रेममें डुबो
दिया॥ 221॥
अनुभाष्य—'पश्चिम'-देश'-कोई-कोई कहते हैं कि
उस समय श्रीमन्महाप्रभु वृन्दावनसे कुरुक्षेत्र जाकर फिर
प्रयाग गये थे। कुरुक्षेत्रमें भद्रकाली-मन्दिरके निकट
श्रीगौरविग्रह आज भी विराजमान है॥ 221॥
अठारहवें अध्यायका अनुभाष्य समाप्त।
महाप्रभुका प्रयागमें आगमन; दस दिन
त्रिवेणी-दर्शन और स्नान :-
एइमत चलि' प्रभु 'प्रयाग' आइला।
दशदिन त्रिवेणीते मकर-स्नान कैला॥ 222॥
अनुवाद—इस प्रकार चलते-चलते महाप्रभु 'प्रयाग'में
आ गये। दस दिनों तक उन्होंने त्रिवेणीमें मकर-स्नान
किया॥ 222॥
महाप्रभुका चरित्र अगाध; वृन्दावनके प्रेम-वर्णनमें
साक्षात् शेषकी भी असमर्थता :-
वृन्दावन-गमन, प्रभु-चरित्र अनन्त।
'सहस्र-वदन' याँर नाहि पा'न अन्त॥ 223॥
अनुवाद—महाप्रभुका वृन्दावनमें गमन तथा वहाँपर
उनकी लीलाएँ अनन्त हैं, 'सहस्र-मुखवाले' अनन्त-शेष
भी उनकी लीलाओंका अन्त नहीं पाते॥ 223॥
ग्रन्थकारका दैन्य और दिग्दर्शनमात्र वर्णन :-
ताहा के कहिते पारे क्षुद्र जीव हञा।
दिग्दर्शन कैलुँ मुञि सूत्र करिया॥ 224॥
अनुवाद—तब क्षुद्र जीव होकर कौन उनका वर्णन
कर सकता है? मैंने तो सूत्रके रूपमें उनका दिग्दर्शन
मात्र करवाया है॥ 224॥
दुर्भागे व्यक्तियोंका ही श्रीचैतन्यलीलामें अविश्वास :-
अलौकिक-लीला प्रभुर अलौकिक-रीति।
शुनिलेओ भाग्यहीनेर ना हय प्रतीति॥ 225॥
अनुवाद—महाप्रभुकी लीलाएँ और उनकी रीतियाँ,
सब अलौकिक हैं। किन्तु भाग्यहीन व्यक्तियोंको उन
लीलाओंको सुनकर भी उनके प्रति विश्वास नहीं
होता॥ 225॥
सभी श्रोताओंको ही श्रीचैतन्यलीलामें
दृढ़-श्रद्धा और वास्तविक सत्यवस्तुके
ज्ञानमें विश्वास करनेका अनुरोध :-
आद्योपान्त चैतन्यलीला—'अलौकिक' जान'।
श्रद्धा करि' शुन इहा, 'सत्य' करि' मान'॥ 226॥
अनुवाद—आदिसे अन्त तक श्रीचैतन्यलीलाओंको
अलौकिक जानो। इस प्रकार श्रद्धापूर्वक उनका श्रवण
करो और उन्हें 'सत्य' मानो॥ 226॥
अविश्वासी और तार्किकके द्वारा
अपने ही अमङ्गलको बुलाना :-
येइ तर्क करे इँहा, सेइ—'मूर्खराज'।
आपनार मुण्डे से आपनि पाड़े बाज॥ 227॥
अनुवाद—जो इसमें तर्क करता है—वह 'महामूर्ख'
है। वह अपने ही सिरपर जान-बूझकर वज्रपात करता
है॥ 227॥
चैतन्यचरितामृत-रसामृतसिन्धुके जलमें जगत् प्लावित :-
चैतन्य-चरित्र एइ—'अमृतेर सिन्धु'।
जगत् आनन्दे भासाय यार एकबिन्दु॥ 228॥
अनुवाद—यह श्रीचैतन्यचरित 'अमृतका सिन्धु' है,
जिसकी एक बूँद भी समस्त जगत्को आनन्दमें डुबो
सकती है॥ 228॥
168 |
अठारहवाँ अध्याय 18/229 ]
श्रीरूप-रघुनाथ-पदे यार आश। कृपाभिलाषा करते हुए कृष्णदास इस श्रीचैतन्यचरितामृतका
चैतन्यचरितामृत कहे कृष्णदास ॥ 229 ॥ वर्णन कर रहा है ॥ 229 ॥
इति श्रीचैतन्यचरितामृते मध्यखण्डे श्रीवृन्दावनदर्शन-विलासो
नाम अष्टादश-परिच्छेदः। श्रीचैतन्यचरितामृतके मध्यखण्डमें श्रीवृन्दावनदर्शन-विलास
अनुवाद—श्रीरूप-रघुनाथ गोस्वामीके चरणकमलोंकी नामक अठारहवें अध्यायका अनुवाद समाप्त।
। 169
श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
170 |
उन्नीसवाँ अध्याय
कथासार—श्रीरूप-सनातन रामकेलिग्राममें महाप्रभुके
दर्शन करनेके बाद विषयोंके त्यागके उपायोंको कार्यान्वित
करने लगे। उन्होंने चैतन्य महाप्रभुके चरणोंका आश्रय
प्राप्त करनेके लिये 'कृष्णमन्त्र'के दो पुरश्चरण करवाये।
श्रीरूपगोस्वामी अपनी सम्पत्तिमें-से दस हजार मुद्राएँ
गौड़देशमें एक व्यापारीके पास रखकर बाकी धनको
नौकामें चढ़ाकर बाकला-चन्द्रद्वीपमें गये। उस धनको
उन्होंने ब्राह्मणों, वैष्णवों और कुटुम्बियोंमें बाँट दिया
और एक भाग किसी विपत्तिसे बचनेके लिये अलग
रख दिया। महाप्रभु वनके पथसे किस दिन वृन्दावन-यात्रा
करेंगे, इसे जाननेके लिये उन्होंने अपने दो सेवकोंको
पुरुषोत्तम-क्षेत्रमें भेजा। दूसरी ओर श्रीसनातन गोस्वामी
रोगके छलसे पण्डितोंको लेकर भागवतादिकी चर्चा
करने लगे। गौड़ेश्वर बादशाह हुसेनशाहने पहले वैद्यके
द्वारा, बादमें स्वयं अपने नेत्रोंसे देखकर सनातनके
राजकार्यको छोड़नेके छलको जानकर उन्हें कारागारमें
बन्द करके उड़ीसा देशपर आक्रमण करनेके लिये
यात्रा की।
महाप्रभुने जब वृन्दावन जानेके लिये वनपथसे
यात्रा आरम्भ की, तब श्रीरूप गोस्वामीने गृहत्याग कर
दिया। उन्होंने श्रीसनातन गोस्वामीको यह सन्देश भिजवाया
कि वे गृहत्याग करके अपने भाई अनुपम मल्लिकके
साथ महाप्रभुसे मिलने जा रहे हैं। श्रीरूप गोस्वामी
प्रयागमें पहुँचकर महाप्रभुके पास दस दिन तक रहे।
इसी बीच श्रीवल्लभभट्टने महाप्रभुको निमन्त्रण करके
महाप्रभुका विशेष सम्मान किया। महाप्रभुने श्रीरूपका
श्रीवल्लभभट्टके साथ परिचय करा दिया। उसके बाद
श्रीरघुपति उपाध्यायके वहाँ पहुँचनेपर उनका महाप्रभुके
साथ बहुत रस-आलाप हुआ। इस स्थानपर श्रीकविराज
गोस्वामीने श्रीरूप और श्रीसनातनके व्रजजीवनके विषयमें
कुछ वर्णन किया है। प्रयागमें दस दिन रहकर
महाप्रभुने श्रीरूपको भक्तिरसतत्त्वकी सूत्ररूपमें शिक्षा
देकर रसामृतसिन्धुकी रचना करनेकी आज्ञा दी।
श्रीरूपको वहाँसे वृन्दावन भेजकर महाप्रभु काशीमें
जाकर श्रीचन्द्रशेखरके घरमें रहे।
—(अमृतप्रवाह भाष्य)
श्रीरूपके द्वारा व्रजरसकेलि-तत्त्वको प्रकट
करनेवाले श्रीगौरसुन्दर :-
वृन्दावनीयां रसकेलिवात्ताँ
कालेन लुप्तां निजशक्तिमुक्तः।
सञ्चार्य रूपे व्यतनोत् पुनः स
प्रभुर्विधौ प्रागिव लोकसृष्टिम् ॥ 1 ॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 1 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीगौरने सृष्टिसे पहले ब्रह्माके
हृदयमें जिस प्रकार (सम्बन्ध-अभिधेय-प्रयोजनात्मक
भगवत्तत्त्वकी) प्रेरणा की थी, उसी प्रकार श्रीरूप
गोस्वामीमें अत्यधिक उत्सुक होकर निज-शक्तिका
सञ्चार करके कालधर्मसे (कालके प्रभावसे) लुप्त हुई
वृन्दावनकी रसकेलिवात्र्ताका विस्तार किया था ॥ 1 ॥
अनुभाष्य—
सः प्रभुः (श्रीगौरः) उत्कः (उत्कण्ठितः सन्) लोक-सृष्टिं
प्राक् (विश्व-सृष्ट्यादेः पूर्वं) विधौ (विधातरि ब्रह्मणि) इव रूपे
(श्रीरूपगोस्वामिनि) निजशक्तिं सञ्चार्य (निधाय) कालेन
(कालधर्मेण) लुप्ताम् (अन्तर्हितामिति) वृन्दावनीयां रसकेलिवार्त्तां
(वृन्दावनसम्बन्धिनीं श्रीव्रजेन्द्रनन्दन-विलास-कथां) पुनः व्यतनोत्
(प्रकाशितवान्)।
श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 1 ॥
171
[ 19/2-11 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
जय जय श्रीचैतन्य जय नित्यानन्द।
जयाद्वैतचन्द्र जय गौरभक्तवृन्द॥२॥
अनुवाद—श्रीचैतन्य महाप्रभुकी जय हो, जय हो,
श्रीनित्यानन्द प्रभुकी जय हो, श्रीअद्वैतचन्द्रकी जय हो,
सभी गौरभक्तोंकी जय हो॥२॥
महाप्रभुके दर्शनके बाद श्रीरूप-सनातनका
अपने घरमें लौटना :—
श्रीरूप-सनातन रहे रामकेलि-ग्रामे।
प्रभुरे मिलिया गेला आपन-भवने॥३॥
अनुवाद—महाप्रभुसे रामकेलि ग्राममें मिलनेके बाद
श्रीरूप और श्रीसनातन अपने घर लौट गये थे॥३॥
विषय-त्याग और महाप्रभुकी प्राप्तिके
लिये दोनोंका पुरश्चरण :—
दुइभाइ विषय-त्यागेर उपाय सृजिल।
बहुधन दिया दुइ ब्राह्मणे वरिल॥४॥
कृष्णमन्त्रे कराइल दुइ पुरश्चरण।
अचिरात् पाइबारे चैतन्य-चरण॥५॥
अनुवाद—दोनों भाइयोंने विषय-त्यागका उपाय सोच
निकाला। इस कार्यके लिये उन्होंने बहुत-सा धन देकर
दो ब्राह्मणोंको वरण किया। उन ब्राह्मणोंने तीनों सन्ध्या
श्रीकृष्णमन्त्रका जप, श्रीकृष्ण-अर्चर्नादि पुरश्चरण
नियमपूर्वक दो बार किये जिससे दोनों भाइयोंको
श्रीचैतन्य महाप्रभुके चरणकमलोंकी अतिशीघ्र प्राप्ति
हो॥४-५॥
अनुभाष्य—‘पुरश्चरण’—मध्यलीला 15/108 संख्या
देखें॥५॥
श्रीरूपका फतेहाबादमें अपने घरपर आगमन :—
श्रीरूप-गोसाञि तबे नौकाते भरिया।
आपणार घरे आइला बहुधन लञा॥६॥
अनुवाद—उसके बाद श्रीरूपगोस्वामी बहुत-सा धन नौकामें भरकर अपने घरमें लेकर आये॥६॥
ब्राह्मण-वैष्णवोंको आधा, स्वजनोंको
एक-चौथाई धनका वितरण :—
ब्राह्मण-वैष्णवे दिला तार अर्द्ध-धने।
एक चौठि धन दिला कुटुम्ब-भरणे॥७॥
अनुवाद—उन्होंने उस धनका आधा भाग तो
ब्राह्मणों और वैष्णवोंमें बाँट दिया तथा उन्होंने एक
चौथाई धन अपने कुटुम्बके भरण-पोषणके लिये दे
दिया॥७॥
भावी-विपत्तिसे उद्धारके लिये धनको बचाकर रखना :—
दण्डबन्ध लागि' चौठि सञ्चय करिला।
भाल-भाल विप्र-स्थाने स्थाप्य राखिला॥८॥
अनुवाद—भविष्यमें आनेवाली किसी विपत्तिसे
उद्धारके लिये बचा हुआ एक चौथाई धन एक अच्छे
ब्राह्मणके पास रखवा दिया॥८॥
अमृतप्रवाह भाष्य—‘दण्डबन्ध’—उपस्थित विपत्ति,
राजदण्ड और बन्धनादिसे उद्धारके लिये॥८॥
गौड़में श्रीसनातनके लिये दस हजार मुद्राका रक्षण :—
गौड़े राखिल मुद्रा दश-हाजारे।
सनातन व्यय करे, राखे मुदि-घरे॥९॥
अनुवाद—श्रीरूपने गौड़देशमें श्रीसनातनके खर्च
करनेके उद्देश्यसे दस हजार मुद्राएँ एक व्यापारीके
घरपर रख दीं॥९॥
महाप्रभुके पुरी-गमन और वृन्दावनमें जानेके लिये तैयार
होनेकी वार्त्ताका श्रवण :—
श्रीरूप शुनिल प्रभुर नीलाद्रि-गमन।
वनपथे याबेन प्रभु श्रीवृन्दावन॥१०॥
उसके लिये दो दूतोंको भेजना :—
रूप-गोसाञि नीलाचले पाठाइल दुइजन।
प्रभु यबे वृन्दावन करेन गमन॥११॥
172 |
उन्नीसवाँ अध्याय 19/10-17 ]
"शीघ्र आसि' मोरे ताँर दिबा समाचार।
शुनिया तदनुरूप करिब व्यवहार॥" 12 ॥
अनुवाद—श्रीरूपने सुना कि महाप्रभु जगन्नाथपुरी लौट आये हैं और वे वनमार्गसे श्रीवृन्दावन जानेकी तैयारी कर रहे हैं। श्रीरूप गोस्वामीने नीलाचलमें दो लोगोंको यह पता करनेके लिये भेजा कि महाप्रभु कब श्रीवृन्दावनके लिये प्रस्थान करेंगे। श्रीरूप गोस्वामीने उनसे कहा,—"तुम लोग शीघ्र आकर मुझे उनका समाचार देना, मैं उसके अनुरूप अपना कार्यक्रम बनाऊँगा॥" 10-12 ॥
श्रीसनातनका राजकार्यसे छुट्टी लेनेका सुयोग खोजना :-
एथा सनातन-गोसाञि भावे मने मन।
"राजा मोरे प्रीति करे, से—मोर बन्धन॥ 13 ॥
राजा उनसे रुष्ट हो, इसके लिये प्रयत्न :-
कोन मते राजा यदि मोरे क्रुद्ध हय।
तबे अव्याहति हय, करिलुँ निश्चय॥" 14 ॥
अनुवाद—इधर रामकेलि ग्राममें श्रीसनातन अपने मनमें सोचने लगे,—"राजा मुझसे प्रीति करता है, यह मेरे लिये बन्धन है। यदि किसी प्रकारसे राजा मुझसे रुष्ट हो जाय, तभी मेरा छुटकारा होगा। यही मेरा निश्चय है॥" 13-14 ॥
रोगका छल :-
अस्वास्थ्येर छद्म करि' रहे निज-घरे।
राजकार्य छाड़िला, ना याय राजद्वारे॥ 15 ॥
अपने घरपर भागवतका विचार :-
लोभी कायस्थगण राजकार्य करे।
आपने स्वगृहे करे शास्त्रेर विचारे॥ 16 ॥
भट्टाचार्य पण्डित बिश त्रिश लञा।
भागवत-विचार करेन सभाते बसिया॥ 17 ॥
अनुवाद—श्रीसनातन अस्वस्थ होनेका छल करके अपने घरपर ही रहने लगे। उन्होंने राजकार्य करना छोड़ दिया और राज-दरबारमें जाना भी बन्द कर दिया। लोभी कायस्थ (राजकीय लेखा और खाता लिखनेवालोंके अधिकारी) लोग राजकार्य देखने लगे तथा श्रीसनातन गोस्वामी अपने घरपर शास्त्रोंपर विचार-विमर्श करने लगे। वे बीस-तीस भट्टाचार्य पण्डितोंको अपने घरपर ही बुलाकर सभा करके भागवतपर विचार करने लगे॥ 15-17 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—छद्म'-छल। जिस समय श्रीसनातन गोस्वामी राजमन्त्री थे, उस समय उनके अधीन कुछ 'कायस्थ' कर्मचारी थे। श्रीसनातनके वैराग्यभावको देखकर उनमेंसे कुछ व्यक्ति श्रीसनातनके पदको प्राप्त करनेके लोभसे राजकार्यमें विशेष निपुणता दिखलाने लगे। लोगोंका कहना है कि श्रीसनातन गोस्वामीके पद त्याग करनेके बाद उनके अधीन कार्य करनेवाले कर्मचारी प्रसिद्ध पुरन्दर खाँनको यह पद प्राप्त हुआ था॥ 15-16 ॥
अनुभाष्य—'भागवत-विचार'-विद्या 'दो' प्रकारकी है; (मुः उः 1/1/4-5)—
"द्वे विद्ये वेदितव्ये इति ह स्म
यद् ब्रह्मविदो वदन्ति-परा चैवापरा च।
तत्रापरा ऋग्वेदो यजुर्वेदः सामवेदोऽथर्ववेदः
शिक्षा कल्पो व्याकरणं निरुक्तं छन्दो ज्योतिषमिति।
अथ परा यया तदक्षरमधिगम्यते।"
[अर्थात् "ब्रह्मविद् लोग कहते हैं,—विद्या परा और अपराके भेदसे दो प्रकारकी होती है। उनमें-से ऋक्, यजुः, साम, अथर्ववेद, शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द और ज्योतिष-ये अपरा विद्या हैं। और जिसके द्वारा अक्षर-ब्रह्मको जाना जाता है, वह परा विद्या है।"]
पराविद्याकी बात ब्रह्मसूत्र अथवा वेदान्तमें ही कही गयी है। मुक्तिकामी वेदान्तिक लोग भी धर्म-अर्थकामियोंकी भाँति छलसे युक्त होते हैं। इसलिये अपरा-विद्यापरक अथवा परा-विद्यापरक शास्त्रोंमें जहाँ शुद्धभक्तिविरोधी मोक्षकी महिमाका गान हुआ है, वे
। 173
सभी बातें छलपूर्ण हैं; किन्तु श्रीमद्भागवत शास्त्रमें ऐसा
छल नहीं है। यमदण्डके भागी कर्मी लोग अथवा
अहंग्रहोपासकगण श्रीमद्भागवतके विचारसे सम्पूर्ण अयोग्य
हैं; वैष्णवगण ही एकमात्र भागवतका विचार करके
भक्तिबलसे संसारसे विमुक्त होते हैं; (भाः 12/13/18)—
“श्रीमद्भागवतं पुराणममलं यद्वैष्णवानां प्रियं,
यस्मिन् पारमहंस्यमेकममलं ज्ञानं परं गीयते।
यत्र ज्ञानविरागभक्तिसहितं नैष्कर्म्यमाविष्कृतं,
तच्छृ
[अर्थात् “श्रीमद्भागवत निर्मल पुराण है। यह
वैष्णवोंका प्रिय ग्रन्थ है। इसमें एक अमल पारमहंस्य-
ज्ञान वर्णित हुआ है। इसमें ज्ञान-वैराग्य-भक्तियुक्त
नैष्कर्म्य-ज्ञान आविष्कृत (प्रकाशित) हुआ है। मनुष्य
भक्तिपूर्वक इसका श्रवण, पाठ और विचार करके
विमुक्ति प्राप्त करते हैं।”] ॥ 17 ॥
एकदिन अचानक बादशाहका आगमन :—
आर दिन गौड़ेश्वर, सङ्गे एकजन।
आचम्बिते गोसाञि-सभाते कैल आगमन ॥ 18 ॥
सभीके द्वारा आदरपूर्वक बादशाहकी अगवानी :—
पात्साह देखिया सबे सम्भ्रमे उठिला।
सम्भ्रमे आसन दिया राजारे बसाइला ॥ 19 ॥
अनुवाद—जब श्रीसनातन गोस्वामीकी विद्वान ब्राह्मणोंके
साथ गोष्ठी चल रही थी, तब एक दिन अचानक
बादशाह एक व्यक्तिको अपने साथ लेकर वहाँ आ
पहुँचे। बादशाहको देखकर सभी ब्राह्मण और श्रीसनातन
उठकर खड़े हो गये और उन्होंने आदरपूर्वक आसन
देकर राजाका सम्मान करते हुए उन्हें बैठाया ॥ 18-19 ॥
अनुभाष्य—'गौड़ेश्वर'—आलाऊद्दीन सैयद हुसेन शाह
सेरिफ मक्का 1420 शकाब्दसे 1443 शकाब्द तक
गौड़के सिंहासनपर अधिष्ठित थे। इसलिये 1424 शकाब्दमें
यही हुसेन शाह ही श्रीसनातनकी सभामें उपस्थित
हुए ॥ 18 ॥
बादशाहकी उक्ति, श्रीसनातनके अभिप्रायकी जिज्ञासा :—
राजा कहे,—“तोमार स्थाने वैद्य पाठाइलुँ।
वैद्य कहे,—व्याधि नाहि, सुस्थ ये देखिलुँ ॥ 20 ॥
आमार ये किछु कार्य, सब तोमा लञा।
कार्य छाड़ि' रहिला तुमि घरेते बसिया ॥ 21 ॥
मोर यत कार्य-काम, सब कैला नाश।
कि तोमार हृदये आछे, कह मोर पाश ॥” 22 ॥
अनुवाद—बादशाहने कहा,—“मैंने तुम्हारे घरपर
वैद्यको भेजा था। वैद्यने मुझसे कहा कि तुम्हें कोई भी
बीमारी नहीं है, उसने अच्छी तरहसे जाँचकर तुम्हें
पूर्णतया स्वस्थ पाया है। मैं राज-काजके समस्त कार्योंमें
तुमपर निर्भर करता हूँ और तुम कार्यको छोड़कर
घरपर बैठे हुए हो। तुमने मेरे सब कार्योंका नाश कर
दिया है। तुम्हारे हृदयमें क्या विचार है, वह मुझे स्पष्ट
रूपसे बतलाओ ॥” 20-22 ॥
श्रीसनातनकी राजकार्यमें अनिच्छा बताना :—
सनातन कहे,—“नहे आमा हैते काम।
आर एकजन दिया कर समाधान ॥” 23 ॥
अनुवाद—श्रीसनातनने कहा,—“अब मुझसे कोई
काम नहीं होगा। अन्य किसी एक व्यक्तिको नियुक्त
करके अपने कार्य करवा लीजिये ॥” 23 ॥
बादशाहकी क्रोधपूर्ण उक्ति :—
तबे क्रुद्ध हञा राजा कहे आरबार।
“तोमार ‘बड़ भाई’ करे दस्यु-व्यवहार ॥ 24 ॥
जीव-पशु मारि' कैल चाक्ला सब नाश।
एथा तुमि कैला मोर सर्व कार्य नाश ॥” 25 ॥
अनुवाद—तब क्रोधित होकर बादशाहने पुनः
कहा,—“तुम्हारा ‘बड़ा भाई’ अर्थात् मैं डाकुओं जैसा
कार्य अर्थात् लूट-पाट करता हूँ। शिकारमें बहुतसे
पशुओंको मारकर मैंने चाक्ला नामक स्थानको प्रायः
उन्नीसवाँ अध्याय
19/24-30 ]
नष्ट कर दिया है। और इधर तुम मेरी समस्त
योजनाओंको नष्ट करनेमें लगे हो॥"24-25॥
श्रीसनातनकी कार्यसे छुटकारा पानेके
लिये दण्डकी प्रार्थना :-
सनातन कहे, – “तुमि स्वतन्त्र गौड़ेश्वर।
ये येइ दोष करे, देह' तार फल ॥" 26 ॥
अनुवाद- श्रीसनातनने कहा,- “आप गौड़देशके बादशाह
और पूर्ण स्वतन्त्र हैं। आपके राज्यमें जो व्यक्ति जो
दोष करता है, आप उसे उसका फल देते हैं॥"26॥
बादशाहकी आज्ञासे श्रीसनातनको बाँधना :-
एत शुनि' गौड़ेश्वर उठि' घरे गेला।
पलाइब बलि' सनातनरे बान्धिला ॥ 27 ॥
अनुवाद-यह सुनकर बादशाह उठकर अपने घर
चला गया। उसने श्रीसनातनको बन्दी बनानेका आदेश
दिया जिससे वे कहीं भाग न जाँय ॥ 27 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य-सुना जाता है कि श्रीसनातन
गोस्वामीको बादशाह हुसेनशाह 'छोटा भाई' मानता था।
जब श्रीसनातनने कर्मत्यागकी अत्यन्त दृढ़ता दिखलायी,
तब हुसेनशाहने प्रणय-रोषपूर्वक कहा कि,- “मैं तुम्हारा
'बड़ा भाई' हूँ, मैं बिल्कुल भी राज्यका पालन नहीं
करता हूँ। मैं तो सेनाको लेकर युद्धके द्वारा केवल
देश-विदेशको लूटते हुए घूमता हूँ एवं जातिसे यवन
होनेके कारण गौड़-चाक्लामें शिकार करके बहुतसे
जीव-पशुओंका नाश ही करता हूँ। तुमपर ही मेरा
विश्वास है; तुम्हारा बड़ा भाई, मैं, जब केवल
डाकुओंके जैसे कार्य तथा जीवोंके नाशके कार्यमें ही
लगा हुआ था, और छोटे भाई, तुमने भी तब कार्यका
परित्याग करके सब कार्योंका नाश कर दिया है, अब
राज्य किस प्रकार चलेगा?" श्रीसनातनने छोटे भाईके
नाते परिहास करते हुए कहा, - 'आप गौड़देशके बादशाह
हैं, स्वतन्त्र राजा हैं, आपके पास दण्ड प्रदान करनेकी
पूर्ण सत्ता है; जो जैसा भी दोष करता है, आप उसे
उसका फल प्रदान करते हैं।' इस वचनमें गूढ़ रहस्य
है, - राजा स्वयं डाकुओं जैसा व्यवहार करता है,
इसलिये वह उसका फल ग्रहण करे और मन्त्रीका
(मेरा) जब कार्यमें आलस्य दिखलायी देता है, तब
उसका (मेरा) कार्यसे छुटकारा रूपी फल हो। इससे
श्रीसनातनके अभिलषित विषयको जानकर बादशाह
उठकर चला गया ॥ 24-27 ॥
बादशाहका उड़ीसा जानेका अभियान; श्रीसनातनको साथमें
चलनेके लिये आह्वान :-
हेनकाले गेल राजा उड़िया मारिते।
सनातने कहे, - "तुमि चल मोर साथे ॥"28 ॥
अनुवाद-उसी समय बादशाह उड़ीसापर आक्रमण
करनेके लिये गया। बादशाहने सनातनसे कहा,-“तुम
भी मेरे साथ चलो ॥" 28 ॥
अनुभाष्य-1424 शकाब्दमें हुसेनशाहने उड़ीसाके
सामन्तराज गणोंको [उनके साथ युद्ध करनेके लिये]
बाध्य किया ॥ 28 ॥
विष्णु-विरोधी कार्यमें श्रीसनातनका असहयोग :-
तेँ हो कहे, – “याबे तुमि देवताय दुःख दिते।
मोर शक्ति नाहि, तोमार सङ्गे याइते ॥"29 ॥
अनुवाद- श्रीसनातनने कहा,- “आप श्रीजगन्नाथदेवको
दुःख देने जा रहे हैं। मुझमें आपके साथ जानेकी शक्ति
नहीं है ॥"29॥
बादशाहकी यात्रा, महाप्रभुकी भी पुरीसे वृन्दावन-यात्रा :-
तबे ताँरे बान्धि' राखि' करिला गमन।
एथा नीलाचल हैते प्रभु चलिला वृन्दावन ॥ 30 ॥
अनुवाद- श्रीसनातनको बन्दी बनाकर बादशाह
उड़ीसा युद्धके लिये चला गया। इधर महाप्रभु नीलाचलसे
वृन्दावनकी ओर चल दिये ॥ 30 ॥
175
[ 19/31-40 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
श्रीरूपको उन दो दूतोंके द्वारा महाप्रभुकी
वृन्दावन-यात्राकी बात बतलाना :-
तबे सेइ दुइ चर रूप-ठाञि आइल।
'वृन्दावन चलिला प्रभु'-आसिया कहिल ॥ 31 ॥
अनुवाद-तभी श्रीरूप गोस्वामीके द्वारा नीलाचल
भेजे गये दो दूत उनके पास लौटकर आये। उन्होंने
बतलाया कि 'महाप्रभु वृन्दावनके लिये चल पड़े
हैं' ॥ 31 ॥
श्रीरूपका छोटे भाईके साथ महाप्रभुके दर्शनके लिये
यात्राके संवादका श्रीसनातनको पत्रके द्वारा ज्ञापन; और
उन्हें जिस-किसी उपायसे चले आनेका आह्वान :-
शुनिया श्रीरूप लिखिला सनातन-ठाञि।
'वृन्दावन चलिला श्रीचैतन्य-गोसाञि ॥ 32 ॥
आमि-दुइभाइ चलिलाङ ताँहारे मिलिते।
तुमि यैछे तैछे छुटि' आइस ताँहा हैते ॥ 33 ॥
अनुवाद-दूतोंकी बात सुनकर श्रीरूपने श्रीसनातनके
पास पत्र लिखकर भेजा, - 'श्रीचैतन्य गोसाईं वृन्दावनके
लिये चल पड़े हैं। हम दोनों भाई उनसे मिलनेके लिये
जा रहे हैं, आप भी वहाँसे जिस किसी प्रकारसे
छूटकर आ जाइये ॥ 32-33 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य- 'आमि-दुइभाइ'-मैं रूप और
हमारे छोटे भाई अनुपम अथवा वल्लभ ॥ 33 ॥
गौड़देशमें रखी हुई दस हजार मुद्राओंकी सहायतासे
बन्धनसे मुक्त होनेका परामर्श देना :-
दशसहस्र मुद्रा तथा आछे मुदि-स्थाने।
ताहा दिया कर शीघ्र आत्म-विमोचने ॥ 34 ॥
यैछे तैछे छुटि' तुमि आइस वृन्दावन।'
एत लिखि' दुइभाइ करिला गमन ॥ 35 ॥
अनुवाद-गौड़देशमें अमुक व्यापारीके पास दस
हजार मुद्राएँ रखी हैं, उनके द्वारा शीघ्र ही अपने
आपको छुड़ा लीजिये। जिस किसी प्रकारसे छूटकर
आप वृन्दावन आ जाइये।' इतना लिखकर दोनों भाई
महाप्रभुसे मिलनेके लिये चल पड़े ॥ 34-35 ॥
अनुपमका परिचय :-
अनुपम मल्लिक, ताँर नाम-'श्रीवल्लभ'।
रूप-गोसाञिर छोटभाइ-परम वैष्णव ॥ 36 ॥
अनुवाद-श्रीरूप गोस्वामीके छोटे भाई परम वैष्णव
थे। उनका नाम 'श्रीवल्लभ' था। उनको अनुपम
मल्लिक नाम दिया गया था ॥ 36 ॥
अनुभाष्य-आदिलीला 10/84 संख्या देखें ॥ 36 ॥
दोनों भाइयोंका प्रयागमें आगमन और वहाँ महाप्रभुके
होनेके विषयमें सुनकर आनन्द :-
ताँहारे लञा रूप-गोसाञि प्रयागे आइला।
महाप्रभु ताँहा शुनि' आनन्दित हैला ॥ 37 ॥
अनुवाद-श्रीवल्लभको अपने साथ लेकर श्रीरूप
गोस्वामी प्रयागमें आ पहुँचे। महाप्रभुके भी वहीं होनेके
विषयमें सुनकर वे बहुत आनन्दित हुए ॥ 37 ॥
प्रयागमें महाप्रभुका बिन्दुमाधव दर्शन
और लोगोंकी भीड़ :-
प्रभु चलियाछेन बिन्दुमाधव-दरशने।
लक्ष लक्ष लोक आइसे प्रभुर मिलने ॥ 38 ॥
केह कान्दे, केह हासे, केह नाचे, गाय।
'कृष्ण' 'कृष्ण' बलि' केह गड़ागड़ि याय ॥ 39 ॥
अनुवाद-महाप्रभु बिन्दुमाधवका दर्शन करनेके
लिये जा रहे थे। लाखों-लाखों लोग महाप्रभुसे मिलनेके
लिये आ रहे थे। कोई रो रहा था, कोई हँस रहा था,
कोई नाच रहा था, कोई गा रहा था। कोई तो 'कृष्ण'
'कृष्ण' बोलते हुए भूमिपर लोटपोट खा रहा था ॥ 38-39 ॥
प्रेमकी बाढ़में प्रयाग निमग्न :-
गङ्गा-यमुना प्रयाग नारिल डुबाइते।
प्रभु डुबाइल कृष्णप्रेमेर वन्याते ॥ 40 ॥
176 |
उन्नीसवाँ अध्याय 19/40-50 ]
अनुवाद—गङ्गा तथा यमुना प्रयागको डुबो नहीं
पायीं, किन्तु महाप्रभुने प्रयागको श्रीकृष्णप्रेमकी बाढ़में
डुबो दिया॥40॥
दोनों भाइयोंका थोड़े एकान्त स्थानमें रहना :—
भिड़ देखि' दुइ भाइ रहिला निर्जने।
प्रभुर आवेश हैल माधव-दर्शने ॥ 41 ॥
अनुवाद—भीड़को देखकर दोनों भाई एकान्त स्थानमें
खड़े रहे। महाप्रभु बिन्दुमाधवके दर्शनसे प्रेमाविष्ट हो
गये॥41॥
महाप्रभुकी उस समयकी अवस्था :—
प्रेमावेशे नाचे प्रभु हरिध्वनि करि'।
ऊर्द्धबाहु करि' बले—बल 'हरि' 'हरि'॥42॥
प्रभुर महिमा देखि' लोके चमत्कार।
प्रयागे प्रभुर लीला नारि वर्णिवार ॥ 43 ॥
अनुवाद—महाप्रभु प्रेमावेशमें हरिध्वनि करते हुए
नृत्य कर रहे थे और अपनी भुजाओंको ऊपर उठाकर
लोगोंसे 'हरि' 'हरि' बोलनेके लिये कह रहे थे।
महाप्रभुकी महिमा देखकर लोग आश्चर्यचकित हो रहे
थे। प्रयागमें महाप्रभुने जो लीलाएँ कीं, मैं उनका यथार्थ
रूपमें वर्णन नहीं कर सकता॥42-43॥
दक्षिण-भारतके ब्राह्मणके घरमें महाप्रभुकी भिक्षा :—
दाक्षिणात्य-विप्र-सने आछे परिचय।
सेइ विप्र निमन्त्रिया निल निजालय ॥ 44 ॥
अनुवाद—महाप्रभुका दक्षिण भारतके एक ब्राह्मणके
साथ परिचय था। वही ब्राह्मण महाप्रभुको निमन्त्रित
करके अपने घरपर ले गया॥44॥
निर्जनमें महाप्रभुके साथ दोनों भाइयोंका मिलन :—
विप्र-गृहे आसि' प्रभु निभृते बसिला।
श्रीरूप-वल्लभ दुँहे आसिया मिलिला ॥ 45 ॥
अनुवाद—ब्राह्मणके घरपर आकर महाप्रभु एकान्तमें
बैठ गये। श्रीरूप और श्रीवल्लभ—दोनों वहींपर आकर
महाप्रभुसे मिले॥45॥
दोनोंकी दैन्यपूर्ण उक्ति :—
दुइगुच्छ तृण दुँहे दशने धरिया।
प्रभु देखि' दूरे पड़े दण्डवत् हञा ॥ 46 ॥
नाना श्लोक पड़ि' उठे, पड़े बार बार।
प्रभु देखि' प्रेमावेश हइल दुँहार ॥ 47 ॥
अनुवाद—तृणके दो गुच्छोंको अपने दाँतोंमें दबाकर
दोनों भाइयोंने दूरसे महाप्रभुको देखकर दण्डवत् प्रणाम
किया। महाप्रभुके दर्शन करके उन दोनोंमें प्रेमावेश हो
रहा था। वे अनेक श्लोक पढ़ते हुए बार-बार उठ रहे
थे तथा पुनः भूमिपर गिरकर प्रणाम कर रहे थे॥46-47॥
उन्हें देखकर महाप्रभुका प्रसन्न होना :—
श्रीरूपे देखिया प्रभुर प्रसन्न हैल मन।
“उठ, उठ, रूप, आइस”, बलिला वचन ॥ 48 ॥
श्रीकृष्णकी कृपासे जीवके संसारसे उद्धारका वर्णन :—
“कृष्णेर करुणा किछु ना याय वर्णने।
विषयकूप हैते तोमा काड़िल दुइजने ॥ 49 ॥
अनुवाद—श्रीरूपको देखकर महाप्रभुका मन बहुत
प्रसन्न हो गया और उन्होंने कहा,—“उठो, उठो, रूप,
यहाँपर आओ।” महाप्रभुने आगे कहा,—“श्रीकृष्णकी
करुणाका वर्णन करना सम्भव नहीं है। उन्होंने तुम
दोनोंको विषयरूपी कुएँसे निकाल लिया है॥48-49॥
जिस किसी भी कुलमें उत्पन्न वैष्णव ही
भगवान्की भाँति सभीके द्वारा सर्वथा पूज्य :—
श्रीहरिभक्तिविलास (10/99)में—
न मेऽभक्तश्चतुर्वेदी मद्भक्तः श्वपचः प्रियः।
तस्मै देयं ततो ग्राह्यं स च पूज्यो यथा ह्यहम्॥” 50 ॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥50॥
अमृतप्रवाह भाष्य—चतुर्वेदपाठी अर्थात् चौबे ब्राह्मण
होनेपर ही 'भक्त' होता है, ऐसा नहीं है। मेरा भक्त
। 177
[ 19/50-54 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
चण्डाल होनेपर भी मुझे प्रिय है; भक्त ही वास्तवमें
दान-पात्र एवं ग्रहण-पात्र है; भक्तमात्र ही मेरे समान
पूजनीय है॥"50॥
अनुभाष्य—
अभक्तः (शुद्धभक्तिविहीनः) चतुर्वेदी (चतुर्वेदनिपुणः ब्राह्मणः)
मे (मम) प्रियः न (भवति); मद्भक्तः श्वपचः (सुनीचकुलोद्भवोऽपि)
मे प्रियः (भवति); तस्मै (शुद्धभक्ताय नीचकुलोद्भवाय श्वपचाय)
[अपि चतुर्वेदकुशलैर्ब्राह्मणादिभिः एव सम्मानादिकं] देयम्;
ततः (तस्मात् नीचकुलोद्भूतात् श्वपचात् अपि शुद्धभक्तात्)
ग्राह्यं (तदुच्छिष्टादिकं प्रतिगृह्णीयात्), यथा अहं (सर्वेश्वरेश्वरः
श्रीभगवान् विष्णुः) पूज्यः [तथा] सः (श्वपचकुलजातोऽपि
भक्तः) [तच्छिष्यस्थानीय-ब्राह्मणादिभिः सर्वैः एव पूज्यः च]।
श्लोक-भावानुवाद—शुद्धभक्तिविहीन चतुर्वेदोंमें
निपुण ब्राह्मण मेरा प्रिय नहीं है, सुनीचकुलमें उत्पन्न
मेरा भक्त मुझे प्रिय है। नीचकुलमें उत्पन्न शुद्धभक्त
चतुर्वेदोंमें निपुण ब्राह्मणोंके द्वारा सम्मान दिये जाने
योग्य और शुद्धभक्त होनेके कारण नीचकुलमें उत्पन्न
चण्डालका उच्छिष्ट ग्रहण करनेके योग्य है। वह मेरे
समान ही पूजनीय है [उसके शिष्य-स्थानीय ब्राह्मणादिके
द्वारा भी पूजनीय है]॥50॥
महाप्रभुके द्वारा आलिङ्गन और दोनोंके
मस्तकपर अपने चरणार्पण :-
एइ श्लोक पड़ि' दुँहारे कैला आलिङ्गन।
कृपाते दुँहार माथाय धरिला चरण॥51॥
अनुवाद—महाप्रभुने यह श्लोकका पढ़कर उन
दोनोंका आलिङ्गन किया और कृपापूर्वक अपने
चरणकमल उन दोनोंके सिरपर रख दिये॥51॥
दोनों भाइयोंके द्वारा महाप्रभुका स्तव :-
प्रभु-कृपा पाञा दुँहे दुइ हात युड़ि'।
दीन हञा स्तुति करे विनय आचरि'॥52॥
अनुवाद—महाप्रभुकी कृपाको प्राप्त करके दोनों
भाई दोनों हाथ जोड़कर दीनतापूर्वक विनयका आचरण
करते हुए स्तुति करने लगे॥52॥
स्वरूप-नाम-रूप-गुण-लीलामय और
सम्बन्ध-अभिधेय-प्रयोजनाधिदेवता श्रीगौरको प्रणाम :-
श्रीरूप-वचन—
नमो महावदान्याय कृष्णप्रेमप्रदाय ते।
कृष्णाय कृष्णचैतन्यनाम्ने गौरत्विषे नमः॥53॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥53॥
अमृतप्रवाह भाष्य—महावदान्य, श्रीकृष्णप्रेमप्रदाता,
श्रीकृष्णस्वरूप, श्रीकृष्णचैतन्य नामक श्रीगौराङ्गरूपधारी
प्रभु आपको नमस्कार है॥53॥
अनुभाष्य—
महावदान्याय (अतुलपरमकरुणामयाय) कृष्णप्रेमप्रदाय
(शिवविरिञ्चिदुर्लभकृष्णप्रेमदातृप्रवराय) कृष्णचैतन्यनाम्ने
(कृष्णचैतन्याख्याय) गौरत्विषे (श्रीराधाद्युतिसुवलित-गौरकान्तिमयाय)
कृष्णाय (गोपीजनवल्लभाय गोविन्दाय) ते (तुभ्यं) नमः।
श्लोक-भावानुवाद—अतुलनीय परम करुणामय,
शिव-ब्रह्मादिके लिये भी दुर्लभ श्रीकृष्णप्रेमको प्रदान
करनेमें अग्रणी, श्रीकृष्णचैतन्य नामक श्रीराधाकान्तियुक्त
गौरकान्तिमय श्रीगोपीजनवल्लभ-गोविन्द, आपको नमस्कार
है॥53॥
ग्रन्थकारके द्वारा श्रीगौर-प्रणाम—
श्रीगोविन्दलीलामृत (1/2)में ग्रन्थकारके वचन—
योऽज्ञानमत्तं भुवनं दयालुरुल्लाघयन्नप्यकरोत् प्रमत्तम्।
स्वप्रेमम्पत्सृधयाद्भुतेहं श्रीकृष्णचैतन्यममुं प्रपद्ये॥54॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥54॥
अमृतप्रवाह भाष्य—जिन दयालु पुरुषने अज्ञानमें
मत्त जगत्को अज्ञानरूपी व्याधिसे मुक्त करके अपनी
प्रेम-सम्पत्तिरूपी अमृतके द्वारा प्रमत्त किया था, मैं उन
अद्भुत-चेष्टायुक्त श्रीकृष्णचैतन्यके शरणागत होता हूँ॥54॥
अनुभाष्य—
यः दयालुः (करुणामयविग्रहः) अज्ञानमत्तं (मायावाद-
कर्मफलभोगादि-मार्ग-कारणे अज्ञाने मत्तं विह्वलं) भुवनं (लोकं)
स्वप्रेमत्सम्पत्सुधया (निजकृष्णप्रीतिरूपा सम्पत् श्रीः सा एव
सुधा अमृतं तया) उल्लाघयन् (तत्तज्ज्ञानादिकं प्रशमयन्) प्रमत्तं
178 |
उन्नीसवाँ अध्याय 19/54-61 ]
(भोगमोक्षादि-प्राकृतविषयाद्यनुसन्धानरहितं निरन्तर- ग्रहण करनेके लिये कहा। श्रीरूप गोस्वामी उस दिन
कृष्णानुशीलनासक्तम्) अकरोत्, अमुं (तं) अद्भुतेहम् वहींपर रहे॥ 58 ॥
(अश्रुतपूर्वचेष्टायुक्तं) श्रीकृष्णचैतन्यम् [अहं] प्रपद्ये (प्रपन्नोऽस्मि)।
दोनोंको महाप्रभुके उच्छिष्टकी प्राप्ति :-
श्लोक-भावानुवाद-जिन करुणामय पुरुषने
मायावाद-कर्मफलभोगादि मार्गोंमें मत्त लोगोंको अपनी भट्टाचार्य दुइ भाइये निमन्त्रण कैल।
श्रीकृष्णप्रीतिरूपी सम्पत्तिकी शोभाके अमृतके द्वारा प्रभुर शेषप्रसाद-पात्र दुइभाइ पाइल॥ 59॥
उन-उन अज्ञानका नाश करके एवं भोग-मोक्षादि
अनुवाद-बलभद्र भट्टाचार्यने उन दोनों भाइयोंको
प्राकृत विषयोंसे निवृत्त करके निरन्तर श्रीकृष्णानुशीलनमें प्रसाद पानेका निमन्त्रण दिया। दोनों भाइयोंने महाप्रभुके
आसक्त किया है, उन अद्भुत-अपूर्व-चेष्टायुक्त पात्रसे उनके उच्छिष्ट प्रसादको प्राप्त किया॥ 59 ॥
श्रीकृष्णचैतन्यके मैं शरणागत होता हूँ॥ 54 ॥
महाप्रभुके वासस्थानके निकट ही दोनोंका रहना :-
श्रीरूपसे श्रीसनातनके विषयमें जिज्ञासा :-
त्रिवेणी-उपर प्रभुर वासा-घर स्थान।
तबे महाप्रभु ताँरे निकटे बसाइला।
दुइभाइ वासा कैल प्रभु-सन्निधान ॥ 60 ॥
'सनातनेर वार्त्ता कह' - ताँहारे पुछिला ॥ 55 ॥
अनुवाद-त्रिवेणीके तटपर ही महाप्रभुका वासस्थान
श्रीरूपके द्वारा श्रीसनातनके कारागारमें
था। दोनों भाइयोंने भी महाप्रभुके वासस्थानके निकट ही
बन्द होनेका संवाद देना :-
अपना वासस्थान बनाया ॥ 60 ॥
रूप कहेन, - "तेँहो बन्दी राज-घरे।
तुमि यदि उद्धार', तबे हइबे उद्धारे ॥" 56 ॥
महाप्रभुके साथ वल्लभ-भट्टका मिलन :-
से-काले वल्लभ-भट्ट रहे आड़ाइल-ग्रामे।
महाप्रभुके द्वारा श्रीसनातनके बन्धनसे
मुक्त होनेका संवाद देना :-
महाप्रभु आइला शुनि' आइल ताँर स्थाने॥ 61 ॥
प्रभु कहे, - "सनातनेर हञाछे मोचन।
अनुवाद-उस समय श्रीवल्लभ-भट्ट आड़ाइल-ग्राममें
अचिरात् आमा-सह हइबे मिलन ॥" 57 ॥
रहते थे। महाप्रभुके प्रयागमें आनेका समाचार पाकर वे
अनुवाद-तब महाप्रभुने श्रीरूपको अपने निकट उनसे मिलने उनके वासस्थानपर आये ॥ 61 ॥
बैठाया और उनसे पूछा- 'सनातनका क्या समाचार
अमृतप्रवाह भाष्य- 'वल्लभ भट्ट' - ये वैष्णव पण्डित
है?' श्रीरूपने कहा,-"वे बादशाहके कारागारमें बन्दी थे। इन्होंने पहले श्रीमन्महाप्रभुके सम्प्रदायमें प्रविष्ट
हैं। यदि आप उनका उद्धार करें, तभी वे मुक्त हो होकर भी अधिक सम्मान नहीं पानेके कारण
सकते हैं।" महाप्रभुने कहा,-"सनातनकी कारागारसे विष्णुस्वामि-सम्प्रदायमें आचार्यत्व प्राप्त किया था। इनको
मुक्ति हो गयी है। अति शीघ्र ही सनातनकी मुझसे भेंट ही लोग 'वल्लभाचार्य' कहते हैं। गोकुल और मुम्बई
होगी॥" 55-57॥ प्रदेशमें इनका बहुत प्रचार है। इनके द्वारा रचित
'अणुभाष्य', 'षोडश ग्रन्थ' आदि अनेक ग्रन्थ हैं।
उस दिन दोनोंका वहीं रहना :-
'आड़ाइल-ग्राम'-सङ्गमके निकट यमुनाकी दूसरी
मध्याह्न करिते विप्र प्रभुरे कहिला।
पार (प्रायः एक मीलकी दूरीपर) अड़ैली-ग्राम अथवा
रूप-गोसाञि से-दिवस तथाञि रहिला ॥ 58 ॥
आड़ाइल-ग्राम है; (यहाँपर 'वल्लभी' सम्प्रदायका एक
अनुवाद-तब ब्राह्मणने महाप्रभुको दोपहरका प्रसाद प्राचीन विष्णुमन्दिर वर्तमान है।) ॥ 61 ॥
। 179
[ 19/61-66 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
अनुभाष्य- 'वल्लभभट्ट'-ये त्रैलङ्गदेशमें
'निडाडाभलु'-रेलस्टेशनसे सोलह मीलकी दूरीपर
'काङ्कड़वाड़' अथवा 'काकूँरपाडु'-नामक ग्रामके निवासी
'लक्ष्मण-दीक्षित'के पुत्र हैं। आन्ध्रके ब्राह्मणोंमें पाँच
विभाग हैं, - वेल्ल-नाटी, वेगी-नाटी, मुरकि-नाटी,
तेलगु-नाटी और काशाल-नाटी; उनमेंसे वेल्ल-नाटी
आन्ध्र-ब्राह्मणकुलमें 1400 शकाब्दमें श्रीवल्लभाचार्यने
जन्म ग्रहण किया। कोई-कोई कहते हैं कि वल्लभके
जन्म होनेसे पहले ही उनके पिताने संन्यास ग्रहणकर
घरका त्याग कर दिया था, बादमें पुनः घर लौटनेके
बाद वल्लभाचार्यको पुत्रके रूपमें प्राप्त किया था।
अन्य मतके अनुसार, - विक्रम सम्वत् 1535 अर्थात्
1400 शकाब्दकी चैत्री कृष्णा-एकादशी तिथिमें त्रैलङ्गदेशीय
वेल्लनाटी-ब्राह्मण-वंशमें उत्पन्न 'खम्पंपाटीवारु' उपाधिधारी
लक्ष्मणभट्ट-दीक्षितके पुत्रके रूपमें वल्लभाचार्य
'चम्पकारण्य'में, मतान्तरमें, - मध्यप्रदेशके अन्तर्गत वि.
एन. आर. लाईनमें राजिम स्टेशनके निकट चाँपाझार-
ग्राममें आविर्भूत हुए थे। ग्यारह वर्षों तक काशीमें वास
करके विद्या अध्ययनके बाद अपने देशमें लौटते समय
मार्गमें शेषाद्रिमें उन्होंने अपने पिताके परलोक-प्राप्तिके
विषयमें सुना। भाई और माताको घरपर छोड़कर
तुङ्गाभद्राके तटपर विद्यानगरमें जाकर बुक्कराजके पौत्र
कृष्णदेवका उल्लास विधान किया। उसके बाद तीन
बार छः-छः वर्षवाली दिग्विजयमें अठारह वर्ष व्यतीत
किये। तीस वर्षकी आयुमें काशीमें स्वजातीय ब्राह्मणकी
'महालक्ष्मी'-नामक कन्याका पाणिग्रहण किया। इन्होंने
गोवर्धन-पर्वतके नीचे श्रीमूर्त्ति स्थापित करके प्रयागके
निकट आड़ाइल ग्राममें वास किया था। इनके दो
पुत्र-श्रीगोपीनाथ और श्रीविट्ठलेश्वर थे। अन्तिम
अवस्थामें त्रिदण्ड-संन्यास ग्रहण करके 1452 शकाब्दमें
इन्होंने वाराणसीमें परलोक गमन किया। श्रीवल्लभके
'षोडशग्रन्थ', ब्रह्मसूत्रका 'अनुभाष्य', श्रीमद्भागवतकी
'सुबोधिनी'-टीका आदि कुछ ग्रन्थोंके अतिरिक्त और
भी अनेक ग्रन्थ हैं॥ 61 ॥
श्रीवल्लभभट्टका महाप्रभुको प्रणाम, दोनोंमें परस्पर
श्रीकृष्ण-कथाका आलाप :-
तेंहो दण्डवत् कैल, प्रभु कैला आलिङ्गन।
दुइजने कृष्णकथा हैल ततक्षण॥ 62 ॥
अनुवाद—श्रीवल्लभभट्टने महाप्रभुको दण्डवत् प्रणाम
किया तथा महाप्रभुने उनका आलिङ्गन किया। तभी
दोनों श्रीकृष्णकथाकी चर्चा करने लगे॥ 62 ॥
महाप्रभुमें प्रेमावेश और श्रीवल्लभको बहिरङ्ग-देखकर
आवेशका सङ्कोपन :-
कृष्णकथाय प्रभुर महाप्रेम उथलिल।
भट्टेर सङ्कोचे प्रभु सम्वरण कैल॥ 63 ॥
अनुवाद-श्रीकृष्णकथाकी चर्चामें महाप्रभुमें महा-
प्रेमावेश होने लगा, किन्तु उन्होंने श्रीवल्लभभट्टके
सङ्कोचसे उसे सम्वरण कर लिया॥ 63 ॥
महाप्रभुके प्रेमावेशको देखकर श्रीवल्लभका विस्मय :-
अन्तरे गर-गर प्रेम, नहे सम्वरण।
देखि' चमत्कार हैल वल्लभ-भट्टेर मन॥ 64 ॥
अनुवाद-महाप्रभुके हृदयमें प्रेमका प्रचण्ड वेग था,
जिसे वे सम्वरण नहीं कर पा रहे थे। श्रीवल्लभ-भट्ट
महाप्रभुमें प्रेमके वेगको देखकर आश्चर्यचकित हो
गये॥ 64 ॥
महाप्रभुको भट्टका निमन्त्रण, भट्टको दोनों
भाइयोंका परिचय देना :-
तबे भट्ट महाप्रभुरे निमन्त्रण कैला।
महाप्रभु दुइभाइ ताँहारे मिलाइला॥ 65 ॥
अनुवाद-तब श्रीवल्लभभट्टने महाप्रभुको निमन्त्रण
दिया। महाप्रभुने दोनों भाइयों श्रीरूप और श्रीवल्लभको
उनसे मिलवाया॥ 65 ॥
अमानी होकर दोनोंके द्वारा श्रीवल्लभका सम्मान :-
दुइभाइ दूर हैते भूमिते पड़िया।
भट्टे दण्डवत् कैला अति दीन हञा॥ 66 ॥
180 ।
उन्नीसवाँ अध्याय 19/66-75 ]
अनुवाद- श्रीरूप और श्रीवल्लभ, दोनों भाइयोंने
अति दीनतापूर्वक दूरसे ही भूमिपर गिरकर श्रीवल्लभभट्टको
दण्डवत् प्रणाम किया ॥ 66 ॥
श्रीभट्टकी आलिङ्गनकी चेष्टासे दोनोंका पीछे हटना :-
भट्ट मिलिबारे याय, दुँहे पलाय दूरे।
"अस्पृश्य पामर मुञि, ना छुँइह मोरे ॥"67॥
अनुवाद- श्रीवल्लभभट्ट जैसे ही उनसे मिलनेके
लिये आगे बढ़े, वे दोनों दूर भाग गये और श्रीरूप
कहने लगे, - "मैं अस्पृश्य और महापापी हूँ, आप मुझे
स्पर्श मत कीजिये ॥"67 ॥
कुलीन पण्डिताभिमानी श्रीवल्लभको बहिरङ्ग-मानकर
महाप्रभुके द्वारा उन्हें जड़ीय-प्रतिष्ठा देना या छलना :-
भट्टेर विस्मय हैल, प्रभुर हर्ष मन।
भट्टरे कहिला प्रभु ताँर विवरण ॥68॥
"इँहो ना स्पर्शियह, इँहो जाति अति-हीन !
वैदिक, याज्ञिक तुमि कुलीन प्रवीण ! ॥"69॥
अनुवाद- दोनों भाइयोंके व्यवहारसे श्रीवल्लभ भट्ट
विस्मित हो गये, किन्तु महाप्रभुका मन बहुत प्रसन्न
हुआ। महाप्रभुने श्रीवल्लभभट्टको दोनों भाइयोंका विवरण
देते हुए कहा,- "आप इन्हें स्पर्श मत कीजिये, ये दोनों
छोटी जातिके हैं। आप वैदिक सदाचारका पालन
करनेवाले और यज्ञोंमें प्रवीण व्यक्ति हैं। साथ ही आप
उच्च कुलके ब्राह्मण भी हैं ॥" 68-69 ॥
दोनोंके मुखसे निरन्तर श्रीकृष्णनाम सुनकर श्रीभट्टका
विस्मय और दोनोंको सर्वोत्तम मानना :-
दुँहार मुखे निरन्तर कृष्णनाम शुनि' ।
भट्ट कहे, प्रभुर किछु इङ्गित-भङ्गी जानि' ॥70॥
"दुँहार मुखे कृष्णनाम करिछे नर्त्तन ।
एइ दुइ 'अधम' नहे, हय सर्वोत्तम ॥ 71 ॥
अनुवाद- दोनोंके मुखसे निरन्तर कृष्णनाम सुनकर
श्रीवल्लभभट्ट महाप्रभुके वचनोंकी कुछ इङ्गित-भङ्गिमाको
समझ गये। उन्होंने कहा, - "दोनोंके मुखमें कृष्णनाम
नृत्य कर रहा है। ये दोनों 'अधम' नहीं, अपितु
सर्वोत्तम हैं ॥ 70-71 ॥
श्रीमद्भागवत (3/33/7) में-
अहो बत श्वपचोऽतो गरीयान्
यज्जिह्वाग्रे वर्त्तते नाम तुभ्यम्।
तेपुस्तपस्ते जुहुवुः सस्नुराया
ब्रह्मानूचुर्नाम गृणन्ति ये ते ॥"72॥
अनुवाद- हे भगवन्, जिनके मुखमें आपका नाम
वर्तमान है, वे श्वपच (कुत्तेका मांस खानेवाले) होनेपर
भी श्रेष्ठ है। जो आपका नाम-कीर्तन करते हैं, उन्होंने
सब प्रकारकी तपस्या कर ली है, समस्त यज्ञ कर लिये
हैं, सभी तीर्थोंमें स्नान कर लिया है एवं अङ्गसहित
समस्त वेदोंका पाठ कर लिया है, इसलिये उनकी
आर्योंमें गणना होती है ॥"72॥
अनुभाष्य-मध्यलीला 11/192 संख्या देखें ॥ 72 ॥
श्रीभट्टकी सुबुद्धिको देखकर और सुसिद्धान्तको
सुनकर महाप्रभुके द्वारा प्रशंसा :-
शुनि' महाप्रभु ताँरे बहु प्रशंसिला ।
प्रेमाविष्ट हञा श्लोक पड़िते लागिला ॥ 73 ॥
अनुवाद-इस श्लोकको सुनकर महाप्रभुने
श्रीवल्लभभट्टकी बहुत प्रशंसा की। प्रेमाविष्ट होकर
महाप्रभु श्लोक पढ़ने लगे ॥ 73 ॥
नीचवंशमें उत्पन्न होनेपर भी हरिभक्त ही पूज्य,
अभक्त होनेके कारण नामका ही ब्राह्मण
वेदज्ञ होनेपर भी घृणाका पात्र :-
हरिभक्तिसुधोदय (3/11-12) में-
शुचिः सद्द्भक्तिदीप्ताग्निदग्धदुर्जातिकल्मषः ।
श्वपाकोऽपि बुधैः श्लाघ्यो न वेदज्ञोऽपि नास्तिकः ॥74॥
भगवद्भक्तिहीनस्य जातिः शास्त्रं जपस्तपः ।
अप्राणस्यैव देहस्य मण्डनं लोकरञ्जनम् ॥ 75 ॥
। 181
[ 19/74-80
श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 74-75 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—सदाचरित्र, सद्भक्तिरूप दीप्ताग्निके
द्वारा जिसका दुर्जातिमें उत्पन्न होनेका कल्मष जलकर
समाप्त हो गया है, ऐसा चण्डाल भी पण्डितोंके द्वारा
सम्मानित होने योग्य है; किन्तु नास्तिक व्यक्ति वेदज्ञ
होनेपर भी सम्मानके योग्य नहीं है। भगवद्भक्तिहीन
व्यक्तिके सद्जातिमें जन्म, शास्त्र-ज्ञान, जप और तप
मृतदेहके अलङ्कारोंकी भाँति किसी कामके नहीं, केवल
लोकरञ्जन मात्र ही हैं॥ 74-75 ॥
अनुभाष्य—
सद्भक्तिदीप्ताग्निदग्धदुर्जातिकल्मषः (सती ऐकान्तिकी कृष्णभक्तिः
एव दीप्ताग्निः तेन दग्धं निःशेषितं दुर्जात्यादिकम् एव कल्मषं
प्रारब्धं पापं यस्य सः, अतः कृष्णभजनादेव) शुचिः (सदाचारः)
श्वपाकः (अति-नीचकुलोद्भवः) अपि बुधैः (विद्वद्भिः) श्लाघ्यः
(वरणीयः), (परन्तु) नास्तिकः (भगवत्-सेवाविमुखः) वेदज्ञः
(वेदशास्त्रपारङ्गतः ब्राह्मणः अपिः) न [पूज्यः, दुःसङ्गत्वात्
परमार्थपथिकेन सर्वथा परित्याज्य एवेत्यर्थः]।
भगवद्भक्तिहीनस्य (कृष्णसेवा-विमुखस्य) जातिः (प्राक्तन-
सुकृतिवशात् उत्तमकुले जन्मादिकं) शास्त्रं (स्वाध्यायादिकं)
जपं (मन्त्रोच्चारणादिकं), तपः (साधनाद्यनुशीलनं)-[एतत् सर्वमेव]
अप्राणस्य (मृतस्य) देहस्य मण्डनम् (अलङ्करणम् इव
व्यर्थमकिञ्चित्करं) लोकरञ्जनं (व्यवहारिकं जड़लोकानां
बहिर्दर्शन-सुखकरमिव निष्फलमित्यर्थः)।
श्लोक-भावानुवाद—ऐकान्तिकी श्रीकृष्णभक्तिरूप
दीप्ताग्निके द्वारा जिसका दुर्जातिमें उत्पन्न होनेका
कल्मष और प्रारब्ध पाप जलकर समाप्त हो गये हैं,
श्रीकृष्णभजनके कारण ऐसा चण्डाल भी पण्डितोंके द्वारा
सम्मानित होने योग्य है; किन्तु भगवद्-सेवा-विमुख
व्यक्ति वेद-शास्त्रोंमें पारङ्गत होनेपर भी सम्मानके योग्य
नहीं है, अपितु दुःसङ्ग जानकर परमार्थ-पथिकको
उसका सर्वथा त्याग करना चाहिये। श्रीकृष्णसेवा-विमुख
व्यक्तिका पूर्व-सुकृतिके कारण उत्तमकुलमें जन्म, शास्त्र-
ज्ञान, जप और तप-ये सभी मृतदेहके अलङ्कारोंकी
भाँति व्यर्थ हैं, केवल सांसारिक लोगोंके बाहिरी
दर्शनके सुखकर होनेपर भी निष्फल ही हैं॥ ॥ 74-75 ॥
महाप्रभुके प्रेम, प्रभाव-सौन्दर्यादि-दर्शनसे
श्रीभट्टको विस्मय :-
प्रभुर प्रेमावेश, आर प्रभाव भक्तिसार।
सौन्दर्यादि देखि' भट्टेर हैल चमत्कार ॥ 76 ॥
अनुवाद—महाप्रभुके प्रेमावेश, भक्तिसारके ज्ञान और
उनके प्रभाव, सौन्दर्यादिको देखकर श्रीवल्लभभट्ट बड़े
आश्चर्यचकित हुए ॥ 76 ॥
परिकरों सहित महाप्रभुके साथ नौकामें बैठना :-
सगणे प्रभुरे भट्ट नौकाते चड़ाञा।
भिक्षा दिते निज घरे चलिला लञा ॥ 77 ॥
अनुवाद—महाप्रभुको उनके परिकरों सहित नौकामें
चढ़ाकर श्रीवल्लभ भट्ट उन्हें भिक्षा देनेके लिये अपने
घर ले गये ॥ 77 ॥
यमुनाके नीले जलको देखकर श्रीकृष्णके उद्दीपनके
कारण महाप्रभुका प्रेमावेश :-
यमुनार जल देखि' चिक्वण श्यामल।
प्रेमावेशे महाप्रभु हइला विह्वल ॥ 78 ॥
महाप्रभुका यमुनामें कूदना, सभीका भयभीत होना :-
हुङ्कार करि' यमुनार जले दिला झाँप।
प्रभु देखि' सबार मने हैल भय-काँप ॥ 79 ॥
अनुवाद—यमुनाके चमकदार श्याम वर्णके जलको
देखकर महाप्रभु प्रेमावेशमें विह्वल हो गये। हुङ्कार करते
हुए महाप्रभुने यमुनाके जलमें छलाँग लगा दी। महाप्रभुको
कूदते देखकर सभी भयभीत हो गये और काँपने
लगे ॥ 78-79 ॥
महाप्रभुको उठाकर नौकामें बैठाना, महाप्रभुका नृत्य :-
आस्ते-व्यस्ते सबे धरि' प्रभुरे उठाइल।
नौकार उपरे प्रभु नाचिते लागिल ॥ 80 ॥
अनुवाद—जल्दीसे सभीने पकड़कर महाप्रभुको
जलमेंसे निकाला। नौकाके ऊपर आकर महाप्रभु नृत्य
करने लगे ॥ 80 ॥
182 |
उन्नीसवाँ अध्याय 19/81-88 ]
नृत्यके कारण नौकाका डगमगाना :-
महाप्रभुर भरे नौका करे टलमल।
डुबिते लागिल नौका, झलके भरे जल ॥ 81 ॥
अनुवाद—महाप्रभुके भारसे नौका डगमगाने लगी।
नौकाके डगमगानेसे उसमें जल भरने लगा और वह
डूबने लगी ॥ 81 ॥
बहिरङ्ग-श्रीभट्टके सामने भावको छुपानेकी चेष्टा
करनेपर भी महाप्रभुकी प्रेम-मत्तता :-
यद्यपि भट्टेर आगे प्रभुर धैर्य हैल मन।
दुर्वार उद्भट प्रेम, नहे सम्वरण ॥ 82 ॥
अनुवाद—यद्यपि श्रीवल्लभ भट्टके आगे महाप्रभुने
मनमें धैर्य धारण करनेका प्रयास किया, तथापि
दुर्दमनीय प्रबल प्रेम होनेके कारण वे उसको सम्वरण
नहीं कर पाये ॥ 82 ॥
अनुभाष्य—'दुर्वार'—जिसका प्रकाश रोका अर्थात्
बन्द नहीं किया जा सके; 'उद्भट'—उदार, श्रेष्ठ,
अभिनव, विचित्र, प्रसिद्ध, असाधारण, प्रबल ॥ 82 ॥
महाप्रभुका धैर्य-धारण, दूसरी ओर उतरना :-
देश-पात्र देखि' महाप्रभु धैर्य हइल।
आड़ाइलेर घाटे नौका आसि' उत्तरिल ॥ 83 ॥
अनुवाद—स्थान तथा पात्रको देखकर अन्तमें महाप्रभुने
धैर्य धारण किया। तब नौका स्थिर होकर चलती हुई
आड़ाइल ग्रामके घाटपर आ पहुँची ॥ 83 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—उस देशमें अधिकांश लोग
प्रेमशून्य हैं और सामने उपस्थित श्रीवल्लभ भट्ट भी
बहुत ही तर्कप्रिय व्यक्ति हैं; ऐसा देखकर महाप्रभुने धैर्य
धारण किया ॥ 83 ॥
अनुभाष्य—देश-पात्र—[जलमें] निमग्न प्रायः नौकाके
ऊपर नृत्यादि सुविधाजनक नहीं है; और फिर,
श्रीवल्लभ-दीक्षितकी भाँति प्रेमरहित पण्डितके समक्ष
सात्त्विकभावका उल्लास नहीं होता ॥ 83 ॥
श्रीवल्लभके द्वारा महाप्रभुके स्नान करनेके
बाद उन्हें अपने घरपर लाना :-
भये भट्ट सङ्गे रहे, मध्याह्न कराञा।
निज-गृहे आनिला प्रभुरे सङ्गेते लञा ॥ 84 ॥
अनुवाद—महाप्रभुकी कुशलताके भयके कारण
श्रीवल्लभ भट्ट सब समय उनके साथमें रहे। उन्होंने
महाप्रभुको वहींपर स्नान कराया और उन्हें अपने साथ
ही अपने घरपर ले आये ॥ 84 ॥
श्रीवल्लभके द्वारा अपने हाथोंसे महाप्रभुके श्रीचरणोंको
धोना और सपरिवार चरणामृतका सम्मान :-
आनन्दित हञा भट्ट दिल दिव्यासन।
आपने करिल प्रभुर पादप्रक्षालन ॥ 85 ॥
महाप्रभुको नये वस्त्र प्रदान :-
सवंशे सेइ जल मस्तके धरिल।
नूतन कौपीन-बहिर्वास पराइल ॥ 86 ॥
अनुवाद—श्रीवल्लभ भट्टने आनन्दित होकर महाप्रभुको
बैठनेके लिये दिव्य-आसन प्रदान किया और अपने
हाथोंसे उन्होंने स्वयं महाप्रभुके चरणोंको धोया। फिर
उन्होंने और उनके परिवारने उस जलको अपने-अपने
मस्तकपर धारण किया। तब उन्होंने महाप्रभुको नया
बहिर्वास तथा कौपीन प्रदान किया ॥ 85-86 ॥
महाप्रभुकी पूजा और बलभद्रके द्वारा रसोई बनाना :-
गन्ध-पुष्प-धूप-दीपे महापूजा कैल।
भट्टाचार्ये मान्य करि' पाक कराइल ॥ 87 ॥
अनुवाद—गन्ध, पुष्प, धूप और दीपसे श्रीवल्लभभट्टने
महाप्रभुकी महापूजा की। तब उन्होंने बलभद्र भट्टाचार्यको
सम्मान देते हुए उनके द्वारा भोजन बनवाया ॥ 87 ॥
महाप्रभु और दोनों भाइयोंका श्रीवल्लभके
घरमें भोजन करना :-
भिक्षा कराइल प्रभुरे सस्नेह यतने।
रूपगोसाञि-दुइभाइये कराइल भोजने ॥ 88 ॥
। 183
[ 19/88-96 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
अनुवाद—श्रीवल्लभभट्टने अति स्नेह और सेवाभावसे
महाप्रभुको भोजन कराया। बादमें उन्होंने श्रीरूप गोस्वामी
और उनके भाई श्रीवल्लभको भी भोजन कराया॥88॥
श्रीरूप और कृष्णदासको महाप्रभुके उच्छिष्टकी प्राप्ति :—
भट्टाचार्य श्रीरूपे दओयाइल 'अवशेष'।
तबे सेइ प्रसाद कृष्णदास पाइल शेष॥89॥
अनुवाद—बलभद्र भट्टाचार्यने पहले श्रीरूपको
महाप्रभुका उच्छिष्ट प्रसाद दिया और बादमें बचे हुए
उच्छिष्टको कृष्णदासको प्रदान किया॥89॥
श्रीवल्लभके द्वारा महाप्रभुका पाद-सम्वाहन :—
मुखवास दिया प्रभुरे कराइल शयन।
आपने भट्ट करेन प्रभुर पाद-सम्वाहन॥90॥
भोजन समाप्त करके श्रीवल्लभका पुनः आगमन :—
प्रभु पाठाइल ताँरे करिते भोजने।
भोजन करि' आइला तँहो प्रभुर चरणे॥91॥
अनुवाद—मुखके अच्छे स्वादके लिये श्रीवल्लभ
भट्टने महाप्रभुको लौंग, इलायची आदि देकर उन्हें
विश्राम कराया और स्वयं महाप्रभुके श्रीचरण दबाने
लगे। तब महाप्रभुने श्रीवल्लभ भट्टको भोजन करनेके
लिये भेजा। भोजन करनेके बाद श्रीवल्लभभट्ट पुनः
महाप्रभुके चरणकमलोंमें लौट आये॥90-91॥
त्रिहुत-पण्डित श्रीरघुपति उपाध्यायका आगमन :—
हेनकाले आइला रघुपति उपाध्याय।
तिरुहिता पण्डित, बड़ वैष्णव, महाशय॥92॥
अनुवाद—उसी समय त्रिहुत नामक स्थानके
श्रीरघुपति उपाध्याय वहाँपर आये। वे बड़े विद्वान, बहुत
बड़े वैष्णव और सम्मानित सज्जन थे॥92॥
अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीरघुपति उपाध्यायके द्वारा
रचित कुछेक श्लोक पद्यावलीमें पाये जाते हैं। उनका
निवास—त्रिहुत अथवा मिथिला देशमें था॥92॥
अनुभाष्य—'तिरुटिया' अथवा 'त्रिहुटिया'—वर्तमान
समयमें सारण, चम्पारण, मुज्जफरपुर और द्वारभाङ्गा—ये
चार जिले त्रिहुट् विभागके अन्तर्गत हैं; इस प्रदेशके
अधिवासियोंको 'तिरुटिया' कहते हैं॥92॥
महाप्रभुकी वन्दना, महाप्रभुके द्वारा आशीर्वाद :—
आसि' तँहो कैल प्रभुर चरण वन्दन।
'कृष्णे मति रहु' बलि' प्रभुर वचन॥93॥
अनुवाद—श्रीरघुपति उपाध्यायने आकर महाप्रभुके
चरणोंकी वन्दना की और महाप्रभुने उनको आशीर्वाद
देते हुए कहा,—'श्रीकृष्णमें तुम्हारी मति रहे'॥93॥
श्रीउपाध्यायको श्रीकृष्ण-वर्णन करनेका आदेश :—
शुनि' आनन्दित हैल उपाध्यायेर मन।
प्रभु ताँरे कहिल,—“कह कृष्णेर वर्णन॥”94॥
अनुवाद—महाप्रभुके आशीर्वाद वचन सुनकर
श्रीरघुपति उपाध्यायका मन बहुत प्रसन्न हुआ। महाप्रभुने
उनसे कहा,—“श्रीकृष्णके विषयमें कुछ वर्णन करो॥”94॥
श्रीउपाध्यायके द्वारा स्वरचित श्लोकका पढ़ना,
महाप्रभुमें प्रेमावेश :—
निज-कृत कृष्णलीला-श्लोक पड़िल।
शुनि' महाप्रभुर महा प्रेमावेश हैल॥95॥
अनुवाद—तब श्रीरघुपति उपाध्यायने स्वरचित एक
श्रीकृष्णलीला-श्लोक पढ़ा। उसे सुनकर महाप्रभुमें महा
प्रेमावेश उदित हो गया॥95॥
श्रीनन्द-प्रणाम :—
पद्यावली (126)में उद्धृत श्लोक—
श्रुतिमपरे स्मृतिमितरे भारतमन्ये भजन्तु भव-भीताः।
अहमिह नन्दं वन्दे यस्यालिन्दे परं ब्रह्म॥96॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥96॥
अमृतप्रवाह भाष्य—भवचक्रसे भयभीत सभी
व्यक्तियोंमेंसे कोई श्रुतिओंका, कोई स्मृतिका या कोई
महाभारतका भजन करे; (किन्तु मैं) इस स्थानपर
184 ।