श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1622, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 19/31-40 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
श्रीरूपको उन दो दूतोंके द्वारा महाप्रभुकी
वृन्दावन-यात्राकी बात बतलाना :-
तबे सेइ दुइ चर रूप-ठाञि आइल।
'वृन्दावन चलिला प्रभु'-आसिया कहिल ॥ 31 ॥
अनुवाद-तभी श्रीरूप गोस्वामीके द्वारा नीलाचल
भेजे गये दो दूत उनके पास लौटकर आये। उन्होंने
बतलाया कि 'महाप्रभु वृन्दावनके लिये चल पड़े
हैं' ॥ 31 ॥
श्रीरूपका छोटे भाईके साथ महाप्रभुके दर्शनके लिये
यात्राके संवादका श्रीसनातनको पत्रके द्वारा ज्ञापन; और
उन्हें जिस-किसी उपायसे चले आनेका आह्वान :-
शुनिया श्रीरूप लिखिला सनातन-ठाञि।
'वृन्दावन चलिला श्रीचैतन्य-गोसाञि ॥ 32 ॥
आमि-दुइभाइ चलिलाङ ताँहारे मिलिते।
तुमि यैछे तैछे छुटि' आइस ताँहा हैते ॥ 33 ॥
अनुवाद-दूतोंकी बात सुनकर श्रीरूपने श्रीसनातनके
पास पत्र लिखकर भेजा, - 'श्रीचैतन्य गोसाईं वृन्दावनके
लिये चल पड़े हैं। हम दोनों भाई उनसे मिलनेके लिये
जा रहे हैं, आप भी वहाँसे जिस किसी प्रकारसे
छूटकर आ जाइये ॥ 32-33 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य- 'आमि-दुइभाइ'-मैं रूप और
हमारे छोटे भाई अनुपम अथवा वल्लभ ॥ 33 ॥
गौड़देशमें रखी हुई दस हजार मुद्राओंकी सहायतासे
बन्धनसे मुक्त होनेका परामर्श देना :-
दशसहस्र मुद्रा तथा आछे मुदि-स्थाने।
ताहा दिया कर शीघ्र आत्म-विमोचने ॥ 34 ॥
यैछे तैछे छुटि' तुमि आइस वृन्दावन।'
एत लिखि' दुइभाइ करिला गमन ॥ 35 ॥
अनुवाद-गौड़देशमें अमुक व्यापारीके पास दस
हजार मुद्राएँ रखी हैं, उनके द्वारा शीघ्र ही अपने
आपको छुड़ा लीजिये। जिस किसी प्रकारसे छूटकर
आप वृन्दावन आ जाइये।' इतना लिखकर दोनों भाई
महाप्रभुसे मिलनेके लिये चल पड़े ॥ 34-35 ॥
अनुपमका परिचय :-
अनुपम मल्लिक, ताँर नाम-'श्रीवल्लभ'।
रूप-गोसाञिर छोटभाइ-परम वैष्णव ॥ 36 ॥
अनुवाद-श्रीरूप गोस्वामीके छोटे भाई परम वैष्णव
थे। उनका नाम 'श्रीवल्लभ' था। उनको अनुपम
मल्लिक नाम दिया गया था ॥ 36 ॥
अनुभाष्य-आदिलीला 10/84 संख्या देखें ॥ 36 ॥
दोनों भाइयोंका प्रयागमें आगमन और वहाँ महाप्रभुके
होनेके विषयमें सुनकर आनन्द :-
ताँहारे लञा रूप-गोसाञि प्रयागे आइला।
महाप्रभु ताँहा शुनि' आनन्दित हैला ॥ 37 ॥
अनुवाद-श्रीवल्लभको अपने साथ लेकर श्रीरूप
गोस्वामी प्रयागमें आ पहुँचे। महाप्रभुके भी वहीं होनेके
विषयमें सुनकर वे बहुत आनन्दित हुए ॥ 37 ॥
प्रयागमें महाप्रभुका बिन्दुमाधव दर्शन
और लोगोंकी भीड़ :-
प्रभु चलियाछेन बिन्दुमाधव-दरशने।
लक्ष लक्ष लोक आइसे प्रभुर मिलने ॥ 38 ॥
केह कान्दे, केह हासे, केह नाचे, गाय।
'कृष्ण' 'कृष्ण' बलि' केह गड़ागड़ि याय ॥ 39 ॥
अनुवाद-महाप्रभु बिन्दुमाधवका दर्शन करनेके
लिये जा रहे थे। लाखों-लाखों लोग महाप्रभुसे मिलनेके
लिये आ रहे थे। कोई रो रहा था, कोई हँस रहा था,
कोई नाच रहा था, कोई गा रहा था। कोई तो 'कृष्ण'
'कृष्ण' बोलते हुए भूमिपर लोटपोट खा रहा था ॥ 38-39 ॥
प्रेमकी बाढ़में प्रयाग निमग्न :-
गङ्गा-यमुना प्रयाग नारिल डुबाइते।
प्रभु डुबाइल कृष्णप्रेमेर वन्याते ॥ 40 ॥
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