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सर्वकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1630, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 1630

[ 19/88-96 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
अनुवाद—श्रीवल्लभभट्टने अति स्नेह और सेवाभावसे
महाप्रभुको भोजन कराया। बादमें उन्होंने श्रीरूप गोस्वामी
और उनके भाई श्रीवल्लभको भी भोजन कराया॥88॥
श्रीरूप और कृष्णदासको महाप्रभुके उच्छिष्टकी प्राप्ति :—
भट्टाचार्य श्रीरूपे दओयाइल 'अवशेष'।
तबे सेइ प्रसाद कृष्णदास पाइल शेष॥89॥
अनुवाद—बलभद्र भट्टाचार्यने पहले श्रीरूपको
महाप्रभुका उच्छिष्ट प्रसाद दिया और बादमें बचे हुए
उच्छिष्टको कृष्णदासको प्रदान किया॥89॥
श्रीवल्लभके द्वारा महाप्रभुका पाद-सम्वाहन :—
मुखवास दिया प्रभुरे कराइल शयन।
आपने भट्ट करेन प्रभुर पाद-सम्वाहन॥90॥
भोजन समाप्त करके श्रीवल्लभका पुनः आगमन :—
प्रभु पाठाइल ताँरे करिते भोजने।
भोजन करि' आइला तँहो प्रभुर चरणे॥91॥
अनुवाद—मुखके अच्छे स्वादके लिये श्रीवल्लभ
भट्टने महाप्रभुको लौंग, इलायची आदि देकर उन्हें
विश्राम कराया और स्वयं महाप्रभुके श्रीचरण दबाने
लगे। तब महाप्रभुने श्रीवल्लभ भट्टको भोजन करनेके
लिये भेजा। भोजन करनेके बाद श्रीवल्लभभट्ट पुनः
महाप्रभुके चरणकमलोंमें लौट आये॥90-91॥
त्रिहुत-पण्डित श्रीरघुपति उपाध्यायका आगमन :—
हेनकाले आइला रघुपति उपाध्याय।
तिरुहिता पण्डित, बड़ वैष्णव, महाशय॥92॥
अनुवाद—उसी समय त्रिहुत नामक स्थानके
श्रीरघुपति उपाध्याय वहाँपर आये। वे बड़े विद्वान, बहुत
बड़े वैष्णव और सम्मानित सज्जन थे॥92॥
अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीरघुपति उपाध्यायके द्वारा
रचित कुछेक श्लोक पद्यावलीमें पाये जाते हैं। उनका
निवास—त्रिहुत अथवा मिथिला देशमें था॥92॥
अनुभाष्य—'तिरुटिया' अथवा 'त्रिहुटिया'—वर्तमान
समयमें सारण, चम्पारण, मुज्जफरपुर और द्वारभाङ्गा—ये
चार जिले त्रिहुट् विभागके अन्तर्गत हैं; इस प्रदेशके
अधिवासियोंको 'तिरुटिया' कहते हैं॥92॥
महाप्रभुकी वन्दना, महाप्रभुके द्वारा आशीर्वाद :—
आसि' तँहो कैल प्रभुर चरण वन्दन।
'कृष्णे मति रहु' बलि' प्रभुर वचन॥93॥
अनुवाद—श्रीरघुपति उपाध्यायने आकर महाप्रभुके
चरणोंकी वन्दना की और महाप्रभुने उनको आशीर्वाद
देते हुए कहा,—'श्रीकृष्णमें तुम्हारी मति रहे'॥93॥
श्रीउपाध्यायको श्रीकृष्ण-वर्णन करनेका आदेश :—
शुनि' आनन्दित हैल उपाध्यायेर मन।
प्रभु ताँरे कहिल,—“कह कृष्णेर वर्णन॥”94॥
अनुवाद—महाप्रभुके आशीर्वाद वचन सुनकर
श्रीरघुपति उपाध्यायका मन बहुत प्रसन्न हुआ। महाप्रभुने
उनसे कहा,—“श्रीकृष्णके विषयमें कुछ वर्णन करो॥”94॥
श्रीउपाध्यायके द्वारा स्वरचित श्लोकका पढ़ना,
महाप्रभुमें प्रेमावेश :—
निज-कृत कृष्णलीला-श्लोक पड़िल।
शुनि' महाप्रभुर महा प्रेमावेश हैल॥95॥
अनुवाद—तब श्रीरघुपति उपाध्यायने स्वरचित एक
श्रीकृष्णलीला-श्लोक पढ़ा। उसे सुनकर महाप्रभुमें महा
प्रेमावेश उदित हो गया॥95॥
श्रीनन्द-प्रणाम :—
पद्यावली (126)में उद्धृत श्लोक—
श्रुतिमपरे स्मृतिमितरे भारतमन्ये भजन्तु भव-भीताः।
अहमिह नन्दं वन्दे यस्यालिन्दे परं ब्रह्म॥96॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥96॥
अमृतप्रवाह भाष्य—भवचक्रसे भयभीत सभी
व्यक्तियोंमेंसे कोई श्रुतिओंका, कोई स्मृतिका या कोई
महाभारतका भजन करे; (किन्तु मैं) इस स्थानपर
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