श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ 18/202–211 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
मौलानाके द्वारा स्वयं साधन और साध्य वस्तुकी
मीमांसाकी चेष्टामें असमर्थताको मानना :-
अनेक देखिनु मुञि म्लेच्छ-शास्त्र हैते।
'साध्य-साधन-वस्तु' नारि निर्द्धारिते ॥ 202 ॥
अनुवाद-मैंने मुस्लिम-शास्त्रोंमें बहुत ढूँढ़ा है,
किन्तु साध्य-वस्तु क्या है और उसे पानेका साधन
क्या है, मैं इसको निर्धारित नहीं कर पाया हूँ ॥ 202 ॥
महाप्रभुके दर्शनसे मौलानाकी जिह्वापर स्वतः ही
श्रीकृष्णनामकी स्फूर्ति और जड़ीय अभिमान दूर होना :-
तोमा देखि' जिह्वा मोर बले 'कृष्णनाम'।
'आमि-बड़ ज्ञानी'-एड़ गेल अभिमान ॥ 203 ॥
महाप्रभुको प्रणाम करके साध्य-साधनकी जिज्ञासा :-
कृपा करि' बल मोरे 'साध्य-साधने'।"
एत बलि' पड़े महाप्रभुर चरणे ॥ 204 ॥
अनुवाद-आपको देखकर मेरी जिह्वा श्रीकृष्णनाम
बोल रही है। 'मैं बहुत बड़ा ज्ञानी हूँ'-मेरा यह
अभिमान भी दूर हो गया है। आप कृपा करके मुझे
परम 'साध्य' और उसे पानेके 'साधन'के विषयमें
बतलाइये।" इतना कहकर वे महाप्रभुके चरणोंमें गिर
पड़े॥ 203-204 ॥
महाप्रभुके द्वारा उसे आश्वासन, श्रीकृष्णनामके
आभाससे ही उसके पापपुञ्जका विनाश :-
प्रभु कहे,-“उठ, कृष्णनाम तुमि लइला।
कोटि जन्मेरे पाप गेल, 'पवित्र' हइला ॥"205 ॥
महाप्रभुके आदेशसे सभीके द्वारा श्रीकृष्णनाम-ग्रहण :-
'कृष्ण' कह, 'कृष्ण' कह, -कैला उपदेश।
सबे 'कृष्ण' कहे, सबार हैल प्रेमावेश ॥ 206 ॥
अनुवाद-महाप्रभुने कहा, - "उठो, तुमने कृष्णनामका
उच्चारण किया है, इसलिये तुम्हारे करोड़ों जन्मोंके पाप
नष्ट हो गये हैं। अब तुम 'पवित्र' हो गये हो।" 'कृष्ण'
बोलो, 'कृष्ण' बोलो-महाप्रभुने यह उपदेश उन सब
पठानोंको दिया। जैसे ही वे 'कृष्ण'का उच्चारण करने लगे, सभीमें प्रेमका आवेश हो गया ॥ 205-206 ॥
महाप्रभुके द्वारा उसका 'रामदास'-नाम-संस्कार प्रदान :-
'रामदास' बलि' प्रभु ताँर कैल नाम।
आर एक पाठान, ताँर नाम - 'बिजली-खाँन' ॥ 207 ॥
पठानोंके सरदार बिजली खाँका परिचय :-
अल्प वयस ताँर, राजार कुमार।
'रामदास' आदि पाठान-चाकर ताँहार ॥ 208 ॥
अनुवाद-महाप्रभुने उस म्लेच्छाचार्यको परोक्षरूपसे
हरिनामकी दीक्षा देते हुए उसे 'रामदास' कहकर उसका
नामकरण किया। उन लोगोंमें-से एक 'बिजली खाँन'
नामका पठान था। उसकी आयु बहुत कम थी और
वह राजाका पुत्र था। 'रामदास' आदि पठान उसके दास
थे॥ 207-208 ॥
उसके द्वारा भी महाप्रभुके श्रीचरणोंमें शरण-ग्रहण,
महाप्रभुका उसके मस्तकपर पदार्पण :-
'कृष्ण' बलि' पड़े सेइ महाप्रभुर पाय।
प्रभु श्रीचरण दिल ताँहार माथाय ॥ 209 ॥
अनुवाद-वह बिजली-खाँन भी 'कृष्ण' बोलते हुए
महाप्रभुके चरणोंमें पड़ गया। महाप्रभुने अपने
श्रीचरणकमलको उसके मस्तकपर रख दिया ॥ 209 ॥
महाप्रभुकी यात्रा, उन सब पठानोंके द्वारा
वैराग्यधर्मको ग्रहण करना :-
ताँ-सबारे कृपा करि' प्रभु त' चलिला।
सेइत पाठान सब 'वैरागी' हइला ॥ 210 ॥
अनुवाद-उन सबपर कृपा करके महाप्रभु तो चल
दिये। वे सब पठान वैरागी बन गये ॥ 210 ॥
उनकी 'पठान-वैष्णव'के रूपमें ख्याति और उनके द्वारा
सर्वत्र महाप्रभुके गुणोंका गान :-
'पाठाम-वैष्णव' बलि' हैल ताँर ख्याति।
सर्वत्र गाहिया बुले महाप्रभुर कीर्त्ति ॥ 211 ॥
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