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सर्वकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1623, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 1623

उन्नीसवाँ अध्याय 19/40-50 ]
अनुवाद—गङ्गा तथा यमुना प्रयागको डुबो नहीं
पायीं, किन्तु महाप्रभुने प्रयागको श्रीकृष्णप्रेमकी बाढ़में
डुबो दिया॥40॥
दोनों भाइयोंका थोड़े एकान्त स्थानमें रहना :—
भिड़ देखि' दुइ भाइ रहिला निर्जने।
प्रभुर आवेश हैल माधव-दर्शने ॥ 41 ॥
अनुवाद—भीड़को देखकर दोनों भाई एकान्त स्थानमें
खड़े रहे। महाप्रभु बिन्दुमाधवके दर्शनसे प्रेमाविष्ट हो
गये॥41॥
महाप्रभुकी उस समयकी अवस्था :—
प्रेमावेशे नाचे प्रभु हरिध्वनि करि'।
ऊर्द्धबाहु करि' बले—बल 'हरि' 'हरि'॥42॥
प्रभुर महिमा देखि' लोके चमत्कार।
प्रयागे प्रभुर लीला नारि वर्णिवार ॥ 43 ॥
अनुवाद—महाप्रभु प्रेमावेशमें हरिध्वनि करते हुए
नृत्य कर रहे थे और अपनी भुजाओंको ऊपर उठाकर
लोगोंसे 'हरि' 'हरि' बोलनेके लिये कह रहे थे।
महाप्रभुकी महिमा देखकर लोग आश्चर्यचकित हो रहे
थे। प्रयागमें महाप्रभुने जो लीलाएँ कीं, मैं उनका यथार्थ
रूपमें वर्णन नहीं कर सकता॥42-43॥
दक्षिण-भारतके ब्राह्मणके घरमें महाप्रभुकी भिक्षा :—
दाक्षिणात्य-विप्र-सने आछे परिचय।
सेइ विप्र निमन्त्रिया निल निजालय ॥ 44 ॥
अनुवाद—महाप्रभुका दक्षिण भारतके एक ब्राह्मणके
साथ परिचय था। वही ब्राह्मण महाप्रभुको निमन्त्रित
करके अपने घरपर ले गया॥44॥
निर्जनमें महाप्रभुके साथ दोनों भाइयोंका मिलन :—
विप्र-गृहे आसि' प्रभु निभृते बसिला।
श्रीरूप-वल्लभ दुँहे आसिया मिलिला ॥ 45 ॥
अनुवाद—ब्राह्मणके घरपर आकर महाप्रभु एकान्तमें
बैठ गये। श्रीरूप और श्रीवल्लभ—दोनों वहींपर आकर
महाप्रभुसे मिले॥45॥
दोनोंकी दैन्यपूर्ण उक्ति :—
दुइगुच्छ तृण दुँहे दशने धरिया।
प्रभु देखि' दूरे पड़े दण्डवत् हञा ॥ 46 ॥
नाना श्लोक पड़ि' उठे, पड़े बार बार।
प्रभु देखि' प्रेमावेश हइल दुँहार ॥ 47 ॥
अनुवाद—तृणके दो गुच्छोंको अपने दाँतोंमें दबाकर
दोनों भाइयोंने दूरसे महाप्रभुको देखकर दण्डवत् प्रणाम
किया। महाप्रभुके दर्शन करके उन दोनोंमें प्रेमावेश हो
रहा था। वे अनेक श्लोक पढ़ते हुए बार-बार उठ रहे
थे तथा पुनः भूमिपर गिरकर प्रणाम कर रहे थे॥46-47॥
उन्हें देखकर महाप्रभुका प्रसन्न होना :—
श्रीरूपे देखिया प्रभुर प्रसन्न हैल मन।
“उठ, उठ, रूप, आइस”, बलिला वचन ॥ 48 ॥
श्रीकृष्णकी कृपासे जीवके संसारसे उद्धारका वर्णन :—
“कृष्णेर करुणा किछु ना याय वर्णने।
विषयकूप हैते तोमा काड़िल दुइजने ॥ 49 ॥
अनुवाद—श्रीरूपको देखकर महाप्रभुका मन बहुत
प्रसन्न हो गया और उन्होंने कहा,—“उठो, उठो, रूप,
यहाँपर आओ।” महाप्रभुने आगे कहा,—“श्रीकृष्णकी
करुणाका वर्णन करना सम्भव नहीं है। उन्होंने तुम
दोनोंको विषयरूपी कुएँसे निकाल लिया है॥48-49॥
जिस किसी भी कुलमें उत्पन्न वैष्णव ही
भगवान्की भाँति सभीके द्वारा सर्वथा पूज्य :—
श्रीहरिभक्तिविलास (10/99)में—
न मेऽभक्तश्चतुर्वेदी मद्भक्तः श्वपचः प्रियः।
तस्मै देयं ततो ग्राह्यं स च पूज्यो यथा ह्यहम्॥” 50 ॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥50॥
अमृतप्रवाह भाष्य—चतुर्वेदपाठी अर्थात् चौबे ब्राह्मण
होनेपर ही 'भक्त' होता है, ऐसा नहीं है। मेरा भक्त
। 177