श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउन्नीसवाँ अध्याय 19/54-61 ]
(भोगमोक्षादि-प्राकृतविषयाद्यनुसन्धानरहितं निरन्तर- ग्रहण करनेके लिये कहा। श्रीरूप गोस्वामी उस दिन
कृष्णानुशीलनासक्तम्) अकरोत्, अमुं (तं) अद्भुतेहम् वहींपर रहे॥ 58 ॥
(अश्रुतपूर्वचेष्टायुक्तं) श्रीकृष्णचैतन्यम् [अहं] प्रपद्ये (प्रपन्नोऽस्मि)।
दोनोंको महाप्रभुके उच्छिष्टकी प्राप्ति :-
श्लोक-भावानुवाद-जिन करुणामय पुरुषने
मायावाद-कर्मफलभोगादि मार्गोंमें मत्त लोगोंको अपनी भट्टाचार्य दुइ भाइये निमन्त्रण कैल।
श्रीकृष्णप्रीतिरूपी सम्पत्तिकी शोभाके अमृतके द्वारा प्रभुर शेषप्रसाद-पात्र दुइभाइ पाइल॥ 59॥
उन-उन अज्ञानका नाश करके एवं भोग-मोक्षादि
अनुवाद-बलभद्र भट्टाचार्यने उन दोनों भाइयोंको
प्राकृत विषयोंसे निवृत्त करके निरन्तर श्रीकृष्णानुशीलनमें प्रसाद पानेका निमन्त्रण दिया। दोनों भाइयोंने महाप्रभुके
आसक्त किया है, उन अद्भुत-अपूर्व-चेष्टायुक्त पात्रसे उनके उच्छिष्ट प्रसादको प्राप्त किया॥ 59 ॥
श्रीकृष्णचैतन्यके मैं शरणागत होता हूँ॥ 54 ॥
महाप्रभुके वासस्थानके निकट ही दोनोंका रहना :-
श्रीरूपसे श्रीसनातनके विषयमें जिज्ञासा :-
त्रिवेणी-उपर प्रभुर वासा-घर स्थान।
तबे महाप्रभु ताँरे निकटे बसाइला।
दुइभाइ वासा कैल प्रभु-सन्निधान ॥ 60 ॥
'सनातनेर वार्त्ता कह' - ताँहारे पुछिला ॥ 55 ॥
अनुवाद-त्रिवेणीके तटपर ही महाप्रभुका वासस्थान
श्रीरूपके द्वारा श्रीसनातनके कारागारमें
था। दोनों भाइयोंने भी महाप्रभुके वासस्थानके निकट ही
बन्द होनेका संवाद देना :-
अपना वासस्थान बनाया ॥ 60 ॥
रूप कहेन, - "तेँहो बन्दी राज-घरे।
तुमि यदि उद्धार', तबे हइबे उद्धारे ॥" 56 ॥
महाप्रभुके साथ वल्लभ-भट्टका मिलन :-
से-काले वल्लभ-भट्ट रहे आड़ाइल-ग्रामे।
महाप्रभुके द्वारा श्रीसनातनके बन्धनसे
मुक्त होनेका संवाद देना :-
महाप्रभु आइला शुनि' आइल ताँर स्थाने॥ 61 ॥
प्रभु कहे, - "सनातनेर हञाछे मोचन।
अनुवाद-उस समय श्रीवल्लभ-भट्ट आड़ाइल-ग्राममें
अचिरात् आमा-सह हइबे मिलन ॥" 57 ॥
रहते थे। महाप्रभुके प्रयागमें आनेका समाचार पाकर वे
अनुवाद-तब महाप्रभुने श्रीरूपको अपने निकट उनसे मिलने उनके वासस्थानपर आये ॥ 61 ॥
बैठाया और उनसे पूछा- 'सनातनका क्या समाचार
अमृतप्रवाह भाष्य- 'वल्लभ भट्ट' - ये वैष्णव पण्डित
है?' श्रीरूपने कहा,-"वे बादशाहके कारागारमें बन्दी थे। इन्होंने पहले श्रीमन्महाप्रभुके सम्प्रदायमें प्रविष्ट
हैं। यदि आप उनका उद्धार करें, तभी वे मुक्त हो होकर भी अधिक सम्मान नहीं पानेके कारण
सकते हैं।" महाप्रभुने कहा,-"सनातनकी कारागारसे विष्णुस्वामि-सम्प्रदायमें आचार्यत्व प्राप्त किया था। इनको
मुक्ति हो गयी है। अति शीघ्र ही सनातनकी मुझसे भेंट ही लोग 'वल्लभाचार्य' कहते हैं। गोकुल और मुम्बई
होगी॥" 55-57॥ प्रदेशमें इनका बहुत प्रचार है। इनके द्वारा रचित
'अणुभाष्य', 'षोडश ग्रन्थ' आदि अनेक ग्रन्थ हैं।
उस दिन दोनोंका वहीं रहना :-
'आड़ाइल-ग्राम'-सङ्गमके निकट यमुनाकी दूसरी
मध्याह्न करिते विप्र प्रभुरे कहिला।
पार (प्रायः एक मीलकी दूरीपर) अड़ैली-ग्राम अथवा
रूप-गोसाञि से-दिवस तथाञि रहिला ॥ 58 ॥
आड़ाइल-ग्राम है; (यहाँपर 'वल्लभी' सम्प्रदायका एक
अनुवाद-तब ब्राह्मणने महाप्रभुको दोपहरका प्रसाद प्राचीन विष्णुमन्दिर वर्तमान है।) ॥ 61 ॥
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