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श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

DevanagariHindipublished696 पृष्ठ

रहेगा नहीं । नियोग की नित्यता होने से विषयानुष्ठान (यागादि क्रिया)
की साध्यता भी समाप्त हो जायगी । यदि ब्रह्म से भिन्न कोई वस्तु
नियोग है तो उसकी संपूर्ण प्रपंचनिवृत्तिरूप विषयानुष्ठान साध्यता और
प्रयोक्ता दोनों ही नष्ट हो जावेंगे तथा आश्रय के अभाव से वह स्वयं
(नियोग) भी अस्तित्व हीन हो जायगा । प्रपंचनिवृत्ति रूप अनुष्ठात्व से
ही, ब्रह्म भिन्न समस्त वस्तुओ की निवृत्ति हो जायगी, फिर नियोग
निष्पाद्य, मोक्ष नामक फल भी न होगा ।
किं च प्रपंचनिवृत्ते नियोगकरणस्य इति-कर्त्तव्यताऽभावात्
अनुपकृतस्य च करणत्वऽयोगान्न करणत्वं । कथं इतिकर्त्तव्यता
अभाव इति चेत् , इत्थम अस्येति कर्त्तव्यता भावरूपा अभावरूपा
वा ? भावरूपा च करणशरीरनिष्पत्तितदनुग्रहकार्यं भेदभिन्ना ।
उभयविधा च न संभवति । न हि मुद्गरादि घातादिवत् कृत्स्नस्य
प्रपंचस्य निवर्त्तकः कोऽपि दृश्यत इति दृष्टार्था न संभवति ।
नापि निष्पन्नस्य करणस्य कार्योत्पत्तावनुग्रहः संभवति । अनुग्राह-
कांश सद्भावेन कृत्स्नप्रपंचनिवृत्ति रूपकरण स्वरूपासिद्धेः ।
ब्रह्मणोऽद्वितीयत्वज्ञानं प्रपंचनिवृत्ति रूपकरण शरीरं निष्पादयतीति
चेत् तेनैव प्रपंचनिवृत्तिरूपो मोक्षः सिद्ध इति न करणादि
निष्पाद्यम्, अवशिष्यत इति पूर्वमेवोक्तम् । अभावरूपत्वे चाभावा-
देव न करणशरीरं निष्पादयति । नाऽप्यनुग्राहकः श्रतो निष्प्रपंच
ब्रह्मविषयो विधिर्न संभवति ।
नियोग की करण रूप प्रपंचनिवृत्ति की इति कर्त्तव्यता के अभाव
से उसके अनुकर्त्ता करणता का भी अभाव हो जाने से, करणता ही समाप्त
हो जाती है (इसलिए प्रपंचनिवृत्ति कभी नियोग का करण नहीं हो
सकती) यदि कहें कि-इति कर्त्तव्यता का अभाव कैसे हो सकता है ?
तो सुनिये—इतिकर्त्तव्यता भावरूप या अभावरूप होती है । भावरूप
वह दो प्रकार की होगी, एक करण शरीर स्वरूप निष्पादक, दूसरी
करण की अनुग्राहक (उपकारी) सो, यहाँ दोनों प्रकार की नहीं हो

( २६१ )

सकती। तण्डुल निष्पादक मुद्गर (मुसल) आदि के आघात की तरह, संपूर्ण
प्रपंच का निवर्त्तक ऐसा कोई नहीं दीखता, जिससे उसकी निवृत्ति हो
सके, इसलिए दृष्टार्थ इति कर्त्तव्यता तो संभव है, नहीं और न, निष्पन्न
करण का कर्म योग्यता संपादक अनुग्रह ही संभव है। केवल अनुग्राहक
अंश से ही निखिल जगत की प्रपंच की करणता हो सके ऐसा संभव नहीं
है। यदि कहें कि-ब्रह्म का अद्वैत रूप ज्ञान ही प्रपंचनिवृत्ति रूप करण
शरीर का निष्पादन कर सकता है। जब उसी से प्रपंच निवृत्ति रूप मोक्ष
हो सकता है तो, करण निष्पाद्य, कुछ भी शेष नहीं रह जाता, ऐसा
पहिले भी कह चुके हैं। यदि इति कर्त्तव्यता अभावरूप है तो वह
अस्तित्वहीन होने से, न करण के शरीर का निष्पादन कर सकती है, न
अनुग्रह ही। इससे स्पष्ट होता है कि-ब्रह्म के निष्प्रपंचीकरण की विधि
संभव नहीं है।
अन्योऽप्याह-यद्यपि वेदांतवाक्यानां न परिनिष्पन्न ब्रह्म
स्वरूपपरतया प्रामाण्यम्, तथापि ब्रह्मस्वरूपं सिद्धत्येव।
कुतः ? ध्यानाविधिसामर्थ्यात् । एवमेव हि समामनन्ति । “
आत्मा वाऽरेद्रष्टव्यः 'निदिध्यासितव्यः-"यः आत्मा अपहतपाप्मा
सोऽन्वेष्टव्यः स विजिज्ञासितव्य"-"आत्मेत्येवोपासीत्"-"आत्मान-
मेव लोकमुपासीत् “इति। अथ ध्यानविषयो हि नियोगः स्वविषय
भूतध्यानं ध्येयैकनिरूपणीयम्-इति ध्येयमाक्षिपति । स च
ध्येयः स्ववाक्य निर्दिष्ट आत्मा। स किं रूप इत्यपेक्षायां तत्
स्वरूपविशेषसमर्पणद्वारेण “सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म" सदैव सोम्येद्-
मग्र आसीत्"इत्येवमादीनां वाक्यानां ध्यानविधिशेषतया प्रामाण्यम्-
इति विधिविषयभूतध्यानशरीरानुप्रविष्ट ब्रह्म स्वरूपे अपि
तात्पर्यमस्त्येव । “अतः एकमेवाद्वितीयम् ” 'तत्सत्यं स
आत्मा तत्त्वमसि श्वेतकेतोः “नेह नानास्ति-किंचन”इत्यादिभि-
र्ब्रह्मस्वरूपमेकमेव सत्यं तद्व्यतिरिक्तं सर्वं मिथ्येत्येवंगम्यते ।
प्रत्यक्षादिभिर्भेंदावलंबिना च कर्म शास्त्रेण भेदः प्रतीयते ।

( २६२ )
भेदाभेदयोः परस्परविरोधे सत्यनाद्यविद्यामूलत्वेनापि भेद
प्रतीत्युपपत्तेरभेद एव परमार्थ इति निश्चीयते। तत्र ब्रह्म-
ध्याननियोगेन तत्साक्षात्कारफलेन निरस्तसमस्ताविद्याकृत
विविधभेदाद्वितीयज्ञानैकरसब्रह्मरूप मोक्षः प्राप्यते।
एक बात और भी है यद्यपि वेदांत वाक्यों की परिनिष्पन्न
सिद्धवस्तु परब्रह्म के स्वरूप निर्धारण में प्रमाणिक नहीं है फिर भी
ध्यानविधि के सामर्थ्य से ब्रह्म का स्वरूप तो प्रामाणित होता ही
है। ऐसा श्रुति प्रमाण भी है -"अरे! आत्मा द्रष्टव्य और ध्येय है' "जो
निष्पाप है वह अन्वेषणीय है "वही विशेष रूप से जिज्ञास्य है "आत्मा
का अस्तित्व स्वीकार कर उपासना करनी चाहिए "इत्यादि। यहाँ
ध्यान के विषय में नियोग (विधि) है। नियोग का विषय रूप ध्यान
कार्य, ध्येय सापेक्ष है। अर्थात् ध्येय के जाने बिना ध्यान हो नहीं सकता,
इस प्रकार नियोग ही ध्येय वस्तु का अस्तित्व ज्ञापन करती है। स्व-
पद वाच्य आत्मा ही ध्येय है,वह कैसा है? ऐसी आकांक्षा होने
पर"ब्रह्म सत्य ज्ञान और अनंत स्वरूप है 'हे सौम्य ! यह जगत एक
अद्वितीय सत् ही था "इत्यादि वाक्य आकांक्षित आत्मा के स्वरूप का
प्रकाशन करके ध्यान विधि के अंग रूप से प्रमाणित होते हैं। इस
प्रकार विधि के विषय रूप ध्यान से संश्लिष्ट ब्रह्म का स्वरूप भी,उक्त
वाक्य का तात्पर्य है, ऐसा स्वीकारना होगा। "एक अद्वितीय ही निश्चित
है" जो सत्य वही आत्मा है "जगत में कोई भिन्नता नहीं है" इत्यादि
वाक्यों से एकमात्र ब्रह्म का स्वरूप ही सत्य ज्ञात होता है। प्रत्यक्ष
आदि भेदावलम्बी प्रमाणों और कर्मशास्त्र से भेद की प्रतीति होती
है। यद्यपि इस प्रकार भेद और अभेद दो परस्पर विरुद्ध बातें हैं,पर भेद
प्रतीति को अनादि अविद्यामूलक मान लेने से विरोध का परिहार
हो जाता है तथा अभेद प्रतीत ही परमार्थ रूप पर निश्चित होती है और
फिर,ब्रह्म साक्षात् रूप फल वाले,ब्रह्म ध्यान नियोग (विधि) से अविद्याकृत
सारे भेद समाप्त हो जाते हैं एवं अद्वितीय ज्ञानैकस्वभावब्रह्मस्वरूप
मोक्ष प्राप्त हो जाता है।
न च वाक्यात् वाक्यार्थज्ञानमात्रेण ब्रह्म भावसिद्धिः

( २६३ )
अनुपलब्धेः विविधभेददर्शनानुवृत्तेश्च । तथा च सति श्रवणादि
विधानमनर्थकं स्यात् ।
वाक्य या वाक्यार्थ ज्ञान मात्र से, ब्रह्म भाव की सिद्धि नही हो
सकती ऐसा कहीं देखा भी नहीं जाता बड़े बड़े वाक्यार्थ ज्ञानियों में भी
भेद दर्शन की अनुवृत्ति बनी ही रहती है । यदि वाक्यार्थ ज्ञान मात्र से
ब्रह्म भाव की सिद्धि संभव भी हो जाय तो श्रवण, मनन आदि शास्त्रीय
विधि व्यर्थ हो जायेंगी ।
अथोच्येत—"रज्जुरेषा न सर्पः” इत्युपदेशेन सर्पभयनिवृत्ति
दर्शनात् रज्जुसर्पवत् बन्धस्य च मिथ्यारूपत्वेन ज्ञानबाध्यतया तस्य
वाक्यजन्यज्ञानेनैव निवृत्तिर्युक्ता, न नियोगेन । नियोग साध्यत्वे
मोक्षस्यानित्यत्वं स्यात् स्वर्गादिवत् । मोक्षस्य नित्यत्वं हि सर्ववादि
संप्रतिपन्नम् । किं च—धर्माधर्मयोः फलहेतुत्वं स्वफलानुभवानुगुण
शरीरोत्पादनद्वारेणेति ब्रह्मादिस्थावरान्तचतुर्विधशरीरसंबन्धरूप
संसार फलत्वमवर्जनीयम् । तस्मान्नधर्मसाध्यो मोक्षः । तथा च
श्रुतिः—"स ह वै सशरीरस्य सतः प्रियाप्रिययोरपहतिरस्ति
अशरीरं वा वसंतं न प्रियाप्रियेस्पृशतः ।” इति, अशरीरत्वरूपे मोक्षे
धर्माधर्मसाध्यप्रियाप्रियविरहश्रवणात्, न धर्मसाध्यमशरीरत्वमिति
विज्ञायते । न च नियोगविशेष साध्यफल विशेषवत् ध्याननियोग
साध्यमशरीरत्वम्, अशरीरत्वस्य स्वरूपत्वेनासाध्यत्वात् । यथाहूः
श्रुतयः—"अशरीरं शरीरेष्वनवस्थेष्ववस्थितम्, महान्तं विभुमात्मानं
मत्वा धीरो न शोचति” अप्राणोह्यमनाश्शुभ्रः”, असंगोह्ययं पुरुषः”
इत्याद्याः । अतोऽशरीरत्वरूपो मोक्षो नित्य इति न धर्मसाध्यः । तथा
च श्रुतिः “अन्यत्र धर्मादन्यत्राधर्मादन्यत्रास्मात्कृताकृतात् अन्यत्र
भूताद्भव्याच्च यत्तत्पश्यतितद्वद” इति ।
इस पर कहते हैं “यह रस्सी है सर्प नहीं” इस उपदेश से सर्प
भयनिवृत्ति देखी जाती है । रज्जुसर्प की तरह बंधन जब मिथ्या है तथा
[email protected]

( २६४ )
मिथ्या होने से ही वह ज्ञान द्वारा निवार्य है, तो वाक्यार्थज्ञान से ही भेद
बुद्धि का निवारण हो जायगा, नियोग (विधि) की आवश्यकता तो
समझ में आती नहीं। मोक्ष को यदि नियोग साध्य मानेंगे तो स्वर्गादि
की तरह उसकी अनित्यता भी स्वीकारनी पड़ेगी, जबकि मोक्ष की
नित्यता सभी लोग मानते हैं।
तथा जब, धर्म और अधर्म, अपने फलभोग के उपयुक्त शरीरो-
त्पादक होने से ही फल के हेतु कहे जाते हैं। ब्रह्मा से लेकर तृणपर्यन्त
चारों प्रकार के शरीरों से संबंधित संसार की प्राप्ति अवश्यंभावी हो
जावेगे इसलिए मोक्ष को धर्म साध्य नहीं मान सकते। ऐसा ही श्रुति का
प्रमाण भी है—"शरीरधारी उसके प्रिय और अप्रिय (सुख और दुःख)
निवृत्त नहीं होते, शरीर रहित होने पर प्रिय अप्रिय स्पर्श नहीं कर
सकते” इस प्रकार शरीर रहित मोक्ष में, धर्म-अधर्म से साध्य प्रियअप्रिय
की हीनता कही गई है। इससे ज्ञात होता है कि--मोक्ष वस्तु धर्म साध्य
नहीं है। ऐसा भी नहीं है कि—नियोग (विधि विशेष) साध्यफल विशेष
की तरह, ध्यान नियोग से, अशरीरता साध्य हो सके। अशरीरता ही तो
आत्मा का वास्तविक स्वरूप है, इसलिए वह किसी भी प्रकार साध्य नहीं
हो सकता। जैसा कि—श्रुतियाँ कहती हैं—"स्वभाव से-अशरीर,
अनवस्थित (क्षणभंगुर) शरीरों में स्थित, महान और विभु आत्मा का
मनन करके धीर व्यक्ति, शोक नहीं करते”—आत्मा, प्राण और मन
रहित समुज्वल है “यह आत्मा अनासक्त है, इत्यादि। इस प्रकार अश-
रीरतारूप मोक्ष नित्य है, इसलिए धर्मसाध्य नहीं हो सकता। वैसा ही
श्रुतिवाक्य भी है—"धर्म से पृथक् अधर्म से पृथक्, भूत-भविष्य-वर्तमान
घटित पदार्थों से पृथक्, कृतकार्य से पृथक् अकृत से पृथक् जिस वस्तु
को आप जानते हों उसे बतलावें।"
अपि च—उत्पत्तिप्राप्तिविकृतिसंस्कृतिरूपेण चतुर्विधं हि
साध्यत्वं मोक्षस्य न संभवति । न तावदुत्पाद्यः, मोक्षस्य ब्रह्म
स्वरूपत्वेन नित्यत्वात् । नापि प्राप्यः आत्मस्वरूपत्वेन ब्रह्मणो
नित्य प्राप्तत्वात् । नापि विकार्यः दध्यादिवदनित्यत्वप्रसंगादेव ।
नापि संस्कार्यः संस्कारो हि दोषापनयनेन वा गुणाधानेन वा
[email protected]

( २६५ )
साधयति । न तावत् दोषापनयनेन वा नित्यशुद्धत्वाद् ब्रह्मणः ।
नाप्यतिशयाधानेन अनाधेयातिशय स्वरूपत्वात् । नित्यनिर्विकारत्वेन
स्वाश्रयायाः पराश्रयायाश्च क्रियाया अविषयतया न निघर्षेणेनादर्शा
दिवत् संस्कार्यत्वम् । न च देहस्थया स्नानादि क्रियया आत्मा
संस्क्रियते । किंतु अविद्यागृहीतः तत्संगतोऽहंकर्त्ता, तत्फलानुभवोऽपि
तस्यैव । न चाहंकृत्तैवात्मा तत्साक्षित्वात् । तथा च मंत्रवर्णाँ
“तयोरन्यं पिप्पलं स्वाद्वत्ति अनश्नन्नन्यो अभिचाकशीति इति ।”
आत्मेन्द्रियमनोयुक्तं भोक्तेत्याहुर्मनीषिणः “एकोदेवः सर्वभूतेषु गूढः
सर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा कर्माध्यक्षः सर्वभूतादिवासः साक्षी
चेता केवलोगिर्गुणश्च” संपर्यगाच्छुक्रमकायमव्रह्मणमस्नाविरं
शुद्धमपापविद्धम्” इति च । अविद्यागृहीतादहंकर्तु ु रात्मस्वरूपमनाधे
यातिशयम् नित्यशुद्धं निर्विकारं निष्कृष्येत । तस्मादात्मस्वरूपत्वेन
न साध्योमोक्षः ।
उत्पत्ति, प्राप्ति, विकृति और संस्कृति रूप चार प्रकार की साध्यता
भी मोक्ष की नहीं हो सकती । मोक्ष की उत्पत्ति तो इसलिए संभव नहीं
है कि-वह ब्रह्मस्वरूप होने से नित्य है । उसे प्राप्य इसलिए नहीं कह
सकते कि--ब्रह्म स्वरूप होने से नित्य प्राप्त है । उसकी विकृति भी संभव
नहीं है, विकृति मानने से वह दही आदि की तरह अनित्य हो जायगा ।
वह संस्कार्य भी नहीं है; संस्कार दोषों का परिमार्जन कर गुणों का
संस्थापन करता है । नित्य शुद्ध ब्रह्म में दोषों के परिमार्जन की बात
नितांत असंगत है । ब्रह्म, स्वरूपतः ही अतिशय गुणों वाले हैं इसलिए
गुणाधान रूप संस्कार की बात भी उनमें लागू नहीं होती । नित्य
निर्विकार होने से, स्वाश्रित या पराश्रित क्रियाओं के अविषय होने के
कारण, दर्पण के घर्षण के समान संस्कार का रूप भी नहीं हो सकता ।
परमात्मा अशरीरी है, इसलिए स्नान आचमन आदि रूप संस्कार भी
असंभव है । अविद्या के कारण, देह संश्लिष्ट अहंकार करने वाला, कर्त्ता
ही संस्कृत होता है, संस्कार के फलस्वरूप वही फलोपभोग भी करता है ।

( २६६ )
अहंकार करने वाला स्वाभाविक आत्मा नही है, वह तो साक्षी मात्र है,
जैसा कि मंत्रवर्णों से ज्ञात होता है—"एक पिप्पल का आस्वाद करता है
दूसरा देखता मात्र है।" मनीषी लोग, देह, इन्द्रिय, मन युक्त आत्मा को
भोक्ता कहते हैं।" एक ही देव, समस्त भूतों के अन्दर छिपे हुए हैं, वे
सर्वव्यापी, सर्वान्तर्यामी, जीवकर्मों के परिचालक सब भूतों में निवास
करने वाले साक्षी, चेतन और निराकार हैं।" शुक्ल ( उज्वल अविद्या
वासना ) रहित, अकाय ( सूक्ष्म शरीर रहित ) अव्रण ( अज्ञानरूप कारण
शरीर रहित ) अस्नाविर ( स्नायु शून्य स्थूल शरीर रहित ) काम्यकर्म
आदि दोष शून्य, निष्पाप परमात्मा हर जगह व्याप्त हैं। 'इत्यादि
वाक्यों में अविद्या रहित, अहंकारी आत्मा के स्वरूप से पृथक् अतिशय
गुणवाले नित्य शुद्ध निर्विकार परमात्मा का निर्देश किया गया है।
इसलिए आत्म स्वरूपी मोक्ष साध्य तत्व नहीं है ( अपितु स्वयं
सिद्ध है।)
यद्येवं किंवाक्यार्थज्ञानेन क्रियत इति ? चेत्, मोक्ष प्रतिबन्ध
निमित्तमात्रमिति ब्रूमः । तथा च श्रुतयः—"त्वं हि नः पितायोस्माक-
मविद्यायाः परंपारंतारयसि” श्रुतं ह्येवमेव भगवद्दृशेभ्यस्तरति
शोकमात्मविदिति सोऽहंभगवः शोचामि तं मा भगवान् शोकस्य
पारंतारयतु"—तस्मै मृदितकषायाय तमसः पारंदर्शयति भगवान्
सनत्कुमारः" इत्याद्याः । तस्मान्नित्यस्यैव मोक्षस्य प्रतिबंधनिवृत्ति-
र्वाक्यार्थज्ञानेन क्रियते । निवृत्तिस्तु साध्याऽपि प्रध्वंसाभावरूपा न
विनश्यति । "ब्रह्मवेद ब्रह्मैवभवति" "तमेव विदित्वाऽतिमृत्युमेति"
इत्यादि वचनं मोक्षस्य वेदनानन्तरभावितां प्रतिपादयन् नियोग
व्यवधानं प्रतिरुणद्धि । न विदिक्रिया कर्मत्वेन वा ध्यानक्रियाकर्मत्वेन
वा कार्यानुप्रवेशः उभयविधिकर्मत्वप्रतिषेधात् "अन्यदेव तद्विदिता-
दथो अविदितादपि” येनेदं सर्वं विजानाति तत्केन विजानीयात्
“इति । “तदेव ब्रह्मत्वं विद्धिनेदं यदिदमुपासते" इति च ।
यदि कहो कि—मोक्ष स्वतः सिद्ध है तो, "तत्त्वमसि" आदि

वाक्यार्थ ज्ञान से फिर क्या होता है ? इसका उत्तर स्पष्ट है; वाक्यार्थ
ज्ञान, मोक्ष प्रतिबन्धक अज्ञान की निवृत्ति मात्र करता है। जैसी कि
श्रुति भी है—"आप हमारे पिता हैं, निश्चित आप हमें विद्या द्वारा पार
उतार सकते हैं"—"आप ऐसे लोगों से ही मैंने सुना है कि—आत्मवेत्ता
शोक से मुक्त हो जाता है"—"भगवन् ! मैं बड़ा शोकाकुल हूं, कृपया
मुझे शोक से मुक्त करिये" "भगवान् सनत्कुमार ऋषि ने भोगवासना
रहित उन नारद को अज्ञान से पार मायातीत आत्मस्वरूप ) का
दर्शन कराया" इत्यादि। इससे ज्ञात होता है कि—वाक्यार्थ ज्ञान,
नित्यसिद्ध मोक्ष के प्रतिबन्धक अज्ञान की निवृत्ति मात्र करता है। निवृत्ति,
साध्य होते हुए भी प्रध्वंसाभाव रूपा होती है, नष्ट नहीं होती (उत्पत्ति
शील भाव का ही विनाश होता है, अभाव के विनाश का प्रश्न ही
उठता) "ब्रह्मवेत्ता ब्रह्म ही होता है"—"उसको जानकर अमर हो जाता
है"—इत्यादि वाक्य, मोक्ष को, ज्ञान का अनन्तरभावी बतलाकर, नियोग
व्यवधान का प्रत्याख्यान करते हैं ] अर्थात्—ज्ञान द्वारा ही

( २६८ )
अतएव न शरीरपातादूर्ध्वमेव बंधनिवृत्तिरिति वक्तुंयुक्तम्। नहि
मिथ्यारूपसर्पभयनिवृत्तिः रज्जुयाथात्म्यज्ञानातिरेकेण सर्पविनाश-
मपेक्षते। यदि शरीर संबंधः पारमार्थिकः तदा हि तद् विनाशापेक्षा।
स तु ब्रह्मव्यतिरिक्ततया न पारमार्थिकः। यस्य तु बन्धो न निवृत्तः,
तस्य ज्ञानमेव न जातमित्यवगम्यते, ज्ञानकार्यादर्शनात्। तस्मात्
शरीरस्थितिर्भवतु वा, मा वा, वाक्यार्थज्ञानसमनन्तरं मुक्त
एवासौ। अतो न ध्याननियोग साध्यो मोक्ष इति न ध्यानविधि-
शेषतया ब्रह्मणस्सिद्धिः। अपितु-"सत्यंज्ञानमनन्तं ब्रह्म"-तत्त्व-
मसि”-“अयमात्माब्रह्म" इति तत्परेणैव पदसमुदायेन सिध्यतीति।
ब्रह्म की इयत्ता ( सीमा ) बोधक वाक्यों की निर्विषयता भी नहीं
हो सकती, क्योंकि-अविद्या कल्पित भेद की निवृत्ति ही शास्त्र का
तात्पर्य होता है। शास्त्र, कभी ब्रह्म को, प्रत्यक्ष वस्तु की तरह "इदं" भी
नहीं कहते, अपितु वे, अविषय जीवात्मा स्वरूप का प्रतिपादन करते
हुए, अविद्या कल्पित, ज्ञातृ-ज्ञान-ज्ञेय-के विभाग का निवारण कर देते
हैं—जैसे कि—"दृष्टि के दृष्टा का दर्शन मत करो" इत्यादि।
ज्ञान के द्वारा बन्धन निवृत्ति होने से, श्रवण, मनन आदि विधि
व्यर्थ हो जायगी, यह कथन भी ठीक नहीं। ब्रह्म से अतिरिक्त विषयों
में जीवों की जो स्वाभाविक विकल्प बुद्धि होती है, उसी की निवृत्ति के
लिए, श्रवण, मनन आदि का विधान है। यह भी नहीं कह सकते कि-
ज्ञानमात्र से बंधन मुक्ति नहीं देखी जाती। बंधन मिथ्या वस्तु है,
ज्ञानोदय के बाद उसकी स्थिति कदापि संभव नहीं है। सर्पबुद्धि के
विनाश में रज्जु का यथार्थ ज्ञान ही अपेक्षित है, मिथ्या सर्पभय की
निवृत्ति, रज्जु के यथार्थ ज्ञान के अतिरिक्त किसी अन्य से संभव नहीं है।
यदि शरीर के साथ आत्मा का पारमार्थिक संबंध होता, तो निश्चित
उस संबंध का विनाश अपेक्षित होता, वह परब्रह्म से अतिरिक्त है, इसलिए
पारमार्थिक नहीं हो सकता। जिसका बंधन मुक्त नहीं हुआ, उसे ज्ञान
नहीं हुआ, ऐसा जानना चाहिए, क्योंकि—उसमें, ज्ञान के कार्य मुक्ति का
अभाव है। शरीर रहे या न रहे, वाक्यार्थ ज्ञान के बाद ही व्यक्ति मुक्त

( २६६ )
हो जाता है। इसलिए मोक्ष, ध्यान नियोग साध्य नहीं है। ध्यान विधि
के वर्णन से ब्रह्म प्रमाणित भी नहीं होता। अपितु--“ब्रह्म सत्यज्ञान और
अनंतरूप है”--“तू वही है”--“यह आत्मा ब्रह्म है” इत्यादि तत् परक
पदों से ही उसकी सिद्धि होती है ।
तदयुक्तम्—वाक्यार्थज्ञानमात्रात् बंधनिवृत्त्यनुपपत्तेः । यद्यपि
मिथ्यारूपोऽपिबन्धो ज्ञानबाध्यः, तथापि बंधस्यापरोक्षत्वात् न परोक्ष-
रूपेण वाक्यार्थज्ञानेन स बाध्यते, रज्वादावपरोक्षसर्पप्रतीतौ
वर्तमानायां “नायं सर्पोरज्जुरेषा” इत्याप्तोपदेशजनितपरोक्ष सर्प
विपरीत ज्ञानमात्रेण भयान्निवृत्तिदर्शनात् । आप्तोपदेशस्तु
भयनिवृत्तिहेतुवस्तुयाथात्म्यापरोक्षनिमित्तप्रवृत्ति हेतुत्वेन ।
तथाहि रज्जुसर्पदर्शनभयात् परावृत्तोपुरुषो “नायं सर्पोरज्जुरेषा”
इत्याप्तोपदेशेन तद्वस्तुयाथात्म्यदर्शने प्रवृत्तस्तदेव प्रत्यक्षेण दृष्ट्वा
भयान्निवर्तते । न च शब्दएव प्रत्यक्षज्ञानंजनयतीति वक्तुंयुक्तम्,
तस्यानिन्द्रियत्वात् । ज्ञानसामग्रीष्विन्द्रियाण्येव ह्यपरोक्षसाधनानि ।
न चास्यानभिसंहितफलकर्मानुष्ठानमृदितकषायस्यश्रवणमनन-
निदिध्यासनविमुखीकृतानवाह्यविषयस्य पुरुषस्यवाक्यमेवापरोक्षज्ञानं
जनयति, निवृत्तप्रतिबन्धेतत्परेऽपि पुरुषे ज्ञानसामग्रीविशेषाणामि-
न्द्रियादीनां स्वविषयनियमातिक्रमादर्शनेनतदयोगात् ।
उपर्युक्त सब कुछ असंगत है—वाक्यार्थ ज्ञान मात्र से बंधनमुक्ति
नितान्त असंभव है । यद्यपि मिथ्या रूप बंधन ज्ञान बाध्य है, फिर भी
बंधन अपरोक्ष है, परोक्ष रूप वाक्यार्थ ज्ञान से वह निवार्य नहीं है ।
रज्जु आदि में प्रत्यक्ष सर्पभय होता है ।” यह सर्प नहीं रज्जु है” ऐसे
प्रामाणिक व्यक्ति के कथन मात्र से भय की निवृत्ति नही देखी जाती,
क्योंकि—भीत व्यक्ति के समक्ष तो, सर्प की ही प्रवृत्ति रहती है, उक्त
आप्तवाक्य तो, अप्रत्यक्ष सर्प विपरीत ज्ञान मात्र ही है। आप्तोपदेश—
भयन्निवृति हेतुता, वस्तु के यथार्थ प्रत्यक्ष ज्ञान पर आधारित रहती है,
जैसे कि रज्जु को सर्प मानकर भयभीत पीछे हटा हुआ व्यक्ति “यह सर्प

( २७० )
नहीं रज्जु है" ऐसे प्रामाणिक व्यक्ति के कथन से, वस्तु को यथार्थरूप से
देखने में प्रवृत्त होता है, उसको भलीभांति देख समझकर ही भय से निवृत्त
होता है ( केवल कहने मात्र से नहीं होता ) इसलिए शब्द को भी प्रत्यक्ष
ज्ञान का उत्पादक नहीं कह सकते, क्योंकि वह अतीन्द्रिय तत्त्व है । जितने
भी ज्ञान के साधन हैं, उनमें केवल इन्द्रियाँ ही प्रत्यक्ष ज्ञान की साधन
हैं । निष्काम कर्मानुष्ठान से निर्मल मन, श्रवण-मनन-निदिध्यासन से,
विषयपराङ्मुख पुरुष का ज्ञान भी वाक्यार्थमात्र से नहीं हो सकता । जब
निर्मल मन वाले, साधन तत्पर व्यक्ति में ही, ज्ञान की साधन, इन्द्रियों
की स्वविषक निवृत्ति नहीं देखी जाती, तो सामान्य साधनानुष्ठान विहीन
व्यक्ति की चर्चा ही क्या है ?
न च ध्यानस्यवाक्यार्थज्ञानोपायता, इतरेतराश्रयत्वात्
वाक्यार्थज्ञानेजाते तद्विषयध्यानम्, ध्यानेनिवृत्ते वाक्यार्थज्ञानम्-
इति न च ध्यानवाक्यार्थज्ञानयोर्भिन्नविषयत्वम्, तथासति ध्यानस्य
वाक्यार्थज्ञानोपायता न स्यात् । न ह्यन्यध्यानमन्यौन्मुख्यमुत्पाद-
यति । ज्ञातार्थस्मृतिसंततिरूपस्यध्यानस्य वाक्यार्थज्ञानपूर्वकत्व-
मवर्जनीयम् । ध्येयब्रह्मविषयज्ञानस्य हेत्वंतरासंभवात् न च ध्यान-
मूलं ज्ञानं वाक्यान्तरजन्यम् निवर्त्तकज्ञानं तत्त्वमस्यादिवाक्यजन्यमिति
युक्तम् । ध्यानमूलमिदं वाक्यान्तरजन्यम् ज्ञानं तत्त्वमस्यादि वाक्यज-
ज्ञानेनैकविषयम्, भिन्नविषयं वा एकविषयत्वेतदेवेतरेतराश्रयत्वम् ।
भिन्नविषयत्वे ध्यानेन तदौन्मुख्यापादनासंभवः । किं च-ध्यानस्य
ध्यात्राद्यनेकप्रपंचापेक्षत्वान्निष्प्रपंचब्रह्मात्मैकत्वविषयवाक्यार्थ ज्ञानो-
त्पत्तौदृष्टद्वारेण नोपयोग इति वाक्यार्थज्ञानमात्रादविद्यानिवृत्तिं
वदतः श्रवणमनननिदिध्यासनविधीनामानर्थक्यमेव ।
ध्यानमूलक ज्ञान, किसी अन्य वाक्यजन्य भी नहीं हो सकता और
न तत्त्वमसि आदि वाक्यजन्य ही हो सकता है । ध्यान का मूल कारण
वाक्यान्तरजन्य ज्ञान, तत्त्वमसि आदि वाक्य जन्य ज्ञान से भिन्न विषयक
होता है अथवा एक विषयक ? यह विचारणीय है । एक विषयक होने

से अन्योन्याश्रयता होगी तथा भिन्न विषयक होने से, ध्यान द्वारा, वाक्य-
गत विषय में एकांगता असंभव होगी । ध्यान में—ध्येय, ध्याता आदि
भेद अपेक्षित हैं । निष्प्रपंच ब्रह्मात्मैकत्वविषयक वाक्यार्थजन्य ज्ञानो-
त्पत्ति में, प्रत्यक्ष तो कोई उपयोग दीखते नही, इसलिए वाक्यार्थ ज्ञान
मात्र से विद्या निवृत्ति बतलाने वालों के लिए, श्रवण-मनद-निदिध्यासन
आदि विधियां भी व्यर्थ ही होंगी ।
यतो वाक्यादपरोक्ष्यज्ञानासम्भवात् वाक्यार्थज्ञानेनाविद्या न
निवर्त्तते, तत एव जीवन्मुक्तिरपिदूरोत्सारिता । का चेयं जीवन्मुक्तिः ?
सशरीरस्यैव मोक्ष इति चेत्-“माता मे वन्ध्या” इतिवद सगतार्थ
वचः यतः अशरीरत्वमेव सशरोत्वमेव बन्धः मोक्ष इति त्वयैव श्रुति-
भिरुपपादितम् । अथ सशरीरत्वप्रतिभासे वर्त्तमाने यस्यायं प्रतिभा-
सोमिथ्येति प्रत्ययः तस्यसशरीरस्य निवृत्तिरिति । न मिथ्येति प्रत्ययेन
स शरीरत्वं निवृत्तं चेत्, कथं स शरीरस्य मुक्तिः ? अजीवतोऽपि मुक्तिः
सशरीरत्वमिथ्याप्रतिभासनिवृत्ति रेवेति कोऽयं जीवन्मुक्ति रितिविशेषः ।
अथसशरीरत्वप्रतिभासो बाधितोऽपि यस्य द्विचंद्रज्ञानवदनुवर्त्तते,
सजीवन्मुक्त इति चेत्—न, ब्रह्माव्यतिरिक्त सकलवस्तुविषयत्वादबाधक
ज्ञानस्य । कारणभूताविद्याकर्मादिदोषः सशरीरत्व प्रतिभासेन सह
तेनैव बाधित इति बाधितानुवृत्तिर्नशक्यतेवक्तुम् । द्विचंद्रादौ तु
तत्प्रतिभासहेतुभूतदोषस्य बाधकज्ञानभूतचंद्रैकत्वज्ञानाविषयत्वे-
नाबाधितत्वात् द्विचंद्रप्रतिभासानुवृत्तिर्युक्ता । किं च—“तस्यताव-
देवचिरं यावन्नविमोक्ष्ये अथ सम्पत्स्ये इति सद्विद्यानिष्ठस्य शरीर-
पातमात्रमपेक्षते मोक्ष इति वदन्तीयं श्रुतिः जीवन्मुक्तिं वारयति ।
सैषा जीवन्मुक्तिरापस्तंबेनापि निरस्ता “वेदानिमं लोकममुं च
परित्यज्यात्मानमन्विच्छेत्, बुद्धे क्षेमप्रापणं तच्छास्त्रै विप्रतिषिद्धम् ।
बुद्धे चेत्क्षेमं प्रायणमिहैव न दुःखमुपलभेत्, एतेन परं व्याख्यातम्”

( २७२ )
इति। अनेन ज्ञानमात्रान्मोक्षश्च निरस्तः। अतः सफलभेद निवृत्ति
रूपा मुक्तिर्जीवतो न संभवति।
वाक्य से प्रत्यक्ष ज्ञान तो हो नहीं सकता, परोक्षवाक्यार्थ ज्ञान
द्वारा भी अविद्या की निवृत्ति संभव नहीं है, इसलिए जीवन्मुक्ति की
बात भी दूर से ही त्याज्य है। फिर यह जीवन्मुक्ति है क्या वस्तु ?
सशरीर अवस्था में ही जीवन्मुक्ति कहना “मेरी माता बन्ध्या है” के
समान असंगत हास्यास्पद बात है। सशरीरता को बंधन तथा अशरीरता
को मोक्ष तो तुमने भी स्वयं श्रुति प्रमाणों से सिद्ध किया है। यदि कहो
कि—सशरीर के प्रतिभास में ही उसकी मिथ्या प्रतीति हो जाने से,
मिथ्यामय सशरीरत्व की प्रतीति निवारित हो जाती है। नही ऐसा नहीं
कह सकते, क्योंकि—"यह शरीर मिथ्या है" ऐसे ज्ञान से ही सशरीरता
की निवृत्ति कैसे हो जायगी ? मृत की मुक्ति भी, मिथ्यामय शरीरता-
भिमान की निवृत्ति ही तो है, जीवन्मुक्ति की ही क्या विशेषता है ?
यदि कहो कि—जिसकी, सशरीरता की प्रतीति बाधित होते हुए भी,
द्विचन्द्र दर्शन ज्ञान की तरह अविलुप्त भाव से रहती है, वही जीवन्मुक्त
है। यह कथन भी असंगत है—बाधक ज्ञान, ब्रह्म से अतिरिक्त सभी
विषयों से संबद्ध होता है, तो शरीरता की प्रतीति, उसकी कारण अविद्या
कर्म आदि दोष भी तो, उस ज्ञान से बाध्य होंगे, इसलिए शरीरता की
प्रतीति को, द्विचन्द्र ज्ञान की तरह अनुवृत्त नहीं कह सकते [अर्थात् ब्रह्म
के अतिरिक्त जब सभी कुछ मिथ्या हो जायगा तो उसका कोई भी अंश
अवभासित हो भी कैसे सकता है] द्विचन्द्र के आभास में, द्विचन्द्र प्रतीति
का हेतुभूत दोष, कभी भी, तद्बाधक द्विचन्द्रैकता के ज्ञान का विषय तो
होता नहीं, विषय न होने से, वह बाधक ज्ञान से बाधित भी नहीं होता,
इसलिए वहाँ द्विचन्द्र दर्शन की अनुवृत्ति बना रहना स्वाभाविक है।
“उसकी मुक्ति में तभी तक का विलम्ब है, जब तक देह से
छूटकारा नहीं होता”—सद्विद्या ( उपासना ) निष्ठ व्यक्ति का मोक्ष
शरीरावसान अपेक्षित होता है, यह बतलाने वाली उक्त श्रुति, जीव-
न्मुक्ति का प्रत्याख्यान करती है। इस जीवन्मुक्ति का आपस्तम्ब स्मृति
में भी प्रत्याख्यान इस प्रकार किया गया है—"वैदिक लौकिक कर्मों का

( २७३ )

त्याग करके आत्मचिंतन करना चाहिए, केवल आत्मज्ञान बुद्धि से मोक्ष
होने की बात शास्त्र से प्रतिबद्ध है; यदि बुद्धि से ही मोक्ष की प्राप्ति,
इस शरीर में ही संभव हो सकती है तो, फिर दुःख नहीं मिलना चाहिए,
सो ऐसा होता नहीं” (अर्थात् दुःख होता देखा जाता है) इस वाक्य से
ज्ञानमात्र लभ्य मोक्ष की बात का निराकरण हो जाता है। इसलिए
समस्त भेद निवृत्तिरूपामुक्ति शरीर रहते संभव नहीं है।
तस्माद् ध्याननियोगेन ब्रह्मापरोक्षज्ञान फलेनैव बंधनिवृत्तिः।
न च नियोगसाध्यत्वे मोक्षस्यानित्यत्वप्रसक्तिः प्रतिबंधनिवृत्ति
मात्रस्यैव साध्यत्वात् । किंचं न-नियोगेन साक्षात् बंध निवृत्तिः
क्रियते, किंतु निष्प्रपंचज्ञानैकरसब्रह्मापरोक्ष्यज्ञानेन । नियोगस्तुत-
दापरोक्ष्यज्ञानं जनयति ।
इससे निश्चित होता है कि-ब्रह्म के अप्रत्यक्ष ज्ञान के उत्पादक,
ध्यान नियोग (विधि) से ही बंध निवृत्ति होती है। नियोग की
साधनता से मोक्ष की अनित्यता नहीं हो सकती; क्यों कि-नियोग
की, प्रतिबंध निवृत्ति मात्र ही, साध्यता है। नियोग से सीधे बंध निवृत्ति
नहीं होती, अपितु निष्प्रपंचज्ञानस्वरूप ब्रह्म के परोक्ष ज्ञान से मुक्ति
होती है। नियोग तो उसमें अपरोक्ष ज्ञान का उत्पादन करता है।
कथं नियोगस्य ज्ञानोत्पत्तिहेतुत्वमिति चेत् ,कथं वा भक्तो
अनभिसंहित फलानांकर्मणां वेदनोत्पत्तिहेतुत्वम् ? मनोनैर्मल्य-
द्वारेणेति चेत् ,ममापि तथैव,मम तु निर्मले मनसि शास्त्रेण
ज्ञानमुत्पाद्यते । तव तु नियोगेन मनसि निर्मले ज्ञानसामग्री
वक्तव्येति चेत्, ध्याननियोगनिर्मलंमन एव साधनमिति
ब्रूमः । केनावगम्यते इति चेत् ,भवतो वा कर्मभिर्मनोनिर्मल
भवति, निर्मलेमनसि श्रवणमनननिदिध्यासनैः सकलेतर विषय
विमुखस्यैव शास्त्रं निवर्त्तकज्ञानमुत्पादयतीति केनावगम्यते ?
“विविदिषन्ति यज्ञेनदानेनतपसानाशकेन”-श्रोतव्यो मंतव्यो
निदिध्यासितव्यः”-“ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति”इत्यादिभिः शास्त्रैरिति

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चेत्, ममापि-“श्रोतव्योमंतव्यो निदिध्यासितव्यः”-“ब्रह्मविदाप्नोति
परम्”-“न चक्षुषा गृह्यते नापि वाचा” मनसा तु विशुद्धेन”-“
हृदामनीषा मनसाऽपि क्लृप्तः”इत्यादिभिः शास्त्रैः ध्यान नियोगेन
मनो निर्मलं भवति, निर्मलं च मनो ब्रह्मापरोक्षज्ञानंजनयती-
त्यवगम्यते-इति निरवद्यम् ।
यदि पूछें कि-नियोग की ज्ञानोत्पत्ति हेतुता कैसे है ? (अर्थात्
नियोग प्रत्यक्ष ज्ञान कैसे कराता है ? ) तो मैं ही आप से पूछता हूँ कि-
आपके मत से निष्काम कर्म ही ज्ञानोत्पत्ति का हेतु कैसे है ? यदि
आप कहें कि-निर्मल मन में संभव है, तो वैसे ही मेरी हेतुता भी
संभव है । आप कहें कि-हमारे मत से तो मन निर्मल होने पर शास्त्र
की सहायता से ज्ञानोत्पत्ति होती है; तुम्हारे मत से नियोग द्वारा
निर्मल मन में ज्ञानोत्पत्ति होती है,तुम्हें ज्ञानोत्पत्ति की सामग्री बतलानी
होगी । इस पर हमारा कथन है कि-ध्यान नियोग से निर्मल मन ही
ज्ञानोत्पत्ति का साधन है । यदि पूछें कि-यह कैसे जाना ? तो मैं पूछना
हूँ कि-आपके मत में कर्म द्वारा मन की निर्मलता तथा श्रवण- मनन-
निदिध्यासन द्वारा समस्त विषयों की पराङ्मुखता में ही, मोक्ष
शास्त्र, बंध निवर्त्तक ज्ञान का उत्पादन करता है, यही कैसे
जाना ? इस पर उदाहरण प्रस्तुत करें कि- यज्ञ-दान-तप और भोग
त्याग द्वारा ब्रह्म को जानने की इच्छा करते हैं-“आत्म तत्त्व श्रवणीय,
मननीय और चिन्तनीय है-“ब्रह्म वेत्ता ब्रह्म ही होता है“ इत्यादि वाक्यों
से हमारे मत की पुष्टि होती है । तो हमारे मत में भी-‘आत्म तत्त्व
श्रवणीय- मननीय और चिन्तनीय है” “ब्रह्म वेत्ता ब्रह्म को प्राप्त करता
है”-“वह नेत्र या वाणी से ग्राह्य नहीं है”-“विशुद्ध मन से ही गृहीत
है”-“वशीकृत मन से ही वह परिज्ञात है”-इत्यादि शास्त्र, ध्यान नियोग
से मन की निर्मलता का प्रतिपादन करते हैं । निर्मल मन ही ब्रह्म
साक्षात्कार करता, अतः यही निर्दोष मत है ।
“नेदं यदिदमुपासते” इत्युपास्यत्वं प्रतिषिद्धमिति चेत्
नैवम्-नात्र ब्रह्मण उपास्यत्वं प्रतिषिध्यते, अपितु ब्रह्मणो जगत्
वैरूप्यं प्रतिपाद्यते । यदिदं जगदुपासते प्राणिनः, नेदं ब्रह्म, तदेव

ब्रह्म त्वं विद्धि-यद वाचाऽनभ्युदितं येन,वागभ्युद्यते-इति-वाक्यार्थः
अन्यथा-“तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि” इति विरुध्यते ।ध्यानविधि वैयर्थ्यं
च स्यात् । अतो ब्रह्मसाक्षात्कारफलेन ध्याननियोगेनैवापरमार्थ
भूतस्य कृत्स्नस्य द्रष्ट दृश्यादि प्रपंचरूपबंधस्य निवृत्तिः ।
यदि कहें कि—“जिसकी उपासना करते हो वह ब्रह्म नहीं है”
इसमें उपास्यता का प्रतिषेध किया गया है सो बात नहीं है, यहाँ ब्रह्म
की उपास्यता का प्रतिषेध नहीं है, अपितु इसमें ब्रह्म की जगत से
विलक्षणता बतलाई गई है—अर्थात् प्राणि, जिस जगत् की उपासना
करते हैं, वह ब्रह्म नहीं है, अपितु “उसे ही ब्रह्म जानों जिससे वाणी
प्रस्फुरित होती है और जो वाक्य से अवर्णनीय है ।” यही उक्त वाक्य का
सही अर्थ है, यदि ऐसा अर्थ नहीं मानेंगे तो “उसे ही तुम ब्रह्म जानों”
इस वाक्य से विरुद्धता होगी । साथ ही आत्मविषयक ध्यान विधि भी
व्यर्थ हो जायगी इससे निश्चित होता है, कि—ब्रह्म साक्षात्कार कराने
वाली ध्यान विधि से ही, असत्य रूप दृष्ट-दृश्य आदि प्रपंचात्मक जगत
के सारे बंधन छूटते हैं ।
यदपि कैश्चिदुक्तम्-भेदाभेदयोर्विरोधो न विद्यते इति-तद-
युक्तम्, नहि शीतोष्णतमःप्रकाशादिवद्भेदाभेदावेकस्मिन्वस्तुनि
संगच्छेते । अथोच्येत्-सर्वं हिवस्तुजातं प्रतीति व्यवस्थाप्यम् ।
सर्वं च भिन्नाभिन्नं प्रतीयते । कारणात्मना जात्यात्मना चाभिन्नम् ।
कार्यात्मनाव्यक्त्यात्मना च भिन्नम् । छायाऽऽतपादिषु विरोधः
सहानवस्थानलक्षणो भिन्नाधारत्वरूपश्च । कार्यकारणयोर्जा-
तिव्यक्त्योश्च तदुभयमपि नोपलभ्यते । प्रत्युत एकमेव वस्तु द्विरूपं
प्रतीयते—यथा-“मृदयं घटः” षण्डो गौ “मुण्डो गौ” इति । न
चैकरूपं किंचिदपिवस्तु लोके दृष्टचरम् । न च तृणादेर्ज्वलनादिवद
भेदो भेदोपमर्दी दृश्यत इति । न वस्तु विरोधः मृत्सुवर्णगवाश्वा-
द्वात्मनाऽवस्थितस्यैव घटमुकुटषण्डवडवाद्यात्मना चावस्थानात् । न

( २७६ )

चाभिन्नस्यभिन्नस्य च वस्तुनोऽभेदो भेदश्च एक एवाकार
इतीश्वराज्ञा। १,
कोई (ध्यान नियोग वादी भेदाभेद मतावलंबी भास्कर) ऐसा भी
कहते हैं कि-जीव जगत्-ब्रह्म और माया में भेदाभेद संबंध मानने से
कोई विरुद्धता नहीं होती। यह मत भी असंगत है-शीत-उष्ण, तम-
प्रकाश आदि की तरह, भेद और अभेद, दोनों एक ही वस्तु में हो नहीं
सकते। वे कहते हैं कि-सारी वस्तुएं प्रतीति के अनुसार व्यवस्थापनीय हैं,
सभी भिन्नाभिन्न रूप से प्रतीत होती हैं सभी वस्तुएं, कारणरूप और
जाति रूप से अभिन्न तथा कार्य रूप और व्यक्ति रूप से भिन्न हैं। धूप
और छाया आदि में तो एक साथ न रहना तथा स्थानों में रहना ये दो
विरुद्धतायें रहती हैं; पर कार्य-कारण और जाति-व्यक्ति में ऐसी
विरुद्धतायें नहीं रहतीं, अपितु एक ही वस्तु दो रूपों में प्रतीत होती हैं।
जैसे कि-"घट मिट्टी का है" षण्ड गौ "मुण्डगौ" इत्यादि। लोक में कोई
भी वस्तु एक रूप की नहीं दीखती। अग्नि जैसे तृण आदि को भस्म
करती है, वैसे ही भेद को नष्ट करने वाला अभेद भी दृष्टिगत नहीं
होता; इसलिए वस्तु विरोध नाम की कोई वस्तु नहीं है। मिट्टी, सुवर्ण,
गो अश्व आदि वस्तुओं को ही प्रकारान्तर से घट, मुकुट, षण्ड और
घोड़ी आदि रूपों में देखा जाता है। अभिन्न वस्तु (जाति) केवल
अभिन्न ही रहेगी, तथा भिन्न वस्तु (व्यक्ति) भिन्न ही रहेगी, ऐसी
ईश्वराज्ञा तो है, नहीं।
प्रतीतत्वादेकरूप्यं चेत्,-प्रतीतत्वादेव भिन्नाभिन्नत्वमिति
द्वैरूप्यमभ्युपगम्यताम्। न हि विस्फारिताक्षः पुरुषो घटशरावषण्ड-
मुण्डादिषुवस्तुषूपलभ्यमानेषु “इयं मृत्-अयं घटः-इदं गोत्वम्-
इयंव्यक्तिः' इति विवेक्तुं शक्नोति। अपितु-“मृदयं घटः, षण्डो गौ”
इत्येव प्रत्येति। अनुवृत्तिबुद्धिबोद्धव्यंकार्यं व्यक्तिश्चेति विविन-
क्तीति चेत्-नैवम् विविक्ताकारानुपलब्धेः। नहि सुसूक्ष्मपि निरीक्ष-
माणैः 'इदमनुवर्त्तमानं इदं च व्यावत्र्तमानं" इति पुरोऽवस्थिते
वस्तुन्याकारभेद उपलभ्यते। यथा संप्रतिपन्नैक्येकार्येविशेषे

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( २७७ )
चैकत्वबुद्धिरुपजायते, तथैव सकारणेसामान्यैकत्वबुद्धिर-
विशिष्टोपजायते । एवमेव देशतःकालतश्चाकारतश्चात्यन्त
विलक्षणेष्वपि वस्तुषु तदेवेदमिति प्रत्यभिज्ञा जायते। अतो स्वात्मक-
मेव वस्तुप्रतीयते इति, कार्यकारणयोर्जातिव्यक्त्योश्चात्यन्तभेदोप-
पादनं प्रतीति पराहतम् ।
यदि कहा जाय कि-प्रतीति से ही एकरूपता होती है तो ऐसा
मानने से, भेदाभेद भी, प्रतीति का विषय होगा; इसलिए वस्तु की
द्विरूपता (भेद और अभेद) अनिवार्य हो जायगी। खुली आंखों वाला
कोई व्यक्ति-घट, षण्ड, मुण्ड आदि को देखकर 'यह मिट्टी है, यह घट
है यह गाय जाति है, यह गाय व्यक्ति है" इत्यादि प्रकार से कार्यकारण
जातिव्यक्ति की पृथकता नहीं बतला सकता; अपि तु-“यह मिट्टी का
घट है" यह षण्ड गौ है" ऐसा ही अनुभव करता है। यदि कहें कि-जाति
और व्यक्ति की आकृति, अनुवृत्ति बोध्य तथा कार्य और व्यक्ति की
व्यावृत्ति बोध्य होती है, इसी से उनकी पृथकता प्रतीत होती है। सो
बात नही है, दृश्यमान वस्तु में आकारगत पार्थक्य प्रतीत नही होता ।
सूक्ष्म रूप से देखने पर भी “यह अंश अनुगत तथा यह अंश व्यावृत्त है"
ऐसी सामने स्थित वस्तुओं में, आकार भेद की प्रतीति नही होती ।
पूर्वनिश्चित ऐक्यवाले कार्य विशेष मे, जैसी एकता की प्रतीति होती है,
सकारण सामान्य कार्य में भी वैसी ही एकता प्रतीत होती है। इसी
प्रकार देश काल और आकार से अत्यन्त भिन्न वस्तुओं में भी “यह वही
वस्तु है" ऐसी (जातिगतऐक्य) की प्रत्यभिज्ञा होती है [पूर्वदृष्ट वस्तु
को बाद में देखे जाने पर होने वाली प्रतीति को प्रत्यभिज्ञा कहते है] इस
प्रकार हर वस्तु दो प्रकार से (भिन्न अभिन्न) प्रतीत होती है। इसलिए
कार्य-कारण और जाति-व्यक्ति में अत्यन्त भिन्नता कहना, अनुभव
विरुद्ध बात होगी ।
अथोच्येत्-“मृदयंघटः षण्डो गौ” इतिवत् "देवोऽहं मनुष्योऽहं"
इति सामानाधिकरण्येनैक्यप्रतीतेरात्मशरीरयोरपि भिन्नाभिन्नत्वं
स्यात्, अत इदं भेदाभेदोपपादनं निजसदननिहितहुतवहज्वालायतं
इति, तदिदमनाकलितभेदाभेदसाधनसामानाधिकरण्यतदर्थया-
[email protected]

( २७८ )
थ्यात्म्यावबोधविलसितम् । तथा हि अबाधित एव प्रत्ययः सर्वत्रार्थं
व्यवस्थापयति । देवाद्यात्माभिमानस्तु आत्मयाथात्म्यगोचरैः सर्वैः
प्रमाणैर्बाध्यमानो रज्जुसर्पादि बुद्धिवन्नात्मशरीरयोरभेदं साधयति ।
“षण्डो गौः मुण्डो गौः” इति सामानाधिकरण्यस्य न केनचिद्-
क्वचिद्बाधो दृश्यते । तस्मान्नातिप्रसंगः अतएव जीवोऽपि ब्रह्मणो
नात्यन्तभिन्नः । अपि ब्रह्मांशत्वेन भिन्नाभिन्नः । तत्राभेद एव
स्वाभाविकः, भेदस्त्वौपाधिकः कथमवगम्यत इति चेत्—“तत्त्वमसि’”
“नान्योऽतोऽस्तिद्रष्टा” “अयमात्मा ब्रह्म” इत्यादिभिः श्रुतिभिः ।
“ब्रह्मेमेद्यावापृथिवी” इति प्रकृत्य–“ब्रह्मदाशा ब्रह्मदासा ब्रह्मेमे-
कितवा उत, स्त्री पुंसौ ब्रह्मणो जातौ स्त्रियो ब्रह्मोऽत वा पुमान्”
इत्याथर्वणिकानां संहितोपनिषदि ब्रह्मसूक्ते अभेद श्रवणाच्च ।
वे कहते है—“यह घट मिट्टी का है, यह षण्ड गाय है” इन
प्रतीतियों की तरह “मैं देवता हूँ, मैं मनुष्य हूँ,, ऐसी सामानाधिकरण्य
ऐक्य प्रतीति से शरीर आत्मा की भी भिन्नाभिन्नता हो सकती है । ऐसा
भेदाभेद का समर्थन, अपने घर में आग लगाने के समान है, ऐसा विचार
शून्य भेदाभेद का साधन, वे ही करते हैं, जो सामानाधिकरण्य और
उसके सही अर्थ को नहीं जानते ।
जो प्रतीति किसी प्रमाण द्वारा बाधित नहीं होती (अर्थात् भ्रांत
नहीं कही जाती) वही सब जगह पदार्थ निर्धारण की हेतु हो सकती है ।
आत्मा के देवत्व आदि का अभिमान, आत्मा के यथार्थ बोधक सभी
प्रमाणों से बाध्य है । रज्जुसर्प की तरह, उक्त प्रतीति भी, आत्मा
शरीर की एकता का साधन नहीं कर सकती । “षण्ड गौ मुण्ड गौ” इस
सामानाधिकरण्य में कोई बाधा नहीं दीखती, इसलिए उसमें कोई नियम
भंग नहीं होता । इसी प्रकार जीव भी ब्रह्म से अत्यंत भिन्न नही है
अपितु ब्रह्म का अंश होने से भिन्नाभिन्न है । उसका अभेद तो स्वाभाविक
है, और भेद औपाधिक है । यदि पूछें कि-यह कैसे जाना ? “तू वही है”
द्रष्टा कोई भिन्न नहीं है “यह आत्मा ही भिन्न है” इत्यादि श्रुतियों से ही
ज्ञात होता है । “ये वृक्ष और यह पृथिवीआकाश” यहां से लेकर—“ब्रह्म

( २७६ )
दाश, ब्रह्मदास और कितव सभी ब्रह्म हैं, स्त्री और पुरुष दोनों ही ब्रह्म
जात हैं ब्रह्म ही स्त्री पुरुष हैं” इस अथर्वणीय संहिता के ब्रह्मसूत्र में कहे
गए अभेद से भी उक्त बात निश्चित हो जाती है ।
“नित्यो नित्यानांचेतनश्चेतनानामेको बहूनां यो विदधाति
कामान्”—“ज्ञाज्ञौद्वावजावीशनीशौ”—क्रियागुणैरात्मगुणैश्चतेषां
संयोगहेतुरपरोऽपि दृष्टः—“प्रधानक्षेत्रज्ञ पतिर्गुणेशः संसार मोक्षस्थिति-
बंधहेतुः”—सकारणंकरणाधिपाधिपः”—“तयोरन्यः पिप्पलं स्वादव-
त्यनश्नन्नन्यो अभिचाकशीति”— स आत्मनि तिष्ठन्—“प्राज्ञेनात्मना
संपरिष्वक्तो न वाह्यं किंचन वेद”—प्राज्ञेनात्मनाऽन्वारूढः उत्सर्ज-
न्यति—“तमेवविदित्वाऽतिमृत्युमेति” इत्यादिभिभेदश्रवणाच्च जीव-
परयोर्भेदाभेदाववश्याश्रयणीयौ तत्र—“ब्रह्मवेद ब्रह्मैव भवति इत्यादि
भिर्मोक्षदशायां जीवस्य ब्रह्मस्वरूपापत्तिव्यपदेशात् । “यत्रत्वस्य
सर्वमात्मैवाभूत्तत्केन कं पश्येत्” इति तदानीं भेदेनेश्वरदर्शननिषे-
धाच्चाभेदः स्वाभाविक इत्यवगम्यते ।
“नित्यों के नित्य चेतनों के चेतन वह अकेले ही अनेकों की
कामनाओं को पूर्ण करते हैं—ज्ञाता और अज्ञ, ईश और अनीश दो अज
हैं—क्रियागुण और आत्मगुण द्वारा उनका संयोग कराने वाला एक
अन्य (जीव) भी ज्ञात होता है—प्रधान (प्रकृति) और क्षेत्रज्ञ (जीव) का
अधिपति संचालक तीनों गुणों का स्वामी (ईश्वर) अधिपति हैं—उन
दोनों में एक पिप्पल का आस्वाद करता है दूसरा केवल देखता मात्र है।
जो आत्मा में स्थिति है—प्राज्ञ (जीव) परमात्मा से आलिंगित होकर
वाह्याभ्यंतर ज्ञान से रहित हो जाता है—प्राज्ञ, आत्मा द्वारा परिचालित
देह का परित्याग कर चला जाता है—उसको जानकर मृत्यु का अतिक्रमण
करता है । “इत्यादि भेद परक श्रुतियों से भी जीव और परमात्मा का
भेदाभेद अवश्य मान्य है । “ब्रह्मवेत्ता ब्रह्म ही होता है” इत्यादि
श्रुतियों से मोक्षदशा में जीव की ब्रह्मस्वरूपावाप्ति बतलाई गई है तथा
“जब सब कुछ आत्म्य है तो किससे किसको देखा जाय”? इत्यादि में
कहे गए भेद परक ईश्वर दर्शन के निषेध से, स्वाभाविक अभेद प्रतीत
होता है ।