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श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

DevanagariHindipublished696 पृष्ठ

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पृष्ठ 321

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सकती। तण्डुल निष्पादक मुद्गर (मुसल) आदि के आघात की तरह, संपूर्ण
प्रपंच का निवर्त्तक ऐसा कोई नहीं दीखता, जिससे उसकी निवृत्ति हो
सके, इसलिए दृष्टार्थ इति कर्त्तव्यता तो संभव है, नहीं और न, निष्पन्न
करण का कर्म योग्यता संपादक अनुग्रह ही संभव है। केवल अनुग्राहक
अंश से ही निखिल जगत की प्रपंच की करणता हो सके ऐसा संभव नहीं
है। यदि कहें कि-ब्रह्म का अद्वैत रूप ज्ञान ही प्रपंचनिवृत्ति रूप करण
शरीर का निष्पादन कर सकता है। जब उसी से प्रपंच निवृत्ति रूप मोक्ष
हो सकता है तो, करण निष्पाद्य, कुछ भी शेष नहीं रह जाता, ऐसा
पहिले भी कह चुके हैं। यदि इति कर्त्तव्यता अभावरूप है तो वह
अस्तित्वहीन होने से, न करण के शरीर का निष्पादन कर सकती है, न
अनुग्रह ही। इससे स्पष्ट होता है कि-ब्रह्म के निष्प्रपंचीकरण की विधि
संभव नहीं है।
अन्योऽप्याह-यद्यपि वेदांतवाक्यानां न परिनिष्पन्न ब्रह्म
स्वरूपपरतया प्रामाण्यम्, तथापि ब्रह्मस्वरूपं सिद्धत्येव।
कुतः ? ध्यानाविधिसामर्थ्यात् । एवमेव हि समामनन्ति । “
आत्मा वाऽरेद्रष्टव्यः 'निदिध्यासितव्यः-"यः आत्मा अपहतपाप्मा
सोऽन्वेष्टव्यः स विजिज्ञासितव्य"-"आत्मेत्येवोपासीत्"-"आत्मान-
मेव लोकमुपासीत् “इति। अथ ध्यानविषयो हि नियोगः स्वविषय
भूतध्यानं ध्येयैकनिरूपणीयम्-इति ध्येयमाक्षिपति । स च
ध्येयः स्ववाक्य निर्दिष्ट आत्मा। स किं रूप इत्यपेक्षायां तत्
स्वरूपविशेषसमर्पणद्वारेण “सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म" सदैव सोम्येद्-
मग्र आसीत्"इत्येवमादीनां वाक्यानां ध्यानविधिशेषतया प्रामाण्यम्-
इति विधिविषयभूतध्यानशरीरानुप्रविष्ट ब्रह्म स्वरूपे अपि
तात्पर्यमस्त्येव । “अतः एकमेवाद्वितीयम् ” 'तत्सत्यं स
आत्मा तत्त्वमसि श्वेतकेतोः “नेह नानास्ति-किंचन”इत्यादिभि-
र्ब्रह्मस्वरूपमेकमेव सत्यं तद्व्यतिरिक्तं सर्वं मिथ्येत्येवंगम्यते ।
प्रत्यक्षादिभिर्भेंदावलंबिना च कर्म शास्त्रेण भेदः प्रतीयते ।