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सर्वकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

DevanagariHindipublished696 पृष्ठ

पृष्ठ 325, कुल 696 में से

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पृष्ठ 325

( २६५ )
साधयति । न तावत् दोषापनयनेन वा नित्यशुद्धत्वाद् ब्रह्मणः ।
नाप्यतिशयाधानेन अनाधेयातिशय स्वरूपत्वात् । नित्यनिर्विकारत्वेन
स्वाश्रयायाः पराश्रयायाश्च क्रियाया अविषयतया न निघर्षेणेनादर्शा
दिवत् संस्कार्यत्वम् । न च देहस्थया स्नानादि क्रियया आत्मा
संस्क्रियते । किंतु अविद्यागृहीतः तत्संगतोऽहंकर्त्ता, तत्फलानुभवोऽपि
तस्यैव । न चाहंकृत्तैवात्मा तत्साक्षित्वात् । तथा च मंत्रवर्णाँ
“तयोरन्यं पिप्पलं स्वाद्वत्ति अनश्नन्नन्यो अभिचाकशीति इति ।”
आत्मेन्द्रियमनोयुक्तं भोक्तेत्याहुर्मनीषिणः “एकोदेवः सर्वभूतेषु गूढः
सर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा कर्माध्यक्षः सर्वभूतादिवासः साक्षी
चेता केवलोगिर्गुणश्च” संपर्यगाच्छुक्रमकायमव्रह्मणमस्नाविरं
शुद्धमपापविद्धम्” इति च । अविद्यागृहीतादहंकर्तु ु रात्मस्वरूपमनाधे
यातिशयम् नित्यशुद्धं निर्विकारं निष्कृष्येत । तस्मादात्मस्वरूपत्वेन
न साध्योमोक्षः ।
उत्पत्ति, प्राप्ति, विकृति और संस्कृति रूप चार प्रकार की साध्यता
भी मोक्ष की नहीं हो सकती । मोक्ष की उत्पत्ति तो इसलिए संभव नहीं
है कि-वह ब्रह्मस्वरूप होने से नित्य है । उसे प्राप्य इसलिए नहीं कह
सकते कि--ब्रह्म स्वरूप होने से नित्य प्राप्त है । उसकी विकृति भी संभव
नहीं है, विकृति मानने से वह दही आदि की तरह अनित्य हो जायगा ।
वह संस्कार्य भी नहीं है; संस्कार दोषों का परिमार्जन कर गुणों का
संस्थापन करता है । नित्य शुद्ध ब्रह्म में दोषों के परिमार्जन की बात
नितांत असंगत है । ब्रह्म, स्वरूपतः ही अतिशय गुणों वाले हैं इसलिए
गुणाधान रूप संस्कार की बात भी उनमें लागू नहीं होती । नित्य
निर्विकार होने से, स्वाश्रित या पराश्रित क्रियाओं के अविषय होने के
कारण, दर्पण के घर्षण के समान संस्कार का रूप भी नहीं हो सकता ।
परमात्मा अशरीरी है, इसलिए स्नान आचमन आदि रूप संस्कार भी
असंभव है । अविद्या के कारण, देह संश्लिष्ट अहंकार करने वाला, कर्त्ता
ही संस्कृत होता है, संस्कार के फलस्वरूप वही फलोपभोग भी करता है ।