श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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चाभिन्नस्यभिन्नस्य च वस्तुनोऽभेदो भेदश्च एक एवाकार
इतीश्वराज्ञा। १,
कोई (ध्यान नियोग वादी भेदाभेद मतावलंबी भास्कर) ऐसा भी
कहते हैं कि-जीव जगत्-ब्रह्म और माया में भेदाभेद संबंध मानने से
कोई विरुद्धता नहीं होती। यह मत भी असंगत है-शीत-उष्ण, तम-
प्रकाश आदि की तरह, भेद और अभेद, दोनों एक ही वस्तु में हो नहीं
सकते। वे कहते हैं कि-सारी वस्तुएं प्रतीति के अनुसार व्यवस्थापनीय हैं,
सभी भिन्नाभिन्न रूप से प्रतीत होती हैं सभी वस्तुएं, कारणरूप और
जाति रूप से अभिन्न तथा कार्य रूप और व्यक्ति रूप से भिन्न हैं। धूप
और छाया आदि में तो एक साथ न रहना तथा स्थानों में रहना ये दो
विरुद्धतायें रहती हैं; पर कार्य-कारण और जाति-व्यक्ति में ऐसी
विरुद्धतायें नहीं रहतीं, अपितु एक ही वस्तु दो रूपों में प्रतीत होती हैं।
जैसे कि-"घट मिट्टी का है" षण्ड गौ "मुण्डगौ" इत्यादि। लोक में कोई
भी वस्तु एक रूप की नहीं दीखती। अग्नि जैसे तृण आदि को भस्म
करती है, वैसे ही भेद को नष्ट करने वाला अभेद भी दृष्टिगत नहीं
होता; इसलिए वस्तु विरोध नाम की कोई वस्तु नहीं है। मिट्टी, सुवर्ण,
गो अश्व आदि वस्तुओं को ही प्रकारान्तर से घट, मुकुट, षण्ड और
घोड़ी आदि रूपों में देखा जाता है। अभिन्न वस्तु (जाति) केवल
अभिन्न ही रहेगी, तथा भिन्न वस्तु (व्यक्ति) भिन्न ही रहेगी, ऐसी
ईश्वराज्ञा तो है, नहीं।
प्रतीतत्वादेकरूप्यं चेत्,-प्रतीतत्वादेव भिन्नाभिन्नत्वमिति
द्वैरूप्यमभ्युपगम्यताम्। न हि विस्फारिताक्षः पुरुषो घटशरावषण्ड-
मुण्डादिषुवस्तुषूपलभ्यमानेषु “इयं मृत्-अयं घटः-इदं गोत्वम्-
इयंव्यक्तिः' इति विवेक्तुं शक्नोति। अपितु-“मृदयं घटः, षण्डो गौ”
इत्येव प्रत्येति। अनुवृत्तिबुद्धिबोद्धव्यंकार्यं व्यक्तिश्चेति विविन-
क्तीति चेत्-नैवम् विविक्ताकारानुपलब्धेः। नहि सुसूक्ष्मपि निरीक्ष-
माणैः 'इदमनुवर्त्तमानं इदं च व्यावत्र्तमानं" इति पुरोऽवस्थिते
वस्तुन्याकारभेद उपलभ्यते। यथा संप्रतिपन्नैक्येकार्येविशेषे