श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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नहीं रज्जु है" ऐसे प्रामाणिक व्यक्ति के कथन से, वस्तु को यथार्थरूप से
देखने में प्रवृत्त होता है, उसको भलीभांति देख समझकर ही भय से निवृत्त
होता है ( केवल कहने मात्र से नहीं होता ) इसलिए शब्द को भी प्रत्यक्ष
ज्ञान का उत्पादक नहीं कह सकते, क्योंकि वह अतीन्द्रिय तत्त्व है । जितने
भी ज्ञान के साधन हैं, उनमें केवल इन्द्रियाँ ही प्रत्यक्ष ज्ञान की साधन
हैं । निष्काम कर्मानुष्ठान से निर्मल मन, श्रवण-मनन-निदिध्यासन से,
विषयपराङ्मुख पुरुष का ज्ञान भी वाक्यार्थमात्र से नहीं हो सकता । जब
निर्मल मन वाले, साधन तत्पर व्यक्ति में ही, ज्ञान की साधन, इन्द्रियों
की स्वविषक निवृत्ति नहीं देखी जाती, तो सामान्य साधनानुष्ठान विहीन
व्यक्ति की चर्चा ही क्या है ?
न च ध्यानस्यवाक्यार्थज्ञानोपायता, इतरेतराश्रयत्वात्
वाक्यार्थज्ञानेजाते तद्विषयध्यानम्, ध्यानेनिवृत्ते वाक्यार्थज्ञानम्-
इति न च ध्यानवाक्यार्थज्ञानयोर्भिन्नविषयत्वम्, तथासति ध्यानस्य
वाक्यार्थज्ञानोपायता न स्यात् । न ह्यन्यध्यानमन्यौन्मुख्यमुत्पाद-
यति । ज्ञातार्थस्मृतिसंततिरूपस्यध्यानस्य वाक्यार्थज्ञानपूर्वकत्व-
मवर्जनीयम् । ध्येयब्रह्मविषयज्ञानस्य हेत्वंतरासंभवात् न च ध्यान-
मूलं ज्ञानं वाक्यान्तरजन्यम् निवर्त्तकज्ञानं तत्त्वमस्यादिवाक्यजन्यमिति
युक्तम् । ध्यानमूलमिदं वाक्यान्तरजन्यम् ज्ञानं तत्त्वमस्यादि वाक्यज-
ज्ञानेनैकविषयम्, भिन्नविषयं वा एकविषयत्वेतदेवेतरेतराश्रयत्वम् ।
भिन्नविषयत्वे ध्यानेन तदौन्मुख्यापादनासंभवः । किं च-ध्यानस्य
ध्यात्राद्यनेकप्रपंचापेक्षत्वान्निष्प्रपंचब्रह्मात्मैकत्वविषयवाक्यार्थ ज्ञानो-
त्पत्तौदृष्टद्वारेण नोपयोग इति वाक्यार्थज्ञानमात्रादविद्यानिवृत्तिं
वदतः श्रवणमनननिदिध्यासनविधीनामानर्थक्यमेव ।
ध्यानमूलक ज्ञान, किसी अन्य वाक्यजन्य भी नहीं हो सकता और
न तत्त्वमसि आदि वाक्यजन्य ही हो सकता है । ध्यान का मूल कारण
वाक्यान्तरजन्य ज्ञान, तत्त्वमसि आदि वाक्य जन्य ज्ञान से भिन्न विषयक
होता है अथवा एक विषयक ? यह विचारणीय है । एक विषयक होने