श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
पृष्ठ 337, कुल 696 में से
संदर्भ में पढ़ें( २७७ )
चैकत्वबुद्धिरुपजायते, तथैव सकारणेसामान्यैकत्वबुद्धिर-
विशिष्टोपजायते । एवमेव देशतःकालतश्चाकारतश्चात्यन्त
विलक्षणेष्वपि वस्तुषु तदेवेदमिति प्रत्यभिज्ञा जायते। अतो स्वात्मक-
मेव वस्तुप्रतीयते इति, कार्यकारणयोर्जातिव्यक्त्योश्चात्यन्तभेदोप-
पादनं प्रतीति पराहतम् ।
यदि कहा जाय कि-प्रतीति से ही एकरूपता होती है तो ऐसा
मानने से, भेदाभेद भी, प्रतीति का विषय होगा; इसलिए वस्तु की
द्विरूपता (भेद और अभेद) अनिवार्य हो जायगी। खुली आंखों वाला
कोई व्यक्ति-घट, षण्ड, मुण्ड आदि को देखकर 'यह मिट्टी है, यह घट
है यह गाय जाति है, यह गाय व्यक्ति है" इत्यादि प्रकार से कार्यकारण
जातिव्यक्ति की पृथकता नहीं बतला सकता; अपि तु-“यह मिट्टी का
घट है" यह षण्ड गौ है" ऐसा ही अनुभव करता है। यदि कहें कि-जाति
और व्यक्ति की आकृति, अनुवृत्ति बोध्य तथा कार्य और व्यक्ति की
व्यावृत्ति बोध्य होती है, इसी से उनकी पृथकता प्रतीत होती है। सो
बात नही है, दृश्यमान वस्तु में आकारगत पार्थक्य प्रतीत नही होता ।
सूक्ष्म रूप से देखने पर भी “यह अंश अनुगत तथा यह अंश व्यावृत्त है"
ऐसी सामने स्थित वस्तुओं में, आकार भेद की प्रतीति नही होती ।
पूर्वनिश्चित ऐक्यवाले कार्य विशेष मे, जैसी एकता की प्रतीति होती है,
सकारण सामान्य कार्य में भी वैसी ही एकता प्रतीत होती है। इसी
प्रकार देश काल और आकार से अत्यन्त भिन्न वस्तुओं में भी “यह वही
वस्तु है" ऐसी (जातिगतऐक्य) की प्रत्यभिज्ञा होती है [पूर्वदृष्ट वस्तु
को बाद में देखे जाने पर होने वाली प्रतीति को प्रत्यभिज्ञा कहते है] इस
प्रकार हर वस्तु दो प्रकार से (भिन्न अभिन्न) प्रतीत होती है। इसलिए
कार्य-कारण और जाति-व्यक्ति में अत्यन्त भिन्नता कहना, अनुभव
विरुद्ध बात होगी ।
अथोच्येत्-“मृदयंघटः षण्डो गौ” इतिवत् "देवोऽहं मनुष्योऽहं"
इति सामानाधिकरण्येनैक्यप्रतीतेरात्मशरीरयोरपि भिन्नाभिन्नत्वं
स्यात्, अत इदं भेदाभेदोपपादनं निजसदननिहितहुतवहज्वालायतं
इति, तदिदमनाकलितभेदाभेदसाधनसामानाधिकरण्यतदर्थया-
[email protected]