स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा
८६ स्पन्दकारिका
इयं योनिः स्मृता विप्र मन्त्राणां प्रत्ययात्मिका ।
ते मन्त्रा वर्णरूपेण सबाह्याभ्यन्तरोदिताः ॥
नैष्कालिक पदावस्थाः करणानीव देहिनाम् ।
प्रयुक्ताः सर्वकालेषु सिद्ध्यन्ते वीर्ययोगतः ॥'
१६. 'जय संहिता' में कहा गया है—'एक ही मन्त्रनाथ अन्तर एवं बाह्य दोनों में
उदित होकर एकहो जाता है । तब उस जप को लक्षसंख्या से अधिक समझना
चाहिए'—
'एकस्य मन्त्रनाथस्याप्यन्तर्बाह्योदितस्य च ।
यदैक्यं तं जपं विद्धि लक्षसंख्याधिकं मुने ॥'
(एवं शुद्धबोधात्मकत्वेन अन्तर्बाह्योदयादेकोऽपि जपो लक्षसंख्याकः'—'स्पन्द-
प्रदीपिका') ।
१७. पुस्तक में लिखे मन्त्रों का जप इन्हीं कारणों से निषिद्ध है और ऐसा मन्त्र-
जापक चाण्डाल होता है—
'पुस्तके लिखितान्मन्त्रा दृष्ट्वा जपति यो नरः ।
स जीवन्नेव चाण्डालो,—तथा—'मृतःश्वा चाभिजायते ॥'
१८. 'मन्त्र' समस्त देवशक्तियों से युक्त होते हैं—
यथा—'श्रीविद्या' । 'श्रीविद्या' में
(१) 'वाग्भवकूट'—'क ए ई ल' ।
अ (श्रीकण्ठ) क (कोधीश) ए (कोणत्रय = योनि) ई (लक्ष्मी) 'अ' (अनुत्तर) के
साथ लं (मांस) ।
(२) 'कामराजकूट'—ह, स, क, ह, ल ।
ह (शिव) स (हंस) क (ब्रह्मा) ह (वियत्) ल (शक्र) अ (अक्षर) ।
(३) 'शक्तिकूट'—शिव (ह) वियत् (ह) के बिना 'कामराजकूट । शक्तिकूट कहा
जाता है । प्रत्येक कूट के अन्त में एक-एक हृल्लेखा 'ह्रीं' अन्त में जोड़ लेना चाहिए ।
('वरिवस्यारहस्यम्') ।
(४) 'ह्रीं' (हृल्लेखा) में 'ह' (व्योम) र (अग्नि) ई (वामलोचना) बिन्दु (.)
अर्धचन्द्र, रोधिनी, नाद, नादान्त, शक्ति, व्यापिका, समना एवं उन्मनी । बिन्दादि ९ की
समष्टि 'नाद' कहलाता है ।
१९. 'वरिवस्यारहस्यम्'—मन्त्र के वर्णों का उच्चारण करते हुए ५ अव-
स्थाओं, ६ शून्यों, ७ विषुवों, ९ चक्रों एवं मन्त्र के अर्थ का चिन्तन करना चाहिए ।
यही 'जप' है—
एवमवस्थाशून्यविषुवन्ति चक्राणि पञ्च षट् सप्त ।
नव च मनोरर्थांश्च स्मरतोऽर्णोच्चरणं तु जपः ॥ (वरि०र०)
परिचय एवं पृष्ठभूमि ८७
(क) ५ अवस्थायें—जागरण, स्वप्न, सुषुप्ति, तुरीय, तुरीयातीत ।
(ख) ६ शून्य—तृतीयकूट के रेक, बिन्दु, रोधिनी, नादान्त, व्यापिका एवं उन्मनी
में महाशून्य ॥
(ग) ७ विषुव—मन्त्रविषुव । नाडी विषुव । प्रशान्तविषुव । शक्तिविषुव ।
तत्त्वविषुव ।
(घ) ९ चक्र—चक्रभावन—१. सकल, २. निष्कल, ३. सकल-निष्कल ।
(१) अकुल सहस्रार (२) मूलाधार (३) स्वाधिष्ठान (४) मणिपूरक (५) अनाहत
(६) विशुद्धाख्य (७) आज्ञा (८) सूक्ष्म जिह्वा (९) बिन्दु । (त्रैलोक्यमोहनादि ९ चक्र) ।
'शून्यषट्कं सुरेशानि अवस्थापञ्चकं पुनः ।
विषुवत्सप्तरूपं च भावयन्मनसा जपेत् ॥'
(ङ) मन्त्रार्थ—भावार्थ, संप्रदायार्थ, निगर्भार्थ, कौलिकार्थ, रहस्यार्थ, महातत्त्वार्थ,
नामार्थ, शब्दरूपार्थ, नामैकदेशार्थ, शाक्तार्थ सामरस्यार्थ, समस्तार्थ, सगुणार्थ, महा-
वाक्यार्थ आदि ।
('पञ्चदशी' के उतने ही अर्थ हैं जितने उसके वर्ण हैं ।)
'अहं'—'अहं' भी एक मन्त्र है और उसका अर्थ निम्नांकित है—
अहमित्येकमद्वैतं यत्प्रकाशात्मविभ्रमः ।
अकारः सर्ववर्णाग्र्यः प्रकाशः परमः शिवः ॥
हकारोऽन्त्यः कालरूपो विमर्शाख्यः प्रकीर्तितः ।
अनयोः सामरस्यं यत् परस्मिन्ब्रह्मणि स्फुटम् ॥'
'अ' = शिव । 'ह' = 'शक्ति'
'अहकारौ शिवशक्ती शून्याकारौ परस्पराश्लिष्टौ ।
स्फुरणप्रकाशरूपावुपनिषदुक्तं परं ब्रह्म ॥' (वरि०२० २।६९)
'अहं'—'प्रकाश' + 'विमर्श' का सामरस्य ॥ 'स्पन्दकारिका' में—'स्वबल'
'आत्मबल' शब्दों का बार-बार प्रयोग किया गया है । यही बल 'मन्त्र' की आत्मा है
जिसका स्पन्द० में अनेक बार प्रयोग किया गया है—
१. अपित्वात्मबलस्पर्शात् पुरुषस्तत्समो भवेत् ॥ ८ ॥ (स्पन्द का०)
२. स्वबलोद्योगभावितः (३६) (स्पन्दकारिका) ।
३. 'तत्तथा बलमाक्रम्य' (३७)
४. स्वात्मन्यधिष्ठानात् (३९)
५. 'स्वयमेवावबोत्स्यते' (४३) (स्पन्द का०) ।
६. तदाक्रम्य बलं मन्त्राः (२६) (स्पन्द का०) ।
'स्वभाव' 'तदात्मतापत्ति' भी आत्मा के वाचक हैं—
'स्वभावादुपलब्धृतः' (इ) 'स्वभावमवलोकयन्' (११) (स्पन्द का०) ।
८८ स्पन्दकारिका
'तदाक्रम्य बलं मन्त्रा (३१) इयमेवात्मनो ग्रहः (३२) (स्पन्द का०) ।
२०. मन्त्रदेवता और साधक के साथ उसका तादात्म्य—'स्पन्दकारिका' (३१)
में कहा गया है कि ध्याता साधक के चित्त में ध्येय देवता का प्रत्यक्ष साक्षात्कार इसी को
कहते हैं कि ध्याता के चित्त की मन्त्रोच्चारण करने की इच्छा मात्र से तत्काल उसका
देवता के साथ तादात्म्य हो जाता है—
अयमेवोदयस्तस्य ध्येयस्य ध्यायिचेतसि ।
तादात्मतासमापत्तिरिच्छतः साधकस्य या ॥ (३१)
'तादात्म्यं तत्स्वभावत्वप्राप्तिः मन्त्रदेवतया सह साधकस्य मन्त्रोच्चारणेच्छया
संपादिता ।' (भट्टकल्लटः 'स्पन्दसर्वस्व')
२१. मन्त्रसाधना एवं अमृत प्राप्ति, आत्मग्रह, निर्वाण दीक्षा, शिवसद्भाव—
'स्पन्दकारिका' में कहा गया है—
इयमेवामृतप्राप्तिरयमेवात्मनो ग्रहः ।
इयं निर्वाण दीक्षा च शिवसद्भावदायिनी ॥ (३२)
[११] मन्त्र और नाद
'मन्त्र' अनाहतनाद का स्थूल विग्रह है । समस्त मन्त्रों में यह शब्द ब्रह्मस्वरूप
'नाद' माला की मनकाओं से ग्रथित सूत्र की भाँति है । यही कारण है कि 'नाद' (उद्गीथ,
प्रणव, ओंकार, ॐ) को परम मन्त्र कहा गया है । 'विज्ञानभैरव' में मन्त्र के जप को भी
नादात्मक कहा गया है—
भूयोभूयः परे भावे भावना भाव्यते हिया ।
जपः सोऽत्र स्वयं नादो मन्त्रात्मा जप्य ईदृशः ॥ (१४२)
'नाद' क्या है? 'शक्ति' ही नाद है—
'यत्किंचिन्नादरूपेण श्रूयते शक्तिरेव सा' (हठयोग० प्र० ४।१०२) १
नाद का प्रभाव— १. पापक्षय २. चित्त एवं प्राण का निरंजन में विलय
१. सदानादानुसंधानात् क्षीयन्ते पापसंचयाः ।
निरंजने विलीयेते निश्चितं चित्तमारुतौ ॥ (हठयोग० ४।१०५)
२. शंखदुन्दुभिनादं च न शृणोति कदाचन ।
काष्ठवज्जायते देह उन्मन्यावस्थया ध्रुवम् ॥ (४।१०६)
नाद— १. काष्ठवत् स्थैर्य २. उन्मनी (असंप्रज्ञात समाधि) ३. सर्वावस्थाविनिर्मुक्ति
४. सर्वचिन्ताक्षय ५. मृतवत् अवस्थान ६. काल वंचन ७. कर्म-मुक्ति ८. पञ्चविषयों से
मुक्ति ९. जाग्रत् स्वप्न-सुषुप्ति आदि से मुक्ति १०. समस्त द्वन्द्व-सुखदुःख, शीत-ऊष्ण,
मान-अपमान आदि से मुक्ति ११. जाग्रत् में भी सुषुप्ति १२. श्वासोच्छ्वास विवर्जित
१३. असम्प्रज्ञात समाधि ।
१. हठयोगप्रदीपिका (उप० ४/१०५-११२) ।
परिचय एवं पृष्ठभूमि ८९
मन्त्र और परमेश्वर के साथ अभेद विमर्शन—क्षेमराजाचार्य—शिवसूत्र-
विमर्शिनी' (२।१)—
आचार्य क्षेमराज कहते हैं कि चूँकि 'चित्त' परतत्त्व का चिन्तन करता है—
विमर्शन करता है अतः उसे 'चित्त' कहते हैं और यही चित्त उस परमेश्वर के साथ
तादात्म्यभावापन्न होकर विमर्शन करता है अतः (मनु अवबोधने—'मन्त्र'; मन्त्र = तृ
'पालने' = मं + त्र) इस विमर्श रूप संवेदन को ही 'मन्त्र' कहा जाता = है। चूँकि चित्त
विमर्शन रूप है अतः 'चित्त' भी मन्त्र कहा जाता है—'चित्तं मन्त्रः ।२।१।। चेत्यते
विमृश्यते अनेन परं तत्त्वम् इति ।'¹
चित्तं, पूर्णस्फुरत्तासतत्त्वप्रासाद प्रणवादिविमर्शरूपं संवेदनम्, तदेव मन्त्र्यते गुप्तम्,
अन्तर भेदेन विमृश्यते परमेश्वररूपम् अनेन इति कृत्वा मन्त्रः ।' सारांश यह कि—
परमात्मा के साथ अपनी अभेदापत्तिपूर्वक परमात्मस्वरूप का विमर्शन, तत्स्वरूप
आत्मस्फुरत्ता ही 'मन्त्र' है।
मन्त्र के दो प्रधान अंग—मन्त्र के दो प्रसिद्ध एवं मुख्य अंग—आचार्य क्षेमराज
'शिवसूत्र विर्शिनी' में ही मन्त्र के दो प्रधान संघटक तत्त्वों पर भी प्रकाश डालते हैं और
उनकी नूतन व्याख्या करते हैं। ये निम्न हैं—
१. मनन = 'परस्फुरत्तात्मकमननधर्मार्थमता,²
२. त्राण = 'भेदमयसंसार-प्रशमनात्मक त्राणधर्मता च अस्य निरुच्यते ।³
मन्त्र के दो पक्ष—१. मननात्मक, २. त्राणात्मक ॥
'मन्त्र' की चित्त के साथ एकात्मता हो जाने पर चित्त परमेश्वर के साथ सामरस्य हो
जाने से चित्त भी 'मन्त्र' है—'मन्त्र-देवता विमर्शपरत्वेन प्राप्ततत्सामरस्यम् आराधकचित्त-
मेव मन्त्रः' विचित्रवर्णसंघट्टनमात्र मन्त्र नहीं है—'न तु विचित्रवर्णसंघट्टनमात्रकम् ।'⁴
'शिवसूत्र' में 'मन्त्र' शाक्तोपाय है। इसीलिए शिवसूत्रकार ने 'मन्त्र' की व्याख्या
द्वितीयोन्मेषः 'शाक्तोपाय' के अंतर्गत की है।
'संकेतपद्धति' में मन्त्र को मात्र मनन + त्राण लक्षणों के आधार पर परिभाषित
करते हुए कहा गया कि—मननात्त्राणधर्माऽसौ मन्त्रोऽयं परिकीर्तिताः ।' दीपिकाकार
(योगिनीहृदयदीपिका) ने भी इसी की पुष्टि की—'मननात्त्रायन्ते साधकमिति मन्त्राश्चि-
न्मरीचयः ।' (यो० हृ० पटल २।१) 'योगिनीहृदय' में पराशक्ति को भी 'मन्त्र' का
अभिधान दिया गया है।
ज्ञातृज्ञानमयाकारमननान्मन्त्ररूपिणी ।
तेषां समष्टिरूपेण पराशक्तिस्तु मातृका ॥ (मन्त्रसंकेतः २०)
मन्त्र के अवयव (प्रणव की कलायें)
┌─────┬─────┬─────┬─────┬─────┬─────┬─────┐
बिन्दु नाद अर्धचन्द्र निरोधिनी नादान्त व्यापिनी समना उन्मना
───────────────────────
१-४. शिवसूत्रविमर्शिनी ।
९० स्पन्दकारिका
'अहंकार' मन्त्र और शिवशक्ति—अद्वयसम्पत्तिकार वामननाथ (विज्ञानभैरव ८८
की व्याख्या)—
१. बुद्धि भूमि से ऊपर अहंकार भूमि है। अहंकार—समस्त जगत् में अहन्ता
व्याप्त । २. अहंकार भूमि का ज्ञान—मुक्ति ३. अहंकार ही संवित्स्वरूप 'पराशक्ति' है
और यही 'ज्ञानशक्ति' भी है। 'मन्त्रशक्ति' के रूप में भी प्रतीत होने लगती है। ४.
शिव एवं शक्ति से अभिन्न 'अहंकार' ही 'मन्त्र' है। यही अहंकार अपरिमित अहन्ता
के रूप में 'पूर्णाहन्ता' के रूप में विकसित हो जाता है।
यहाँ अहंकार सांख्य सम्मत अहंकार से पृथक् है क्योंकि वहाँ क्रम इस प्रकार
है—मन-अहंकार—बुद्धि (आरोह क्रमानुसार) । यहाँ 'विमर्शदशा' के अर्थ में ही
'अहंकार' प्रयुक्त है। प्रकाशरूप शिव की इसी विमर्शदशा में समस्त जगत् अन्तर्लीन
है। विमर्श शक्ति—अखिल जगत् का उन्मीलन ।। 'विश्वाहन्ता' (विरूपाक्षपञ्चाशिका) =
'पूर्णाहन्ता' का मन्त्र से सम्बन्ध है।
योगिनी हृदय एवं मन्त्र—'योगिनी हृदय' में कहा गया है कि इन्द्रियों को संयमित
करके आन्तर नाद की भावना करना ही 'जप' है। जप तो मन्त्र का होता है अतः यदि इस
अनाहत नाद का ही जप जप है तो सिद्ध हुआ कि 'मन्त्र' अनाहत नाद है—
संयमेन्द्रिय संचार प्रोच्चरेन्नादमान्तरम् ।
एष एव जपः प्रोक्तो न तु बाह्य जपो जपः ॥
हंसः मन्त्र सोऽहं मन्त्र—जीव दशा का स्वाभाविक मन्त्र—'हंसः हंसः' (अजपा
गायत्री) जब सुषुम्णा नाड़ी में जब प्राण हृदयाकाश से ऊपर की ओर आरोहण करता है
तब 'हम्' वर्ण उत्पन्न होता है और जब वह 'द्वादशान्त' से नीचे की ओर अवरोहण
करता है (उतरता है) तब उसकी अपान अवस्था से 'सः' वर्ण उत्पन्न होता है। इन दोनों
वर्णों के उच्चारण से प्राणी 'जीवित' कहलाता है। परिमित अहन्ता में स्थित यह जीव
अहर्निश 'हंसः हंसः' मन्त्र का जप करता रहता है—
सकारेण बहिर्याति हकारेण विशेत् पुनः ।
हंस हंसेत्यमुं मन्त्रं जीवा जपति नित्यशः ॥ (विज्ञानभैरव ५३)
महेश्वरानन्द—सोम और सूर्य (हंकार + सःकार) के अस्त एवं गमन के काल के
मध्यवर्ती क्षण का उद्धार करना चाहिए—'अहं सः' के विमर्श का उदय = अहं सः =
'सोऽहं' मन्त्र बन जाएगा। 'मैं वही शिव हूँ' की प्रत्यभिज्ञा (संवित् का स्वस्वरूप)
संवित्क्रम में—'अहं सः' 'सोऽहं' मन्त्र बन जाएगा।
'मध्यत्रुटिखुटितव्याऽस्तंगतयोः सोमसूर्ययोस्तर्हि ।' (५६)
शैवागमों में षडध्व का क्रम एवं मन्त्र—'वर्ण' 'पद' 'मन्त्र' 'कला' 'तत्त्व'
भुवन। यह जगत् वाचक (ग्राहक) के रूप में—'पर' 'सूक्ष्म' एवं 'स्थूल' रूप में
क्रमशः—'वर्ण' 'मन्त्र' एवं 'पद' के रूप में विभक्त हो जाता है।
जयरथ 'तत्स्वरूपं जपः प्रोक्तो भावाभावपदच्युतः (१।९०) की व्याख्या में कहते
परिचय एवं पृष्ठभूमि ९१
हैं कि शिव के परावाक्स्वभाव, अनाहतनादमय हो वह शक्तिमूलक एवं नादात्मक
विशिष्ट वर्ण-संरचना 'मन्त्र' है ।
मन्त्र और देवता तथा जगत—'वातुलशुद्धाख्यतन्त्र' (५ पटल) में कहा गया है
कि मन्त्र देवता एवं जगद्रूप है—मन्त्रस्तु देवता रूपं मन्त्ररूपमिदं जगत्' (५।१) ।
मन्त्र का स्वरूप क्या है ?
'मननं सर्वपक्षेषु त्राणं संसारसागरात् ।
मननत्राणधर्मत्वाद् 'मन्त्र' इत्यभिधीयते ।।' (५।७)
मन्त्र का प्रभाव—शिव-साक्षात्कार—
आह्वानतः स्वनाम्ना तु जनः सन्निहितो यथा ।
तथा मन्त्रप्रयोगेण शिवः सन्निहितो भवेत् ।। (५।८)
क्या 'मन्त्र' वर्ण-रचित पदों की समष्टि है?
आचार्य भास्करराय कहते हैं—१. 'माता, विद्या, चक्र, स्वगुरु एवं साधक' इन
पाँचों के भेद का अभाव ही मन्त्र का 'कौलिकार्थ' है ।
इत्थं माता विद्या चक्रं स्वगुरुः स्वयं चेति ।
पञ्चानामपि भेदाभावो मन्त्रस्य कौलिकार्थोऽयम् ॥ (२।१०२)
२. पराभट्टारिका (इष्टदेवी) विद्या, कुण्डलिनी एवं साधक एक दूसरे से अभिन्न
हैं—यह विमर्श श्रीविद्या का 'रहस्यार्थ' है ।
३. 'चक्र' विद्या के अक्षरों से निर्मित होने के कारण विद्या से अभिन्न है । (९६)
४. अवाङ्मनसगोचर, तत्त्वातीत, महत्तम, अणुतम, व्योमातीत, विश्वाभिन्न
चिदानन्द ब्रह्म में अपनी आत्मा का नियोजन ही मन्त्र का 'महातत्त्वार्थ' है । (१०९)
५. प्रत्येक मन्त्राक्षर में अचिन्त्य शक्ति है तथा अक्षरों एवं वामा, इच्छा तथा अन्य
शक्तियों में अभेद है यह विमर्श ही मन्त्र का 'शाक्तार्थ' है । (११८)
६. शिव एवं शक्ति के सामरस्य के कारण 'ब्रह्म हीं शिव एवं शक्ति दोनों ही
हैं'—यह मन्त्रविद्या का सामरस्यार्थ है । (१२०)
मन्त्र के अंग
(क) आन्तरिक अंग—
मन्त्र के वर्णों की संख्या, उद्धार, मात्रा (काल) उच्चारण, स्थान, प्रयत्न, रूप,
स्थितियाँ आकार आदि ।
(ख) मन्त्र के बाह्यांग—ऋषि, छन्द, देवता, विनियोग, बीज, शक्ति, कीलक,
न्यास, ध्यान, नियम एवं पूजा । (वरिवस्यारहस्यम्ः २ अंश।१६१)
मन्त्रोत्पत्ति—'कामकला बीज'—मूल मन्त्र का विकास और मूल—शरीर के
आन्तरिक एवं बाह्यांगों का विकास (२।१६४)
विद्या (मन्त्र) एवं देवी में अभेद है । (वरि० २।९१)
९२ स्पन्दकारिका
जप के ५ अंग → (मन्त्रोच्चारण के समय—) जपांग—
अवस्था ५ शून्य ६ विषुवत् ७ चक्रों का स्मरण ९ मन्त्रार्थचिन्तन
मन्त्र और नाद—मूलाधार से उठने वाला 'नाद' मन्त्राक्षरों के मध्य माला में
पिरोये सूत्र की भाँति होता है—
आधारोत्थित नादो गुण इव परिभाति वर्णामध्यगतः (२।२२)
मन्त्रजप के समय मन्त्र-विस्तार—
प्रथमकूट = मूलाधार से आरब्ध प्रलयाग्निवतः क ए ई ल ह्रीं ।
द्वितीयकूट = अनाहत से आरब्ध एवं उसके आगे कोटिसूर्यवत्—
ह स क ह ल ह्रीं ।
तृतीयकूट = आज्ञा चक्र से आरब्ध एवं ललाट के मध्य तक कोटिचन्द्र के समान—
मन्त्र संस्क्रिया के १० भेद होते हैं—जनन, जीवन, ताडन, बोधन, अभिषेक
विमलीकरण, तर्पण, दीपन, गुप्ति आदि ।
'मन्त्र' और उसके विभिन्न अर्थ—
१. मननत्राणधर्माणो 'मन्त्राः'।
२. मननात् त्राणधर्मासौ मन्त्रोऽयं परिकीर्तितः ।
३. चित्तं मन्त्रः । (शि०सू० ३।१)
४. संविद्देव्य मन्त्रः । (क्रमकेलि)
५. देव्येय मन्त्रः । (भूतिराज)
६. चिदग्निसंहार मरीचिमन्त्रः संविद्विकल्पान्गलपयन्नुदेति । (स्तोत्रभट्टारक)
७. वर्णात्मको न मन्त्रो दशभुजदेहो न पञ्चवदनोऽपि ।
संकल्पपूर्वकोटौ नादोल्लासो भवेन्मन्त्रः ॥'
८. नास्ति नादात् परो मन्त्रः । (राजभट्टारक)
९. मन्त्रः पदार्थांदियस्रंभात्मा परामर्शः । (महार्थमंजरी परिमल)
१०. तद्विमर्शस्वभावा हि सा वाच्या मन्त्रदेवता । (महासंवित् समासत्रा)
११. प्रमातृभूमिगता मन्त्राः । (मतंग टीका)
१२. मान्त्री शक्तिं मनसि महती देवतेत्याद्रियते । (संविदुल्लास)
१३. 'अग्निरूपा मन्त्राः' 'मन्त्रा न मीमांस्या' । (रौरवागम)
१४. सर्वे वर्णात्मकाः मन्त्राः । (तन्त्रसद्भाव)
१५. मन्त्रा वर्णात्मका सर्वे । (सर्ववीर)
१६. ते मन्त्रा वर्णरूपेण सबाह्याभ्यन्तरोदिताः । (संकर्षणसूत्र)
परिचय एवं पृष्ठभूमि ९३
१७. पशुभावे स्थिता मन्त्रा केवलं वर्णरूपिणः ।
सौषुम्णेध्वन्युच्चरिताः पतित्वं प्राप्नुवन्ति ते ।। (हंसपारमेश्वर)
१८. बीजपिण्डादिकं सर्वं संविदः स्पन्दनात्मताम् ।
विदधत परसंवित्तावुपाय इति वर्णितम् ।।
एकानुसंधान बलाज्जाते मन्त्रोदयेऽनिशम् ।
तन्मन्त्रदेवता यत्नात् तादात्म्येन प्रसीदति ।।
—अभिनवगुप्त : तन्त्रालोक (७।२-५)
'मन्त्र' वीर्यवान् होते हैं । 'संवित्स्तोत्र' में इस 'मन्त्रवीर्य' के विषय में कहा
गया है कि—
आदिमान्तिगगृहीतवर्णराश्यात्मिकाहमिति या स्वतः प्रथा । मन्त्रवीर्यम् ।।'
१९. त्रिकहृदय में कहा गया है—'अर्थस्य प्रतिपत्तिर्या ग्राह्यग्राहकरूपिणी । सा
एव मन्त्रशक्तिस्तु वितता मन्त्रसन्ततौ ।।'
२०. किंकरत्वं च गच्छन्ति मन्त्रा मन्त्राधिपैः सह । (त्रिकसार)
२१. तन्त्रालोक—समस्त मन्त्र वीर्यबलोपेत हैं ।
२२. मन्त्र एवं मांत्रिक में अभेद आवश्यक है क्योंकि इस अभेदात्मकता के बिना
मन्त्र कभी सिद्ध नहीं होते—पृथङ्मन्त्रः पृथङ्मन्त्री न सिद्ध्यति कदाचन ।
—'श्रीकण्ठीसंहिता'
२३. उच्चार्यमाणा ये मन्त्रा न मन्त्राश्चापि तान् विदुः ।
२४. शक्तौ नियोजयेन्मन्त्र जपस्तु सफलीभवेत् ।। (तत्वरक्षाविधान)
२५. 'विषुवत्कं जपं कुर्यात्' ।
२६. एकस्य मन्त्रनाथस्य अन्तर्बाह्योदितस्य च ।
यदैक्यं तं जपं विद्धि ।। (सुभगोदयवासनाः १४।६९)
२७. उच्चार्यमाणा ये मन्त्रा न मन्त्राश्चापि तान्विदुः ।
मोहिता देवगंधर्वा मिथ्याज्ञानेन गर्विताः ।। (सर्वज्ञानोत्तर)
२८. 'मन्त्र' शक्ति के बिना व्यर्थ हैं—'तन्त्रसद्भाव'—
'मन्त्राणां जीवभूता तु या स्मृता शक्तिरव्यया ।
तया हीना वरारोहे निष्फलाः शरदभ्रवत् ।।'
२९. मन्त्र के तत्त्व—१. देवतत्त्व २. प्राणतत्त्व ३. बिन्दु तत्त्व ४. ज्ञान तत्त्व ५.
शक्तितत्त्व ६. योगिनी तत्त्व (कामधेनु तन्त्र) ।।
३०. मन्त्र के स्थान—१. सकल २. निष्कल ३. सूक्ष्म ४. सकल निष्कल ५.
कलाभिन्न ६. कलातीत ।
३१. चैतन्यशून्य मन्त्र निरर्थक होते हैं—
चैतन्यरहितं मन्त्रं यो जपेत् स च पापकृत् ।
मन्त्राश्चैतन्यसंहिताः सर्वसिद्धिकराः स्मृताः ।। (शाला० ९।१०३)
९४ स्पन्दकारिका
मन्त्र—अपने तात्त्विक स्तर पर वर्ण या अक्षर नहीं है प्रत्युत् शक्ति की नादात्मक
अभिव्यक्ति है । इसीलिए इन्हें शिवात्मक कहा गया है—‘मन्त्रावर्णात्मिका सर्वे वर्णा सर्वे
शिवात्मकाः ।’ अर्थात् समस्त मन्त्र वर्णात्मक है किन्तु मन्त्रों के अवयव वर्ण स्वयं में
शिवात्मक हैं । इस प्रकार समस्त मन्त्र भी शिवात्मक हैं ।
प्रणव रूप जो मूलमन्त्र है उसके १२ अवयव निम्नांकित हैं—
अकारश्च उकारश्च मकारो बिन्दुरेव च ।
अर्धचन्द्रो निरोधी च नादो नादान्त एव च ॥
कौण्डली व्यापिनी शक्तिः समना श्रेति सामयाः ।
निष्कलं चात्मतत्त्वं च शक्तिश्चैव तथोन्मना ॥१
मन्त्रों का मूल स्रोत (योनि) ‘ज्ञानशक्ति’ है—
ज्ञानशक्तिः परासूक्ष्मा मातृकां तां विदुर्बुधाः ।
सा योनिः सर्वमन्त्राणां सर्वत्रार णिवत्स्थिता ॥
यह ‘ज्ञानशक्ति’ मन्त्रों के अवयवभूत वर्णों का भी आत्मस्वरूप है—इसीलिए इसे
‘मातृका’ भी कहा गया है—
‘ततोऽष्टविधभेदेन पञ्चादशवर्णरूपिणी ।
(ज्ञानशक्तिः) परा सूक्ष्मा मातृका तां बिदुर्बुधाः ॥’२
परावाक् को परमेष्ठी परमशिव का परमन्त्रात्मक विमर्श स्वरूप ‘हृदय’ कहा गया
है । ‘मन्त्र’ ही उसका हृदय है । विमर्श शक्ति के अतिरिक्त अन्य कोई ‘मन्त्र’ नहीं है और
यही मन्त्र परमेष्ठी शिव का हृदय है—‘सा स्फुरत्ता महासत्ता देशकाला विशेषिणी । सैषा
सारतया प्रोक्ता हृदयं परमेष्ठिनः ॥’३
मन्त्र का यथार्थ स्वरूप है—‘अहंविमर्श’ । उच्चतम भूमिकावस्थित विमर्शमय
शब्द ‘परावाक्’ है । ‘मनु अवबोधने’ ‘तृ पालने’ धातु से मन्त्र शब्द निष्पन्न हुआ ।
‘शिवसूत्रविमर्शिनी’ (२.१) में कहा गया है कि—विचित्रवर्णों के संघट्टन मात्र को
‘मन्त्र’ नहीं कहते प्रत्युत् मन्त्र के देवता का निरन्तर विमर्श करते रहने से प्राप्त साधक
चित्त का अपने देवता के साथ जो तादात्म्यभाव है वही है ‘मन्त्र’—‘मन्त्रदेवताविमर्शपरत्वेन
प्राप्ततत्सामरस्यम् आराधकचित्तमेव मन्त्रः न तु विचित्रवर्णसंघट्टनमात्रम् (शि०सू०वि०)।
‘ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी’ (१.५.१४) में मन्त्र को विमर्शनात्मा कहा गया है—
‘मन्त्रश्च विमर्शनात्मा’ विमर्शात्मक आत्मस्फुरण परममन्त्र है और इसका स्वस्वरूप है—
‘अहं परामर्श’ । यह ‘अहंविमर्श’ शुद्धाशुद्ध द्विविध प्रकारक है । ‘शुद्ध अहं विमर्श’ ही
मन्त्र है क्योंकि मन्त्र आत्मा की चिद्रश्मि ही मन्त्र है—‘मन्त्राश्चिन्मरीचयः । विमर्श
(आत्मस्पन्दन) ही प्रत्येक भाव का हृदय है और तद्रूप है ‘मन्त्र’ ।
शब्द, मन्त्र एवं ओंकार तत्वतः अभिन्न हैं ।
१-२. नेत्रतन्त्र । ३. ईश्वरप्रत्यभिज्ञा अ० ४ ।
परिचय एवं पृष्ठभूमि ९५
समस्त मन्त्रों की मूल एवं सर्वोच्चप्रकृति ॐकार है।
अर्धमात्रादिक में जो प्रतिफलित चैतन्य है वही ‘मन्त्र’ है, प्रणव या मन्त्र के निम्न
अवयव हैं—अकार, उकार, मकार, बिन्दु, अर्धचन्द्र, निरोधिका, नाद, नादान्त, शक्ति,
व्यापिनी, समना एवं उन्मना।
समग्र विश्व की उत्पत्ति शब्द द्वारा ही हुई है एवं समस्त विश्व शब्द में ही विधृत
है। शब्दातीत परमपद का साक्षात्कार करने के लिए भी शब्द का आश्रय लेकर ही शब्द
राज्य का भेदन करना पड़ता है। सृष्टि से बाहर जाने के लिए भी शब्द ही एक मात्र
आलम्बन है। इसीलिए शब्द को पकड़कर शब्दातीत परब्रह्म पद में जाने का विधान
किया गया है।
प्रश्न—यदि ‘अहंविमर्श’ आत्मस्फुरण, ‘परावाक्’ चित् तत्त्व की मरीचि ही
‘मन्त्र’ है तब तो समस्त बैखरी वाक् भी आत्मस्फुरण, आत्मा, प्रत्यक् चैतन्य एवं
परावाक् का विकास है। फिर सारे वर्ण ही मन्त्र पद वाच्य हैं। बैखरी वाक् भी आन्तर
विमर्श का ही कार्य है अतः बैखरी के प्रत्येक वर्ण ‘मन्त्र’ हैं। समस्त वर्ण शिवरूप हैं,
परस्वरूप हैं और शक्तिस्वरूप हैं ‘सर्वे वर्णात्मका मन्त्रास्ते च शक्त्यात्मकाः प्रिये’।
मन्त्रों की आत्मभूता शक्ति होती है उसके बिना मन्त्र निरर्थक होते हैं—‘मन्त्राणां
जीवभूता तु या स्मृता शक्तिरव्यया। तया हीना वरारोहे निष्कलाः शरदभ्रवत् ।। (तं० स०,
शि० सू० २.१)।
‘स्वात्मरूपतया स्फुरणं भवति’ मन्त्र इसी आत्मस्फुरण का अपर पर्याय है।
भट्टकल्लट ‘स्पन्दकारिकावृत्ति’ में कहते हैं कि स्पन्दतत्त्व नामक आत्मबल से
तादात्म्य प्राप्त मन्त्र सर्वज्ञता आदि समस्त माहेश्वर बलों से युक्त हो जाते हैं—‘तत् बलं
निरावरणचिद्रूपमधिष्ठाय मन्त्राः सर्वज्ञत्वादिन बलेन श्लाघायुक्ताः प्रवर्तन्ते अनुग्रहादौ
स्वाधिकारे ।।’ ‘स्पन्दकारिका’ (सहज० २६) मे भी यही कहा गया है—
‘तदाक्रम्य बलं मन्त्राः सर्वज्ञबलशालिनः ।
प्रवर्तन्तेऽधिकाराय करणानीव देहिनाम् ।। २६ ।।’
ये मन्त्र शान्त (शुद्धसंवित्रूप) एवं निरञ्जन (मायिक दूषणों से रहित) होकर
आराधकों के साथ-साथ चिदाकाश में ही लीन हो जाते हैं। अतः सारे मन्त्र शिवरूप
(शिवधर्मा) हैं—
‘तत्रैव सम्प्रलीयन्ते शान्तरूपाः निरञ्जनाः ।
सहाराधकचित्तेन तेन ते शिवधर्मिणः ।।’ (२७)
मन्त्र देवता विमर्श स्वभाव हैं—‘तद्विमर्शस्वभावा हि वाच्या मन्त्रदेवता ।’ ‘महा-
संवित् सम्पन्ना’ ‘मन्त्र’ प्रमातृभूमिगत है—प्रमातृभूमिगता मन्त्राः ।। (मतंगटीका)
‘बौद्धायन संहिता’ नामक ग्रन्थ में कहा गया है कि ‘चन्द्रमा शान्त हो जाय और
सूर्य का उदय भी न हो उस समय समस्त देवताओं (इन्द्रियों) का विलय और समस्त
मन्त्रों का उदय होता है।’
९६ स्पन्दकारिका
'मालिनीविजय' में भी इसी मत की पुष्टि करते हुए कहा गया है कि 'जिस
अवस्था में जीव अन्य आधारों से विनिर्मुक्त होकर स्वस्वरूप में लीन हो जाता है वही
अवस्था मन्त्रों के उद्भव का स्थान है।' यह भी कहा गया है कि 'जब पुरुष का चित्त
धर्माधर्म के संधिस्थल में निरुद्ध हो जाता है तब वह जो कुछ भी बोलता है वही 'मन्त्र'
हो जाता है। स्वरवर्ण-मातृका से निर्मित मन्त्र ही मन्त्र नहीं होते ॥'
१. रामकण्ठाचार्य ने तो 'स्पन्दकारिका विवृत्ति' (२ नि० १०-११) में मन्त्र को
वर्ण-संनिवेश कहा है—'मन्त्रा आराध्यदेवतावाचका वर्णादिसंनिवेशः ॥'
२. रामकण्ठ पुनः कहते हैं कि—यदि साधक का चित्त मन्त्रात्मक हो जाता है तो
वर्णसंकल्प आदि स्वरूप धारण करके शिवशक्ति ही मन्त्र के रूप में उदित होती है—
'मन्त्रात्मकतया साधक चित्तात्मकतया च शिवशक्तिरेव वर्णसंकल्पादिरूपधारिणी
उदिता ॥'
क्योंकि मन्त्रचेता एवं शिव में अभेद स्थापित हो जाता है—'मन्त्रचेतसोः उदया-
स्तमदशयोः परमकारणात् शिवाद्भेदः ॥'
३. 'कुलार्णव तन्त्र' में कहा गया है कि—'तत्त्वरूप', 'तेजस्वरूप' देवता का
मनन करने से जो शक्ति समस्त भयों से मुक्त कर देती है उसे मन्त्र कहते हैं—
'मननात्तत्त्वरूपस्य देवस्यामिततेजसः ।
त्रायते सर्वभयस्तस्मान्मन्त्र इतीरितः ॥'
'यम भूतादि सर्वेभ्यो भयेभ्योऽपि कुलेश्वरि ।
त्रायते सततञ्चैव तस्मान्मन्त्र इतीरितः ॥'
४. जो मनन करने से त्राण करने वाले हैं वे 'मन्त्र' कहलाते हैं 'मननत्राणधर्माणो
मन्त्राः' ।
५. चित्तं मन्त्रः' (शिवसूत्रः ३।१) (मन्त्र का आध्यात्मिक स्वरूप)
६. संवित् तत्त्व ही मन्त्र हैं—संविद्देव्येय मन्त्रः (क्रमकेलि)। 'देव्ये मन्त्र'—
भूतिराज ।
७. चिदग्नि संहार मरीचिमन्त्रः संविद्विकल्पान् ग्लपयन्नुदेति (स्तोत्रभट्टारक)
८. वर्णात्मको न मन्त्रो दशभुजदेहो न पञ्चवदनोऽपि । संकल्पपूर्वकौटौ नादो-
ल्लासो भवेन्मन्त्रः ॥ (स्तोत्रभट्टारक)
९. 'नास्ति नादात् परो मन्त्रः' ।
१०. मन्त्रः पदार्थादयसंरम्भात्मा परामर्शः ॥' (महार्थमंजरी परिमल)
मन्त्र शक्ति एवं उसका स्वरूप—स्पन्दप्रदीपिकाकार का अभिमत—
(क) मन्त्र में चार मुख्य तत्त्व होते हैं—१. 'बीज' २. 'पिण्ड' ३. 'पद' और
४. 'नाम' ।
(ख) मन्त्र का मुख्य धर्म है—१. मनन एवं २. त्राण ।
परिचय एवं पृष्ठभूमि ९७
(ग) मन्त्र का बल है—निरावरण चित् का उल्लास अर्थात् पराशक्ति का
उल्लास। उसी शक्ति को लेकर 'मन्त्र' सहज नाद शक्ति से उद्बोधित होकर प्रदीप्त हो
उठते हैं और उनमें सर्वज्ञता आदि का बल आ जाता है। जब सिद्धमन्त्री उनका प्रयोग
करता है तब वे अनुग्रह एवं निग्रह करने में भी समर्थ हो जाते हैं। आत्मा के पर तत्त्व
का अवबोध होने के कारण मन्त्रज्ञ इच्छामात्र द्वारा मन्त्रो का यथेष्ट प्रयोग कर सकता है।
'त्रिकसार' में इसी संदर्भ में कहा गया है कि—'वर्णातीत निराकार परम तत्त्व का
अवबोध हो जाने पर 'मन्त्र' मन्त्राधियों के साथ ही मांत्रिक के किंकर हो जाते हैं।'
चिच्छक्ति के बल का संस्पर्श न होने पर वे मन्त्र केवल वर्ण मात्रा (जडअक्षर) मात्र
बनकर रह जाते हैं और कठपुतली के समान निष्फलचेष्ट रहते हैं।
(घ) 'हंस पारमेश्वर' नामक ग्रन्थ में कहा गया है कि—केवल वर्णरूपमन्त्र 'पशु-
भाव' में स्थित हैं जबकि सुषुम्नामार्ग से उच्चारित होने पर वे 'पशुपति' बन जाते हैं और
इस प्रकार मन्त्र की दो अवस्थायें है—१. 'पशु अवस्था' २. 'पशुपति अवस्था'।
(ङ) शाक्तमार्ग में ही मन्त्रों की सफलता है—मन्त्र का प्रयोग केवल शक्ति के
संदर्भ में ही करना चाहिए क्योंकि वही जप सफल होता है।
(च) 'श्रीवैहायसी' नामक ग्रन्थ में निर्देश दिया गया है कि—'सन्धिसथल में
नादोर्ध्वध्वनि द्वारा बोधित जप करना चाहिए। जिस प्रकार सूत्र में मणि पिरोये रहते हैं उसी
प्रकार शक्ति के ताने-बाने से निर्मित मन्त्राक्षरों का ही ध्यान करना चाहिए। वह शक्ति परम
व्योम में निवास करती है और परमामृत से समृद्ध है। उक्त पद्धति से जप करने पर 'मन्त्र'
अपना स्वस्वरूप उद्घाटित कर देता है और अपने ऊपर से आवरण हटा देता है।
(छ) 'श्रीकालपरा' नामक ग्रन्थ में कहा गया है कि—शब्द नादात्मक हैं अतएव
उनके साथ प्रत्यय, संवित् संलग्न रहता है और उनमें वृद्धि करता रहता है मन्त्र बोध के
स्वरूप में स्थित जो संवित् है वह मन्त्र से अभिन्न है। अतः वह आत्म बोध भी करा
देती है।
(ज) 'संकर्षण सूत्र' में कहा गया है कि—'चिद्रूपता स्वात्मैकनिष्ठ है। भाव एवं
अभाव उसकी दशाएँ एवं परिष्कार हैं। वह स्वसंवेदनसंवेद्य है। वह प्रकृति का विषय
भी है और प्रकृति से अतीत भी है यही मन्त्रों का प्रत्ययात्मक कारण है। मन्त्र बाहर एवं
भीतर वर्णरूप से प्रकट होते हैं। वे शाश्वत पदरूप मन्त्र मनुष्य के करचरणादिक के
समान हैं। वीर्य का योग होने पर प्रत्येक काल में (प्रयोग करने पर) सिद्ध होते हैं।
शुद्ध बोधात्मक रूप से अन्तर्बाह्य दोनों में उदित मन्त्र का एक बार भी 'जप' कर
लिए जाने पर वह लक्ष बार किये गए जप के समान फल वाला हो जाता है। इसीलिए
'जपसंहिता' में कहा गया है कि—जब एक ही मन्त्रनाथ अन्तर एवं बाह्य दोनों में
उदित होकर एक हो जाता है तब ऐसे जप को लक्षसंख्या से भी अधिक महनीय
समझना चाहिए।। इन समस्त भावों एवं सिद्धान्तों को स्पन्दकारिकाकार मे इस प्रकार
व्यक्त किया है— 'तदाक्रम्य बलं मन्त्राः सर्वज्ञबलशालिनः ।
प्रवर्तन्तेऽधिकाराय करणानीव देहिनः ॥'
स्पं.भू. ६
९८ स्पन्दकारिका
(झ) ये मन्त्र साधक चित्त की प्रवृत्ति-निवृत्ति के निमित्त (साधक की इच्छा होने
पर) शक्ति स्वस्वभाव में लीन हो जाते हैं क्योंकि मन्त्र स्वस्वभाव के अनुगामी एवं
शक्तिरूप हैं । 'कालपरा' नामक ग्रन्थ भी इसकी पुष्टि करता है । तदनुसार पर अक्षर
रूप विटप में अनेक शक्तियाँ विद्यमान हैं । उनके विवर्त शक्ति के रूप में वर्णों के
माध्यम से प्रकट होते हैं (वर्णों में प्रकट होते हैं) । ये शक्तियाँ कृतकृत्य होने के कारण
शान्त एवं निरञ्जन (कालुष्यरहित) हैं । मन्त्र सर्वज्ञ एवं सर्वकर्ता हैं । मन्त्र शिवधर्मी हैं ।
आचार्य कल्लट ने 'स्पन्दकारिका' में इसकी पुष्टि की है—
'तत्रैव सम्प्रलीयन्ते शान्तरूपाः निरञ्जनाः ।
सहसाधकचित्तेन तेन ते शिवधर्मिणः ॥'
(ञ) 'साधक के चित्त में मन्त्र लीन हो जाते हैं'—'तत्रैव सम्प्रलीयन्ते' कहने का
तात्पर्य यह है कि आत्मा ही शिव है । यह आत्मा सर्वमय, सर्वात्मक विश्वरूप है क्योंकि
यह बोद्धा है ।
संवित् ही मन्त्रात्मा है अतः मन्त्र शिवरूप है ।
स्पन्दप्रदीपिकाकार कहते हैं कि—१. मन्त्रों में स्पन्दात्मक बल स्वभाव से ही
अन्तर्निहित है । अशुभविकल्प—स्वात्मशक्तियों का लोप या अज्ञान । २. आत्मबल की
विस्मृति की अवस्था में मन्त्र वीर्यहीन हो जाते हैं । ३. स्वरूप की स्पन्दमयता का
निरन्तर अनुसंधान करने से ही मन्त्र शक्ति की अनुभूति होती है । ४. आन्तर अनुसंधान
में प्रगाढ़ता आने पर मन्त्रोच्चारण मात्र से अभीष्ट सिद्धियाँ प्राप्त हो जाती हैं । ५.
मन्त्रशक्ति स्वात्मस्वरूप में ही स्फुरित होती है । ६. चित्त-नैर्मल्य—आन्तर अनुसंधान की
शक्ति-प्राप्ति और निर्मल चित्त में ही स्वरूप का प्रकाश प्रतिबिम्बित । विकल्प संस्कार—
भावशुद्धि, शुद्धविद्योदय, अशुभ विकल्पों का नाश, —मन्त्रशक्ति की अनुभूति । ७.
समस्त वर्ण ही मन्त्र हैं और वे शक्त्यात्मक है—सर्वे वर्णात्मकाः मन्त्रास्ते च
शक्त्यात्मकाः प्रिये (तं०स०) ८. मन्त्रों में एक शक्ति निहित होती है । जो मन्त्र शक्ति-
रहित होते है वे निष्फल होते हैं—मन्त्राणां जीवभूता तु या स्मृता शक्तिरव्यया । तया
हीना वरारोहे निष्फलाः शरदभ्रवत् ॥ ९. शक्ति मन्त्रवीर्यस्फार है—'शक्तिः
मन्त्रवीर्यस्फाररूपा' (शिवसूत्र) मन्त्रशक्ति स्वात्मरूप में ही स्फुरित होती है । 'मन्त्र'—
आत्मस्फुरण के अतिरिक्त अन्य कुछ नहीं है । आत्मस्पन्दन ही मन्त्र भी है । आत्मस्पन्दन
या 'विमर्श' प्रत्येक भाव की आत्मा (हृदय) है—'हृदयं च नाम प्रतिष्ठा स्थानमुच्यते,
तच्च उक्तनीत्या जडानां चेतनम्' तस्यापि प्रकाशात्मकम्, तस्यापि विमर्शशक्तिः इति
विश्वस्य परमे पदे तिष्ठतो विश्रान्तस्य इदमेव हृदयं विमर्शरूपं परमन्त्रात्मकं यत्र यत्र
अभिधीयते (ई०प्र०वि०) ।
स्पन्दकारिका
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॥ श्रीः ॥
ग्रन्थ खण्ड
स्पन्दकारिका
[१] स्पन्दकारिका का अध्यायीकरण
[२] सूत्रों की अनुक्रमणिका
[३] विशेष ध्यातव्य
[४] प्रथम निष्यन्द—'स्वरूपस्पन्दनिष्यन्द'
[५] द्वितीय निष्यन्द—'सहजविद्योदयनिष्यन्द'
[६] तृतीय निष्यन्द—'विभूतिस्पन्दनिष्यन्द'
[१] स्पन्दकारिका का अध्यायीकरण
१) आचार्य क्षेमराज के अनुसार 'स्पन्दनिर्णय' में—
(क) प्रथम निष्यन्द : २५ कारिकायें : स्वरूपस्पन्द
(ख) द्वितीय निष्यन्द : ७ कारिकायें : सहजविद्योदयस्पन्द
(ग) तृतीय निष्यन्द : १९ कारिकायें : विभूतिस्पन्द
(घ) चतुर्थ निष्यन्द : १ कारिका : अगाध... गुरुभारतीम् (१का०)
२) आचार्य रामकण्ठ के अनुसार 'स्पन्दकारिकाविवृति' में—
(क) प्रथम निष्यन्द : १६ कारिकायें : व्यतिरेकोपपत्तिनिर्देशनिष्यन्द
(ख) द्वितीय निष्यन्द : ११ कारिकायें : व्यतिरिक्तस्वभावोपलब्धिनिष्यन्द
(ग) तृतीय निष्यन्द : ३ कारिकायें : विश्वस्वभावशक्त्युपपत्तिनिष्यन्द
(घ) चतुर्थ निष्यन्द : २१ कारिकायें : अभेदोपलब्धिनिष्यन्द
(ङ) अन्त में : १ कारिका : अगाध ... गुरुभारतीम् ॥
३) आचार्य उत्पलदेव के अनुसार 'स्पन्दप्रदीपिका' में—
कारिकाओं का वर्गीकरण करके कारिकाओं को प्रस्तुत नहीं किया गया ।
४) आचार्य वसुगुप्त के अनुसार 'शिवसूत्र' में—
(क) प्रथम अध्याय : 'शांभवोपाय' : (साधना-पद्धति) ॥
(ख) द्वितीय अध्याय : 'शाक्तोपाय' : (साधना-पद्धति) ॥
(ग) तृतीय अध्याय : 'आणवोपाय' : (साधना-पद्धति) ॥
५) आचार्य भट्टकल्लट के अनुसार 'स्पन्दकारिकावृत्ति' में—
(क) प्रथम निष्यन्द : 'स्वरूपस्पन्द' : १-२५ कारिकायें : २५ का०
(ख) द्वितीय निष्यन्द : 'सहजविद्योदय' : २६-३२ कारिकायें : ६ का०
(ग) तृतीय निष्यन्द : 'विभूतिस्पन्द' : ३३-५२ कारिकायें : २० का०
(प्रस्तुत ग्रन्थ में आचार्य भट्टकल्लट की 'स्पन्दकारिकावृत्ति' के द्वारा प्रस्तुत
अध्यायीकरण को ही स्वीकार किया गया है ।)
[२] सूत्रों की अनुक्रमणिका
संख्या सूत्रार्थ
१. अगाधसंशयाम्भोधि समुत्तरणतारिणीम् ॥
२. अतस्तत्कृत्रिमं ज्ञेयं सौषुप्तपदवत्सदा ॥
३. अतिक्रुद्धः प्रहृष्टो वा किं करोमीति वा मृशन् ॥
४. अतो बिन्दुरतो नादोरूपमस्मादतो रसः ॥
५. अतः सततमुद्युक्तः स्पन्दतत्त्वविविक्तये ॥
६. अनेनाधिष्ठिते देहे यथा सर्वज्ञतादयः ॥
७. अन्यथा तु स्वतन्त्रा स्यात्सृष्टिस्तद्धर्मकत्वतः ॥
८. अप्रबुद्धधियस्त्वेते स्वस्थितिस्थगनोद्यताः ॥
९. अयमेवोदयस्तस्य ध्येयस्य ध्यायिचेतसि ॥
१०. अवस्थायुगलञ्चात्र कार्यकर्तृत्वशब्दितम् ॥
११. अहं सुखी च दुःखी च रक्तश्चेत्यादि संविदः ॥
१२. इति वा यस्य संवित्तिः क्रीडात्वेनाखिलं जगत् ॥
१३. इयमेवाप्राप्तिरयमेवात्मनो ग्रहः ।
१४. एक चिन्ता प्रसक्तस्य यतः स्यादपरोदयः ॥
१५. कार्योन्मुखः प्रयत्नो यः केवलं सोऽत्र लुप्यते ॥
१६. गुणादिस्पन्दनिष्यन्दाः सामान्यस्पन्द संश्रयात् ॥
१७. ग्लानिर्विलुम्पिका देहे तस्याश्चाज्ञानतः सृतिः ॥
१८. जाग्रदादि विभेदे तदभिन्ने प्रसर्पति ।
१९. तत्रैव संप्रलीयन्ते शान्तरूपा निरंजनाः ॥
२०. तथा यत्परमार्थेन यदा यत्र यथास्थितम् ॥
२१. तथा स्वप्नेऽप्यभीष्टार्थान् प्रणयस्यानतिक्रमात् ॥
२२. तदाक्रम्य बलं मन्त्राः सर्वज्ञबलशालिनः ॥
२३. तदा तस्मिन्महाव्योम्नि प्रलीनशशिभास्करे ॥
२४. तदास्याकृत्रिमो धर्मो ज्ञत्वकर्तृत्वलक्षणः ।
२५. तन्मात्रोदयरूपेण मनोऽहंबुद्धिवर्तिना ॥
२६. तमधिष्ठातृभावेन स्वभावमवलोकयन् ॥
२७. तस्योपलब्धिः सततं त्रिपदाव्यभिचारिणी ॥
२८. तामाश्रित्योर्ध्वमार्गेण सोमसूर्यावुभावपि ॥
४ स्पन्दकारिका
२९. तेन शब्दार्थचिन्तासु न सावस्था न यः शिवः ॥
३०. दिदृक्षयेव सर्वार्थान् यदा व्याप्यावतिष्ठते ॥
३१. दुर्बलोऽपि तदाक्रम्य यतः कार्ये प्रवर्तते ।
३२. न तु योऽन्तर्मुखो भावः सर्वज्ञत्वगुणास्पन्दम् ॥
३३. न दुःखं न सुखं यत्र न ग्राह्यो ग्राहको न च ॥
३४. न हीच्छादनोदनस्यायं प्रेरकत्वेन वर्तते ॥
३५. नाभावो भाव्यतामेति न च तत्रास्त्यमूढता ॥
३६. निजाशुद्ध्यासामर्थ्यस्य कर्तव्येष्वभिलाषिणः ॥
३७. परामृतरसापायस्तस्य यः प्रत्ययोद्भवः ॥
३८. प्रबुद्धः सर्वदा तिष्ठेत् ज्ञानेनालोच्य गोचरम् ॥
३९. भुंक्ते परवशो भोगं तद्भावात्संसरत्यतः ॥
४०. यत्र स्थितमिदं सर्वं कार्यं यस्माच्च निर्गतम् ॥
४१. यतः करणवर्गोऽयं विमूढोऽमूढवत् स्वयम् ॥
४२. यथा ह्यर्थोऽस्फुटो दृष्टः सावधानेऽपि चेतसि ॥
४३. यथेच्छाभ्यर्थितो धाता जाग्रतोऽर्थान् हृदि स्थितान् ॥
४४. यदा त्वेकत्र संरूढस्तदा तस्य लयोद्भवौ ॥
४५. यस्मात्सर्वमयो जीवः सर्वभावसमुद्भवात् ॥
४६. यस्योन्मेषनिमेषाभ्यां जगतः प्रलयोदयौ ॥
४७. यामवस्थां समालम्ब्य यदयं मम वक्ष्यति ॥
४८. लभते तत्प्रयत्नेन परीक्ष्यं तत्त्वमादरात् ॥
४९. शब्दराशिसमुत्थस्य शक्तिवर्गस्य भोग्यताम् ॥
५०. स्वरूपावरणे चास्य शक्तयः सततोत्थिताः ॥
५१. सेयं क्रियात्मिका शक्तिः शिवस्य पशुवर्तिनी ॥
५२. ज्ञानज्ञेयस्वरूपिण्या शक्त्या परमया युतः ॥
[३] विशेष ध्यातव्य
कतिपय ऐसी स्पन्दकारिकायें भी हैं जो कि भट्टकल्लट के 'स्पन्दसर्वस्व' में तो
नहीं हैं किन्तु अन्य ग्रन्थों में हैं; यथा—
| कारिका | वह ग्रन्थ जिसमें यह कारिका उद्धृत की गई है— |
|---|---|
| १. 'लब्ध्वाप्यलभ्यमेतज्ज्ञानधनं, हृद्गुहान्तकृतनिहितेः ।<br>वसुगुप्तवच्छिवाय हि, भवति सदा सर्वलोकस्य ॥'<br>— 'स्वोपज्ञपरिमल' में उद्धृत ॥ | 'महार्थमंजरी' की 'स्वोपज्ञ<br>'परिमल' टीका श्लोक<br>क्रमाङ्क १ |
| २. वसुगुप्तादवाप्येदं गुरोस्तत्त्वार्थदर्शिनः ।<br>रहस्यं श्लोकयामास सम्यक् श्रीभट्टकल्लटः ॥<br>— 'स्पन्दप्रदीपिका' (का० ५३)<br>(यह कारिका 'स्पन्दकारिकाविवृति' में नहीं है ।)<br>उपर्युक्त कारिका (क्र० २) उत्पलाचार्य की टीका<br>'स्पन्दप्रदीपिका' में है, तो उनके परवर्ती ग्रन्थकार<br>रामकण्ठाचार्य की 'स्पन्दकारिकाविवृति' में भी होनी<br>चाहिए थी किन्तु वहाँ उल्लिखित नहीं है । | 'स्पन्दप्रदीपिका' में तो है<br>किन्तु 'स्पन्दसर्वस्व'<br>(कल्लट की टीका) में नहीं<br>है । 'स्पन्दसर्वस्व' में मात्र<br>५२ कारिकायें हैं । |
| ३. अन्तिम कारिका (विभिन्न टीकाओं में)—<br>(क) 'अगाधसंशयाम्भोधि समुत्तरणतारिणीम् ॥'<br>— 'स्पन्दसर्वस्व' (५२)<br>— 'स्पन्दकारिकाविवृति (५२)<br>(ख) 'वसुगुप्तादवाप्येदं गुरोस्तत्त्वार्थदर्शिनः'<br>— 'स्पन्दप्रदीपिका' (५३) | |
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