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श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)

Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary

गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा

DevanagariHindipublished195 पृष्ठ

१००) (श्री भक्तमाल
श्रीमधु गोसाँईजी
श्रीमधुगोसाँई आये वृन्दावन चाह बढ़ी, देखें इन नैननि सौं कैसो धौं सरूप है।
ढूँढ़त-फिरत वन-वन कुजलता द्रुम, मिटी भूख-प्यास नहीं जानैं छाँह धूप है।।
जमुना चढ़त काट करत करारे जहाँ, वंसीवट तट डीठ परे वे अनूप है।
अँक भरि लिये दौर अजहूँ लौं सिरमौर, चाहै भाग भाल साथ गोपीनाथ रूप है।। ३८०।।
श्रीकृष्णदासजी ब्रह्मचारी
गुसाँईं श्रीसनातन जू मदनमोहन रूप, माथैं पधराये कही 'सेवा नीके कीजियै'।
जानौं कृष्णदास ब्रह्मचारी अधिकारी भये, भट्ट श्रीनारायण जू शिष्य किये रीझियै।।
करिकै सिंगार चारु आप ही निहारि रहैं, गहैं नहीं चेत भाव माँझ मति भीजियै।
कहाँ लौं बखान करौं राग भोग रीति भाँति, अबलौं विराजमान देखि-देखि जीजियै।। ३८१।।
श्रीकृष्णदासजी पण्डित
श्रीगोविन्दचन्द रूपरासि रसरासि दास, कृष्णदास पण्डित ये दूसरे यों जानि लै।
सेवा अनुराग अंग-अंग मति पागि रही, पागि रही मति जोपै तोपै यह मानि लै।।
प्रीति हरिदासन सौं विविध प्रसाद देत, हिये लाय लेत देखि पद्धति प्रमानि लै।
सहज की रीति में प्रतीति सो विनीत करें, ढरै वाही ओर मन अनुभव आनि लै।। ३८२।।
श्रीभूगर्भ गोसाँईजी
गुसाँईं भूगर्भ वृन्दावन दृढ़ वास कियौ, लियौ सुख बैठि कुंज गोविन्द अनूप हैं।
बड़ेई विरक्त अनुरक्त रूपमाधुरी में, ताही को सवाद लेत मिले भक्तभूप हैं।।
मानसी विचार ही अहार सौं निहारि रहैं, गहैं मनवृत्ति वेई युगल सरूप हैं।
बुद्धि के प्रमान उनमान में बखान कर्यो, भर्यौ बहुरंग जाहि जानै रसरूप हैं।। ३८३।।
श्री रसिकमुरारिजी
(श्री) रसिकमुरारि उदार अति मत्त गजहिं उपदेश दियौ।।
तन मन धन परिवार सहित सेवत सन्तन कहँ।
दिव्य भोग आरती अधिक हरिहूँ ते हिय महँ।।
श्रीवृन्दावनचन्द स्याम - स्यामा रँग भीने।
मगन प्रेम पीयूष पयध परचै बहु दीने।।

श्री रसिकमुरारि जी) (१०१
श्रीहरिप्रिय श्यामानन्दवर भजन भूमि उद्धार कियौ।
(श्री) रसिकमुरारि उदार अति मत्त गजहिं उपदेश दियौ।। ६५।।
रसिकमुरारि साधुसेवा विसतार कियो, पावै कौन पार, रीति भाँति कछु न्यारियै।
सन्त चरनामृत के माट गृह भरे रहें, ताही कौ प्रनाम पूजा, करि उर धारियै।।
आवैं हरिदास, तिन्हें देत सुखरासि, जीभ एक न प्रकासि सकै, थकै सो विचारियै।
करैं गुरु उत्सव लै, दिन मान सबै कोऊ द्वादस दिवस जन घटा लागी प्यारियै।। ३८४।।
सन्त चरनामृत कौं ल्यावो जाय नीकी भाँति, जीय की भाँति जानिवे को दास लै पठायौ है।
आनिकै बखान कियौ, लियो सब साधुन कौ, पान करि बोले, सो सवाद नहीं आयौ है।।
जिते सभाजन कही, चाखौ देहु मन कोऊ महिमा न जानै कन जानी छोड़ि आयौ है।
पूछी कही कोढ़ी एक रह्यौ, आनो, ल्यायो, पीयो, दियो सुख पाय नैन नीर ढरकायौ है।। ३८५।।
नृपति समाज में विराजमान भक्तराज, कहैं वे विवेक कोऊ कहनि प्रभाव है।
तहाँ एक ठौर, साधु भोजन करत रौर, देवो दूजी सोंटा संग, कैसे आवै भाव है।।
पातरि उठाय श्रीगुसाँई पर डारि दई, दई गारी सुनी आप, बोले देखो दाव है।
सीथ सौं विमुख मैं तो, आनि मुख मध्य दियो, कियो दास दूर, सन्तसेवा में न चाव है।। ३८६।।
बाग में समाज सन्त, चले आप देखिवें को, देखत दुरायौ जन हुक्का सोच पर्यो है।
बड़ौ अपराध मानि, साधु सनमान चाहें, घूमितन बैठि कही देखौ कहूँ धर्यो है।।
जायकै सुनाई दास, काहू के तमाखू पास, सुनिकै हुलास बढ़्यौ, आगैं आनि कर्यो है।
झूठे ही उसांस भरि, साँचे प्रेम पाय लिये, किये मनभाये ऐसे, शंका दुख हर्यो है।। ३८७।।
उपजत अन्न गाँव, आवै साधुसेवा ठांव, नयौ नृप दुष्ट, आय कांव-कांव कियौ है।
ग्राम सो जबत कर्यो, कर्यो लै विचार आप, स्यामानन्द जू मुरारि पत्र लिखि दियौ है।
जाही भाँति होहु, ताही भाँति उठि आवौ इहाँ, आये हाथ बाँधि करि अँचैहू न लियौ है।
पाछे साष्टांग करी, करी लै निवेदन सो भोजन में कही चलि आयो भीज्यौ हियौ है।। ३८८।।
आज्ञा पाय अँचयौ लै, दै पठाये वाही ठौर, दुष्ट सिरमौर जहाँ, तहाँ आप आये हैं।
मिले मुतसद्दी शिष्य, आइकै सुनाई बात, जावौ उठि प्रात, यह नीच जैसे गाये हैं।।
हमही पठावैं, काम करि समझावैं सब, मन में न आवै, जानी नेह डर पाये है।
चिन्ता जिनि करौ, हिये धरौ निहचिन्तताई, भूप सुधि आई, दिना तीन कहाँ छाये है।। ३८६।।

सुनी आये गुरुवर, कही ल्यावो मेरे घर, देखें करामात, बात यह लै सुनाई है।
कह्यौ आनि अभूँ जावौ चलौ उनमान देखें, चले सुख मानि आयौ हाथी धूम छाई है।
छोड़िकै कहार भाजि गये न निहारि सके, आप रससार वानी बोले, जैसी गाई है।
बोलौ हरे कृष्ण-कृष्ण, छाड़ौ गज तम तन, सनि गयौ हिये भाव, देह सो नवाई है॥३६०॥
बहै दृह नीर, देखि ह्वै गयौ अधीर, आप कृपा करि शिष्य कियौ, दियौ भक्तिभाव है।
कान में सुनायौ नाम, नाम दै गुपालदास, माल पहिराई गरें, प्रगट्यौ प्रभाव है॥
दुष्ट सिरमौर भूप, लखि उहिं ठौर आयौ, पाँय लपटायौ, भयौ हिये अति चाव है।
निपट अधीन, गाँव केतिक नवीन दिये, लिये कर जोरि, मेरौ फल्यो भाग दाव है॥३६१॥
भयौ गजराज, भक्तराज साधुसेवा साज, सन्तनि समाज देखि, करत प्रनाम है।
आनि डारै गोनि, बनजारनि की बारन सौं, आयेई पुकारन वे जहाँ, गुरू धाम है॥
आवत महोच्छौ मध्य, पावत प्रसाद सीथ, बोले आप हाथी सौं यों, निंद्य वह काम है।
छोड़ि दई रीति तब, भक्तन सौं प्रीति बढ़ी, संग ही समूह फिरै, फैलि गयो नाम है॥३६२॥
सन्त सत पाँच, सात, संग जित जात तित, लोग उठि धावैं, ल्यावैं सीधे बहु भीर है।
चहुँदिसि परी हई सूबा सुनि चाह भई हाथ पै न आवत सो आनै कोऊ धीर है॥
साधु एक गयौ, गही लयौ भेष दास तन, मन में प्रसाद, नेम पीवै नहीं नीर है।
बीते दिन तीन चारि, जल लै पियावैं धारि, गंगा जू निहारि मधि, तज्यौ यों सरीर है॥३६३॥
सप्ताह परायण चौथा विश्राम
मास परायण सत्रहवाँ विश्राम
भव प्रवाह निस्तार हित अवलम्बन ये जन भये॥
सोझा सींवा अधार धीर हरिनाभ त्रिलोचन।
आसाधर घौराजनीर सधना दुखमोचन॥
काशीश्वर अवधूत कृष्ण किंकर कटहरिया।
सोभू ऊदाराम नाम डूँगर व्रत धरिया॥
पदम पदारथ रामदास विमलानन्द अमृतश्रये।
भव प्रवाह निस्तार हित अवलम्बन ये जन भये॥ ६६॥
श्रीसदन (सधनजी)
सदना कसाई, ताकी नीकी कस आई, जैसे बाराबानी सोने की, कसौटी कस आई है।
जीव को न बध करैं, ऐपै कुलाचार ढरै, बेंचै मांस लाय, प्रीति हरि सौं लगाई है॥

श्रीकलिकल्पवृक्ष भक्त) (१०३
गण्डकी कौ सुत, बिन जाने तासो तौल्यौ करै, भरै दृग साधु, आनि पूजे पै न भाई है।
कही निसि सपने में, वाही ठौर मोकौं देवौ, सुनौं गुनगान रीझौ, हिय की सचाई है।। ३६४।।
लैके आयौ साधु, मैं तौ बड़ौ अपराध कियौ, कियौ अभिषेक सेवा करी पै न भाई है।
ए तौ प्रभु रीझे तोपै, जोई चाहौ सोई करौ, गरो भरि आयौ, सुनि मति बिसराई है।।
वेई हरि उर धारि, डारि दियौ कुलाचार, चले जगन्नाथदेव, चाह उपजाई है।
मिल्यौ एक, संग-संग जात वे सुगात सब, तब आप दूर-दूर रहैं जानि पाई है।। ३६५।।
आयौ मग गाँव, भिक्षा लेन इक ठांव गयौ, नयो रूप देखि, कोऊ तिया रीझि परी है।
बैठौ याही ठौर, करौ भोजन निहोरि कह्यौ, रह्यौ निसि सोय, आई मेरी मति हरी है।।
लेवो मोकौं संग, गरौ काटौ तौ न होय रंग, बूझी और काटी पति ग्रीव, पै न डरी है।
कही अब पागो मोसौँ, नातौ कौन तोसौँ मोसौँ शोर करि उठी इन मार्यौ भीर करी है।। ३६६।।
हाकिम पकरि पूछे, कहै हँसि मार्यौ हम, डार्यौ सोच भारी, कही हाथ काटि डारियै।
कट्यौ कर, चले हरि रंग माँझ झिले मानी जानी कछु चूक मेरी यहै उर धारियै।।
जगन्नाथदेव आगे, पालकी पठाई लेन, सधना सो भक्त कहाँ? चढैं न विचारियै।
चढ़ि आये प्रभु पास, सपनो सो मिट्यो त्रास, बोले दै कसौटी हूँ पै भक्ति बिसतारियै।। ३६७।।
श्रीकाशीश्वर गोसाँईजी
श्रीगुसाँई काशीश्वर, आगे अवधूत वर, करि प्रीति नीलाचल, रहे लाग्यो नीको है।
महाप्रभु श्रीकृष्णचैतन्य जू की आज्ञा पाय, आये वृन्दावन, देखि भायौ भयौ हीको है।।
सेवा अधिकार पायौ, रसिक गोविन्दचन्द, चाहत मुखारविन्द, जीवनि जो जीको है।
नित ही लड़ायैं, भवसागर बुड़ायैं, कौन पारावार पावै, सुनैं लागैं, जग फीको है।। ३६८।।
श्रीकलिकल्पवृक्ष भक्तजी
करुना छाया भक्तिफल ए कलिजुग पादप रचे।।
जतीरामरावल्लि श्यामखोज़ी सन्त सीहा।
दलहा पद्म मनोरथ राँका घौगू जपजीहा।।
जाड़ा चाचागुरू सवाई चाँदा नापा।
पुरूषोत्तम सौँ साँच चतुर कीता (मनकौ) जिहि मेट्यौ आपा।।

मति सुन्दर, धीधांग श्रम, संसार चाल नाहिन नचे।
करुना छाया, भक्तिफल, ए कलियुग पादप रचे ॥६७॥

श्रीखोजीजी
खोजी जू के गुरु, हरि भावना प्रवीन महा, देह अन्त समैं, बाँधि घण्टा सो प्रमानियै।
पावै प्रभु जब तब बाजि उठै जानौ यही, पाये पै न बाजी, बड़ी चिन्ता मन आनियै॥
तन त्याग बेर नहीं हुते फेरि पाछे आये, वाही ठौर पौढ़ि देख्यौ, आम पक्यौ मानियै।
तोरि ताके टूक किये, छोटौ एक जन्तु मध्य, गयौ सो विलाय बाजि उठो जग जानियै॥३६६॥

शिष्य की तौ जोग्यताई, नीके मन आई, अजू, गुरू की प्रबल ऐपै नेकु घटी क्यों भई।
सुनौ याकी बात, मन बातवत गति कही, सही लै दिखाई, और कथा अति रसमई॥
वेतौ प्रभु पाय चुके, प्रथम, प्रसिद्ध पाछे, आछो फल देखि, हरि जोग उपजी₁ नई।
इच्छा सो सफल स्याम भक्तवश करी, वही रही पूरपच्छ सब विथा उर की गई॥४००॥

श्रीराँकाजी, श्रीबाँकाजी
राँका पति बाँका तिया, बसैं पुर पण्ढर में, उर में न चाह, नेकु रीति कछु न्यारियै।
लकरीन बीनि करि, जीविका नवीन करैं, धरैं हरिरूप हिये, ताही सौं जियारियै॥
विनती करत, नामदेव श्रीकृष्णदेव जू सौं, कीजै दुख दूर, कही मेरी मति हारियै।
चलौ लै दिखाऊँ तब, तेरे मन भाऊँ रहे, वन छिपि दोऊ, थैली मग माँझ डारियै॥४०१॥

आये दोऊ तिया पति, पाछे बधू आगे स्वामी, औचक ही मन माँझ, सम्पति निहारियै।
जानी यों जुवति जाति, कभूँ मन चलि जात, याते वेगि सम्भ्रम सौं, धूरि वापै डारियै॥
पूछी अजू ! कहा कियौ भूमि में निहूरि तुम? कही वही बात, बोली धनहूँ विचारियै।
कहै मोसौँ राँका, ऐपै बाँका आज देखी तुही, सुनि प्रभु बोले, बात साँची है हमारियै॥४०२॥

नामदेव हारे, हरिदेव कही और बात, जोपै दाह गात, चलौ लकरी सकेरियै।
आये दोउ बीनिवे को, देखी इकठौरी ढेरी, द्वैहूँ मिली पावैं, तऊ हाथ नाहिं छेरियै॥
तबतौ प्रगट श्याम, ल्याये यों लिवाय घर, देखि मूँड फोरौ कह्यौ, ऐसे प्रभु फेरियै।
विनती करत, कर जोरि अंग पटधारौ भारौ, बोझ पर्यो लियौ चीर मात्र हेरियै॥४०३॥

कलि में कामधेनु भक्तजी
पर अर्थ परायन भक्त ये, कामधेनु कलियुग्ग के॥

लक्ष्मण लफरा लड्डू सन्त जोधपुर त्यागी।
सूरज कुम्भनदास, विमानी खेम विरागी॥
भावन विरही भरत, नफर हरिकेश लटेरा॥
हरिदास अयोध्या चक्रपानि, (दियो) सरजू तट डेरा॥
तिरलोक पुखरदी बिज्जुली, उद्धव वनचर वंस के।
पर अर्थ परायन भक्त ये, कामधेनु कलियुग्ग के॥६८॥

श्रीलड्डू भक्तजी

लड्डू नाम भक्त जाय, निकसे विमुख देस, लेशहूँ न सन्तभाव, जानैं पाप पागे हैं।
देवी कौं प्रसन्न करें, मानुस को मारि धरैं, लै गये पकरि तहाँ, मारिवे कौं लागे हैं॥
प्रतिमा कौं फारि बिकरार रूप धारि आई, लैकै तरवार, मूँड़ काटे भीजे बागे हैं।
आगे नृत्य करैं, दृग भरैं, साधु पाँव धरैं, ऐसे रखवारे जानि, जन अनुरागे हैं॥४०४॥

श्रीसन्तजी

सदा साधुसेवा अनुराग रंग पागि रह्यौ, गह्यौ नेम भिक्षा व्रत, गाँव-गाँव जायकै।
आये घर सन्त पूछैं, तिया सौं यों, सन्त कहाँ? सन्त चूल्हे माँझ, कही ऐसे अलसायकै॥
वानी सुनि जानी चले मग सुखदानी मिले, कही कित हुते? सो बखानी उर आयकै।
बोली वह साँच, वही आँच ही कौ ध्यान मेरे, आनि गृह फेरि किये मगन जिंवायकै॥४०५॥

श्रीतिलोकजी सुनार

पूरब में ओक, सो तिलोक हो सुनार जाति, पायौ भक्तिसार साधुसेवा उर धारियै।
भूप के विवाह, सुता जोरो एक जेहरि कौं, गढ़िवे को दियौ, कह्यौ नीके कै, सँवारियै॥
आवत अनन्त सन्त, औसर न पावैं किहूँ, रहे दिन दोय, भूप रोष यों सँभारियै।
ल्यावो रे पकरि, ल्याये, छाड़ियै मकर कही नेकु, रह्यौ काम आवै, नातो मारि डारियै॥४०६॥

आयौ वही दिन, कर छुयौहूँ न इन नृप, करै प्रान बिन, वन माँझ छिप्यौ जायकै।
आये नर चारि पाँच, जानी प्रभु आँच, गढ़ि लियौ सो दिखायौ, साँच चले भक्त भायकै।
भूप कौ सलाम कियौ, जेहरि कौ जोरौ दियौ, लियो कर देखि, नैन छोड़ैं न अघायकै।
भई रीझि भारी, सब चूक मेटि डारी, धन पायौ लै मुरारी, ऐसे बैठे घर आयकै॥४०७॥

१०६) (श्री भक्तमाल
भोर ही महोच्छौ कियौ, जोई माँगै सोई दियौ, नाना पकवान रस खान स्वाद लागे हैं।
सन्त कौ सरूप धरि, लै प्रसाद गोद भरि, गये तहाँ पावै जू तिलोक गृह पागे हैं।।
कौन सो तिलोक? अरे दूसरो तिलोक मैं न, बैन सुनि चैन भयौ, आये निसि रागे हैं।
चहल-पहल धन, भर्यौ, घर देखि ठर्यो, प्रभु, पदकंज जानी, मेरे भाग जागे है।।४०८।।
अभिलाषपूरक भक्तजी
अभिलाष अधिक पूरन करन ये चिन्तामणि चतुरदास।।
सोम भीम सोमनाथ विको विशाखा लमध्याना।
महदा मुकुन्द गयेश त्रिविक्रम रघु जग जाना।।
बालमीकि वृद्धव्यास जगन झाँझू बीठल आचारज।
हरभूलाला हरिदास बाहुबल राघव आरज।।
लाखा छीतर उद्धव कपूर घाटम घोरी कियौ प्रकास।
अभिलाष अधिक पूरन करन ये चिन्तामणि चतुरदास।।६६।।
दिग्गज भक्तजी
भक्तपाल दिग्गज भगत, ए थानापति सूर धीर।।
देवानन्द नरहरियानन्द, मुकुन्द महीपति सन्तराम तम्बोली।
खेम श्रीरंग नन्द विष्णु बीदा बाजूसुत जोरी।।
छीतम द्वारकादास माधव मांडन रूपा दामोदर।
भल नरहरि भगवान बालकान्हर केशव सोहैं घर।।
दास प्रयाग लोहंग गुपाल नासूसुत गृह भक्तभीर।
भक्तपाल दिग्गज भगत, ए थानापति सूर धीर।। १००।।
श्रीहरिभजन परायण भक्तजी
बद्रीनाथ उड़ीसे द्वारका, सेवक सब हरिभजन पर।।
केसौ पुनि हरिनाथ, भीम खेता गोविन्द ब्रह्मचारी।
बालकृष्ण बड़भरथ, अच्युत अपया व्रत धारी।।

श्रीगोविन्दस्वामीजी) (१०७
पण्डा गोपीनाथ, मुकुन्दा, गजपति महाजस।
गुननिधि जस गोपाल, देइ भक्तनि कौ सरबस॥
श्रीअंग सदा सानिधि रहें, कृत पुण्यपुंज भल भाग भर।
बद्रीनाथ उड़ीसे द्वारका, सेवक सब हरिभजन पर ॥१०१॥
श्रीरुद्रप्रताप गजपतिजी
श्रीप्रतापरुद्र, गजपति कौ बखान कियौ, लियौ भक्तिभाव, महाप्रभु पै न देखहीं।
कियेहूँ उपाय कोटि, ओटि लै संन्यास लियौ, हियौ अकुलायौ, अहो! किहूँ मोको पेखहीं॥
जगन्नाथ रथ आगे, नृत्य करैं मत्त भये, नीलाचल नृप पाँय पर्यौ भाग लेखहीं।
छाती सौं लगायौ, प्रेमसागर बुड़ायौ भयौ, अति मन भायौ, दुख देत ये निमेखहीं॥४०६॥
श्रीहरिसुयश प्रचारक भक्तजी
हरि सुजस प्रचुर कर जगत् में, ये कविजन अतिसय उदार॥
विद्यापति ब्रह्मदास, बहोरन चतुरविहारी।
गोविन्द गंगा रामलाल बरसानियाँ मंगलकारी॥
प्रियदयाल परसराम, भक्त भाई खाटी कौ।
नन्दसुवन की छाप, कवित केशव कौ नीकौ॥
आसकरन पूरन नृपति, भीषम जनदयाल गुन नहिन पार।
हरि सुजस प्रचुर कर जगत् में, ये कविजन अतिसय उदार। १०२।
श्रीगोविन्दस्वामीजी
गोवर्द्धननाथ साथ, खेलैं सदा झेलैं रंग, अंग सख्यभाव, हिये गोविन्द सुनाम है।
स्वामी करि ख्यात, ताकी बात सुनि लीजै नीके, सुने सरसात नैन, रीति अभिराम है॥
खेलत हो लाल संग, गयौ उठि दाँव लैके, मारी खैंचि गिल्ली, देखि मन्दिर में स्याम है।
मानि अपराध साधु, धक्का दै निकारि दियो, मति सो अगाध कैसे, जानै वह बाम है॥४१०॥
बैठ्यौ कुण्ड तीर जाय, निकसैगो आय वन, दिये हैं लगाय, ताको फल भुगताइयै।
लाल हिय सोच पर्यौ, कैसे भयौ जात वह, अऱ्यौ मग माँझ, भोग धर्यौ पै न खाइयै।
कही श्रीगुसाँई जू सौं, मोकौं ये न भायो कछू, चाहौ जो खवावौ तौपै, वाकौं जा मनाइये।
वाको हुतो दाँव, मोपै सो तौ भाव जान्यौ नहीं, कहै मोसौँ बातै सो कुमारै वेगि ल्याइये॥४११॥

१०८) (श्री भक्तमाल
वन-वन खेले बिन, बनत न मोकौं नेकु, भनत जु गारी, अनगनत लगावैगो।
सुधि-बुधि मेरी गई, भई बड़ी चिन्ता मोहिं, ल्याइये जू ढूँढ़ि, कहूँ चैन ढिंग आवैगो।।
भोग जे लगाये मैं तौ, तनक न पाये रिस, वाकी जब जाय, तब मोहिं कछु भावैगो।
चले उठि धाय, नीठ-नीठ कैं मनाय ल्याये, मन्दिर में खाय मिलि, कही गरें लावैगो।।४१२।।
गये हैं बहिर भूमि, तहाँ कृष्ण आये झूमि, करी बड़ी धूम, आक बोड़िन सौं मारिकै।
इनहूँ निहारि, उठि मार दई वाही सौं जु, कौतुक अपार, सख्यभाव रससारकै।।
माता मग चाहै बड़ी, बेर भई आई तहाँ, कहाँ बार लाई ओट, पाई उर धारिकै।
आयौ यों विचार, अनुसार सदाचार कियौ, लियौ प्रेम गाढ़ कभूँ, करत सँभारिकै।।४१३।।
आवत हो भोग, महासुन्दर मन्दिर कौं, रह्यौ मग बैठि, कही आगै मोहिं दीजिये।
भयौ कोप भारी, थार डारि जा पुकार करी, भरी न अनीति जात, सेवा यह लीजिये।
बोलिकै सुनाई अहो, कहा मनभाई? तब, बोलिकै बताई, अजू बात कान किजिये।
पहिले जु खाय, वन माँझ उठि जाय पाछे, पाऊँ कहाँ धाय, सुनि मति रस भीजिये।।४१४।।
मास परायण अठाहरवाँ विश्राम
श्रीमथुरामण्डलवासी भक्तजी
जे बसे बसत मथुरा मण्डल, ते दयादृष्टि मो पर करौ।।
रघुनाथ गोपीनाथ, रामभद्र दासूस्वामी।
गुँजामाली चित उत्तम, बीठल मरहठ निहकामी।।
यदुनन्दन रघुनाथ रामानन्द, गोविन्द मुरली सोती।
हरिदास मिश्र, भगवान् मुकुन्द केसौ दण्डोती।।
चतुरभुज चरित्र विष्णुदास, बेनी पद मो सिर धरौ।
जे बसे बसत मथुरा मण्डल, ते दयादृष्टि मो पर करौ।।१०३।।
श्रीगुँजामालीजी और उनकी पुत्रवधू
कही नाभा स्वामी आप, गायौ मैं प्रताप सन्त, बसे ब्रज बसैं सो तौ, महिमा अपार है।
भये गुँजामाली, गुँजाहार धारि नाम पर्यौ, कर्यौ वास लाहौर में, आगें सुनौ सार है।।
सुत बधू विधवा सौं, बोलिकै सुनायौ लेहु, धनपति गेह श्रीगोपाल भरतार है।
देवौ प्रभुसेवा माँगे, नारि बार-बार यहै, डारै सब वारि यापै, गनै जग छार है।।४१५।।

श्रीगणेशदेईरानी) (१०६
दई सेवा वाहि, और घर धन तिया दियौ, लियौ ब्रजवास, वाकी प्रीति सुनि लीजिये।
ठाकुर विराजैं तहाँ, खेलैं सुत औरनि के, डारैं ईंटा खोहा, पर्यौ प्रभु पर खीझियै॥
दिये वे बिझारि, धर्यौ भोग पै न खात हरि, पूछी कही वेई आवैं, तबही तौ जीजियै।
कह्यौ रिस भरि, धूरि नीकी भोर डारौं भरि, खावौ अब हा-हा करी, पायौ ल्याई रीझियै॥४१६॥
श्रीभक्तराज युवतीजनजी
कलिजुग जुवतीजन भक्तराज, महिमा सब जानै जगत्॥
सीता झाली सुमति सोभा प्रभुता उमा भटियानी।
गंगा गौरी कुँवरि उबीठा, गोपाली गनेसदे रानी॥
कला लखा कृतगढौ, मानमती सुचि सतिभामा।
जमुना कोली रामा, मृगा देवादे भक्तन विश्रामा॥
जुग जेवा कीकी कमला, देवकी हीरा हरिचेरी पोखे भगत।
कलिजुग जुवतीजन भक्तराज, महिमा सब जानै जगत्॥१०४॥
श्रीगणेशदेई रानीजी
मधुकरसाह भूप भयौ देस ओड़छे कौ, रानी सो गनेसदेई काम बाँकौ कियौ है।
आवैं बहु सन्त सेवा करत अनन्त भाँति, रह्यौ एक साधु, खान-पान सुख लियौ है॥
निपट अकेली देखि, बोल्यौ धन थैली कहाँ? होय तौ बताऊँ, सब तुम जानौ हियौ है।
मारी जाँघ छुरी, लखि लोहू वेगि भागि गयौ, भयौ सोच जानै जिनि, राजा बन्द दियौ है॥४०७॥
बाँधि नीकी भाँति पौढ़ि, रही कही काहू सौं न, आयो ढिंग राजा, मति आवौ तिया धर्म है।
बीते दिन तीन, जानी वेदन नवीन कछू, कहिये प्रवीन मोसौँ, खोलि सब मर्म है॥
टारी बार दोय चारि, नृप के विचार पर्यो, कर्यौ समाधान जिन, आनौ जिय भर्म है।
फिर्यौ आस-पास भूमि, पर तन रास करी, भक्तिकौ प्रभाव छाँड़ि, तिया पति सर्म है॥४१८॥
हरि के सम्मत जे भगत, ते दासनि के दास॥
नरबाहन बाहन बरीस जापू जैमल बीदावत।
जयन्त धारा रूपा अनुभई ऊदारावत।

गम्भीरे अर्जुन जनार्दन गोविन्द जीता।
दामोदर साँपिले गदा ईश्वर हेमविदीता॥
मयानन्द महिमा अनन्त, गुढीले तुलसीदास।
हरि के सम्मत जे, भगत, ते दासनि के दास॥१०५॥
श्रीनरबाहनजी
रहैं भौगाँव नांव नरबाहन साधुसेवी, लूटि लई नाव, जाकी बन्दीखानै दियौ है।
लौंड़ी आवै दैन कछू, खायवे को, आई दया, अति अकुलाई लै, उपाय यह कियौ है॥
बोलौ राधवल्लभ औ, लेवौ हरिवंश नाम, पूछै शिष्य नाम कहौ, पूछी नाम लियौ है।
दई मँगवाय वस्तु, राखियो दुराय बात, आय दास भयौ, कही रीझि पद दियौ है॥४१६॥
श्रीमुख पूजा सन्त की, आपुन तें अधिकी कही॥
यहै वचन परमान, दास गाँवरी जटीयाने भाऊ।
बूँदी बनियाँ राम, मँड़ौते मोहनवारी दाऊ॥
माड़ौठी जगदीसदास, लछमन चट्टूथावल भारी।
सुनपथ में भगवान, सबै सलखान गुपाल उधारी॥
जोबनेर गोपाल के, भक्त इष्टा निर्वही।
श्रीमुख पूजा सन्त की, आपुन तें अधिकी कही॥१०६॥
श्रीगोपालदास जोबनेरी
जोबनेर वास, सो गोपाल भक्त-इष्ट ताकौं, कियौ निर्वाह बात, मोकौं लागी प्यारियै।
भयौ हो विरक्त कोऊ कुल में प्रसंग सुन्यौ, आयौ यों परीच्छा लैन, द्वार पै विचारियै॥
आय पर्यौ पाँय, पाँय धारौ निज मन्दिर में, सुन्दरी न देखौं मुख, पन कैसे टारियै।
चलो जिन टारौ तिया, रहैंगी किनारौ करि, चले सब छिपीं नेकु, देखी याकै मारियै॥४२०॥
एक पै तमाचो दियौ, दूसरे ने रोष कियौ, देवौ या कपोल पै यों, वानी कही प्यारी है।
सुनि आँसू भरि आये, जाय लपटाये पाँय, कैसे कही जाय, यह रीति कछु न्यारी है॥
भक्त इष्ट सुन्यौ मेरे, बड़ौ अचरज भयौ, लई मैं परीच्छा, भई सिच्छ मोकौं भारी है।
बोल्यौ अकुलाय, अजू पैयै कहाँ भाय ऐपै, साधु सुख पाय कहैं, यही मेरी ज्यारी है॥४२१॥

श्रीलाखाजी) (१११
श्रीलाखाजी
परमहंस वंशानि में, भयौ विभागी बानरौ॥
मुरधरखण्ड निवास, भूप सब आज्ञाकारी।
राम-नाम विश्वास, भक्त पद रज व्रतधारी।
जगन्नाथ के द्वार, दँडौतनि प्रभु पै धायौ।
दई दास की दादि, हुण्डी करि फेरि पठायौ॥
सुरधुनी ओघ संसर्ग तैं, नाम बदल कुच्छित नरौ।
परमहंस वंशानि में, भयौ विभागी बानरौ॥१०७॥
लाखा नाम भक्त, वाकौ बानरौ बखान कियौ, कहै, जग डूब, जासौ मेरो सिरमौर है।
करैं साधुसेवा बहु, पाक डारि मेवा, सन्त जेंवत अनन्त, सुख पावै कौर-कौर है॥
ऐसे में अकाल पर्यौ, आवैं धरि माल-जाल, कैसे प्रतिपाल करैं, ताकी और ठौर है।
प्रभु जू स्वपन दियौ, कियौं में जतन एक, गाड़ी भरि गेहूँ भैंसि, आवै करौ गौर है॥४२२॥
गेहूँ कोठी डारि मुँह, मूँदि नीचे देवो खोलि, निकसै अतोल, पीसि रोटी लै बनाइयै।
दूध जितौ होय, सो जमायके विलोय लीजै, दीजै यों चुपिरि संग, छाछ दै जिंवाइयै॥
खुलि गई आँखें, भाखैं तिया सौं जु आज्ञा दई, भई मनभाई, अजू हरिगुन गाइयै।
भोर भयैं गाड़ी भैंसि, आई वही रीति करी, करी साधुसेवा नाना भाँतिन रिझाइयै॥४२३॥
आई कौन रीति, वाकी प्रीतिहूँ बखान कीजै, लीजै उरधारि, सार भक्ति निरधार है।
रहै ढिंग गाँव, तहाँ सभा एक ठाव भई, टूटि गयौ भाई, सो उगाही कौ विचार है॥
बोलि उठ्यौ कोऊ, यों व्यौहार को तौ भार चुक्यौ, लीजियै सँभारि लाखा सन्त भवपार है।।
लाज दबि तिन दिये, गेहूँ लै पचास मन, दई निज भैंसि सग सब सरदार है॥४२४॥
मारबाड़ देस तैं, चल्यौई साष्टांग किये, हिये जगन्नाथदेव, याही पन जाइयै।
नेह भरि भारी, देह वारि फेरि डारी, कैसें करै तनधारी, नेकु श्रम मुरझाइयै॥
पहुँचौ निकट जाय, पालकी पठाइ दई, कहैं लाखा भक्त कौन? वेगि दै बताइयै।
काहू कहि दियौ, जाय कर गहि लियौ, अजू! चलौ प्रभु पास इहि छिनहिं बुलाइयै॥४२५॥
कैसे चढौं पालकी में?, पन प्रतिपाल कीजै, दीजै मोकौं दान, यही भाँति जा निहारियै।
बोले प्रभु कही यों, सुमिरनी बनाय ल्याये, अब पहिराय मोहिं सुनि उर धारियै॥

११२) (श्री भक्तमाल)
चले चढ़ि-बढ़ि, कियौ चाहैं यह जानी मैं तौ, पढ़ि-पढ़ि पोथी प्रेम मोपै बिसतारियै।
जायकै निहारे, तन मन प्रान वारे, जगन्नाथ जू के प्यारे, नेकु ढिंग तें न टारियै।।४२६।।
बेटी एक क्याँरी, ब्याहि देत न विचारी, मन, धन हरि साधुनि कौ, कैसे कै लगाइयै।
कीजै वाकौ काज कही, जगन्नाथदेव जू ने, लीजै मोपै द्रव्य, उर नेकहूँ न आइयै।।
विदा पै न भये, चले, दृग भरि लये गये, आगे नृप भक्त, मग चौकी अटकाइयै।
दियौ है सुपन प्रभु, जिनि हठ करौ आजू, हुण्डी लिखि दई लई, बिनै कै जताइयै।।४२७।।
हुण्डी सो हजार की यों, लैकै गृहद्वार आये, तामें ते लगायौ सौक, बेटी ब्याह कियौ है।
और सब सन्तनि, बुलायकैँ खवाय दिये, लिये पग दास, सुखरासि पन लियौ है।।
ऐसें ही बहुत दाम, वाही के निमित्त लै-लै, सन्त भुगताये अति हरषित हियौ है।
चरित अपार, कछु मति अनुसार कह्यौ, लह्यौ जिन स्वाद, सो तौ पाय निधि जियौ है।।४२८।।
मास परायण उन्नीसवाँ विश्राम
श्रीनरसीजी
जगत् विदित नरसी भगत, (जिन) गुज्जर धर पावन करी।
महास्मारत लोग, भक्ति लौलेश न जानैं।
माला मुद्रा देखि, तासु की निन्दा ठानैं।।
ऐसे कुल उत्पन्न, भयौ भागौत सिरोमनि।
ऊसर तें सर कियौ, खण्डदोषहिं खोयो जिनि।।
बहुत ठौर परचै दियौ, रसरीति भक्ति हिरदै धरी।
जगत् विदित नरसी भगत, (जिन) गुज्जर धर पावन करी।।१०८।।
जूनागढ़ वास, पिता-माता तन नास भयौ, रहै एक भाई, औ भौजाई रिस भरी है।
डोलत-फिरत आय, बोलत पियावौ नीर, भाभी पै न जानी पीर, बोली जरीबरी है।।
आवत कमाये जल, प्याये बिन सरै कैसे?, पियौ यों जवाब दियौ, देह थरथरी है।
निकसे विचारि कहूँ, दीजै तन डारि मानौ, शिव पै पुकार करी, रहे चित धरी है।।४२६।।
बीते दिन सात, शिव धाम तें न जात, बार, परै काहू तुच्छ द्वार, सोऊ सुधि लेत है।
इतनी विचारि, भूख-प्यास दई टारि, लियौ प्रगट सरूप धारि, भयौ हिये हेत है।।
बोले वर माँग आजू, माँगिवौ न जानत हौं, तुम्हें जोई प्यारौ, सोई देवो चितचेत है।
पर्यो सोच भारी, मेरी प्रान-प्यारी नारी, तासौं कहत डरत वेद, कहै नेति-नेति है।।४३०।।

श्रीनरसीजी) (११३
दियौं मैं वृकासुर को, वर डर भयौ तहाँ, वैसे डर कोटि-कोटि, यापै वारि डारे हैं।
बालक न होय, यह पालक है लोकनि कौ, मन कौ विचार कहा, दीजै प्रान प्यारे है।।
जोपै नहीं देत, मेरौ बोलिवो अचेत होत, दियौ निज हेत तन आलिन के धारे हैं।
ल्याये वृन्दावन, रासमण्डल जटित मनि, प्रिया अनगन बीच, लाल जू निहारे हैं।। ४३१।।
हीरनि खचित, रासमण्डल नचत दोऊ, रचित अपार नृत्य, गान तान न्यारियै।
रूप उजियारी, चन्द चाँदनी न सम तारी, देत कर-तारी, लाल गति लेत प्यारियै।।
ग्रीवा की ढुरनि, कर आँगुरी मुरनि, मुख मधुर सुरनि, सुनि श्रवन तपारियै।
बजत मृदंग मुँहचंग, संग अंग-अंग, उठति तरंग, रंग, छबि जीय की ज्यारियै।। ४३२।।
दई लै मसाल हाथ, निरखि निहाल भई, लाल डीठि परी कोऊ नई यह आई है।
शिव सहचरी, रंग भरी अटकरी, बात, मृदु-मुसकात, नैन कोर में जताई है।।
चाहै याहि टारौ, यह चाहै प्रान वारौं, तब स्याम ढिंग आय कही, नीके समुझाई है।
जावौ यहै ध्यान करौ, करौ सुधि आऊँ जहाँ, आये निज ठौर, चटपटी-सी लगाई है।। ४३३।।
कीनी ठौर न्यारी, विप्र सुता भई नारी, एक सुत उभै बारी, जग भक्ति बिसतारी है।
आवै बहु सन्त, सुख देत है अनन्त, गुन गावत रिझावत औ सेवा विधि धारी है।।
जिती द्विज जात, दुख भयौ अति गात, मान्‍यौ बड़ी उतपात, दोष करै न विचारी है।
एतौ रूप सागर में, नागर मगन महां, सकै कहा करि, चहुँओर गिरिधारी है।। ४३४।।
तीरथ करत साधु, आये, पुर पूछे कोऊ, हुण्डी लिखि देय हमें ? द्वारका सिधारिवे।
जे वे रहे दूषि, कही जात ही भगावै भूषि, नरसी विदित शाह आगे दाम डारिवे।
चरन पकरि गिरि, जावो जौ लिखावौ अहो, कहौ बार-बार सुनि, विनती न टारिवे।
दियौ लै बताय घर, जाय वही रीति करी, भरी अँकवार मेरे, भाग कहा बारिवे।। ४३५।।
सात सै रुपैया गनि ढेरी करि दई आगे, लागे पग देवौ लिखि, कही बार-बार है।
जानी बहकाये प्रभु, दाम दै पठाये लिखी, किये मनभाये, शाह साँवल उदार है।।
वाही हाथ दीजियै लै कीजिये निशंक काज, गये जदु राजधानी, पूछ्यो सौं बजार है।
ढूँढ़ि फिरि हारे, भूख-प्यास मीड़ि डारे पुर, तजि भये न्यारे, दुख सागर अपार है।। ४३६।।
शाह कौ सरूप करि, आये काँधे थैली धरि, कौन पास हुण्डी? दाम लीजियै गनायकै।
बोलि उठे ढूँढ़ि हारे!, भले जू निहारे आजु, कही लाज हमें देत, मैं हूँ पाये आयकै।।
मेरौ है इको सौ वास, जानै कोऊ हरिदास, लेवो सुखरासि, करो चीठी दीजै जायकै।
धरे हैं रुपैया ढेर, लिख्यो करौ बेर-बेर, फेरि आय पाती दई, लई गरे लायकै।। ४३७।।

११४) (श्री भक्तमाल)
देखि आये शाह ? दौरि मिले उतसाह अंग, वेऊ रंग बोरे, सन्त संग कौ प्रभाव है।
हुण्डी लिखि दई दाम, लिये सो खवाय दिये, किये प्रभु पूरे काम, सन्तनि सौं भाव है।।
सुता ससुरारि भयौ, छूछक विचारि सासु, देत बहु गारि, जाको निपट अभाव है।।
पिता सौं पठाई, कहि छाती लै जराई इनि, जोपै कछु दियौ जाय, आवो यह दाव है।।४३८।।
चले गाड़ी टूटी-सी, उभय बूढ़े बैल जोरि, पहुँचे नगर छोर, द्विज कही जायकै।
सुनत ही आई देखि, मुँह पियराई फिरी, दाम नहीं एक, तुम कियौ कहा आयकै।।
चिन्ता जिनि करौ जाय, सासु ढिंग धरौ लिखि, कागद में धरौ अति, उत्तम अघायकै।
कही समझाय सुनि, निपट रिसाय उठी, कियौ परिहास लिख्यौ, गाँव खुनसायकै।।४३६।।
कागद लै आई देखि, दूसरें फिराई पुनि, भूलै पै न पाई, जात पाथर लिखाये हैं।
रहिवे कौं दई, ठौर फूटी ढही पौरि जाके, बैठे सिरमौर आय बहु सुख पाये हैं।।
जल दै पठायौ, भलीभाँति कै औटायौ, भई बरषा सिरायौ, यों समोयकै अन्याये हैं।
कोठरी सँवारि, आगे परदा सो दियौ डारि, लै बजाई तार, वेश अगनित आये हैं।।४४०।।
गाँव पहिरायो, छबि छायौ जस गायो अहो, हाटक रजत उभै, पाथर हू आये हैं।
रहि गई एक, भूले लिखत अनेक जहाँ, लेंहौं तांही पास, जापै सब मिलि पाये हैं।।
विनती करत बेटी, दीजियै जू लाज रहे, दियौ मँगवाय हरि, फेरिकै बुलाये हैं।
अँग न समात सुता, तात कौ निरखि रंग, संग चली आई, पति आदि बिसराये हैं।।।४४१॥
सुता हुतीं दोय भोय, भक्ति रही घर ही में, एक पति त्याग, एक पतिहू न कियौ है।
पुर में फिरत उभै, गाइन सुचाइन सौं, धन सौं न भेंट, काहू नाम कहि दियौ है।।
आई लगी गाइवे कौं, कही समझाय अहो, पायवे को नाहीं, कछु पावै दुख हियौ है।
चाहौ हरिभक्ति तौ, मुँड़ायकै लड़ाय लीजै, कीजै बार दूर रहीं, प्रेमरस पियौ है।।४४२।।
मिलीं उभै सुता, रंग झिली संग गायन वै, चायनि सौं नृत्य करै भायनि बतायकै।
सालंग है नाम, मामा मण्डलीक मन्त्री रहै, कहै विपरीत बड़ी, राजा सौं सुनायकै।।
बड़े-बड़े दण्डी, और पण्डित समाज कियौ, करौ वाकी भण्डी, देश दिजिये छुटायकै।
आये चार चोबदार, चलौ जू विचार कीजै, भयौ दरबार हमें, दिये हैं पठायकै।।४४३।।
चारौं तुम जावो टरि, भयौ हमें राजा डर, सकै कहा करि? अजू चलैं संग-संगहीं।।
नाचत बजावत ये, चलीं ढिंग गावत, सुभावत मगन जानी, भीजि गईं रंगहीं।।
आये वाही भाँति, सभा प्रभाहत भई तऊ, बोले कहा रीति यह, जुवती प्रसंगहीं?।
कही भक्तिगन्ध, दूरि, पढ़े पोथी परी धूरि, श्रीशुक सराही तिया, माथुरनि भंगहीं।।४४४।।

श्रीनरसीजी) (११५)

बोलि उठ्यौ विप्र एक, छूतक प्रसंग देख्यौ कह्यौ, रसरंग भर्यौ, डर्यौ नृप पाँय में।
कही जू विराजौ गाजौ, नित सुख साजौ जाय, किये हरि राय वश, भीजे रहौ भाय में।।
धारौ उर और, सिरमौर प्रभु मन्दिर में, सुन्दर केदारौ राग, गावै भरे चाय में।
स्याम कण्ठमाल टूटि, आवत रसाल हियें, देखि दुख पावैं परे, विमुख सुभाय में।।४४५।।
नृपति सिखायौ जाय, वृथा जस छायौ काचे, सूत में पुहायौ हार, टूटै ख्यात करी है।
माता हरिभक्त, भूप कही जिनि करौ कान, तऊ बानि राजस की, माया मति हरी है।।
गयौ ढिंग मन्दिर के, सुन्दर मँगाय पाट, तागौ बटवाय करि, माला गुहि धरी है।
प्रभु पहिराय कह्यौ, गाय अब जानि परै, भरै सुर राग और गायौ पै न परी है।।४४६।।
विमुख प्रसन्न भये, तबतौ उराहने दये, नये-नये चोज हरि, सनमुख भाखिये।
जाने ग्वालबाल एक, माल गहि रहे हिये, जिये लाग्यौ यही रूप, कहौ लाख लाखिये।।
नारायन बड़े महा, अहो मेरे भाग लिख्यो, करै कौन दूरि, छबि पूरी अभिलाखिये।
म्हारो कहा जाय, आय परसे कलंक तुम्हे, राखिये निशंक हार, भक्ति मारि नाखिये।।४४७।।
रहै तहाँ शाह, किये उभै लै विवाह जाने, तिया एक भक्त कहै, हरि कौं दिखाइयै।
नरसी कही ही भलै, सोई प्रभु वानी लई, साँच करि दई, गये राग छुटवाइयै।।
बोले पट खोलि, दिये, किये दरसन ताने, ताने पट सोवै वह, कही देवौ भाइयै।
लिये दाम, काम कियौ, कागद गहाय दियो, दियौ कछु खाइवे कौं पायौ लै भिंजाइयै।।४४८।।
गहने धर्यौ हो राग, केदारौ सो शाह घर, धरि रूप नरसी कौ, जायकै छुटायौ है।
कागद लै डार्यौ गोद, मोद भरि गाय उठे, आय झन्न-झन्न श्याम, हार पहिरायौ है।।
भयौ जै-जैकार, नृप पाँय लपटाय गयौ, रहस्यौ हिये भाव, सो प्रभाव दरसायौ है।
विमुख खिसाने भये, गये उठि नये नाहिं, बिन हरिकृपा भक्तिपन्थ जात पायौ है।।४४६।।
करन सगाई आयो, पायो वर भायो नाहिं, घर-घर फिर्यो द्विज नरसी बतायौ है।
आय सुख पाय, पूछ्यौ सुत सो दिखाय दियौ, कियौ लै तिलक मन, देखत चुरायौ है।।
अजून हम लायक न, तुम सब लायक हौ, सायक सो छूट्यौ, जाय नाम लै सुनायौ है।
सुनत ही माथौ फोरि, कहें तालकूटा वह, बाल, बोरि आये, जावो फेरि दुख छायौ है।।४५०।।
काटिकै अँगूठा डारौ, तब सो उचारौ बात, मन में विचारौ, कियौ तिलक बनायकै।
जाने सुता भाग ऐसे, रहे सोच पागि सब, आवै जब ब्याहिवे कौं, धन दै अघायकै।।
लगन हूँ लिखि दियौ, दियौ द्विज आनि लियौ, डारि राख्यो कहूँ, गावैं ताल ए बजायकै।
रहे दिन चार, पै विचार नहीं नेकु मन, आये श्री कृष्ण-रूक्मिनी जू, झूमि मिले धायकै।।४५१।।

४. गौड़ीय, निम्बार्क एवं अन्य सम्प्रदाय के संत (चैतन्य, रूप-सनातन)

११९६) (श्री भक्तमाल
ठौर-ठौर पकवान, होत तिया गान करै, घुरत निसान कान सुनिये न बात है।
चित्रमुख किये, लै विचित्र पट्टरानी आप, घोरी रंग बोरी पै, चढ़ायौ सुत रात है।।
करी सो ज्यौनार, तामें मानस अपार आये, द्विजनि विचारि, पोट बाँधी पै न मात है।
मणिमय ही साज-बाज, गज रथ ऊँट कोर, झमकै किशोर आज, सजी यों बरात है।।४५२।।
नरसी सौं कहें गहैं हाथ, तुम साथ चलौ, अन्तरिच्छ में हूँ चलौं, इति बात मानिये।
कही अजू! जानौ तुम, मैं तो हिये आनौं यहैं, लहै सुख मन मेरो, फेंट ताल आनिये।।
आप ही विचारि सब, भार सौं उठाइ लियो, दिया डेरा पुरी, समधी की पहिचानिये।
मानस पठायौ, दिन आयौ पै न आये, अहो!, देखें छबि छाये, नर पूछैं जू बखानिये।।४५३।।
नरसी बरात मत जानौ यह नरसी की नरसी न पावै ऐसी समझ अपार है।
आयकै सुनाई सुधि-बुधि बिसराई अहो करत हँसाई बात भाखौ निरधार है।।
गयौ जो सगाई करि दर वर आयौ द्विज अंग में न मात कैसे रंग बिसतार है।
कही एक घास धनरासि सौं न पूजै किहूँ चहुँदिसि पूरि रही देखौ भक्तिसार है।।४५४।।
चले अचरज मानि, देखि अभिमान गयौ, लयौ पाछौ ब्राह्मन को, हमें राखि लीजिये।
जाइ गहि पाँय, रह्यौ, भाय भरि दया करौ, गये दृग भरै पाँव, परै कृपा कीजिये।।
मिले भरि अँक लै, दिखायौ सो मयंक मुख, हूजिये निशंक इन्हे, भार सुता दीजिये।
ब्याह करि आये, भक्तिभाव लपटाये सब, गाये गुण जाने, जेते सुनि-सुनि जीजिये।।४५५।।
मास परायण बीसवाँ विश्राम
श्रीयशोधरजी
दिवदास वंश, जसोधर सदन, भई भक्ति अनपायनी।।
सुत कलत्र सम्मत, सबै गोविन्द परायन।
सेवत हरि हरिदास, द्रवत मुख राम रसायन।।
सीतापति कौ सुजस, प्रथम ही गवन बखान्यौ।
द्वै सुत दीजै मोहिं, कवित सबही जग जान्यौ।।
गिरा गदित लीला मधुर, सन्तनि आनन्ददायिनी।
दिवदास वंश, जसोधर सदन, भई भक्ति अनपायनी।।१०६।।
नवाह परायण षष्ठ विश्राम

श्रीमाधवदासजी) (११७
श्रीनन्ददासजी
(श्री) नन्ददास आनन्द निधि, रसिक सु प्रभु हित रँग मगे॥
लीला पद रस रीति, ग्रन्थ रचना में नागर।
सरस उक्ति जुत जुक्ति, भक्तिरस गान उजागर॥
प्रचुर पयध लौं सुजस, रामपुर ग्राम निवासी।
सकल सुकुल सम्बलित, भक्तपद रेनु उपासी॥
चन्द्रहास अग्रज सुहृद्, परम प्रेम पै में पगे।
(श्री) नन्ददास आनन्द निधि, रसिक सु प्रभु हित रँग मगे॥ ११०॥
श्रीजनगोपालजी
संसार सकल व्यापक भई, जकरी जन गोपाल की॥
भक्ति तेज अति भाल, सन्त मण्डल कौ मण्डन।
बुधि प्रवेश भागौत, ग्रन्थि संशय कौ खण्डन॥
नरहड़ ग्राम निवास, देश बागड़ निस्तार्यौ।
नवधा भजन प्रबोध, अनन्य दासन व्रत धार्यौ॥
भक्त कृपा बांछी, सदा पदरज राधा लाल की।
संसार सकल व्यापक भई, जकरी जन गोपाल की॥१११॥
श्रीमाधवदाजी
माधव दृढ़ महि ऊपरै, प्रचुर करी लोटन भगति॥
प्रसिद्ध प्रेम की राशि, गढ़ागढ़ परचौ दीयौ।
ऊँचे तें भयौ पात, स्याम साँचौ पन कीयौ॥
सुत नाती पुनि, सदृश चलत ऊही परिपाटी।
भक्तनि सौं अति प्रेम, नेम नहीं किहुँ अँग घाटी॥
नृत्य करत नहिं तन सँभार, समसर जनकन की सकति।
माधव दृढ़ महि ऊपरै, प्रचुर करी लोटन भगति॥ ११२॥

११८) (श्री भक्तमाल
गढ़ागढ़ पुर नाम, माधौ बढ़ि प्रेम भूमि, लोटैं जब नृत्य करैं, भूलैं सुधि अंग की।
भूपति विमुख झूठ, जानिकै परीक्ष्ण लई, आनि तीन छाति पर, देखी गति रंग की।।
नूपुरनि बाँधि नाचि, साँच सो दिखाय दियौ, गिर्यौ हू कराह मध्य, जियौ मति पंग की।
बड़ौ त्रास भयौ नृप, दास बिसवास बढ़यौ, बढ़यौ उर भाव, रति न्यारी या प्रसंग की।।४५६।।
श्रीअंगदजी
अभिलाष भक्त अंगद कौ, पुरुषोत्तम पूरन कर्यौ।।
नग अमोल इक ताहि, सबै भूपति मिलि जाचैं।
साम दाम बहु करैं, दास नाहिन मत काचैं।।
एक समै संकष्ट, लेय पानी महँ डार्यौ।
प्रभो तिहारी वस्तु, वदन ते वचन उचार्यौ।।
पाँच दोय सत कोस ते, हरि हीरा लै उर धर्यौ।
अभिलाष भक्त अंगद कौ पुरुषोत्तम पूरन कर्यौ।।११३।।
रायसेन गढ़ वास, नृप सो सिलाहदी जू, ताको यह काका रहे, अंगद विमुख है।
ताकी नारी प्यारी, प्रभु साधुसेवा धारी उर, आये गुरू घर कहैं, कृष्ण कथा सुख है।।
बैठे भौन कौन?, देखि कैसें मौन रह्यो जात?, बोल्यो तिया जात कहा, करौ नर रुख है।
सुनि उठि गये, बधू अन्न-जल त्यागि दये, लये पाँव जाय, विषै वश भयौ दुख है।।४५७।।
मुख न दिखावै याहि, देख्यो ही सुहावै कही, भावै सोई करौ, नेकु वदन दिखाइयै।
मैं हूँ जल त्यागि दियौ, अन्न जात कापै लियौ, जीवौं तब नीके, जब आपु कछु खाइयै।।
बोली मोसौ 'बोलौ, जिन छाँड़ौ तन याही छिन, पन साँचौ होतौ, तोपै सुनत समाइयै'।
'कहौ अब कीजै जोई, मेरी मति गई खोई', भोई उर दया, बात कहि समझाइयै।।४५८।।
'वेई गुरु करौ जाय, पाँयन में परौ' गयौ, चायनि लिवाय ल्यायौ, भयौ शिष्य दीन है।
धारी उर माल, भाल तिलक बनाय कियौ, लियो सीत, प्रीति कोऊ उपजी नवीन है।।
चढ़ी फौज संग चढ़यौ, बैरी पुर मारि बढ़यौ, कढ़यौ टोपी लैके हीरा सत एक पीन है।
डारे सब बेंच पागपेच मध्य रख्यौ मुख्य, भाष्यौ 'सो अमोल करौं जगन्नाथ लीन है'।।४५६।।
कानाकानी भई नृप बात सुनि लई कही, 'हीरा वह देव तोपै और माफ किये हैं'।
आय समुझावैं बहु जुगति बनावैं याके, मन में न आवैं जाय सबै कहि दिये हैं।।

श्रीचतुर्भुजजी नृपति) (११६
अंगद बहिन लागै वाकी भूवा पागै वासौं, 'देवो विष मारौ फिर तूही पग छिये हैं'।
करत रसोई घोरि गरल मिलायो पाक, भोग हूँ लगायो 'अजू आवो' बोलि लिये हैं॥४६०॥
वाकी एक सुता संग लैवै बैठै जेंवन कौं, आई सो छिपाय कही 'जेंवौ कहूँ गई है'।
जेंवत न बोधि हारी तब सो विचारी प्रीति, भीति रोय मिली गरें रीति कहि दई है॥
प्रभु लै जिवाये राँड-भाँड कै निकासि द्वार, दै करि किवार सब पायौ ओप नई है।
वह दुख हियें रह्यौ कह्यौ कैसे जात काहू? बात सुनी नृपहूँ नै जैसी भाँति भई है॥४६१॥
चले नीलाचल हीरा जाय पहिराय आवैं, आय घेरि लीने नृप नरनि खिसायकै।
कही डारि देवौ कै लराई सनमुख लेवौ, बस न हमारौ भूप आज्ञा आये धायकै॥
बोले 'नेकु रहौ मैं अन्हाय पकराय देत,' हेत मन और जल डार्यौ लै दिखायकै।
'वस्तु है तिहारी प्रभु लीजिये' उचारी यह, वानी लागी प्यारी उर धारी सुख पायकै॥४६२॥
ऐतौ घर आये वे तो जल मधि कूदि छाये, अति अकुलाये नेकु खोजहूँ न पायौ है।
राजा चलि आयौ सब नीर कढ़वायौ कीच, देखि मुरझायौ दुखसागर अन्हायौ है॥
जगन्नाथदेव आज्ञा दई 'वाहि सुधि देवौ', आयकै सुनाई नर-तन बिसरायौ है।
गयौ जाय देख्यौ उर पर जगमग रह्यौ, लह्यौ सुख नैननि कौ कापै जात गायौ है॥४६३॥
राजा हिय ताप भयौ दयौ अन्न त्यागि कह्यौ, आवै जोपै भाग मेरे ब्राह्मन पठाये हैं।
धरनौ दे रहे कहे नृप के वचन सब, तब ह्वै दयाल आप पुर ढिंग आये हैं॥
भूप सुनि आगे आय पाँय लपटाय गयौ, लयौ उर लाय दृग नीर लै भिजाये हैं।
राजा सरबसु दियौ जियो हरिभक्ति कियौ, हियो सरसायौ गुन जाने जिते गाये हैं॥४६४॥
श्रीचतुर्भुजजी नृपति
चतुर्भुज नृपति की भक्ति को, कौन भूप सरवर करें॥
भक्त आगमन सुनत, सनमुख जोजन इक जाई।
सदन आनि सत्कार, सदृश गोविन्द बड़ाई॥
पाद प्रछालन सुहथ, राय रानी मन साँचै।
धूप दीप नैवेद्य, बहुरि तिन आगें नाचै॥
यह रीति करौलीधीश की, तन मन धन आगे धरैं।
चतुर्भुज नृपति की भक्ति कौ कौन भूप सरवर करें॥११४॥