श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)
Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary
गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंलक्ष्मण लफरा लड्डू सन्त जोधपुर त्यागी।
सूरज कुम्भनदास, विमानी खेम विरागी॥
भावन विरही भरत, नफर हरिकेश लटेरा॥
हरिदास अयोध्या चक्रपानि, (दियो) सरजू तट डेरा॥
तिरलोक पुखरदी बिज्जुली, उद्धव वनचर वंस के।
पर अर्थ परायन भक्त ये, कामधेनु कलियुग्ग के॥६८॥
श्रीलड्डू भक्तजी
लड्डू नाम भक्त जाय, निकसे विमुख देस, लेशहूँ न सन्तभाव, जानैं पाप पागे हैं।
देवी कौं प्रसन्न करें, मानुस को मारि धरैं, लै गये पकरि तहाँ, मारिवे कौं लागे हैं॥
प्रतिमा कौं फारि बिकरार रूप धारि आई, लैकै तरवार, मूँड़ काटे भीजे बागे हैं।
आगे नृत्य करैं, दृग भरैं, साधु पाँव धरैं, ऐसे रखवारे जानि, जन अनुरागे हैं॥४०४॥
श्रीसन्तजी
सदा साधुसेवा अनुराग रंग पागि रह्यौ, गह्यौ नेम भिक्षा व्रत, गाँव-गाँव जायकै।
आये घर सन्त पूछैं, तिया सौं यों, सन्त कहाँ? सन्त चूल्हे माँझ, कही ऐसे अलसायकै॥
वानी सुनि जानी चले मग सुखदानी मिले, कही कित हुते? सो बखानी उर आयकै।
बोली वह साँच, वही आँच ही कौ ध्यान मेरे, आनि गृह फेरि किये मगन जिंवायकै॥४०५॥
श्रीतिलोकजी सुनार
पूरब में ओक, सो तिलोक हो सुनार जाति, पायौ भक्तिसार साधुसेवा उर धारियै।
भूप के विवाह, सुता जोरो एक जेहरि कौं, गढ़िवे को दियौ, कह्यौ नीके कै, सँवारियै॥
आवत अनन्त सन्त, औसर न पावैं किहूँ, रहे दिन दोय, भूप रोष यों सँभारियै।
ल्यावो रे पकरि, ल्याये, छाड़ियै मकर कही नेकु, रह्यौ काम आवै, नातो मारि डारियै॥४०६॥
आयौ वही दिन, कर छुयौहूँ न इन नृप, करै प्रान बिन, वन माँझ छिप्यौ जायकै।
आये नर चारि पाँच, जानी प्रभु आँच, गढ़ि लियौ सो दिखायौ, साँच चले भक्त भायकै।
भूप कौ सलाम कियौ, जेहरि कौ जोरौ दियौ, लियो कर देखि, नैन छोड़ैं न अघायकै।
भई रीझि भारी, सब चूक मेटि डारी, धन पायौ लै मुरारी, ऐसे बैठे घर आयकै॥४०७॥