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सर्वकोश
श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)

श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)

Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary

गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा

DevanagariHindipublished195 पृष्ठ

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पृष्ठ 123

१०८) (श्री भक्तमाल
वन-वन खेले बिन, बनत न मोकौं नेकु, भनत जु गारी, अनगनत लगावैगो।
सुधि-बुधि मेरी गई, भई बड़ी चिन्ता मोहिं, ल्याइये जू ढूँढ़ि, कहूँ चैन ढिंग आवैगो।।
भोग जे लगाये मैं तौ, तनक न पाये रिस, वाकी जब जाय, तब मोहिं कछु भावैगो।
चले उठि धाय, नीठ-नीठ कैं मनाय ल्याये, मन्दिर में खाय मिलि, कही गरें लावैगो।।४१२।।
गये हैं बहिर भूमि, तहाँ कृष्ण आये झूमि, करी बड़ी धूम, आक बोड़िन सौं मारिकै।
इनहूँ निहारि, उठि मार दई वाही सौं जु, कौतुक अपार, सख्यभाव रससारकै।।
माता मग चाहै बड़ी, बेर भई आई तहाँ, कहाँ बार लाई ओट, पाई उर धारिकै।
आयौ यों विचार, अनुसार सदाचार कियौ, लियौ प्रेम गाढ़ कभूँ, करत सँभारिकै।।४१३।।
आवत हो भोग, महासुन्दर मन्दिर कौं, रह्यौ मग बैठि, कही आगै मोहिं दीजिये।
भयौ कोप भारी, थार डारि जा पुकार करी, भरी न अनीति जात, सेवा यह लीजिये।
बोलिकै सुनाई अहो, कहा मनभाई? तब, बोलिकै बताई, अजू बात कान किजिये।
पहिले जु खाय, वन माँझ उठि जाय पाछे, पाऊँ कहाँ धाय, सुनि मति रस भीजिये।।४१४।।
मास परायण अठाहरवाँ विश्राम
श्रीमथुरामण्डलवासी भक्तजी
जे बसे बसत मथुरा मण्डल, ते दयादृष्टि मो पर करौ।।
रघुनाथ गोपीनाथ, रामभद्र दासूस्वामी।
गुँजामाली चित उत्तम, बीठल मरहठ निहकामी।।
यदुनन्दन रघुनाथ रामानन्द, गोविन्द मुरली सोती।
हरिदास मिश्र, भगवान् मुकुन्द केसौ दण्डोती।।
चतुरभुज चरित्र विष्णुदास, बेनी पद मो सिर धरौ।
जे बसे बसत मथुरा मण्डल, ते दयादृष्टि मो पर करौ।।१०३।।
श्रीगुँजामालीजी और उनकी पुत्रवधू
कही नाभा स्वामी आप, गायौ मैं प्रताप सन्त, बसे ब्रज बसैं सो तौ, महिमा अपार है।
भये गुँजामाली, गुँजाहार धारि नाम पर्यौ, कर्यौ वास लाहौर में, आगें सुनौ सार है।।
सुत बधू विधवा सौं, बोलिकै सुनायौ लेहु, धनपति गेह श्रीगोपाल भरतार है।
देवौ प्रभुसेवा माँगे, नारि बार-बार यहै, डारै सब वारि यापै, गनै जग छार है।।४१५।।