श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)
Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary
गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमति सुन्दर, धीधांग श्रम, संसार चाल नाहिन नचे।
करुना छाया, भक्तिफल, ए कलियुग पादप रचे ॥६७॥
श्रीखोजीजी
खोजी जू के गुरु, हरि भावना प्रवीन महा, देह अन्त समैं, बाँधि घण्टा सो प्रमानियै।
पावै प्रभु जब तब बाजि उठै जानौ यही, पाये पै न बाजी, बड़ी चिन्ता मन आनियै॥
तन त्याग बेर नहीं हुते फेरि पाछे आये, वाही ठौर पौढ़ि देख्यौ, आम पक्यौ मानियै।
तोरि ताके टूक किये, छोटौ एक जन्तु मध्य, गयौ सो विलाय बाजि उठो जग जानियै॥३६६॥
शिष्य की तौ जोग्यताई, नीके मन आई, अजू, गुरू की प्रबल ऐपै नेकु घटी क्यों भई।
सुनौ याकी बात, मन बातवत गति कही, सही लै दिखाई, और कथा अति रसमई॥
वेतौ प्रभु पाय चुके, प्रथम, प्रसिद्ध पाछे, आछो फल देखि, हरि जोग उपजी₁ नई।
इच्छा सो सफल स्याम भक्तवश करी, वही रही पूरपच्छ सब विथा उर की गई॥४००॥
श्रीराँकाजी, श्रीबाँकाजी
राँका पति बाँका तिया, बसैं पुर पण्ढर में, उर में न चाह, नेकु रीति कछु न्यारियै।
लकरीन बीनि करि, जीविका नवीन करैं, धरैं हरिरूप हिये, ताही सौं जियारियै॥
विनती करत, नामदेव श्रीकृष्णदेव जू सौं, कीजै दुख दूर, कही मेरी मति हारियै।
चलौ लै दिखाऊँ तब, तेरे मन भाऊँ रहे, वन छिपि दोऊ, थैली मग माँझ डारियै॥४०१॥
आये दोऊ तिया पति, पाछे बधू आगे स्वामी, औचक ही मन माँझ, सम्पति निहारियै।
जानी यों जुवति जाति, कभूँ मन चलि जात, याते वेगि सम्भ्रम सौं, धूरि वापै डारियै॥
पूछी अजू ! कहा कियौ भूमि में निहूरि तुम? कही वही बात, बोली धनहूँ विचारियै।
कहै मोसौँ राँका, ऐपै बाँका आज देखी तुही, सुनि प्रभु बोले, बात साँची है हमारियै॥४०२॥
नामदेव हारे, हरिदेव कही और बात, जोपै दाह गात, चलौ लकरी सकेरियै।
आये दोउ बीनिवे को, देखी इकठौरी ढेरी, द्वैहूँ मिली पावैं, तऊ हाथ नाहिं छेरियै॥
तबतौ प्रगट श्याम, ल्याये यों लिवाय घर, देखि मूँड फोरौ कह्यौ, ऐसे प्रभु फेरियै।
विनती करत, कर जोरि अंग पटधारौ भारौ, बोझ पर्यो लियौ चीर मात्र हेरियै॥४०३॥
कलि में कामधेनु भक्तजी
पर अर्थ परायन भक्त ये, कामधेनु कलियुग्ग के॥