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सर्वकोश
श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)

श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)

Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary

गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा

DevanagariHindipublished195 पृष्ठ

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पृष्ठ 128

श्रीनरसीजी) (११३
दियौं मैं वृकासुर को, वर डर भयौ तहाँ, वैसे डर कोटि-कोटि, यापै वारि डारे हैं।
बालक न होय, यह पालक है लोकनि कौ, मन कौ विचार कहा, दीजै प्रान प्यारे है।।
जोपै नहीं देत, मेरौ बोलिवो अचेत होत, दियौ निज हेत तन आलिन के धारे हैं।
ल्याये वृन्दावन, रासमण्डल जटित मनि, प्रिया अनगन बीच, लाल जू निहारे हैं।। ४३१।।
हीरनि खचित, रासमण्डल नचत दोऊ, रचित अपार नृत्य, गान तान न्यारियै।
रूप उजियारी, चन्द चाँदनी न सम तारी, देत कर-तारी, लाल गति लेत प्यारियै।।
ग्रीवा की ढुरनि, कर आँगुरी मुरनि, मुख मधुर सुरनि, सुनि श्रवन तपारियै।
बजत मृदंग मुँहचंग, संग अंग-अंग, उठति तरंग, रंग, छबि जीय की ज्यारियै।। ४३२।।
दई लै मसाल हाथ, निरखि निहाल भई, लाल डीठि परी कोऊ नई यह आई है।
शिव सहचरी, रंग भरी अटकरी, बात, मृदु-मुसकात, नैन कोर में जताई है।।
चाहै याहि टारौ, यह चाहै प्रान वारौं, तब स्याम ढिंग आय कही, नीके समुझाई है।
जावौ यहै ध्यान करौ, करौ सुधि आऊँ जहाँ, आये निज ठौर, चटपटी-सी लगाई है।। ४३३।।
कीनी ठौर न्यारी, विप्र सुता भई नारी, एक सुत उभै बारी, जग भक्ति बिसतारी है।
आवै बहु सन्त, सुख देत है अनन्त, गुन गावत रिझावत औ सेवा विधि धारी है।।
जिती द्विज जात, दुख भयौ अति गात, मान्‍यौ बड़ी उतपात, दोष करै न विचारी है।
एतौ रूप सागर में, नागर मगन महां, सकै कहा करि, चहुँओर गिरिधारी है।। ४३४।।
तीरथ करत साधु, आये, पुर पूछे कोऊ, हुण्डी लिखि देय हमें ? द्वारका सिधारिवे।
जे वे रहे दूषि, कही जात ही भगावै भूषि, नरसी विदित शाह आगे दाम डारिवे।
चरन पकरि गिरि, जावो जौ लिखावौ अहो, कहौ बार-बार सुनि, विनती न टारिवे।
दियौ लै बताय घर, जाय वही रीति करी, भरी अँकवार मेरे, भाग कहा बारिवे।। ४३५।।
सात सै रुपैया गनि ढेरी करि दई आगे, लागे पग देवौ लिखि, कही बार-बार है।
जानी बहकाये प्रभु, दाम दै पठाये लिखी, किये मनभाये, शाह साँवल उदार है।।
वाही हाथ दीजियै लै कीजिये निशंक काज, गये जदु राजधानी, पूछ्यो सौं बजार है।
ढूँढ़ि फिरि हारे, भूख-प्यास मीड़ि डारे पुर, तजि भये न्यारे, दुख सागर अपार है।। ४३६।।
शाह कौ सरूप करि, आये काँधे थैली धरि, कौन पास हुण्डी? दाम लीजियै गनायकै।
बोलि उठे ढूँढ़ि हारे!, भले जू निहारे आजु, कही लाज हमें देत, मैं हूँ पाये आयकै।।
मेरौ है इको सौ वास, जानै कोऊ हरिदास, लेवो सुखरासि, करो चीठी दीजै जायकै।
धरे हैं रुपैया ढेर, लिख्यो करौ बेर-बेर, फेरि आय पाती दई, लई गरे लायकै।। ४३७।।