श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)
Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary
गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें११४) (श्री भक्तमाल)
देखि आये शाह ? दौरि मिले उतसाह अंग, वेऊ रंग बोरे, सन्त संग कौ प्रभाव है।
हुण्डी लिखि दई दाम, लिये सो खवाय दिये, किये प्रभु पूरे काम, सन्तनि सौं भाव है।।
सुता ससुरारि भयौ, छूछक विचारि सासु, देत बहु गारि, जाको निपट अभाव है।।
पिता सौं पठाई, कहि छाती लै जराई इनि, जोपै कछु दियौ जाय, आवो यह दाव है।।४३८।।
चले गाड़ी टूटी-सी, उभय बूढ़े बैल जोरि, पहुँचे नगर छोर, द्विज कही जायकै।
सुनत ही आई देखि, मुँह पियराई फिरी, दाम नहीं एक, तुम कियौ कहा आयकै।।
चिन्ता जिनि करौ जाय, सासु ढिंग धरौ लिखि, कागद में धरौ अति, उत्तम अघायकै।
कही समझाय सुनि, निपट रिसाय उठी, कियौ परिहास लिख्यौ, गाँव खुनसायकै।।४३६।।
कागद लै आई देखि, दूसरें फिराई पुनि, भूलै पै न पाई, जात पाथर लिखाये हैं।
रहिवे कौं दई, ठौर फूटी ढही पौरि जाके, बैठे सिरमौर आय बहु सुख पाये हैं।।
जल दै पठायौ, भलीभाँति कै औटायौ, भई बरषा सिरायौ, यों समोयकै अन्याये हैं।
कोठरी सँवारि, आगे परदा सो दियौ डारि, लै बजाई तार, वेश अगनित आये हैं।।४४०।।
गाँव पहिरायो, छबि छायौ जस गायो अहो, हाटक रजत उभै, पाथर हू आये हैं।
रहि गई एक, भूले लिखत अनेक जहाँ, लेंहौं तांही पास, जापै सब मिलि पाये हैं।।
विनती करत बेटी, दीजियै जू लाज रहे, दियौ मँगवाय हरि, फेरिकै बुलाये हैं।
अँग न समात सुता, तात कौ निरखि रंग, संग चली आई, पति आदि बिसराये हैं।।।४४१॥
सुता हुतीं दोय भोय, भक्ति रही घर ही में, एक पति त्याग, एक पतिहू न कियौ है।
पुर में फिरत उभै, गाइन सुचाइन सौं, धन सौं न भेंट, काहू नाम कहि दियौ है।।
आई लगी गाइवे कौं, कही समझाय अहो, पायवे को नाहीं, कछु पावै दुख हियौ है।
चाहौ हरिभक्ति तौ, मुँड़ायकै लड़ाय लीजै, कीजै बार दूर रहीं, प्रेमरस पियौ है।।४४२।।
मिलीं उभै सुता, रंग झिली संग गायन वै, चायनि सौं नृत्य करै भायनि बतायकै।
सालंग है नाम, मामा मण्डलीक मन्त्री रहै, कहै विपरीत बड़ी, राजा सौं सुनायकै।।
बड़े-बड़े दण्डी, और पण्डित समाज कियौ, करौ वाकी भण्डी, देश दिजिये छुटायकै।
आये चार चोबदार, चलौ जू विचार कीजै, भयौ दरबार हमें, दिये हैं पठायकै।।४४३।।
चारौं तुम जावो टरि, भयौ हमें राजा डर, सकै कहा करि? अजू चलैं संग-संगहीं।।
नाचत बजावत ये, चलीं ढिंग गावत, सुभावत मगन जानी, भीजि गईं रंगहीं।।
आये वाही भाँति, सभा प्रभाहत भई तऊ, बोले कहा रीति यह, जुवती प्रसंगहीं?।
कही भक्तिगन्ध, दूरि, पढ़े पोथी परी धूरि, श्रीशुक सराही तिया, माथुरनि भंगहीं।।४४४।।