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शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

अष्टादश पटल ] [ ४१७
अष्टादश पटल
॥ अघोरास्त्रो वर्णन ॥
अथाभिधास्ते विधिवदघोरारास्रमनुत्तमम् ।
यस्य संस्मरणादेव सर्वे नश्यन्त्युपद्रवाः ।१
माया स्फुरद्वय भूयः प्रस्फुरद्वितयंततः ।
घोरघोररतरेत्यन्ते तनुरूपपदं पुनः ।२
चटयुग्मं तदन्तेस्यात्प्रचटद्वितयं ततः ।
कहयुग्मं वमद्वन्द्वं ततो बन्धयुगं पुनः ।३
घातयद्वितयं वर्म फडन्तः समुदाहृतः ।
एकपञ्चाशदक्षोऽयमघोरास्त्रमहामनुः ।४
अघोरारोऽस्य मुनिः प्रोक्तश्छन्दस्त्रिष्टुबुदाहृतम् ।
अघोररुद्रः संदिष्टो देवता मन्त्रवित्तमैः ।५
इसके अनन्तर परमोत्तम अघोरास्त्र के विषय में वर्णन करूँगा '
जिसके संस्मरण मात्र से ही सब उपद्रव नष्ट हो जाया करते हैं।१।
मन्त्र का उद्धार करके बताया जाता है—माया शक्ति बीज, दो बार
'स्फुट'—यह पद, इसके पश्चात् 'प्रस्फुट'—यह पद दो बार कहे, घोर
घोरतर'—इस पद के पश्चात् 'तनुरूप'—यह पद कहे ।२। इसके अन-
न्तर दो बार 'चट'—इस पद को बोले और इसके अनन्तर दो बार
'प्रचड'—इस पद का उच्चारण करना चाहिए । इसके उपरान्त दो बार
'कह'—यह पद और 'वम'—यह दो बार कहे। फिर 'बन्ध' को दो
बार कहे और 'घातय' इसको दो बार कहे । फिर वर्म और फट् कहे ।
यह मन्त्र बताया गया है। यह अघोरास्त्र मन्त्र इक्यावन वर्णों का
होतो है, जो यहाँ पर बताया गया है ।३-४। इस मन्त्र का ऋषि
अघोर होता है और इसका छन्द अनुष्टुप गया है। मन्त्रों के शनि

४१८ ] [ श्रीशारदा तिलक
रखने वाले पुरुषों के द्वारा इस मन्त्र का देवता अघोर रुद्र ही बताये
गये हैं ।५।
हृदय पञ्चभिः प्रोक्तं शिरः षड्भिरुदाहृतम् ।
शिखा दशभिराख्याता तावद्भि कवच मतम् ।६
वसुवर्णैः स्मृतं नेत्रं मासार्णैरस्त्रमीरितम् ।
मूर्द्धनेत्रास्य कण्ठेषु हृन्नाभ्यन्धूरुषु क्रमात् ।७
जानुजंघापदद्वन्दे रुद्राभिन्नाक्षरैर्न्यसेत् ।
पञ्चभिश्चपुनः षड्भिर्द्वाभ्यामष्टभिरक्षरैः ।८
चतुर्वर्णैः षडूर्णे श्च करणेः करणे पुनः ।
चतुर्भिः षड्भिरक्षिभ्यां वर्णभेदोऽयमीरितः ।६
सजलघनसभाभं भीमदंष्ट्रं त्रिनेत्रं
भुजगधरमघोरं रक्तवस्त्रङ्गरागम् ।
परशुडमरुखड्गान्खेटक वाणचापौ
त्रिशिखनरकपाले विभ्रतं भावयामि ।१०
इसका हृदय पाँचों से बताया गया है और छै से इसका शिर कहा
गया है । इसकी शिखा दश से बतायी गयी है और उतनी ही से इसका
कवच माना गया है ।६। आठ वर्णों से इसका नेत्र कहा है और बाहर
वर्णों के द्वारा इसका अस्त्र बताया गया है इसका न्यास क्रम से मूर्धा
नेत्र-मुख-कण्ट-हृदय-नाभि--अन्धु-उरुओंमें-जानु-जंघा और दोनों चरणोंमें
रुद्र से भिन्न अक्षरों के द्वारा करना चाहिए । फिर पाँचों से, छै से,
दो से, आठ अक्षरों से, चार वर्णों से, छै वर्णों से और फिर चार
करणों और छै अक्षियों करे । यह वर्ण भेद कहा गया है ।७।८।६।
अब ध्यान करने की रीति बतलायी जाती है—ध्यान—जल के सहित
मेघों की आभा के समान आभा से समन्वित—महान् भीषण दाढ़ों से
युक्त—तीन नेत्रों वाले—सूर्योको अपने शरीर पर धारण करने वाले—
रक्त वस्त्र के तुल्य अङ्गराग से संयुत—अपने कर कमलों में परशु—

अष्टादश पटल ] [ ४१६
डमरू—खङ्ग—खेटक—वाणचाप—त्रिशिख—नर, कपाल को धारण करने
वाले अघोर की भावना करता हूँ ॥१०॥
अभिचारे ग्रहध्वंसे कृष्णवर्णो भवेद्विभूः ।
वश्ये कुसुमभसङ्काशो मुक्तौ चन्द्रमप्रभः ॥११
लक्षमेकं जपेन्मन्त्रं घृत सक्तोस्तलंः शुभैः ।
तद्दशांशं प्रजुहुयान्मन्त्री मन्त्रस्य सिद्धये ॥१२
शैवे सम्पूजयेत्पीठे षट्कोणान्तः स्थपङ्कजे ।
अ गपूजां केसरेषु कृत्वा पत्रेषु तत्परम् ॥१३
परशुं डमरुं खड्गं खेट बाण च (णांश्च) कार्मुकम् ।
शूलं कपालां प्रयजदष्टास्त्राण्यस्य देशिकः ॥१४
दलाग्रेषु ततः पूज्या ब्राह्मयाद्याः प्रोक्तलक्षणा ।
लोकेशान्पूजयेत्पश्चादायुधैः स्वैः समन्वितान् ॥१५
अभिचार में-ग्रहों के ध्वंस में विभु का कृष्ण वर्ण होता है । वश्य
के प्रयोग में विभु का वर्ण कुसुम्भ के सदृश हुआ करता है और मुक्ति
में उसका वर्ण चन्द्र के समान प्रभा से संयुत होता है ॥११॥ इस मन्त्र
का एक लाख जाप करना चाहिए और घृत सिद्ध परम शुभों तिलों से
जप का दशांश भाग का होम करे ।। तभी मन्त्रधारी को मन्त्रकी सिद्धि
होती है ॥१२। शैव पीठ पर षट्कोण के अन्दर स्थित कमल अच्छी
तरह से यजन करना चाहिए । अङ्गों की पूजा केसरों में करके फिर
पत्रों आयुधों का अर्चन करे जिनके नाम ये हैं—परशु, डमरू, खड्ग,
खेट, बाण, कार्मुक, शूल, कपाल ॥१३॥१४। दलों के अग्रभागों में इसके
अनन्तर ब्राह्म्यादि का यजन करना चाहिये जिनके लक्षण पूर्व में ही कह
दिये गये हैं । इनके पश्चात् लोकपालों का अर्चन करे जो कि वज्रादि
अपने-अपने आयुधों के सहित है ॥१५।
इति पूजाविधिः सिद्धे मन्त्रेणानेन साधकः ।
इष्टान्नप्रयोगान्कुर्वीत सिद्ध्यन्ते नात्र संशयः ॥१६

४२० ] [ श्रीशारदा तिलक
क्रमात्सर्पिर्पामार्गतिलसर्षपपायसैः ।
साज्यैः सहस्रं प्रत्येकं यामिन्यां जुहुयात्सुधीः ।१७
होमोऽयं नाशयेत्सद्यो भूतकृत्याद्युपद्रवान् ।
सितकिंशुकनिर्गुण्डी होमाऽपामार्गसम्भवैः ।१८
समिद्वरैः कृतोहोमः पूर्ववद्भूतशान्तिदः ।
चपामार्गारग्वधयोः पञ्चगव्यसमुक्षिताः ।१६
समिधो जुहुयात्कृष्णपञ्चम्यां निशि संयतः ।
पृथक् सहस्रहोमेन भूतानां निग्रहो भवेत् ।२०
इस प्रकार से अर्चना आदि के द्वारा मन्त्र के सिद्ध हो जाने पर
साधक इस मन्त्र के द्वारा अपने अभीष्ट प्रयोगों का समाचरण करे । वे
सभी प्रयोग सिद्ध होते हैं-इसमें कुछ भी संशय नहीं है ।१६। फिर
क्रम से घृत- अपामार्ग-तिल- सरसों और पायस से प्रत्येक की
घृत के साथ सहस्र आहुतियाँ देवे और सुधी पुरुष रात्रि में होम करे ।
यह किया हुआ होम तुरन्त ही भूतों और कृत्या आदि के उपद्रवों का
विनाश कर दिया करता है । सफेद पलाश (ढाक) निर्गुण्डी के द्वारा
किया हुआ होम तथा अपामार्ग से समुद्भूत श्रेष्ठ समिधाओं से किया
गया होम पूर्व की ही तरह भूतों को शान्ति का देने वाला होता है ।
।१७-१८। अपामार्ग और आरग्वध की समिधाएं जो पञ्चगव्यमें संभु-
क्षित की गयी होवे ।१९। मास की कृष्ण पक्ष की पंचमी में रात्रि के
समय में संयत होकर हवन करे । पृथक् एक सहस्र होम से भूतों का
निग्रह होता है ।२०।
क्रमात्सर्पिरपामार्गं पञ्चगव्य दृविघूतैः ।
हुत्वा सहस्रं प्रत्येकं पात्रे संपा (१) नयेत्सुधीः ।२१
संपातसर्पिषा साध्यं भोजयेद्भूतशान्तये ।२२
मध्ये शक्तिं ससाध्यां स्वपगणसहितां केसरेष्वष्टवर्गा-
न्पत्रान्तर्म्मन्त्रवर्णान् लिखिय गुणमितानग्रदेनेषु तद्वत् ।

अष्टादश पटल ] [ ४२१
वर्म्मास्त्रोल्लासिकोणे दहनपुरयुगे कल्पिते भूपुरस्थे
यन्त्रेऽस्मिन्प्राग्विधानात्कृतकलशविधिः सर्वदुःखापहारी ।२३
षट्कोणे शक्तिरन्तः स्फुरयुगलवृत्ता प्रस्फुरद्वन्द्वकोणे
शिष्टैर्मन्त्रस्य वर्णै रसकरणचतुः षट् चतुर्वेदवेदैः ।
षडङ्गैः कॢप्ताष्टपत्रं दहनपुरयुगेनावृतं वर्म स्फुटः
राजत्कोणेन वीतं (वाह्यं) धरणिपुरयुगं यन्त्रमाघोरमेतत् ।२४
क्षुद्रचोरग्रहव्यालभूतापस्मारनाशनम् ।
यन्त्रमेतत्समाख्यातं सर्वसिद्धिप्रदातृकम् ।२५
क्रमसे घृतःअपामार्ग, पंचगव्य-हवि और घृतसे प्रत्येककी एक सहस्र
आहुतियां देवे और सुधी एक पात्रसे घृतका सम्पात करे।२१।उस सम्पात
के घृतसे साध्य व्यक्ति को भूतोंकी शान्तिके लिये भोजन करावे।२२।अब
एक मन्त्र बतलाया जाता है । इसका उद्धार इस तरहसे होता है-मध्यमें
साध्य के सहित शक्ति को जो स्वरगणसे सहित होवे लिखे और केसरों
में अष्ट वर्णों का लेखन करे तथा पत्रों के अन्दर मन्त्र के वर्णों को लिखे।
उसी भाँति अग्रदेशों में गुणमितों को लिखे । वर्म और अस्त्र से शोभित
कोण में लिखे । भूपुर में स्थित दहनयुगों के युग में जो कि कल्पित
किया गया होवे । इस मन्त्र में पूर्वोक्त विधान से कलश की विधि
को करे तो यह मन्त्र सब दुःखों का अपहरण करने वाला होता है ।२३।
अब अन्य मन्त्र को बतलाया जाता है-षट्कोण में शक्ति है और अन्दर
स्फुरित युगल से वृत हो । फिर प्रस्फुर द्वन्द कोणमें आवृता होव । मंत्र
के शिष्ट वर्णों से छै-करण-चार-सौ चार वेद वेदोंसे षडङ्ग क्लृप्त अष्टपत्र
को जो दहन पुरयुग से आवृत्त वर्म हो स्फुट से शोभित कोणसे परिवीत
करे और इसमें दो भूपुर होते है-यही अघोर मन्त्र होता है ।२४। यह
मन्त्र क्षुद्र चोर ग्रह-व्याल भूत-अपस्मार का नाश करने वाला है
और यह सब सिद्धियों का प्रदान करने वाला कहा गया है ।२५।
तारोवान्तोधरासंस्थो वामनेत्रेन्दुभूषितः ।
पार्श्वोवकः कर्णयुतो वर्म्माश्वान्तः षडक्षरः ।२६

४२२ ] [ श्रीशारदा तिलक
मनुः पाशुपतास्त्राख्यो ग्रहक्षुद्रनिवारणः ।
षडभिर्वणैः षडङ्गानि हुंकडन्तैः सजातिभिः ।२७
मध्याह्नाकंसमप्रभं शशिधरं भीमाट्टहासोज्ज्वलम् ।
त्र्यक्षं पन्नगभूषणं शिखिशिखाश्मश्रुस्फुरन्मूर्द्धजम् ।
हस्ताब्जैस्त्रिशिखं समुद्गरमसिं शक्ति दधानं विभुम् ।
दंष्ट्रोमिच्चतु' मुख' पशुपति दिव्यास्त्ररूप स्मरेत् ।२८
वर्णलक्षं जपेन्मत्रं जुहुयात्तद्दशांशतः ।
गव्येन सर्पिषा मन्त्री संस्कृते हव्यवाहने ।२६
शैवे पीठे यजेद्देवं प्राङ्गैरष्टमातृभिः ।
इन्द्र दिभिर्लोकपालै र्थज्राद्यै रायधैस्ततः ३०
अब पाशुपतास्त्र को बताते हैं तार-प्रणव व्यक्त-शकार, धरा-ल,
उसमें स्थित वामनेत्र-ई, इन्दु-अनुस्वार त भूषित है। पार्श्व पः, वकः--
श, कर्णयुत-उकार से संयुत, वर्मास्त्रान्तः षट् अक्षरों वाला है ।२६।
यह पाशुपत नामक मन्त्र ग्रहों और क्षुद्रों के निवारण करने वाला होता
है । जिसके अन्त में हुँ फट् हो ऐसे सजाति छै वर्णों से
छ अङ्गों को करना चाहिए ।२७। अब ध्यान बताया जाता है
मध्याह्न काल के सूर्य के समान प्रभा से समन्वित-चन्द्रदेव को धारण
करने वाले-परम भीषण अट्टाहास से समुज्ज्वल-तीन नेत्रों से युक्त-
सर्पों के भूषणों से संयुत की शिखा के समान श्मश्रु तथा स्फुरित
केशों से युक्त हस्त कमलों के द्वारा त्रिशिख सुन्दर-असि और
शक्ति का धारण करने वाले विभु का जो दाढों के द्वारा परम भीषण
चार मुखों वाले-दिव्य अस्त्र स्वरूप पशुपति प्रभु का स्मरण करना
चाहिये ।२८। इस मन्त्र में जितने वर्ण होवे उतने ही लाख इस मन्त्र
का जप करना चाहिये । और जप के दशांश भाग का गाय के घृत से
होम करे और मन्त्रधारी पुरुष को संस्कार किये हुये अग्नि में ही हवन
करना चाहिये ।२६। शैव पीठ पर देव का यजन करे जो प्राक् अङ्ग,
अष्ट मातृका-इत्यादि देवगण, लोकपाल और उनके वज्रादि आयुधों के

अष्टादश पटल ] [ ४२३
साथ ही यजन करे, तात्पर्य यह है कि सबका पूजन करना चाहिये।३०।
अनेन मन्त्रितं तोय ग्रस्तस्य वदनेक्षिपेत् ।
सद्यस्तं मुञ्चति क्रन्दन् ग्रहो मन्त्रप्रभावतः ।३१
अमुना मन्त्रितान् बाणान् विमृजेद्युधि भूपतिः ।
जयेत्क्षणेन निखिलाञ् शत्रून्पार्थ इवापरः ।३२
वर्णान्त्यमोबिन्दुयुक्तं क्षेत्रपालाय हृन्मनः ।
ताराद्योवसुवर्णोऽयं क्षेत्रपालस्य कीर्तितः ।३३
षड् दीर्घभाजा बीजेन षडङ्गान्यस्य योजयेत् ।
ऋषिर्ब्रह्मा भवेदस्य गायत्रं छन्द ईरितम् ।३४
क्षेत्रपालो देवता चलायेति शक्तिरीरितः ।३५
मन्त्र के द्वारा अभिमन्त्रित जल को जो भी ग्रस्त हो उसके मुख
में डाल देवे। इस मन्त्र के प्रभाव से ग्रह तुरन्त ही रुदन करता हुआ
उसका त्याग कर दिया करता है। इस मन्त्र के द्वारा अभिमन्त्रित किये
हुये बाणों को राजा यदि युद्ध में छोड़े यो वह दूसरे अर्जुन को ही
भाँति अपने शत्रुओं पर विजय प्राप्त कर लिया करता है ।३१-३२।
अब क्षेत्रपाल के मन्त्र का सोद्धार वर्णन किया जाता है-वर्णान्त्ये-
अः, औ-स्वरूप, हृत्-नमः यह पद, औ बिन्दु (अनुस्वार) से युक्त
होता है। नमः इसके पूर्व क्षेत्रपालाय-यह पद होता है। इसके आदि
में तार अर्थात् प्रणव होता है। यह क्षेत्रपाल का मन्त्र आठ वर्णों वाला
होता है, ऐसा कीर्त्तित किया गया है।३३। इसके छै दीर्घों के भजन
करने वाले बीज के अङ्ग को योजित करना चाहिये। इसका ऋषि
ब्रह्मा है और इसका छन्द गायत्र कहा गया है।३४। इसका देवता क्षेत्र-
पाल है और 'चलाय'-यह शक्ति कही गयी है ।३५।
नीलाञ्जनाद्रिनिभमूर्द्ध्वपिशङ्गकेशं
वृत्तोग्रलोचनमुपान्तगदाकपालम् ।
आशाम्बरं भुजगभूषणमुग्रदंष्ट्रं
क्षेत्रेशमद्भुततनुं प्रणमामि देवम् ।३६

४२४ ] [ श्रीशारदा तिलक
लक्षमेकं जपेन्मन्त्रं जुहुयात्तद्दशांशतः ।
चरूणा घृतसिक्तेन ततः क्षेत्रेशमर्चयेत् ।३७
धर्मादिकल्पिते पीठे पूर्वमङ्गानि पूजयेत् ।
अनलाख्यमग्निकेशं करालं तदनन्तरम् ।३८
घण्टारवम्महाकोपं पिशिताशनसंज्ञकम् ।
पिङ्गलाक्षमूर्ध्वकेशं पत्रेषु परितोयजेत् ।३६
प्रधानम॑तिप्रतिमान्नालङ्कारबन्धुरान् ।
लोकपालांस्तदस्त्राणि यथापूर्वं प्रपूजयेत् ।४०
अब ध्यान कहा जाता है-नील अंजन के सदृश ऊपर की ओर
पिशङ्ग वर्ण वाले केशों से युक्त, वृत्त और उग्रलोचनों से अन्वित-समीप
में ही गदा कपाल वाले--दिशाओं के वस्त्र वाले अर्थात् नग्न--सर्पों के
भूषणों से भूषित--उग्र दष्ट्राओं से युक्त--अद्भुत शरीर धारी देव
क्षेत्रपाल के लिए मैं प्रणाम करता हूँ ।३६। इस मन्त्र का एक लाख जाप
करे और जप का दशांश भाग घृतसे सिक्त चरुसे होम करना चाहिए ।
इसके अनन्तर क्षेत्रपाल का अर्चन करे ।३७। धर्मादि के द्वारा कल्पित
किये हुए पीठ पर पहिले अङ्गों का यजन करना चाहिये । अनल नामक
अग्नि केश कराल--घण्टारव महाकोप-पिशिताशन संज्ञा वाला पिङ्ग-
लाक्ष-ऊर्ध्व केश का सब ओर पत्रों में यजन करना चाहिए ।३८-३६।
प्रधान मूर्त्ति प्रतिमा--अनेक अलंकारों से बन्धुर--लोकपालों का तथा
उनके वज्रादि आयुधों का पूर्व की ही भाँति पूजन करना चाहिए ।४०।
तस्मै सपरिवाराय बलिमेतेन निर्हरेत् ।
पूर्वमेहि द्वयं पश्चाद्विदुषि स्यात्पुरुद्वयम् ।४१
भञ्जय द्वितय भूयोनर्नय द्वितयं पुनः ।
तत विघ्नपदद्वन्द्वं महाभैरवतत्परम् ।४२
क्षेत्रपाल बलिं गृहणद्वय पावकसुन्दरी ।
बलिंमन्त्रोऽयमाख्यातः सर्वकामफलप्रदः ।४३

अष्टादश पटल ]
सोपदंशं बृहत्पिण्ड कृत्वा रात्रिषु साधकः !
स्मृत्वा यथोक्तं क्षेत्रेशं तस्य हस्ते बलिं हरेत् ।४४
बलिनानेन सन्तुष्टः क्षेत्रपाल प्रयच्छति ।
कान्तिमेधावला रोग्यतेजः पुष्टियशः श्रियः ।४५
परिवार के सहित उनके लिए इसके द्वारा वलि का निर्हरण करे ।
पूर्व में 'एहि'--इस पद को दो बार कहे पश्चात् विदुषी पुरु-इसको दो
बार बोले । भञ्जय--इसको दो बार 'नर्त्तय'--इसको दो बार कहे ।
फिर विघ्न पद को दो बार कहे । इसके आगे महाभैरव'--यह पद कहे ।
इसके अनन्तर क्षेत्रपाल बलि 'गृह्ण' इस को दो बार कहकर अन्त में
पावकसुन्दरी 'स्वाहा'--वह पद कहे । यह बलि देने का मन्त्र कहा गया
है जो समस्त मनो कामनाओं के फलों का प्रदान करने वाला होता है ।
।४१-४३। उपदंश अर्थात् व्यंजन के सहित का एक बहुत बड़ा पिण्ड
बनाकर रात्रि के समय में साधक जैसा उनका स्वरूप बताया गया है
वैसे ही स्वरूप वाले क्षेत्रपाल का स्मरण करके हाथ में बलि देवे ।४४।
इस बलि से परम सन्तुष्ट होकर क्षेत्रपाल कान्ति, वन, आरोग्य तेज
पुष्टि, यश और श्री को प्रदान किया करते हैं । ४५।
उद्धरेद्वटुकं ङेऽन्तं आपदुद्धारणं तथा ।
कुरुद्वयं पुनर्ङेऽन्तं वटुक्रान्तं समुद्धरेत् ।४६
एकविंशत्यक्षरात्मा शक्ति ब्दो महामनुः ।
अभीष्टफलसंसिद्ध्यै कीर्तितः सुरपादपः ।४७
बृहदारण्यक ऋषिश्छन्दोऽनुष्टुबुदाहृतम् ।
आपदुद्धारणो देवो भैरवो देवता बुधैः ।४८
अङ्गुलीदेहवक्त्रेषु मूर्तीर्न्यस्येद्यथापुरा ।
सद्यादिपञ्चह्रस्वाढयशक्तिबीजपुरः सरम् ।४६
बकारं पञ्चह्रस्वाढयमीशानादिषु योजयेत् ।
षड्दीर्घयुक्तया शक्त्या वकारेण च तद्वता ।५०

४२६ ] [ श्रीशारदा तिलक
अङ्गानि जातियुक्तानि प्रणवाद्यानि कल्पयेत् ।
तस्य ध्यानं त्रिधा प्रोक्तं सात्विकादिविभेदतः ।५६
अब आपदुद्धारण मन्त्र बतलाया जाता है चतुर्थी विभक्ति के
अन्त वाले वटुक' का उद्धार करे फिर आपदुद्धारण'-इस पद को
कहे । फिर दो बार 'कुरु'-उस पद को कहे । फिर चतुर्थ्येन वटु कान्त
का उद्धार करे ।४६। यह महामन्त्र शक्ति से रुद्ध इक्कीस अक्षरों वाला
होता है। यह मन्त्र मनोभीप्सित फल की सिद्धि के लिये सुरपादप
अर्थात् कल्पवृक्ष कहा गया है-कल्पवृक्ष का यह प्रभाव होता है कि
उसके सामने जो भी व्यक्ति मन में सोचता है वही सिद्ध हो जाया
करता है । ऐसा ही इस मन्त्र का प्रभाव होता है ।४७। इस मन्त्र का
वृहदारण्यक ऋषि है और इसका छन्द अनुष्टुप् कहा गया है। बुधों के
द्वारा इनका देवता आपदुद्धारण भैरव कहा गया है ।४८। पूर्व की तरह
अङ्गुली-देह मुख के द्वारा इसकी मूर्त्तियों का न्यास करना चाहिये ।
सद्यादि पांच ह्रस्वों से आढ्य शक्ति बीज के पूर्वक पञ्चह्रस्वाढ्य
वकार को ईशान आदि में योजित करे । षड् दीर्घों से युक्त शक्ति से
और वैसे ही वकार से प्रणवाद्य जाति युक्त षट् अङ्गों की कल्पना
करनी चाहिये । सात्विक आदि भेदों से उसका ध्यान भी तीन प्रकार
का कहा गया है ।४६-५१।
वन्देबालं स्फटिकसदृशं कुन्तलोल्लासिवक्त्रम् ।
दिव्याकल्पैर्नवमणिमयैः किंकिणीनूराद्यैः ।
दीप्ताकारं विशदवसनं सुप्रसन्नं त्रिनेत्रम् ।
हस्ताब्जाभ्यां बटुकमनिशं शूलदण्डौ दधानम् ।५२
उद्यद्भास्करसन्निभं त्रिनयनं रक्ताङ्गरागस्रजम् ।
स्मेरास्यं वरदं कपालमभयं शूलं दधानं करैः ।
नीलग्रीवमुदारभूषणशतं शीतांशुचूडोज्ज्वलं
बन्धूकारुणवाससं भयहरं देवं सदा भावये ।५३

अष्टादश पटल ] [ ४२७
ध्यायेन्नीलाद्रिकान्तं शशिशकलधरं मुण्डमालं महेश
दिग्वस्त्रं पिङ्गकेशं डमरुमथशृणि खङ्गपाश शूलाऽभयानि
नाग घण्टाङ्कपालं करसरसिरुहैर्बिभ्रतं भीमदंष्ट्रम् ।
सर्वाकल्पं त्रिनेत्रं मणिमयविलसत्किंकिणीनुपुराढ्यम् ।५४
सात्विकं ध्यानमाख्यात मयमृत्यु निवारणम् ।
आयुरारोग्यजनन मपवर्ग फलप्रदम् ।५५
अब क्रम से तीनों ध्यानों को बतलाया जाता है - स्फटिक के
सदृश-केशों से शोभित मुख वाले नौरत्नों से परिपूर्ण दिव्य आभ-
रणों से और किंकणी नूपुर आदि से भूषित-दीप्त आकार वाले-
स्वच्छ एवं विशाल वस्त्रो से संयुक्त-परम प्रसन्न-तीन नेत्रों से
युक्त कर कमलों के द्वारा शूल और दण्ड को धारण करने वाले
वटुक की निरन्तर वन्दना करता हूं ।५२। उदीयमान भुवन भास्कर के
समान प्रभा से समन्वित-तीन नेत्रों से युक्त-रक्त अंगराग और
माला धारण करने वाले-हास्य युक्त मुख से अन्वित-वरदान दाता
करों द्वारा कपाल-अभयदान और शूल को धारण करने वाले -
नील ग्रीवा से युक्त-उत्तम सैकड़ों भूषणों से विभूषित-चन्द्र से
समुज्ज्वल चूड़ा वाले-बन्धूक पुष्प के तुल्य अरुण वस्त्रों को पहिने हुये-
भयके हरने वाले देवकी सदा भावना करता हूँ ।५३। नीलगिरिके समान
कान्त चन्द्र के खण्ड को धारण करने वाले-मुण्डों की माला पहिने
हुये-दिशाओं के वस्त्र वाले-पिङ्ग वर्ण के केशों से अन्वित-कर कमलों
के द्वारा डमरू-शृणि खड्ग-पाश् अभयदान-नाग-घण्टा- कपाल को
धारण करने वाले भीषण दाढोंसे युक्त-सर्पोंके भूषणों से भूषि-तीन नेत्रों
से युक्त मणियों से पूर्ण एवं शोभित किंकिणी ओर नूपुरों से आढ्य
महेश का ध्यान करना चाहिये ।५४। यह सात्विक ध्यान अपमृत्यु का
निवारक कहा है और आयु तथा आरोग्य का जनम ओर अपवर्गके फल
का होता है ।५५।

४२८ ] [ श्रीशारदा तिलक
राजसन्ध्यानमाख्यातं धर्मकामार्थसिद्धिदम् ।
तामस शत्रुशमन कृत्याभूतग्रहा (गदा) पहम् ॥५६
वर्णलक्ष जपेन्मन्त्रं हविष्याशी जितेन्द्रियः ।
तद्दशांश प्रजुहुयात्तिलैर्मधुरसंयुतैः ॥५७
धर्माधर्मादिभिः कल्पते पीठे पङ्कज शोभिते।
षट्कोणान्तस्त्रि कोणस्थव्योम पङ्कजसंयुते ॥५८
वटुक तजयेद्देवं मूर्ति मूलेन कल्पयेत् ।
सद्योजातेन मन्त्रेण देवमावाहयेत्ततः ॥५९
मूलादिवामदेवेन स्थापयेत्परमेश्वर ।
मूलमन्त्रेण कर्त्तव्यं सान्निध्यं तदनन्तरम् ।६०
दूसरा राजस ध्यान है। यह धर्म--काम और अर्थ की सिद्धि
का प्रदाता होता है, ऐसा कहा गया है। तीसरा तामस ध्यान है। यह
शत्रुओं के शमन करने वाला होता है ओर कृत्या, भूत, महाग्रहों के
अवहनन करने वाला है ।५६। इस मन्त्र में जितने वर्ण हैं उतने
ही लाख इस मन्त्र का जप करना चाहिये और जप करने वाले व्यक्ति
को हविष्य का अशन करने बाला तथा इन्द्रियों को जीतकर रखने
वाला होना चाहिए। जप का दशवां भाग मन्त्र द्वारा मधुरों से संयुत
तिलों के द्वारा हवन करे। धर्माधर्मादि से कल्पत पर जो पंकजों
से शोभित होवे और जो षट्कोण के अन्दर स्थित त्रिकोण में स्थित
व्योम पंकजों से संयुत होवे । ५७-५८। उस पीठपर बटुक देव की पूजा
करे और मूल मन्त्र के द्वारा ही मूर्त्ति की कल्पना कर लेनी चाहिए ।
फिर सद्योजात मन्त्र के द्वारा देव का आवाहन करे ।५६। मूलादि
वामदेव के द्वारा परमेश्वर की स्थापना करनी चाहिए। इसके अनन्तर
मूलमन्त्र से सान्निध्य करे ।६०।
अघोरेण सुधीः कुर्यात्सन्निरोधमनन्तरम् ।
तुरुषाख्येन मनुना योनिमुद्रां प्रदर्शयेत् । ६१

अष्टादश पटल ] [ ४२६
देवाय वन्दन कुर्यादीशानेन समाहितः ।
एतत्सर्वं विधातव्यं तत्तन्मुद्राभिरादरात् ।६२
ईशानादीन्यजेद्देवान्न्यासमार्गेण देशिकः ।
सकलीकरणं कृत्वा यजेन्मूर्तीर्यथापुरा ।६३
व्योमपद्मदलेष्वर्चे दमसिताङ्गादिभैरवान् ।
असिताङ्गं रुरुं चण्डं क्रोधमुन्मत्तभैरवम् ।६४
कपालिनं भीषणाख्यं संहारं च क्रमादमन् ।
षट् कोणेषु षडङ्गानि क्रमादभ्यर्चयेत्सुधीः ।६५
सुधी को चाहिए कि वह अघोर मन्त्र से इसके अनन्तर
सन्निरोध करे । पुरुषाख्य मन्त्र के द्वारा योनि मुद्रा को प्रदर्शित करे
।६१। फिर परम सावधान होकर ईशान के द्वारा देव के लिए वन्दना
करनी चाहिए । यह सभी कुछ बड़े आदर के साथ उस-उस मुद्रा के
द्वारा ही करना चाहिए ।६२। आचार्य ईशान आदि देवों का न्यास के
मार्ग द्वारा यजन करे । सकलीकरण करके पूर्व की ही तरह से मूर्त्तियों
का अभ्यर्चन करे ।६३। व्योम पद्म दलों में असिताङ्गादि भैरवों का-
अर्चन करना चाहिये । अब उन भैरवों का नामों का परिगणन करके-
बताया जाता है—असिताङ्ग—रुद्र—चण्ड—क्रोध—उन्मत्त भैरव—
कपाली—भीषण और संहार—इनका क्रम से ही अर्चन करना चाहिए
यह सुधी का कर्त्तव्य है । षट्कोणों में क्रम से छै अङ्गों का अर्चन करे
।६४।६५।
पूर्वादीशामनपर्यन्तं तद्बहिः पूजयेदिमान् ।
डाकिनीपुत्रकान्पूर्वं राकिनीपुत्रकांस्ततः ।६६
लाकिनीपुत्रकान्पश्चात्काकिनीपुत्रकास्ततः ।
शाकिनीपुत्रकान्भूयो हाकिनीपुत्रकान्पुनः ।६७
मालिनीपुत्रकान्पश्चाद्देवीपुत्रांस्ततः परम् ।
अथोमारुद्रमातृणां पुत्रान्दक्षिणतोयजेत् ।६८

४३० ] [ श्रीशारदा तिलक
ऊर्ध्वमुख्याः सुतानूर्ध्वमधोमुख्याः सुतानधः ।
इति सम्पूजयेन्मन्त्री पुत्रवर्गा स्त्रयोदशः ।६६
तद्वहिः पद्मपत्रेषु लोकेशवटुकान्यजेत् ।
ब्रह्माणपुत्रकं पूर्वे माहेशीपुत्रमैश्वरे ।७०
पूर्व दिशा में ईशान पर्यन्त उनके बाहर इनका पूजन करना
चाहिये-पूर्व में डाकिनी पुत्रों का-फिर डाकिनी पुत्रों का-पीछे
लाकिनी पुत्रों का--इनके अनन्तर काकिनी के पुत्रों का, शाकिनी के
पुत्रों का, फिर हाकिनी के पुत्रों का फिर मालिनी के पुत्रों का । इसके
अनन्तर देवों के पुत्रों का--इसके उपरान्त उमा रुद्र मातृकायों के पुत्रों
का दक्षिण की ओर यजन करना चाहिये ।६६-६८। ऊर्ध्व में मुख
सुतो का ऊर्ध्व में और अधोमुख्य सुतों का अधोभाग में इस तरह से
मन्त्रधारी को इन तेरह पुत्र वर्गों का अच्छी तरह से पूजन करना
चाहिये ।६६। इनके बाहरी भागों में पद्म के पत्रों में लोकों के ईश
वटुकों का यजन करना चाहिये । पूर्व दिशा में ब्राह्मणी पुत्र का अर्चन
करे ओर ईश्वर की दिशा मे माहेशी के पुत्रों का अर्चन करना
चाहिये ।७०।
वैष्णवीपुत्रक सौम्ये कौमारीपुत्रमानिले ।
इन्द्राणीपुत्रकं भूयः पूजयेत्पश्चिमे तमः ।७१
महालक्ष्मीसुतं पश्चाद्रक्षोदिशि समर्चेयेत् ।
वाराहीपुत्रकं याम्ये चामुण्डासुतमानले ।७२
वटुकान्दशदिक्ष्वर्चेद्धेतुक त्रिपुरान्तकम् ।
बेताल वह्निजिह्वाख्यं कालान्ताख्य करालकम् ।७३
एकपादं भीम दंष्ट्रमचल हाटकेश्वरम् ।
दिग्वि दिक्ष्वन्तरालेषु श्रीकण्ठान्-जेत्पुनः ।७४
क्रोधीशवरादीनव्वृवन्तांस्तद्वद्बाह्ये समर्चेयेत् ।
ततस्त्रीन्नकुलीशाद्यान्दक्षिणे पूजयेत्सुधीः ।७५

अष्टादश पटल ] [ ४३१
वैष्णवीके पुत्र का सौम्य दिशा में और कौमारी पुत्र का वायव्य में
यजन करे। इसके उपरान्त इन्द्राणी के पुत्र का पश्चिम दिशा में पूजन
करना चाहिये ।७१। राक्षस दिशा में पीछे महालक्ष्मीके पुत्र का समर्चन
करे। याक्ष्य दिशा में वाराही के पुत्र का तथा आनिल दिशा में सुत का
यजन करना चाहिये ।७२। वटुकों का दशों दिशाओं में अर्चन करे।
धेनुक-त्रिपुरान्तकवेताल वह्नि जिह्वाख्य, कालान्त, करालक पाद, भीम-
दष्ट्र, अचल, हाटकेश्वर का दिशा, विदिशाओं के अन्तरालों में
यजन करे ओर फिर श्रीकण्ठ आद का अर्चन करे। इनके बाहिरी
भाग में क्रोधीश्वर से आदि भृगु के अन्त तक का समर्चन करना
चाहिये । ७४-७५ । इस के अनन्तर सुधी पुरुष दक्षिण
में तीन नकुलीशाद्यो का पूजन करे । ७५ ।
दिव्यन्तरिक्षभूमिष्ठान्यो गीशान् शक्तिसंयुतान् ।
योगिनीभिः सहाभ्यर्च्यदीशाग्निन्र्ऋतिस्थितान् ।७६
इति सम्पूज्योद्देव वटुकं प्रोक्तवर्त्मना ।
धर्मार्थकाममोक्षाणां पतिर्भवति मानवः ।७७
विघ्नदुर्गा समाराध्य बलिं दत्वा विधानतः ।
काम्यामि साधयेन्मन्त्रा यथोक्तां सिद्धिमाप्नुयात् ।७८
शाल्यन्नं पलहं सर्पिर्लाजाचूर्णानि शर्करा ।
गुडमिक्षु०रसापूपर्मध्वक्तैः परिमिश्रितैः ।७९
कृत्वा कवलमाराध्य देवं प्रागुक्तवर्त्मना ।
रक्तचन्दनपुष्पाद्यैनिशि तस्मै बलिं हरेत् ।८०
ईशान-निऋ'ति, अग्नि दिशाओं में स्थित दिविलोक ओर
भूमि में स्थित शक्ति से समन्वित योगीशों का योगिनियों के ही साथ
में अभ्यर्चन करना चाहिये ।७६। इस प्रकार से कथित मार्ग के द्वारा
वटुक देव का पूजन करे । इसके प्रभाव से मानव धर्म--अर्थ--काम--
और मोक्ष का स्वामी हो जाता है। अर्थात् ये सभी उसे आसानीसे
प्राप्त हो जाते हैं ।७७। विघ्न दुर्गा का समाराधन करके विधान के

४३२ ] [ श्रीशारदा तिलक
साथ बलि देवे । इसका यह प्रभाव होता है कि मन्त्रधारी पुरुष अपने
काम्य कर्मों का साधन कर लिया करता है और यथोक्त सिद्धि की प्राप्ति
कर लिया करता है ।७८। शाली अन्न - पलल - घृत लाजाओं का
चूर्ण -- शक्कर -- गुण - ईख का रस और पूजा-इन सबको मधु में
अक्त करके परिमिश्रित करके कवल बनावे और पूर्व में कथित मार्ग से
देव का समाराधन करके रदत चन्दन पुष्प आदि के द्वारा रात्रि में उन
के लिए बलि का आहरण करना चाहिए ।७६-८०।
ततः सिध्यन्ति कार्याणि बलिनानेन मन्त्रिणः ।
जुहुयात्सर्पिषा मन्त्री यथोक्तां सिद्धिमाप्नुयात् ।८१
वश्याय जुहुयादिक्षुशनलैर्वशयेज्जनान् ।
जुहुयात्पुत्रलाभाय प्रफुल्लैः कैरवैः सुधीः ।८२
धनधान्यादिसम्पत्त्ये जुहुयादिलतण्डलैः ।
विल्वप्रसूनैर्जुहुयान्महतीं बिन्दति श्रियम् ।८३
लोणैर्मधुरसम्मिश्रैर्वशपद्वनिताजनान् ।
वृष्टिकामेन होतव्यं वेतसानां (सस्य) समिद्वरैः ।८४
अन्नेन जुहुयान्नित्यं धनधान्यादिसम्पदे ।
वश्याय जुहुयान्मन्त्री मधुना दिवसत्रतम् ।८५
इसके उपरान्त मन्त्रधारी के इस बलि के करने से समस्त
कार्य सिद्ध हो जाते हैं । मन्त्रधारी घृत से होम करे तो यथोक्त सिद्धि
को प्राप्त कर लिया करता है ।८१। वश्य के लिए ईख के खण्डों से होम
करे तो वह सभी मनुष्यों को अपने वंश में कर लिया करता है।
सुधी पुरुष को पुत्र के लाभ के लिए खिले हुए कैरव के पुष्पों से होम
करना चाहिए ।८२। धनधान्य आदि की सम्पदा के प्राप्त होने के
लिए तण्डुलों से होम करना चाहिए। यदि विल्व वृक्ष के पुष्पों से
हवन करे तो बहुत बड़ी श्री का लाभ मनुष्य किया करता है ।८३।
मधुर से सम्मिश्रित लवणों से यदि होम करे तो वनिताजनों को अपने
वश में कर लिया करता है । यदि वृष्टि कराने की कामना हो तो

अष्टादश पटल ] { ४३३
वेतसों की श्रेष्ठ समिधाओं के द्वारा हवन करे ।८४। धनधान्य आदि
की सम्पदा के लिए अन्न के द्वारा ही नित्य होम करना चाहिए ।
मन्त्रधारी को चाहिए कि वश्य करने के लिए तीन दिन पर्यन्त मधु से
होम करे ।८५।
रोगोक्तौषधहोमेन रोमा नश्यन्ति तत्क्षणात् ।
कृत्याद्रोहे ग्रहे द्रोहे भूतापस्मारसम्भवं ।८६
व्याघ्राजिने समासीनोजुहुयादयुतं तिलैः ।
भतादयः पलायन्ते नेक्षन्ते तां दिशं भयात् ।८७
कृष्णाष्टमी समारभ्य यावत् स्यात्तच्चतुर्दशो ।
तिलैस्तण्डुलसम्मिश्रैर्मधुरत्रयलोलितैः ।८८
त्रिसहस्रं प्रतिदिनं जुहुयात्संस्कृतेऽनले ।
बटुकेश्वरमभ्यर्च्य भक्ष्यभोज्यफलान्वितम् ।८६
नित्यं निवेद्य नैवेद्यं मध्यरात्रे बलि हरेत् ।
एवं जपित्वा प्रयत: सहस्राण्येकविंशतिम् ।६०
समाप्तिदिवसे नात्रावज हत्वा बलि हरेत् ।
ततः कारयिता राजा तोषयेत्साधकं धनै ।६१
विधिनानेन सन्तुष्टो बटुकेशः प्रयच्छति ।
तेजो बल यशः पुत्रान्कान्ति लक्ष्मीमरोगताम् ।६२
रोग में कही हुई औषध के होम करने से रोग उसी क्षण में नष्ट
हो जाया करते हैं । कृत्या के द्रोह में-ग्रहों के द्रोह में-भूतों और
अपस्मार के रामुत्पन्न होने पर व्याघ्रचर्म पर स्थित होकर तिलों के
द्वारा दश सहस्र आहुतियाँ देवे । इस होम के करने से भूत आदि सब
भाग जाया करते है और उस दिशा की ओर भय से देखते भी नहीं
हैं ।८६-८७। मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी से आरम्भ करके जब तक
चतुर्दशी होवे तीनों मधुरों में लोलित करके तण्डुलों से मिश्रित
तेलों से हवन करे और प्रतिदिन तीन सहस्र आहुतियाँ देवे तथा
संस्कार किये हुये अग्नि में ही होम करना चाहिये । वटुकेश्वर का

४३४ ] [ श्रीशारदा तिलक
अभ्यर्चन करके भक्ष्य भोज्य और फलों से समन्वित नैवेद्य का नित्य
निवेदन करके रात्रि के मध्य में बलि का अपहरण करे । इस प्रकार
से प्रयत होकर इक्कीस हजार जप करे और समाप्ति के दिन में रात्रि
में बकरा का हनन करके बलि का अपहरण करे । राजा इस तरह इसे
कराकर धनों के द्वारा साधक पुरुष को सन्तुष्ट करे । इस विधि से करने
पर वटुकेश परम सन्तुष्ट होकर तेज, बल, यश, पुत्रगण, कान्ति, लक्ष्मी
और निरोगता को प्रदान किया करते हैं ।५६-६२।
नश्यन्ति शत्रवः सर्वे वर्द्धन्ते बन्धुबान्धवाः ।
अवग्रहो न जायेत विषये तस्य भूपतेः ६३
जुहुयात्केवलैर्लोणैरयुतं स्तम्भनेच्छया ।
निगडादिविमोक्षाय प्रयोगोऽयमुदाहृतः ।६४
बचाचूर्णपलं जप्तं गव्येनाज्येन लोलितम् ।
विभज्य भक्षयेद्वन्ध्या मण्डलात्पुत्रकांक्षिणी ।६५
विनीतं पुत्रमाप्नोति मेधाऽऽरोग्यबलान्वितम् ।
आदावन्ते प्रयोगस्य वटुकाय बलि हरेत् ।६६
द्विविधो बलिराख्यातो राजसः सात्विको बुधैः ।
राजसो मांसरक्ताढन्नःपलत्रयसमन्वितः ।६७
उसके सभी शत्रुगण नष्ट हो जाया करते हैं और उसके बन्धु-
बान्धवों की वृद्धि होती है । उस राजा के देश में अवग्रह नहीं हुआ
करता है ।६२। यदि किसी के स्तम्भन करने की इच्छा हो तो केवल
लोण से दश सहस्र आहुतियां देनी चाहिये । बन्धन आदि के विमोक्षण
करने के लिये यह प्रयोग उदाहृत किया गया है ।६४। वच के चूर्ण को
गो के घृत में लोलित करके एक पल प्रमाण को अभिमन्त्रित करे । फिर
इसको विभक्त करके वन्ध्या नारी खावे । जो मण्डल से पुत्र की प्राप्ति
आकांक्षा रखने वाली होवे तो यह नारी परम विनीत पुत्र को
किया करती है, जो मेधा-आरोग्य और बल से अन्वित हुआ करता।
आदि में और अन्त में प्रयोग करने पर वटुक के लिये बलि का

अष्टादश पटल ] [ ४३५
आहरण करना चाहिये ।६४-६५। बुध पुरुषों के द्वारा दो प्रकार का
बलि बताया है। एक सात्विक होता है और दूसरा राजस बलि हुआ
करता है। जो राजस बलि होता है वह रक्त-माँस से अन्वित होता है
और तीन फलों से युक्त होता है ।६७।
मुद्गपायससंयुक्त्तो मधुरत्रयलोलितः ।
सात्विको मांंसरहितः शेषमन्यत्पुरोक्तवत् ।६८
ब्राह्मणो विनयः शुद्धः सात्विकं बलिमाहरेत् ।
साधयन्मनुनाने भस्म सर्वार्थसिद्धिदम् ।६६
उशीर चन्दनं कोष्ठ घनसारं सकुंकुमम् ।
श्वेताकंमूलं वाराहीं लक्ष्मी क्षीरमहीरुहाम् ।१००
त्वचो बिल्वत्तरोर्मूलं शोषयित्वा सुचूर्णयेत् ।
चूर्णं व्योम्नि गृहीतेन गोमयेन विमिश्रिम् ।१०१
कृत्वा पिण्डानि संशोष्य संस्कृते हव्यवाहने ।
मूलेन दग्ध्वा तद्भस्म शुद्धपात्रे वनिःक्षिपेत् ।१०२
जो सात्विक बलि होता है वह मूंग व पायस से संयुक्त और मधुर
त्रय में लोलित होता है। सात्विक बलि माँस से रहित होता है और
शेष सब पूर्व में कहे हुये ही की भांति हुआ करता है ।६८। विनय से
युक्त और शुद्ध ब्राह्मण सात्विक बलि का ही आहरण करे । इस मन्त्र के
द्वारा साधन करते हुआ जो भस्म होती है वह सब अर्थ और सिद्धि से
प्रदान करने वाली हुआ करती है ।६६। अब भस्म के साधन का प्रकार
बताया जाता है, शरीर, चन्दन, कुष्ठ, कपूर, कुंकुम, श्वेत
आक का मूल, बाराही, लक्ष्मी, और दूध वाले वृक्षोंकी त्वचा (वल्कल)
विल्व वृक्ष की जड़-इस सबको सुखाकर कूट-पीस कर चूर्ण बना लेवे ।
चूर्ण को व्योम गृहीत कर गोमय से विमिश्रित करे ।१००-१०१। उसके
पिण्ड बनाकर सुखावे तथा संस्कार की हुई अग्नि में मूल-मन्त्र से जला
कर उस भस्म को शुद्ध पात्र में विनिक्षिप्त कर देवे ।।१०२।

४३६ ] [ श्रीशारदा तिलक
केतकी मालती पुष्पैर्वासयेत् भस्म शोधितम् ।
अयुतं प्रजपेन्मन्त्रं स्पृष्ट्वा भस्म सुपुजितम् ।१०३
एतदादाय दिनशः प्रातः पुण्ड्रं करोति यः ।
तस्य रोगाः प्रणश्यन्ति कृत्यादोहमहाग्रहाः ।१०४
रिपुचौरमृगादिभ्यो भयमस्य न जायते ।
वर्द्धन्ते सम्पदः सर्वाः पूज्यते सकलैर्जनैः ।१०५
राजा वश्योमवेत्तस्य सामात्यः सपरिच्छदः ।
अभिषेकं प्रकुर्वीत राज्ञो विजयकांक्षिणः ।१०६
पूर्वोक्ते मण्डपे कॢप्ते वितानध्वजशोभिते ।
सर्वतोभद्रमालिख्य कर्णिकां तस्य पूरयेत् ।१०७
उस शोभित भस्म को केतकी और मालतीके पुष्पोंसे वासित करे ।
उस भली भाँति पूजित भस्म का स्पर्श करके दश सहस्र की संख्या में
मन्त्र का जप करना चाहिये ।१०३। इसको ग्रहण करके दिन में जो
पुरुष प्रातःकाल में पुण्ड्र (तिलक) करता है उस पुरुषके सब रोग और
कृत्या द्रोह तथा महान ग्रह सभी नष्ट हो जाया करते हैं ।१०४। शत्रू-
चोर और हिंसक पशु आदि से भी इस पुरुष को कभी भी भय नहीं
हुआ करता है। इस पुरुष की सभी सम्पदायें बढा करती हैं और
यह पुरुष सभी जनों के द्वारा पूजा जाया करता है ।१०५। उस पुरुष
का राजा अपने अमात्यों के सहित और सम्पूर्ण परिच्छद के साथ वश्य
हो जाया करता है। जो राजा विजय की आकाङ्क्षा रखता हो उस
राजा का अभिषेक करना चाहिये ।१०६। पूर्व में वर्णित मंडप में जो
कॢप्त किया गया है और वितान और ध्वजा पताओं से सुशोभित है
इसमें सर्वतोभद्र का आलेखन करके उसकी कर्णिका को पूरित कर देना
चाहिये ।१०७
अष्टद्रोणप्रमाणेन् शालिभिः शोभितैः शुभ्रैः ।
तदर्द्धन्तण्डुलांस्तस्मिन्न्यस्य दूर्वाक्षतान्विताम् ।१०८