शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 424, कुल 511 में से
संदर्भ में पढ़ें४२४ ] [ श्रीशारदा तिलक
लक्षमेकं जपेन्मन्त्रं जुहुयात्तद्दशांशतः ।
चरूणा घृतसिक्तेन ततः क्षेत्रेशमर्चयेत् ।३७
धर्मादिकल्पिते पीठे पूर्वमङ्गानि पूजयेत् ।
अनलाख्यमग्निकेशं करालं तदनन्तरम् ।३८
घण्टारवम्महाकोपं पिशिताशनसंज्ञकम् ।
पिङ्गलाक्षमूर्ध्वकेशं पत्रेषु परितोयजेत् ।३६
प्रधानम॑तिप्रतिमान्नालङ्कारबन्धुरान् ।
लोकपालांस्तदस्त्राणि यथापूर्वं प्रपूजयेत् ।४०
अब ध्यान कहा जाता है-नील अंजन के सदृश ऊपर की ओर
पिशङ्ग वर्ण वाले केशों से युक्त, वृत्त और उग्रलोचनों से अन्वित-समीप
में ही गदा कपाल वाले--दिशाओं के वस्त्र वाले अर्थात् नग्न--सर्पों के
भूषणों से भूषित--उग्र दष्ट्राओं से युक्त--अद्भुत शरीर धारी देव
क्षेत्रपाल के लिए मैं प्रणाम करता हूँ ।३६। इस मन्त्र का एक लाख जाप
करे और जप का दशांश भाग घृतसे सिक्त चरुसे होम करना चाहिए ।
इसके अनन्तर क्षेत्रपाल का अर्चन करे ।३७। धर्मादि के द्वारा कल्पित
किये हुए पीठ पर पहिले अङ्गों का यजन करना चाहिये । अनल नामक
अग्नि केश कराल--घण्टारव महाकोप-पिशिताशन संज्ञा वाला पिङ्ग-
लाक्ष-ऊर्ध्व केश का सब ओर पत्रों में यजन करना चाहिए ।३८-३६।
प्रधान मूर्त्ति प्रतिमा--अनेक अलंकारों से बन्धुर--लोकपालों का तथा
उनके वज्रादि आयुधों का पूर्व की ही भाँति पूजन करना चाहिए ।४०।
तस्मै सपरिवाराय बलिमेतेन निर्हरेत् ।
पूर्वमेहि द्वयं पश्चाद्विदुषि स्यात्पुरुद्वयम् ।४१
भञ्जय द्वितय भूयोनर्नय द्वितयं पुनः ।
तत विघ्नपदद्वन्द्वं महाभैरवतत्परम् ।४२
क्षेत्रपाल बलिं गृहणद्वय पावकसुन्दरी ।
बलिंमन्त्रोऽयमाख्यातः सर्वकामफलप्रदः ।४३