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शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

पृष्ठ 70, कुल 511 में से

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६६ ] [ श्रीशारदा तिलक
अंगुलोत्सेधसंयुक्तं चतुरस्रं समं ततः ।
एवं प्रोक्तानि कथ्यन्ते स्रुक्स्रुवौ ततः ।६३
छेदन और मारण कर्मों में कूण्ड षडस्र पद्म के तुल्य होता है ।
अष्टास्र कुण्ड शान्ति के प्रदान करने वाला और रोगों का शयन करने
वाला होता है ऐसा कहा गया है ।८८। विप्रों का कुण्ड चतुरस्र और
क्षत्रियों का कुण्ड वर्त्तुल अर्थात् गोलाकार हुआ करता है । वैश्यों का
कुण्ड आधे चन्द्रमा के आकार के तुल्य तथा शूद्रों का कुण्ड त्र्यस्र हुआ
करता है ।८६। कुछ आचार्यों का मत है कि सबका कुण्ड चतुरस्र ही
होता है । कुण्ड का रूप प्रकृति का ही परम रूप कहा जाता है ।६०।
इसका शिर प्राची में अर्थात् पूर्व दिशा में कहा गया है तथा इसकी
बाहू दक्षिण और सौम्य दिशाओ में होती है। उदर कुण्ड है तथा योनि
पश्चिम की ओर होता है ।६१। नित्य और नैमित्तिक होम का समाच-
रण स्थन्डिल में करना चाहिये । उसने एक हाथ भर का वालुकाओं से
ही परम शोभन बनाना चाहिए ।६२। यह अंगुल के उत्सेधसे युक्त और
फिर समचतुरस्र बनावे । इस प्रकार से कुण्ड बतलाये गये हैं । इसके
उपरान्त स्रूक् और स्रूव कहे जाते ।६३।
प्रकल्पयेत्स्रूचं यागे वक्ष्यमाणेन वर्त्मना।
श्रीपर्णीशिशपाक्षीरशाखिष्वेकमयं गुरुः ।६४
गृहीत्वा विभजेद्धस्तमात्रं षट्त्रिंशता पुनः ।
विंशत्यंशैर्भवेद्दण्डो वेदी तैरष्टभिर्भवेत् ।५६
एकांशेन मितः काण्ठः सप्तभागमितं मुखम् ।
वेदिद्व्यंशेन विस्तारः कण्ठस्य परिकीर्तितः ।६६
अग्रं कण्ठसमानं स्यान्मुखे मार्गं प्रकल्पयेत् ।
कनिष्ठांगुलिमानेन सर्पिषो निर्गमाय च ।६७
वेदिमध्ये विधातव्या भागेनैकेन कर्णिका ।
विदधीत वहिस्तस्या एकांशेनाभितोऽवटम् ।६८