सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

पृष्ठ 69, कुल 511 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 69

तृतीय पटल ] [ ६५
पुत्रप्रदं योनिकुण्डमर्द्धेन्द्राभं शुभप्रदम् ।
शत्रुक्षयकरं त्र्यस्रं वर्त्तुलं शान्तिकर्मणि ।८७
एक मुष्टि मात्र परिमाण वाला कुण्ड अर्धशत का प्रसिद्ध है । जो
शतहोम है । वहाँ पर कुण्डअरत्निमात्र होना चाहिये ओर सहस्र आहु-
तियों के लिये एक हाथ परिमाणं का कुण्ड होता है ।८३। दश हजार
आहुतियों के लिये दो हाथ का कुण्डऔर एक लाख में चार हाथों के
प्रमाण वाला कुण्ड होना चाहिये । दश लाख आहुतियाँ जहाँ पर होवें
वहाँ पर छै हाथ का और एक करोड़ आहुतियों के लिये आठ हाथ का
कुण्ड होना चाहिये ।८४। हाथ परिमाण का कुण्ड एक लाख के
लिये किया जाता है । जहाँ तक दश लाख है वहाँ पर उतने ही
हाथ बढ़ा देना चाहिये ।८५। दश हाथ परिमाण वाला कुण्ड एक करोड़
के होम में भी अशस्त माना जाया करता है । सब प्रकार की सिद्धियों
के करने वाला कुण्डचतुरस्र ( चौकोर ) ही उदाहृत किया गया है ।८६।
योनि-कुण्डपुत्र का प्रदान करने वाला होता है ओर अर्धचन्द्र की आभा
वाला कुण्ड शुभप्रद होता है । त्र्यस्र शत्रुओं के क्षय का करने वाला
है ओर जो कुण्ड वर्त्तुल होता उसको शान्ति कर्म में प्रयुक्त करना
चाहिये ।७८।
छेदमारणयोः कुण्डं षडस्रं पद्मसंन्निभम् ।
वृष्टिदं रोगशमनं कुण्डमष्टास्रमीरितम् । ८८
विप्राणां चतुरस्रं स्याद्राज्ञां वर्त्तुलमिष्यते ।
वैश्यानामर्द्धचन्द्राभं शूद्राणां त्र्यस्तमीरितम् ।८६
चतुरस्रं तु सर्वेषां केचिदिच्छन्ति (२) देशिकाः ।
कुण्ड (१) रूपं तु जानीयात्वा रमं प्रकृतेर्वपुः ।६०
प्राच्यां शिरः समाख्यातं बाहू दक्षिणसौम्ययोः ।
उदरं कुण्डमित्युक्तं योनिः (२) पश्चिमतर्भवेत् ।६१
नित्यं नैमित्तकं होमं (३) स्थण्डिले वा समाचरेत् ।
हस्तमात्रेण तत्कुर्याद्वालुकाभिः सुशोभनम् ।६२