शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
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क्षेत्रं विभज्य मध्यांशे पूर्वादि परिकल्पयेत् ।
अष्टास्वाशासु कुण्डानि रम्याकाराण्यनुक्रमाद् ।४८
भूतों के लिए बलि में लाजा, तिल, हरिद्रा, दधि, सक्तु और अन्न
ये होते हैं। पितृभ्यों के लिए तिलों के सहित तण्डुल बताये गये हैं ।
यक्षों के लिए आरम्भ और लाजा ( खील ) होते हैं । नागों के लिए
नारियल के जल से सतन्वित सक्तुपिष्ट होता है और ब्रह्मा के लिये
पंकज तथा अक्षत है। शर्व के लिए पूजों के सहित अन्न तथा विष्ण
भगवान्की गुड़ और ओदन होता है ।४३-४५। उसके अनन्तर लोकपालों
के लिए भी विधि के साथ बलि का वितरण करना चाहिए । दीक्षा में,
अभिषेकों में, नवीन गृह के प्रवेश करने में, उत्सवों में सम्पदा के लिए
अंकुरार्पण करना ही चाहिए । पूर्व में वर्णित मण्डप में विद्वान् पुरुषको
वेदिका से बाहिर तीन भागों में क्षेत्र का विभाग करके मध्यांशमें पूर्वादि
दिशाओं की कल्पना कर लेनी चाहिए । और अनुक्रम से रम्य आकार
वाले कुण्डों की आठों दिशाओं में रचना करनी चाहिए ।४४-४८।
चतुरस्रं योनिमर्द्धचन्द्रं त्र्यस्रं सुवर्तुलम् ।
षडस्रं पंकजाकारमष्टास्रं तानि नामतः ।४६
आचार्य कुण्डं मध्ये स्यान्गौरीपतिमहेन्द्रयोः ।
हस्तमानमितां भूमि पूर्ववत्परिकल्पयेत् ।५०
समन्तात्कुण्डमेतत्सयाच्चतुरस्रं शुभावहम् ।
चतर्विशत्यंगुलाढयं हस्तं तन्त्रविदोविदुः ।५१
कर्तुर्दक्षिणहस्तस्य मध्यमांगुलिपर्व्वणः ।
मध्यस्य दीर्घमानेन मानांगुलमुदीरितम् ।५२
यवानामष्टभिः क्लृप्तं मानांगुलमुदीरितम् ।
चतुरस्त्रीकृतं क्षेत्रं पञ्चधा विभजेत्सुधीः ।५३
न्यसेत्पुरस्तादेकांशं कोणादर्द्धार्धतप्रमाणतः ।
भ्रामयेत्कोणमानेन तथान्यदपि मन्त्रवित् ।५४