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सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary

जगद्गुरु आदि शंकराचार्य द्वारा

DevanagariHindipublished415 पृष्ठ

१३४ सौन्दर्य लहरी
को देखने से काम की भावना का उदय होना संभव है । प्रकृति
देवी के सूर्य चन्द्र रूपी स्तनों के दूध से पुष्ट होने वाला योगी
फिर इन सामान्य स्त्रियों की मायामयी मोहिनी से कैसे प्रभावित
हो सकता है ? वह प्रकृति जननी का बालक तो दिव्यामृत पीकर
जडोन्मत्त बालवत् क्रीडा करता है। कामी पुरुष के चित्त में स्त्री के
मुख और कुच युग पर दृष्टि पडने से विकार उत्पन्न होता है, परन्तु
जो पुरुष उनको देखकर स्त्री के रूप में कामकला की
भावना कर के, उसमें उपास्य बुद्धि उत्पन्न कर लेते हैं, उनके वश
में त्रिलोकी हो जाती है। अर्थात् वे काम को जीतकर मन्मथारि
हो जाते हैं।
सूर्य जगत् का प्राण है और चन्द्रमा जगत् का मन । श्रुतियां
कहती हैं।
'प्राणः प्रजाना मुदत्येषः सूर्याः'। और 'चन्द्रमा मनसो जातः' ।
दोनों का संबंध सूर्य और चन्द्र मण्डलों से है। अनाहत चक्र
के १२ पत्र १२ आदित्यों से और विशुद्ध चक्र के १६ पत्र
चन्द्रमां की १६ कलाओं से उपमित किये जाते हैं। इसी प्रकार
मणिपूर के १० पत्र अग्नि की १० कलाओं से उपमित किये जाते
हैं। ईंडा को चन्द्र नाडी, पिंगला को सूर्य नाडी कहते हैं और सुषुम्ना
में तीनों का समावेश है। हृदय प्राण का स्थान है और आज्ञा
चक्र मन रूपी चन्द्रमा का। जो योगी सूर्य को उन्मुख कर के
सोमामृत का पान करते हैं और दिव्यानन्द का आस्वाद लेते हैं,
उनको कामाग्नि का संताप नहीं संतप्त करता। ज्ञानी, भक्त, योगी
अथवा समयाचार के उपासक किसी को भी काम प्रयोग इष्ट नहीं

सौंदर्य लहरी १३५
होता । इसलिये इन श्लोकों को एक ज्ञानी अथवा योगी के हृदय
में वैराग्य उत्पन्न करने के निमित्त ही लिखा जाना समझना चाहिये ।
परमहंस परिव्राजकाचार्य श्री शंकर भगवत्पाद की लेखिनी से
निकले हुए श्लोकों का अभिप्राय किसी सांसारिक काम वासना
से संतप्त मनुष्य की स्त्री लोलुपता की सहायतार्थ काम प्रयोगों के
लिये लिखा जाना सर्वथा असंभव है । और उनमें काम सिद्धि के
तुच्छ प्रयोगों का विनियोग देखना अथवा करना भगवत्पाद की
महानता पर कलंक लगागा मात्र है ।
शक्तिपात् करने की सिद्धि
[ २० ]
किरन्तीमङ्गेभ्यः किरणनिकुरुम्बामृतरसं
हृदित्वामाधत्ते हिमकरशिलामूर्तिमिव यः ।
स सर्पाणांदर्प शमयति शकुन्ताधिप इव
ज्वरप्लुष्टान् दृष्ट्या सुखयति सुधाधारसिरया ॥
कठिन शब्दः-- किरन्ती=किरणें फैलाती हुई (radiating)
निकुरम्ब=समूह, हिमकर=चन्द्र, शकुन्ताधिप=गरुड, सिरा=नाडी ।
सुधाधार सिरा=अमृत नाडी, जिससे अमृत का स्राव होता है ।
अर्थः— जो मनुष्य अंगों से अमृत रस रूपी किरणों के
समूह का निकास करती हुई तुझ को हृदय में धारण करता है,
और तेरा चन्द्रकान्त शिला की मूर्तीवत हृदय में ध्यान करता है,

१३६ सौन्दर्य लहरी
वह गरुड़ के सदृश सर्पों के दर्प का शमन कर देता है और
अपनी सुधा की वर्षा करने वाली (आज्ञा चक्रस्थ) नाडी के
द्वारा दृष्टि मात्र से ज्वर संतप्त मनुष्यों को सुख पहुंचाता है।
हिमकर शिला, हिम बनाने वाले चन्द्रमा की चांदनी से
द्रवीभूत होने वाली चन्द्रकान्त मणि जैसे चन्द्रमा की किरणों से
पिघलने लगती है, वैसे ही चन्द्रमण्डल के आज्ञा चक्रस्थ अधोमुख
चन्द्र बिंब से भगवती की मूर्ति भी हृदय में धारण किये जाने पर
अंग प्रत्यंग से अमृत रस की किरणें निकालने लगती हैं। वह
योगी सर्पों के दर्प को भी शान्त कर सकता है, जैसे गरुड को
देखकर सर्प भयभीत होकर चुप हो जाता है। जिस मनुष्य को
कुण्डलिनी रूपी नागन ने डस रखा है और अपनी कुंकुम सदृश दिव्य
अरुण मूर्ति के लिये उसके हृदय को निवास स्थान बना रखा है,
उस योगी पर सामान्य सर्पों के विष का प्रभाव नहीं हो सकता।
मानो कुण्डलिनी देवी की चन्द्रकान्त मणि तुल्य मूर्ति चन्द्रमा की
सोम प्रभा पडने पर अमृत का स्राव करने लगती है और हलाहल
को भी शान्त करने का सामर्थ्य रखती है। इतना ही नहीं, उस
योगी की शांभवी मुद्रा में स्थिरीभूता दृष्टि, अवलोकन मात्र से
आज्ञा चक्र की नाडी द्वारा कुण्डलिनी के उगले हुए गरलामृत को
सींचकर मनुष्यों का ज्वर शांत कर देती है। यहां ज्वर से साधारण
ज्वरों का भाव मात्र ही नहीं लेना चाहिये, यह संसार संताप भी
एक व्यापी ज्वर है, जिसके त्रिताप से भी वह योगी शक्तिपात्
दीक्षा द्वारा मुक्त कर देता है, यह प्रसिद्ध ही है। क्योंकि

सौंदर्य लहरी १३७
[ २१ ]
तडिल्लेखातन्वीं तपनशशिवैश्वानरमयीं
निषण्णां षण्णामप्युपरि कमलानां तव कलाम् ।
महापद्माटव्यां मृदितमलमायेन मनसा
महान्तः पश्यन्तो दधति परमाह्लादलहरीम्१
१ पाठान्तर= परमानन्दलहरीम्
कठिन शब्दः— अटवी=वन, महापद्माटव्यां=सहस्रार में ।
अर्थः— महापुरुष तेरी, विद्युत् रेखा जैसी पतली, सूर्य
चन्द्र और अग्नि की त्रिमयी कला को, छः कमलों के भी ऊपर
कमलों के महावन में, मलमाया से विशुद्ध मन द्वारा देख २
कर परम आनन्द की लहर को धारण किया करते हैं ।
सं० टि० इस श्लोक में अभ्यन्तर आज्ञा चक्र के ऊपर मूर्धागत
ज्योति दर्शन का स्वरूप दिखाया गया है । इससे पूर्व जो ध्यान बताये
गये हैं, वे सब नीचे के स्तरों के ध्यान हैं। कला से चित्स्वरूपा शक्ति
का अभिप्राय है । महा पद्माटवी से सहस्रार का अभिप्राय है ।
षट् चक्र का वेध कर के कुण्डलिनी शक्ति जब सहस्रार में
उठती है, तब उसकी कला बिजली के सदृश चमकती हुई रेखा के
सदृश दृष्टिगोचर हुआ करती है । वह सोम सूर्य और अग्नि तीनों
के तेज से युक्त होती है । उसके दर्शन वे ही महापुरुष योगी कर
सकते हैं जिनके मन मल माया से विशुद्ध हो चुके हैं, जिसका

१३८ सौंदर्य लहरी
दर्शन परम आल्हादकारी होता है । ब्रह्मविद्योपनिषद् में उक्त कला
का वर्णन नीचे उद्धृत श्लोकों में किया गया है ।
सूर्यमण्डल मध्येऽथ ह्यकारः शंख मध्यगः ।
उकारश्चन्द्रसंकाशस्तस्य मध्ये व्यवस्थितः ॥ ७ ॥
मकारस्त्वग्निसंकाशो विधूमो विद्युतोपमः ।
तिस्रो मात्रास्तथोज्ञेया सोमसूर्याग्निरूपिणः ॥ ८ ॥
शिखातु दीपसंकाशा तस्मिन्नुपरि वर्तते ।
अर्ध मात्रा तथा ज्ञेया प्रणवस्योपरि स्थिता ॥ ९ ॥
पद्मसूत्रनिभा सूक्ष्मा शिखा सा दृश्यते परा ॥
अर्थः— ‘ शंख के मध्य भाग में, (ध्वनि के सदृश ) प्रणव
की प्रथम मात्रा अकार सूर्य मण्डल के मध्य है, उकार दूसरी मात्रा
चन्द्रमा के सदृश उसके मध्य में स्थित है, तीसरी मात्रा मकार
अग्नि सदृश जिसमें धूआं न हो, विद्युत् वत् चमकती हुई उसके
मध्य में है । इस प्रकार तीनों मात्राओं को सोमसूर्याग्निमयी जानना
चाहिये । उसके ऊपर दीप शिखा के सदृश लौ है, उसको प्रणव के
ऊपर आधी मात्रा समझना चाहिये । वह कमल सूत्र जैसी सूक्ष्म
शिखा योगियों को दृष्टिगोचर होती है ? उक्त प्रणव कला जो
शक्ति की ही कला है, सहस्रार में दिखती है । शुद्ध अन्तःकरण
वाले योगी ही उसे देख सकते हैं, और उसका दर्शन परम आल्हाद
का देने वाला होता है । इसके दर्शन के पश्चात् ज्ञान की भूमिका
का उदय होता है । सिद्धियों की भूमिका भी नीचे ही रह जाती
है, क्योंकि प्रत्येक चक्र की सिद्धियां भिन्न २ हैं ।

The provided image contains an anatomical diagram in English (borrowed from Gray's Anatomy, commonly included in books on Kundalini/Tantra to correlate chakras and nadis with the autonomic nervous system) rather than Sanskrit or Devanagari text.

Below is the line-by-line transcription of all visible labels and text on this page:

Maxillary nerve
Ciliary ganglion
Sphenopalatine ganglion
Superior cervical ganglion of sympathetic
Cervical plexus
Pharyngeal plexus
Middle cervical ganglion of sympathetic
Inferior cervical ganglion of sympathetic
Recurrent nerve
Brachial plexus
Bronchial plexus
Cardiac plexus
Esophageal plexus
Coronary plexuses
Left vagus nerve
Greater splanchnic nerve
Gastric plexus
Coeliac plexus
Lesser splanchnic nerve
Superior mesenteric plexus
Aortic plexus
Lumbar plexus
Inferior mesenteric plexus
Hypogastric plexus
Sacral plexus
Pelvic plexus
Bladder
Vaginal plexus
Borrowed from Gray's Anatomy

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सौन्दर्य लहरी १३९
चक्रों और सहस्रार का सविस्तार वर्णन
स्थूल देह सप्त धातुओं का बना है । जो अन्न जल खाया
पिया जाता है, वह जठराग्नि से पचकर रस बनाता है, रस से रुधिर,
रुधिर से मांस, मांस से मेदा, मेदा से स्नायु, स्नायु से अस्थि,
अस्थि से मज्जा, और मज्जा से शुक्र । रुधिर, मांस, मेदा ( चर्बी, )
स्नायु, अस्थि, मज्जा, और शुक्र ( वीर्य ) सप्त धातु कहलाती हैं ।
रक्त को अंग प्रत्यंग में पहुंचाने के लिये रक्त वाहिनी ( arteries )
नलिकाओं सदृश नाडियां हैं, जब वह रक्त दूषित होकर नीला हो
जाता है तब उसको स्वच्छ करने के लिये हृदय में खेंचकर फुफुसों
में पहुंचाया जाता है, वहां श्वास द्वारा वह फिर स्वच्छ हो जाने
पर हृदय में खेंच लिया जाता है और रक्त वाहिनी नाडियों में भेज
दिया जाता है । हृदय पंप का कार्य करता रहता है, जिसका एक
ओर फुफुसों से संबंध है दूसरी ओर रक्त को लाने और ले जाने
वाली नलिकाओं से । नीले रंग के दूषित रक्त को हृदय में
खेंचने वाली नलिकायें पित्त नाडियां ( veins ) कहलाती हैं ।
इसी प्रकार मेदस् ( चर्बी ) बनाने वाले द्रव्य की भी नलिकायें
होती हैं जिनको कफ वाहिनी (Lymphs) नाडियां कहते हैं ।
मेदा से स्नायु की उत्पत्ति बताई जाती है । ये स्नायु वात, अर्थात्
प्राण वाहिनी नाडियां ( nerves ) कहलाती हैं । मज्जा अस्थियों
की नलिकाओं में होती है और शुक्र, शुक्राशय में अण्डकोषों
द्वारा बनता है । यहां हम स्नायुओं को ही नाडी नाम से संबोधित
करते हैं । ये नाडियां सुषुम्ना नाडी के द्वारा आनख शिख देह का
मस्तिष्क से संबंध जोडती हैं । इनकी सख्या ७२ हजार कही

१४० सौंदर्य लहरी
जाती है। सुषुम्ना नाडी मेरु दण्ड के भीतर सुरक्षित है। जिसकी
आकृति ∞ के सदृश मिलती हुई सी समझनी चाहिये। किसी
पदार्थ के ऐसे पुर्जों को एक दूसरे पर रखकर और दोनों ओर के
बड़े छिद्रों में दोनों ओर बारीक तारों के गुच्छों को पिरोकर सब
पुर्जों को ग्रथित कर लिया जाय तो वह सर्पाकार सुषुम्ना का ढांचा सा
दिखने लगेगा। सुषुम्ना में तारों के स्थान पर वे स्नायु हैं जो
मस्तिष्क को देह में फैले हुए समस्त नाडी जाल से संबंधित करते
हैं। और बीच के छिद्र से बनी नलिका में एक द्रव्य पदार्थ
भरा रहता है जिसको चन्द्र मण्डल से निकलने वाला अमृत कहते
हैं, इसे सुषुम्ना मानों पान कर के पुष्ट होती है। अंग्रेजी में इसे
(cerebro spinal fluid) अर्थात् मास्तिष्क सौष्मन द्रव्य
कहते हैं। सुषुम्ना के अन्दर गुदा, उपस्थ, नाभि, वक्षस्, ग्रीवा के
५ प्रदेशों से संबंधित ५ चक्र हैं, जिनको विभिन्न अंगों की नाडियों
से सुषुम्ना का संबंध होता है। सुषुम्ना के दोनों तरफ के स्नायु
भ्रूमध्य प्रदेश में एक बिन्दु पर मिलकर दक्षिण भाग से वाम ओर
और वाम भाग से दक्षिण ओर होकर सहस्रार में चढ जाते हैं, इस
भ्रूमध्य स्थान को आज्ञा चक्र कहते हैं। ग्रीवा प्रदेश के चक्र को
विशुद्ध, वक्षस् के चक्र को अनाहत्, नाभि प्रदेश के चक्र को
मणिपुर, उपस्थ देश के चक्र को स्वाधिष्ठान और गुदा प्रदेश के
चक्र को मूलाधार कहते हैं। भ्रूमध्य से ऊपर कपाल संपुट में सुषुम्ना
का ऊर्ध्व भाग चार रूपों में परिणत हो जाता है। सब से नीचे का
भ्रूमध्यस्थ अधोभाग (modula oblangata) कहलाता है,
उसके ऊपर छोटा मस्तिष्क (cerebellum or hind brain)
कहलाता है, इसको कपाल कंद कहते हैं, यहां पर पांचों ज्ञानेंद्रियों

सौंदर्य लहरी १४१
और स्वप्न की नाडियों का स्थान है, इसी को मनश्चक्र भी कहते
हैं। इसके ऊपर एक अति सूक्ष्म नलिका है जो सुषुम्ना के मध्यवर्ती
विल का वह भाग है जो छोटे दिमाग अर्थात् कपाल कंद को
सहस्रार (cerebrum) के मध्यवर्ती ब्रह्मरंध्र (Third Vent-
rical) से जोडता है। इस भाग के नीचे कपाल कंद के
सामने भी एक त्रिकोणाकृति कपाल रंध्र (Fourth ventrical)
है। (Third Ventrical) ब्रह्म रंध्र भी त्रिकोणा कृति ही है जो
पीछे से सामने की ओर फैला हुआ है। ब्रह्मरंध्र पर एक पुलसा
बना हुआ है, जिस पर सुषुम्ना पथ से आने वाले स्नायु समूह स्पर्श
कर के फिर सारे मस्तिष्क (cerebrum) के विभिन्न केन्द्रों को फैल
जाते हैं। इसलिये इस स्नायु समूह के प्रसार को सहस्रार कहते है।
गुदा के पीछे एक मांस पेशी है, जिसे कंद कहते हैं। वह
९ अंगुल लंबी और ४ अंगुल मोटी कही जाती है। इसके मध्य-
वर्ती नाभिवत् केन्द्र पर कुण्डलिनी के सोने का स्थान है। उस
स्थान को विषु चक्र भी कहते हैं, क्योंकि यहां शक्ति निष्क्रिय
सुप्तवत् रहती है, अथवा वह ईडा और पिंगला का एक स्थानीय
उद्गम स्थान होने के कारण, वहां चन्द्रमा और सूर्य दोनों का अभाव
सा रहता है अर्थात् दिन रात्रि एक समान गति रहित रहते हैं। विषु
दिन रात्रि के एक समान होने के समय को कहते हैं। कुण्डलिनी
को नाभि में धारण करने वाली मांस पेशी का कंद अधः सहस्रार
कहलाता है। क्योंकि योगियों के समष्टि प्राण देह की सब नाडियों
से खिंचकर पहिले यहां एकत्रित होते हैं और फिर सुषुम्ना में प्रवेश
करते हैं।

१५२ सौन्दर्यलहरी
ग्रीवा के ऊपर तालु का अन्तिम भाग नीचे की ओर लटका
करता है, उसे लंबिका ( काग ) कहते हैं। वह भी एक चक्र माना
जाता है। तैत्तिरीयोपनिषद् के छठे अनुवाक् में इसको इन्द्रयोनि
नाम दिया गया है, जिसका शीर्षकपाल से संबंध है। और नीचे
उसका हृदयाकाश से भी संबंध है। इस प्रकार अहंवृत्ति को हृदया-
काश से ब्रह्म रंध्र में ले जाने का लंबिका द्वारा सुषुम्ना से बाहर भी
एक मार्ग है, जिसका कपाल कंद से सीधा संबंध है, अर्थात् वह
हृदय के अष्टदल पद्म का सीधा मनश्चक्र से संबंध जोडता है।
इसीलिये हृदय के इस चक्र को सुषुम्नागत षट् चक्रों से पृथक चक्र
माना जाता है।
ऊपर कहा जा चुका है कि कपाल कंद से पांचों ज्ञानेन्द्रियों
और उनके गोलकों से संबंध रखने वाली नाडियों का निकास है।
उनमें से एक नाडी ग्रीवा से नीचे उतरकर वक्षस्, उदर, कटि भाग
में गुदा तक नीचे उतरती है, उसे अंग्रेजी में Vagus nerve
कहते हैं, योग के आचार्यों ने उस के विभिन्न स्तरों पर विभिन्न
नाम दिये हैं, जैसे कूर्म, विश्वोदरी, कुहू इत्यादि। इस नाडी की
वाम शाखा निरर्थक सी है, परन्तु दक्षिण शाखा के तीन विभाग हैं,
अर्थात् वक्ष, उदर और कटि देश के भाग। वक्ष के भाग में प्राण,
उदर के भाग में समान और नीचे के भाग में अपान के स्थान हैं।
इस नाडी का संबंध ईडा और पिंगला की मुख्य नाडियों
(sympathetic columns) से भी है, और उनका संबंध
सुषुम्ना के चक्रों से है। इसलिये यह प्राण समान अपान की नाडी

सौंदर्य लहरी १४३
स्वतंत्र है और मन के आधीन कार्य नहीं करती । इसको स्वतंत्र
नाडीविभाग (autonomous system) कहते हैं ।
सुषुम्ना के तीन परत होते हैं ऊपर के परत वाले भाग को
वज्रा कहते हैं, उसके नीचे का परत चित्रा कहलाता है जिसके बीच
में एक नलिका है । सुषुम्नागत छः चक्र अथवा कमल चित्रा में होते
हैं और बीच वाली नलिका को पुष्प के बीच वाली नलिका सदृश
समझना चाहिये, उसे ही ब्रह्म नाडी या विरजा कहते हैं ।
इस श्लोक में जिन छः पद्मों के ऊपर महापद्मावटी में भगवती
की कला की स्थिति कही गई, वे चित्रास्थित छः चक्र अथवा पद्म
हैं ! छओं चक्रों के छः अधिदेवता हैं । मूलाधार के ब्रह्मा, स्वाधि-
ष्ठान के विष्णु, मणिपूर के रुद्र, अनाहत के ईश्वर, विशुद्ध के
सदाशिव और आज्ञा के पर शिव । इनके अरों अथवा दलों की
संख्या तत्वों की कला के अनुसार है । अग्नि की १०, सूर्य की
१२, चन्द्रमा की १६, कलाएं क्रमशः मणिपूर अनाहत और
विशुद्ध के दलों के बराबर हैं । ब्रह्मा विष्णु और रुद्र प्रत्येक की
दस २ कलायें हैं, ईश्वर की चार और सदाशिव की १६ कलायें हैं ।
मूलाधार की ४, स्वाधिष्ठान की ६, और आज्ञा की दो शिराओं
को भी कला कहें तो सब का योग पूरा १०० होता है । आज्ञा
में परशिव निष्कल है, जिसकी शक्ति की ही ये सब कलाए कही
जा सकी हैं, अर्थात् सहस्रार स्थित भगवती की कला के ये सब
अवान्तर भेद हैं, अथवा वे निम्न स्तरों पर चमकने वाली प्रतिबिंब
सदृश कही जा सकती हैं । कलाओं के नाम नीचे दिये जायेंगे ।

१४४ सौंदर्य लहरी
ऊपर कहा जा चुका है कि अनाहत चक्रस्थ सूर्य उन्मुख होकर
[चन्द्र सूर्य] आज्ञा के ऊपर स्थित अधोमुख चन्द्रमा पर
अपना प्रकाश डालता है तब दोनों के योग
से चन्द्रमा में से अमृत स्रवने लगता है, जिसका प्रमाण कलाओं के
अनुसार समझना चाहिये । अनाहत चक्र के १२ पत्रों पर १२
आदित्य हैं और विशुद्ध चक्र के १६ पत्रों पर चन्द्र की १६ कलायें ।
चन्द्रमा का संबंध मन से है और सूर्य का संबंध प्राण
से । कहा है 'चन्द्रमा मनसो जातः' 'आदित्यो वै प्राणः'
'आत्मन एषः प्राणो जायते' । चन्द्रमा ईश्वर के मन से उत्पन्न हुआ
है, और आदित्य स्वयं समष्टि ब्रह्माण्ड को जीवन प्रदान करने
वाला प्राण है । प्राण का उदय सीधा आत्मा से होता है । शरीर
में मुख्यतः दो प्रकार की नाड़ियों के विभाग हैं । एक प्रकार की
नाडियां वे हैं जो मेरु दण्ड के मध्य में स्थित सहस्रार से नीचे
उतरने वाली सुषुम्ना से निकल कर सारे शरीर में फैलती हैं और
सुषुम्नागत छवों चक्र, जिनके स्थान ग्रीवा, वक्षः स्थल, कटि, मूत्र
और अधो भाग हैं, उनके निकास के केन्द्र हैं । इन नाड़ियों का
मन और प्राण दोनों से संबंध है । और दूसरे प्रकार की वे नाडियां
हैं जो आज्ञा चक्र के पास के मनश्चक्र (hind brain) से निकल
कर श्रोत्र, नेत्र, मुख, जिह्वा में फैल जाती हैं, और उनमें से एक
कूर्म (विश्वोदरी) (Vagus nerve) नीचे उतर कर गुदा तक
फैली हुई है । इसका वाम भाग छोटा है और कुछ विशेष कार्य
नहीं करता, परन्तु दक्षिण भाग फेफडों, और हृदय में श्वास प्रश्वास
का कार्य, उदर में पाचन और रस वितरण का कार्य और अधो भाग

AUTONOMIC NERVOUS SYSTEM
PARASYMPATHETIC      SYMPATHETIC

(हस्ताक्षर / Signature:)
C.R. WANKAR
1937


PARASYMPATHETIC SYSTEM

1- Optical, 2- Other sensory nerves.
3. Right Vagus nerve, 4. Coccygeal
connections.


SYMPATHETIC SYSTEM

Different connections of the symp
thetic columns (Ida & Pingala) with spin
cord on one side and different limbs on
the other.

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सौंदर्य लहरी १४५
में मलविसर्जन का कार्य करती है। पंच प्राणों की क्रियायें
इसही नाडी से संबंध रखने वाली क्रियायें है। जो मन के
आधीन नहीं हैं और सोते जागते सदा अपना कार्य किया
करती हैं। क्योंकि प्राण कभी सोता नहीं, मन सोता जागता
है। इस दक्षिण वैगस नाडी का संबंध सुषुम्ना के दक्षिण पार्श्व की
पिंगला से है, ईडा से नहीं है। इसलिये चन्द्रमा का संबंध ईडा से,
सूर्य का संबंध पिंगला से रहता है और ईडा को चन्द्र नाडी और
पिंगला को सूर्य नाडी कहते हैं।
सूर्य की किरणों में प्रकाश, उष्णता और प्राण शक्ति अर्थात्
जीवन प्रद शक्ति की त्रिधा शक्ति होती है। उनमें उष्णता विष
का कार्य करती है, परन्तु विष भी अल्प मात्रा में अमृत का कार्य
करता है, इसलिये सूर्य की उष्णता एक परिमित ताप मान की अवधि
में जीवन की रक्षा के लिये सहायक होती है और उस अवधि के
बाहर मारक सिद्ध हो जाती है। चन्द्रमा सूर्य की उष्णता को स्वयं पान
कर लेता है और प्रकाश और प्राण शक्ति को अमृत के रूप में भूमि
पर अपनी कलाओं द्वारा बरसाया करता है। यह बाह्य क्रिया प्राणि
मात्र के शरीर पर ईडा और पिंगला नाडियों द्वारा प्रभाव डालती है।
शुक्ल पक्ष में अमृत की वृद्धि होती है और कृष्ण पक्ष में कमी।
साधारण प्राणियों में अमृत का संचय नहीं होने पाता, अधोमुख
अनाहत चक्र अपनी उष्णता से सब अमृत को सुखाता रहता है।
इसलिये उसको विष की वर्षा करने वाला माना गया है।
कुण्डलिनी के जागने पर उसके उद्ध्व मुख होने पर उसकी क्रिया

१४६ सौन्दर्य लहरी
चन्द्र मण्डल पर होने लगती है और चन्द्र मण्डल से प्रसवित अमृत
सब नाडियों को सींचने लगता है।
इस विषय पर विशेष जानकारी के लिये लेखक की Divine
Power नाम की अंग्रेजी पुस्तक देखें।
श्रीमद् भागवत के प्रथम स्कन्द के १५ वें अध्याय में ४१,
४२ श्लोक संपूर्ण योग मार्ग के अनुष्ठान का बडा सुन्दर वर्णन करते
हैं। जब धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान के परम धाम चले जाने का
समाचार जाना तो उन्होंने जिस क्रम से ब्रह्मात्मैक्य कर के
उत्तरा खण्ड की ओर प्रस्थान किया था। उक्त श्लोक इस प्रकार हैं।
वाचं जुहाव मनसि तत्प्राणे इतरे च तं ।
मृत्यावपानं सोत्सर्गं तं पञ्चत्वेह्यजोहवीत् ॥ ४१
त्रित्वे हुत्वाथ पञ्चत्वं तच्चैकत्वेऽजुहोन्मुनिः ।
सर्वमात्मन्यजुहवीद्ब्रह्मण्यात्मानमव्यये ॥ ४२
अर्थः— उस मुनि (युधिष्ठिर) ने बाणि की मन में आहुति
दी, और मन की प्राण में, प्राण की अपान में और उत्सर्ग सहित
अपान की मृत्यु में और मृत्यु की आहुति पञ्चत्व में दी, फिर
पञ्चत्व की त्रित्व में आहुति देकर, उस (त्रित्व) की एकत्व में
आहुति दी, इस प्रकार सब की आत्मा में आहुति देकर आत्मा की
आहुति अव्यय ब्रह्म में दी। अर्थात मौन धारण कर के और मन
को संकल्प विकल्प रहित एकाग्र कर के बाणि को मन में लीन कर
लिया, फिर मन का प्राण से और प्राण का अपान से योग किया,

सौंदर्य लहरी १४७
और तीनों को सुषुम्ना द्वार में प्रवेश कर के मृत्यु को जीत लिया,
मानों मृत्यु को षट् चक्र वेध द्वारा पांचों तत्वों के वेध में लीन कर
दिया, फिर पांचों तत्वों को तीनों ब्रह्म, विष्णु और रुद्र ग्रंथियों के
वेध द्वारा तीनों गुणों में लीन कर दिया और तीनों गुणों को उनके
एक कारणभूत महत् तत्व में लीन कर दिया, इस प्रकार सब को
आत्मा में और आत्मा को परमात्मा अक्षर ब्रह्म में लीन कर दिया ।
तत्पश्चात् 'अहं ब्रह्मास्मि' के ज्ञान में निदिध्यासन द्वारा स्थिति
रखते हुए सायुज्य मोक्ष की प्राप्ति की ।
मणिपूर में अग्नि की दस कलाएं सारे शरीर के व्यापार को
[तत्वों और चक्रों] धारण किये हुए हैं। अग्नि का स्थान योनि
[के अधि देवों की] स्थान में बताया जा चुका है उसकी दस कलाएं
[कलाओं के नाम] मणिपूर में उठा करती हैं। मणिपूर के दस दलों
का प्रत्येक दल इन कलाओं का एक २ दल
है। अग्नि की कलाओं के नाम ये हैं:—
धूम्राचि, ऊष्मा, ज्वलिनी, ज्वालिनी, विस्फुलिंगी, सुश्रिया,
सुरूपा, कपिला, हव्यवाहिनी और कव्यवाहिनी ।
अनाहत् चक्र के १२ दल सूर्य की १२ कलायें हैं, उनके
नाम ये हैं—तपिनी, तापिनी, धूम्रा, मरीची, ज्वालिनी, रुची,
सुषुम्ना, भोगदा, विश्वा, बोधिनी, धारिणी और क्षमा ।
विशुद्ध चक्र के १६ दल चन्द्रमा की १६ कलायें हैं, उनके
नाम ये हैं—अमृता, मानदा, पूषा, तुष्टी, पुष्टी, रती, धृति,

१४८ सौंदर्य लहरी
शशिनी, चन्द्रिका, कान्ति, ज्योत्स्ना, श्री, प्रीति, अङ्गदा,
पूर्णा और पूर्णामृता ।
आज्ञाचक्र के नीचे वायु और आकाश में रुद्रग्रन्थि है, रुद्रकी
१० कलायें हैं, जिनके नाम ये हैं—तीक्ष्णा, रौद्री, भया, निद्रा,
तन्द्रा, क्षुधा, क्रोधिनी, क्रिया, उद्गारी, और मृत्यु ।
मणिपूर के ऊपर अग्नि और सूर्य मण्डलों में विष्णुग्रन्थि है, विष्णु
की भी १० कलायें हैं, जिनके नाम ये हैं। जरा, पालिनी, शान्ति,
ईश्वरी, रति, कामिका, वरदा, ह्लादिनी, प्रीति, और दीर्घा ।
मूलाधार और स्वाधिष्ठान में पृथिवी और जलकी ब्रह्मग्रन्थि है,
ब्रह्माकी १० कलायें ये हैं।—सृष्टि, ऋद्धि, स्मृति, मेधा, कान्ति,
लक्ष्मी, द्युति, स्थिरा, स्थिति, और सिद्धि । तीनों के मध्य चार
रंग की दीप शिखा तुल्य ईश्वर कला है, जिसके रंग पीत, श्वेत,
अरुण और कृष्ण ( असित ) हैं । इसका स्थान हृदय में है । शिखा
के ऊपर उसीका अग्रभागवत् सदाशिव कला है । जो विद्युत्
सदृश कही जाती है ।
तस्य मध्ये वह्निशिखा अणीयोर्ध्वा व्यवस्थिता ।
नलितोयद मध्यस्थाद्विद्युल्लेखेव भास्वरा ॥
नीवारशूकवत्तन्वी पीताभास्वत्यणूपमा ।
तस्याः शिखाया मध्ये परमात्मा व्यवस्थितः ॥
सब्रह्मा सशिवः सहरिः सेन्द्रः सोऽक्षरः परमः स्वराट् ॥
नारायणोपनिषद् खण्ड (१३-२)

सौंदर्य लहरी १४२
अर्थः—उसके मध्य अग्नि की शिखा, पतली ऊपर को
उठी हुई खड़ी है। जो नीले मेघों में विद्युत् रेखा के सदृश
चमकती है, वह नीवारशूक के सदृश पतली, पीत वर्णा,
अणु के सदृश चमकती है। उसकी शिखा के मध्य में
परमात्मा विराजता है, वह ही ब्रह्मा, शिव, हरि, इन्द्र और
परम स्वराट् अक्षर ब्रह्म है।
इसी को सदाख्य कला समझना चाहिये। सदाख्य तत्व की
१६ कलायें नीचे दी जाती हैं। निवृत्ति, प्रतिष्ठा, विद्या, शान्ति,
इन्धिका, दीपिका, रेचिका, मोचिका, परा, सूक्ष्मा, सूक्ष्मामृता,
ज्ञाना, ज्ञानामृता, आप्यायिनी, व्यापिनी और व्योमरूपा।
सब कलाओं का योग ८८ होता है, इनमें मूलाधारस्थ पृथिवी
की ४, जल की छः और आज्ञाचक्र की ईडा, पिंगला अथवा
सहस्रार की ओर बहनेवाली वरणा और असी दो कलायें मिलाने से
सब की संख्या पूरी १०० होती है। ये सब भगवती कुण्डलिनी
देवी की ही कलायें हैं। मूलाधार से उठकर सारे कुलपथ में उक्त
कलाओं के विविध रूपों में प्रकाशित होती हुई, कुण्डलिनी शक्ति
सहस्रार में अपने पति शिवजी से मिलने जब जाती है तब मानों
अनेक शृंगारों को धारण करती है।
मूलाधार से नीचे विषु संज्ञक और अधः सहस्रार दो चक्र और
भी माने जाते हैं और आज्ञा के ऊपर बिन्दु
आज्ञा के ऊपर अर्धेन्दु अथवा अर्धचन्द्रिका, निरोधिका, नाद,
९ स्तर महानाद अथवा नादान्त, शक्ति, व्यापिका,