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सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary

जगद्गुरु आदि शंकराचार्य द्वारा

DevanagariHindipublished415 पृष्ठ

पृष्ठ 182, कुल 415 में से

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पृष्ठ 182

१३६ सौन्दर्य लहरी
वह गरुड़ के सदृश सर्पों के दर्प का शमन कर देता है और
अपनी सुधा की वर्षा करने वाली (आज्ञा चक्रस्थ) नाडी के
द्वारा दृष्टि मात्र से ज्वर संतप्त मनुष्यों को सुख पहुंचाता है।
हिमकर शिला, हिम बनाने वाले चन्द्रमा की चांदनी से
द्रवीभूत होने वाली चन्द्रकान्त मणि जैसे चन्द्रमा की किरणों से
पिघलने लगती है, वैसे ही चन्द्रमण्डल के आज्ञा चक्रस्थ अधोमुख
चन्द्र बिंब से भगवती की मूर्ति भी हृदय में धारण किये जाने पर
अंग प्रत्यंग से अमृत रस की किरणें निकालने लगती हैं। वह
योगी सर्पों के दर्प को भी शान्त कर सकता है, जैसे गरुड को
देखकर सर्प भयभीत होकर चुप हो जाता है। जिस मनुष्य को
कुण्डलिनी रूपी नागन ने डस रखा है और अपनी कुंकुम सदृश दिव्य
अरुण मूर्ति के लिये उसके हृदय को निवास स्थान बना रखा है,
उस योगी पर सामान्य सर्पों के विष का प्रभाव नहीं हो सकता।
मानो कुण्डलिनी देवी की चन्द्रकान्त मणि तुल्य मूर्ति चन्द्रमा की
सोम प्रभा पडने पर अमृत का स्राव करने लगती है और हलाहल
को भी शान्त करने का सामर्थ्य रखती है। इतना ही नहीं, उस
योगी की शांभवी मुद्रा में स्थिरीभूता दृष्टि, अवलोकन मात्र से
आज्ञा चक्र की नाडी द्वारा कुण्डलिनी के उगले हुए गरलामृत को
सींचकर मनुष्यों का ज्वर शांत कर देती है। यहां ज्वर से साधारण
ज्वरों का भाव मात्र ही नहीं लेना चाहिये, यह संसार संताप भी
एक व्यापी ज्वर है, जिसके त्रिताप से भी वह योगी शक्तिपात्
दीक्षा द्वारा मुक्त कर देता है, यह प्रसिद्ध ही है। क्योंकि