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सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary

जगद्गुरु आदि शंकराचार्य द्वारा

DevanagariHindipublished415 पृष्ठ

पृष्ठ 192, कुल 415 में से

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पृष्ठ 192

१४४ सौंदर्य लहरी
ऊपर कहा जा चुका है कि अनाहत चक्रस्थ सूर्य उन्मुख होकर
[चन्द्र सूर्य] आज्ञा के ऊपर स्थित अधोमुख चन्द्रमा पर
अपना प्रकाश डालता है तब दोनों के योग
से चन्द्रमा में से अमृत स्रवने लगता है, जिसका प्रमाण कलाओं के
अनुसार समझना चाहिये । अनाहत चक्र के १२ पत्रों पर १२
आदित्य हैं और विशुद्ध चक्र के १६ पत्रों पर चन्द्र की १६ कलायें ।
चन्द्रमा का संबंध मन से है और सूर्य का संबंध प्राण
से । कहा है 'चन्द्रमा मनसो जातः' 'आदित्यो वै प्राणः'
'आत्मन एषः प्राणो जायते' । चन्द्रमा ईश्वर के मन से उत्पन्न हुआ
है, और आदित्य स्वयं समष्टि ब्रह्माण्ड को जीवन प्रदान करने
वाला प्राण है । प्राण का उदय सीधा आत्मा से होता है । शरीर
में मुख्यतः दो प्रकार की नाड़ियों के विभाग हैं । एक प्रकार की
नाडियां वे हैं जो मेरु दण्ड के मध्य में स्थित सहस्रार से नीचे
उतरने वाली सुषुम्ना से निकल कर सारे शरीर में फैलती हैं और
सुषुम्नागत छवों चक्र, जिनके स्थान ग्रीवा, वक्षः स्थल, कटि, मूत्र
और अधो भाग हैं, उनके निकास के केन्द्र हैं । इन नाड़ियों का
मन और प्राण दोनों से संबंध है । और दूसरे प्रकार की वे नाडियां
हैं जो आज्ञा चक्र के पास के मनश्चक्र (hind brain) से निकल
कर श्रोत्र, नेत्र, मुख, जिह्वा में फैल जाती हैं, और उनमें से एक
कूर्म (विश्वोदरी) (Vagus nerve) नीचे उतर कर गुदा तक
फैली हुई है । इसका वाम भाग छोटा है और कुछ विशेष कार्य
नहीं करता, परन्तु दक्षिण भाग फेफडों, और हृदय में श्वास प्रश्वास
का कार्य, उदर में पाचन और रस वितरण का कार्य और अधो भाग